नेट और नेट न्यूट्रिलिटी (Article in Hindi on Net and Net Neutrality) [ Current Affairs ]

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प्रस्तावना:- नेट में फेसबुक की एक ऐसी दुनिया है, जिसमें मेलजोल बढ़ाने और लोगों को सामाजिक बनाने के लिए रचा गया था। लेकिन अपने फेसबुक अकाउंट में एक बार झांककर देखें कि आज कितने लोगों ने सकारात्मक पोस्ट डाली हैं या खुद आपने कितनी सकारात्मक पोस्ट लाइफ या शेयर की हैं? यहां तो नकारात्मक उल्टी सोच का सैलाब आया हुआ है। वेसे तो इन्टरनेट के अन्दर कई प्रकार के भाग होते है, जिसमें से एक फेसबुक भी है। यह बहुत काम की है पर इसका उपयोग गलत होने से इससे सभी को बहुत नुकसान होता है।

शोध:- सोशल वेबसाइट्स से लोगों के रवैये में क्या और कैसे बदलाव आ रहा है यह जानने के लिए खुद फेसबुक ने अध्ययन किया है जिसके परिणाम स्वरूप 70 फ़ीसदी लोग नकारात्मक पोस्ट पढ़ने और ऐसे अपडेट करने में दिलचस्पी दिखाते हैं। देखा जाए तो फेसबुक के हजारों फायदे है! जैसे दूर हो गए परिजनों को वापस करीब लाना, विचारों की अभिव्यक्ति खुलकर करना। ऐसे ओर भी फायदे है।

उदाहरण के तौर पर दिल्ली की मनोचिकित्सक रागिनी साल्वे कहती हैं, ’जिनकी बातें सुनी नहीं जाती या जो कहने से डरते हैं, वे फेसबुक को अपना सहारा बना लेते है। ऐसा सबसे साथ होता है। ऑफिस में मिली अवहेलना, दोस्त से मिला धोखा, ससुराल वालों से मिला अपमान या जिदंगी से ऊब होने पर फेसबुक को अपना आख़िरी सहारा मानकर अपना मन यहां हल्का करते हैं। इसलिए हमें अपने मन को नकारात्मक से निकाल कर सकारात्मक की ओर सोचना चाहिए हमेशा खुश रहना चाहिए। जिससें हमारा पूरा दिन अच्छा निकले फेसबुक में दुख भरे पोस्ट को पढ़ने के बजाय उसे डिलेट कर देना चाहिए व अच्छे विचार वाले पोस्ट पढ़ने चाहिए।

दुनिया:- यह आभासी दुनिया है। ध्यान रखें कि यहां आपकी प्रोफाइल ही आपका चेहरा है। इसे किसी नए पद की भर्ती या नए रिश्तों को जोड़ने के लिहाज से भी देखा जा सकता है। इसलिए हमेशा कुछ ऐसा लिखें जिससें लोग आपके बारे में गलत राय न बनाएं। ध्यान रखे कि आप फेसबुक के जरिए किसी के विचारों, व्यवहार या आचरण को नहीं बदल सकते। हो सकता है कि आपकी यह छिपी कोशिश गलत़फहमियों को बढ़ावा देने लगे और बात बिगड़ जाए। इसलिए ऐसे प्रयास करने से बचें और अकारण लंबी बहस में न उलझें। इसमें धार्मिक या जातीय दव्ेष, असफलता, हताशा, मानसिक कड़वाहट, संदेह या केवल ध्यान आकर्षित करने की प्रवृति से इस्तेमाल करने से बचें। एक जिम्मेदार नागरिक बनने के साथ ही आभासी संसार में भी अपनी जिम्मेदारियां जाने। अच्छा लिखे! सकारात्मक लिखें नए रिश्ते बनाने और पुराने रिश्ते मजबूत करने के लिए फेसबुक को अपनाए पर सावधानी से।

फिशिंग:- यह भी एक तरह से इन्टरनेट का हिस्सा है। आजकल फोन या ई-मेल के जरिए जानकारी मांगकर, आपके बैंक खाते से पैसा निकालने की कोशिशे खूब हो रही हैं या ई-मेल पर की जाने वाली धोखाधड़ी को फिशिंग कहा जाता है। इसमें जो व्यक्ति आपको धोखा देना चाहता है, वह आपको एक वैधानिक स्वरूप ई-मेल भेजेगा। मान लीजिए किसी ने आपको भारतीय रिजर्व बैंक के नाम से या किसी सरकारी संस्थान के नाम से ई-मेल भेजा, तो हो सकता है कि आप एक जिम्मेदार नागरिक होने के नाते अपनी सारी जानकारी इसके जवाब में दे दें। पहली बार ’फिशिंग’ शब्द का इस्तेमाल 1996 में किया गया था। अधिकांश लोगों को यह लगा कि यह मछली पालन करने के जैसा कुछ होगा, लेकिन इसका तात्पर्य मछली यानी आपको कांटे में फंसाने से है।

प्रकिया:- आपकी सारी व्यक्तिगत और वित्तीय जानकारी व आंकड़े समेट लेने के बाद फिशिंग करने वाले आपके कंप्युटर में वायरस दे जाते हैं। ये धोखा देने वाले आपको बैंक कार्ड कंपनी, अन्य कारोबार या ऑनलाइन कारोबार के नाम पर ठग सकते हैं। फिर भी ई-मेल पर इस तरह के मेसेज आना फिशिंग का बहुत छोटा हिस्सा है। जबकि फिशिंग इससे कहीं ज्यादा खतरनाक है। कई बार फिशिंग करने वाले आपको फोन भी कर सकते हैं, जिसमें वे आपके कम्प्यूटर की समस्या ठीक करने या आपको लाइसेंस देने की बात कर सकते हैं। फिशिंग की प्रकिया में ये सब आता है-

  1. प्लानिंग -फिशिंग करने वाले पहले यह तय करते हैं कि किस कारोबार को निशाना बनाना हैं। इसके जरिए किस तरह से कस्टमर के ई-मेल एड्रेस और अन्य जानकारी जुटाना है। कई बार वे अनेक लोगों को एक साथ मेल भेजते हैं। ठीक वैसे ही जैसे स्पैम मेल में आते हैं।
  2. सेट अप बनाना -एक बार यह तय हो जाए कि किसे झांसे में लेना है तो ये लोग मैसेज पर मैसेज भेजने लगते हैं, ताकि किसी भी तरह इनको कोई डेटा मिल सके। इसमें प्रमुख रूप से होता है ई-मेल एड्रेस।
  3. ऐसे लेते है चपेट में -फिशिंग करने वाले आपकी जानकारी वेब पेज या पॉपअप विंडोज से भी ले लेते हैं। इसके बाद वे कोई प्रभावी संस्था बनकर आपको ई-मेल करते हैं।
  4. मकसद -जैसे ही आपने जानकारी दी, वे इसे लेकर गलत तरह से खरीदी कर लेते हैं। आपको पता ही नहीं चलता कि आपने क्रेडिट कार्ड से इतना पैसा कहां खर्च कर दिया और उल्टा आपके सिर पर कर्ज हो जाता है। यदि किसी फिशर को लगता है कि वह फिर से उसी व्यक्ति को ठग सकता है तो वह फिर से सारी प्रक्रिया करने के बाद आपके सॉफ्टवेयर और सिक्योरिटी की कमजोरी का फायदा उठाता है।

प्रकार:- फिशिंग के प्रकार इस तरह से है-

स्पीयर फिशिंग - जब इस तरह की फिशिंग के प्रयासों को किसी व्यक्ति या कंपनी के निर्देश पर किया जा रहा होता है तो यह स्पीयर फिशिंग कहलाती है। ये लोग आपकी व्यक्तिगत जानकारी जुटाकर खुद को लाभ पहुंचाने के प्रयास में रहते हैं। इसी का प्रयोग आज सबसे ज्यादा हो रहा हैं। इंटरनेट पर करीब 90 फीसदी ठगी इसी के जरिए की जा रही है।

क्लोन फिशिंग- इस तरह की फिशिंग में भेजने वाले का ई-मेल एकदम वैधानिक प्रतीत होता है। इसमें जो अटैचमेंट, कंटेंट और एड्रेस आदि होते हैं, वह सारे इतने व्यवस्थित होते हैं कि कोई भी झांसे में आ जाए। इसे ही क्लोन ई-मेल कहते हैं। इसमें अटैचमेंट या लिंक को दूषित वर्जन से रीप्लेस कर दिया जाता है और इससे ऐसा प्रतीत होता है कि भेजा गया ई-मेल किसी बड़े संगठन या सरकारी दफ्तर से आया है।

व्हेलिंग - हाल ही में हुए कई फिशिंग हमले वरिष्ठ अधिकारियों के निर्देशों पर किए गए है। जब भी इस तरह के ई-मेल अधिकारियों या हाई-प्रोफाइल टारगेट के लिए होते हैं तो इसे व्हेलिंग कहा जाता है, जिसके निर्देश भी कोई और ही देता है।

रूश वाईफाई(एमआईटीएम)- इस तरह से ई-मेल पर हमला करने वाले फ्री वाईफाई एक्सेस पॉइंट्स कन्फिगर करने की आड़ में काम करते हैं। इसमें एसएसएल स्ट्रिप जैसी चीजों का इस्तेमाल किया जाता है।

कानूनी पक्ष:- सूचना प्रौद्योगिकी (आईटी) अधिनियम 2000 की धारा 66सी में इस तरह से लोगों को धोखा देने के लिए दंड का प्रावधान है। इसमें कहा गया है कि जिसने भी जाली या फर्जी इलेक्ट्रॉनिक हस्ताक्षर, पासवर्ड या यूनिक आइडेंटिफिकेशन में प्रयुक्त पहचान का प्रयोग किया, उसे अधिकतम तीन साल की सजा हो सकती है और एक लाख रुपए का दंड भी देना पड़ सकता है।

इसके अलावा अधिनियम की धारा 66डी में धोखाधड़ी और ठगी पर प्रतिबंध का प्रावधान है। ई- कॉमर्स जब देश में तेजी से बढ़ रहा है, ऐसे में फिशिंग सबसे बड़ी चिंता मानी जा सकती है। इसको रोकने का अभी कोई तरीका नहीं आया है। फिर भी दुनिया और भारत में यह देखने में आया है कि फिशिंग के जितने भी मामले हैं, वे लोगों के अज्ञान के कारण होते हैं।

उदाहरण:- एक किस्सा नासिक के किसान का है। नामदेव वराडे नाम के किसान को 2010 में फिशिंग के कारण 29 लाख रुपए की चपत लग गई। हाल ही में बॉम्बे हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को निर्देश दिया है कि ई-मेल सेवा का प्रयोग करने वालों को मैसेज भेजकर जागरूक करें। यदि आप फिशिंग के शिकार हुए हैं, तो तत्काल सायबर अपराध विभाग में इसकी सूचना दें।

पहचान:- हम इस तरह से फिशिंग की पहचान कर सकते है-

  • जेनरिक ग्रीटिंग -ऐसे अपराधी कई लोगों को एक साथ ई-मेल भेजते हैं। अपना समय बचाने के लिए इंटरनेट अपराधी जेनरिक नामों का प्रयोग करते हैं, जैसे ’फर्स्ट जेनरिक बैंक कस्टमर’। इसमें सभी का नाम टाइप करने की जरूरत नहीं होती। यदि आपको खुद का नाम नहीं दिख रहा है तो संशय करना चाहिए।
  • जाली लिंक- यदि लिंक में कोई नाम है, जिसे आपने कभी देखा या जाना है तो जरूरी नहीं है कि यह संगठन के नाम से आया मेल जाली नहीं है। अपना माउस उस ई-मेल पर रखें और देखें कि क्या कोई मैच मिल रहा है। यदि इसमें गड़बड़ी है तो क्लिक बिल्कुल नहीं करें। साथ ही वेबसाइट में https जो रहता है, उसमें एस सिक्योरिटी के लिए ही रहता है, यदि आपको भेजे हुए ई-मेल की लिंक में https नहीं दिखता है तो आगे नहीं बढ़ें।

नेट न्यूट्रिलिटी:- यह भी नेट का ही एक भाग है। यह यूजर से एप्स और अन्य सेवाओं के लिए पैसे लेने का मामला है, जबकि दुनिया के अन्य देशों में इसके लिए कानून बन चुका है। नेट सेवाओं की तुलना केबल टीवी से नहीं हो सकती है। नेट न्यूट्रिलिटी शब्द चर्चा में है एयरटेल की वजह से। क्योंकि इस टेलीकॉम सर्विस प्रोवाइडर कंपनी एयरटेल ने वीओआईपी के लिए अलग से चार्ज लगाने की घोषणा की है, जो ग्राहकों के मौजूदा डेटा पैक का हिस्सा नहीं होगा। यानी डेटा पैक से आप केवल इंटरनेट सर्फ कर सकते हैं लेकिन व्हाट्ाएप, लाइन, फेसबुक जैसे मैसेंजर या विशेष वेबसाइटों के लिए आपको अलग से शुल्क देना होगा।

क्या है यह:- इंटरनेट अपने खुलेपन के लिए जाना जाता है। यह लोगों को एक दूसरे से जानकारियों के आदान प्रदान के लिए जोड़ता है। नेट न्यूट्रिलिटी की उपज टेलीफोन लाइन्स है। 20वीं सदी के आरंभ से इस पर काम हो रहा है। जहां तक टेलीफोन लाइन की बात है तो आप किसे भी फोन लगा सकती है। उसमें इस बात से कंपनी को कोई फर्क नहीं पड़ता है कि आप किस कंपनी की सेवा इस्तेमाल कर रहे हैं। किसे फोन लगा रहे हैं। न ही कोई खास नंबर को तब तक रोकती है जब तक उसमें कानून आदेश या बिल न भरा हो।

अधिकांश देशों में यह नियम है कि टेलीकॉम ऑपरेटर यानी कंपनी को अनफिल्टर्ड (बिना जाने कि कौन फोन कर रहा है) और अबाधित फोन सेवा देनी होती है। जब दुनिया में 1980 में इंटरनेट की शुरुआत हुई और 1990 में यह पूरी दुनिया में फेल गया तो ऐसे कोई नियम नहीं थे, जो इंटरनेट सेवा देने वाली कंपनियों (आईएसपी) से कहें कि वे भी इनका पालन करें, लेकिन अधिकांश टेलीकॉम कंपनियां ही इंटरनेट सेवा देने वाली बनीं। इसलिए वे इस नियम में काम करती रहीं। इसी नियम को नेट न्यूट्रिलिटी कहा जाता है। यानी इंटरनेट सेवा देने वाली कंपनी उसके सर्वर पर आने वाले ट्रैफिक को नियंत्रण में नहीं रख सकती। जब कोई वेब यूजर किसी वेबसाइट या वेब सेवा से कनेक्ट होता है तो यूजर का हर जगह एक जैसी स्पीड मिलती है। जो डेटा रेट-ट्यूब के वीडियों के लिए रहता है, वही फेसबुक के फोटो के लिए भी रहना चाहिए। यूजर किसी भी वैध वेबसाइट या वेब सेवा तक पहुंच सकता है। इसमें किसी भी इंटरनेट सेवा देने वाली कंपनी का हस्तक्षेप नहीं रहेगा। कुछ देशों में नेट न्यूट्रिलिटी के नियम हैं और कुछ में नहीं। इसके बाद भी इस नियम का पालन किया जाता है। यह कानून के रूप में तो नहीं नियम के रूप में प्रचलित है। कोई भी वेब यूजर किसी भी वैध वेबसाइट से जुड़ सकता है। इसमें इंटरनेट सेवा देने वाली कंपनी को इस बात की चिंता नहीं करनी चाहिए कि उसके सर्वर से कैसा कंटेट या सामग्री आ या जा रही है। इसी कारण इंटरनेट पूरी दुनिया में फेल चुका है। यह लोगों की अभिव्यक्ति का सरल माध्यम बना है।

उदाहरण के लिए आप अपने ब्लॉग में आपको इंटरनेट सेवा देने वाली कंपनी की जमकर खिंचाई भी कर सकते हैं, लेकिन उक्त कंपनी आपको उक्त पोस्ट करने से नहीं रोक सकती। लेकिन इससे भी ज्यादा अहम पक्ष है इंटरनेट के क्षेत्र में समान धरातल पर काम करने की बात। किसी वेबसाइट को शुरू करने के लिए आपको ज्यादा पैसे या कनेक्शन की जरूरत नहीं होती है। बस अपनी वेबसाइट को होस्ट कीजिए, यदि आपकी सर्विस अच्छी होगी तो वेबयूजर बढ़ते चले जाएंगे। इसमें केबल टीवी जैसा नहीं रहता है कि आपको केबल कनेक्शन देने वाले से पहले जुड़ना होगा ताकि आपके टीवी में चैनल आ सकें। इंटरनेट सेवा में इस तरह से आपको कंपनी से बात नहीं करनी होती है। इसी कारण से गूगल, फेसबुक, ट्िवटर फेलते चले गए। करोड़ाेे यूजर ये केवल नेट न्यूट्रिलिटी के कारण ही फेले हैं। उन्होंने तमाम वेब यूजर को तमाम वेबसाइट एक्सेस करने की छूट दी।

देश:- दुनिया में चिली ऐसा पहला देश है, जहां पर नेट न्यूट्रिलिटी को 2010 में लागू किया गया। 2014 में चिली टेलीकम्यूनिकेशंस के नियामक सबटेल ने मोबाइल ऑपरेटरों को जीरों रेटिंग करने से प्रतिबंधित कर दिया। ऐसे में इंटरनेट कंपनियों ने मोबाइल टेलीकॉम ऑपरेटरों के साथ मिलकर कंज्यूमर को फ्री इंटरनेट यूज करने का करार किया। इसी प्रकार से यूरोप में द नीदरलैंड्स में 2011 में पहली बार नेट न्यूट्रिलिटी का कानून पारित किया गया। बाद में यूरोपियन यूनियन ने इसी कानून को अपनाकर कानून पारित किया। मकसद केवल इतना था कि पूरे यूरोपियन यूनियन में एक समान टेलीकम्युनिकेंशस कानून हो। यहां तक कि इंटरनेट कंपलियों और मोबाइल आम्परेटरों के बीच जीरो रेटिंग करार पर भी नए कानून पर प्रतिबंध लगा दिया। ब्राजील में 2014 में पारित ’इंटरनेट लॉ’ में इसे और पैना किया गया। इसमें साफ कहा गया कि नेट न्यूट्रिलिटी का अर्थ है सभी डेटा ट्रांसमिशन को नेटवर्क ऑपरेटर समान मानेंगे। उसके कंटेट या कहा से आया है, सेवा या ऐप्लीकेशन के आधार पर भी भेद नहीं किया जाएगा। यहां तक कि इंटरनेट सेवा प्रदाता एटी एंड टी, वेरीजोन और कॉमसेट किसी भी वैध कंटेट को रोकेंगे नहीं। न ही ये कंपनियां किसी एप्लीकेशन या सेवा की स्पीड कम कर सकती हैं। साथ ही सेवा देने के एवज में पैसा भी नहीं वसुलेंगी। देश में वॉट्स एप सबसे बड़ा मैसेजिंग एप बन चुका है। इसी कारण से कई कंपनियों को घाटा लग चुका है।

उपसंहार:- इस तरह हमने देखा कि नेट मे&

- Published on: July 23, 2015