महागठबंधन (Bihar Elections - Was it a real political Game? - Essay in Hindi) [ Current Affairs ]

()

प्रस्तावना: - वैसे तो सत्ता से किसी मजबूत दल को रोकने या बेदखल करने के लिए तमाम विपक्षी दलों की एकजुटता का सिस्टम कोई नया नहीं है। एक जमाना था जब इंदिरा गांधी के खिलाफ तमाम विपक्षी दल एकजुट हुए थे। इन सबका मकसद यह था कि इंदिरा गांधी को सत्ता से बाहर करना और वे इस मकसद में सफल भी हुए परन्तु वे स्वयं भी उतनी ही तेजी से सत्ता से बाहर हो गए। फिर वह एक सपना बनकर ही रह गया। अब बिहार में लालू-नीतीश ने यह सिस्टम अपनाया और वे भी अपने मकसद में सफल हो गए।

चुनाव: - बिहार चुनाव परिणामों ने देश की राजनीति को लेकर एक नई बहस छेड़ दी है। कई नए सवाल खड़े हो गए हैं। जैसे क्या बिहार जैसे महागठबंधन अन्य राज्यों में भी बन पाएगा? कांग्रेस की आगे की रणनीति क्या होगी।? क्या भाजपा में टूट पड़ेगी? क्या नरेंन्द्र मोदी की प्रतिष्ठा समाप्त हो जाएगी? ऐसे बहुत से सवाल जो बिहार के गठबंधन से उठ खड़े हुए हैं।

देश का मतदाता कुछ समय से चौंकाने वाले परिणाम दे रहा हे। वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव में मतदाताओं ने सभी राजनीतिक पंडितों को फेल कर दिया था। भाजपा को ऐसा मत दिया जिसकी कल्पना स्वयं भाजपा ने नही की थी। इसके बाद दिल्ली में अरविंद केजरीवाल को छप्पर फाड़ के वोट मिले। परिणाम उन्होंने रिकॉर्ड तौर जीत हासिल की, और अब बिहार में ऐसा हुआ। बिहार में सब राजनीतिक पंडित फेल हो गए। बिहार में उम्मीद से कहीं अधिक सीटे मिली।

महागठबंधन: - बिहार के बाद अन्य राज्यों में महागठबंधन बनना मुश्किल है। अगले साल असम, पश्चिम बंगाल, केरल और तमिलनाडु में चुनाव हैं। इनमें पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु में कांग्रेस, भाजपा को दूसरे दलों पर टकटकी लगानी होगी। केरल में गठबंधन पहले से ही हैं। वहां पर भाजपा जरूर अपनी उपस्थिति दर्ज कराने के लिए कोशिश करेगी। असम में कांग्रेस और भाजपा के बीच सीधे मुकाबले के आसार हैं। यहां पर क्षेत्रीय दल भाजपा को रोकने के लिए कांग्रेस का अब साथ दे सकते हैं। पर महागठबंधन जैसी बात नहीं होगी। इनके बाद 2017 के पंजाब और उत्तर प्रदेश के चुनाव बताएंगे कि महागठबंधन का क्या होगा? हालांकि इनके साथ उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश में चुनाव होने हैं पर वहां पर भी भाजपा व कांग्रेस आमने-सामने हैं। विपक्ष की असल में राजनीति परीक्षा पंजाब व उत्तरप्रदेश में ही होनी है। पंजाब में नीतीश कुमार की करीबी आम आदमी पार्टी चुनाव की पूरी तैयारी में है। पर कांग्रेस कभी भी आप पार्टी के साथ नहीं जाएगी। रालद, सपा और जदयू का पंजाब में कोई वजूद नहीं है। वह कांग्रेस के साथ जाए या केजरीवाल के साथ यह तय करना आसान नहीं रहेगा। अत: महागठबंधन वाली बात होगी ही नहीं।

इतिहास: - उत्तर प्रदेश में अगर 1993 की तरह मुलायम और मायावती हाथ मिला गठबंधन बना लें तो फिर सारे समीकरण ही उलट जाएगे। उन्हें बाकी किसी दल की जरूरत ही नहीं होती। वह अकले ही भाजपा पर भारी पड़ जाते। बिहार के बाद जानकार मान रहे हैं कि उत्तर प्रदेश में मायावती अभी मजबूत हैं।

कांग्रेस: - बिहार ने कांग्रेस की उम्मीद को बढ़ा दिया है पर अब उसके सामने यह सवाल आ गया है कि राहुल गांधी जी से जो उम्मीदें थीे, वे टूट चुकी हैं। बिहार चुनाव में सहयोगी के बल पर मिली जीत के बाद उन्हें फिर सोचने पर मजबूर होना पड़ेगा। हालांकि राहुल अभी प्रधानमंत्री बनने की रेस में तो नहीं है। बिहार की जीत के बाद राहुल गांधी को वक्त फिर एक मौका दे रहा है। इसके लिए अभी असम का चुनाव होना है। एक राजनीतिक दल के दबदबे का पैमाना होता है सरकार में रहना। इस मामले में कांग्रेस लगातार पिछड़ रही है। तमिलनाडु में कांग्रेस द्रमुक के साथ चुनाव जीतने की कोशिश करेंगी। कांग्रेस की असल परीक्षा 2017 में होनी है। प. बंगाल में ममता बनर्जी के साथ कम सीटो में समझौता कर सकती है। बिहार में महागठबंधन की विजय हमारे लोकतांत्रिक मूल्यों की विजय है। दिल्ली चुनाव में भाजपा की हार को एक छोटा अपवाद बताया गया हो पर बिहार को नहीं। जिस चुनाव में प्रधानमंत्री ने अपनी व्यक्तिगत और अपने पद की प्रतिष्ठा को दांव पर लगाया और दोनों को गंवाया, उसका परिणाम एक छोटी घटना नहीं हो सकती है। इस चुनाव से अल्पसंख्यकों को मिली राहत कोई छोटी बात नहीं है।

भाजपा: - बिहार के चुनाव नतीजों में कई संदेश छिपे हैं। खासकर वर्तमान राजनीति के सबसे बड़े चेहरे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए। पहले केंद्र के फिर दिल्ली को छोड़ राज्य में आगे बढ़ रहा विजय रथ बिहार में थम गया। एनडीए को करारी हार का सामना करना पड़ा। बिहार में हार के बाद भाजपा के बुरे दिन शुरू हो गए हैं। अमित शाह ने यदि जिद नहीं छोड़ी तो परिणाम कुछ भी हो सकता है। इसलिए मोदी की कार्यशैली और अमित शाह से उनकी जोड़ी पर सवालिया निशान लग रहे हैं। उनके द्वारा देश की जनता को किए विकास के वादों का हिसाब मांगा जाने लगा है। इसलिए अब मोदी को वाजपेयी जी से सीख लेकर आरएसएस से दूरी बनाए रखनी होगी। क्योंकि अभी सरकार में संघ हावी दिख रहा है । बिहार चुनाव से पहले गोमांस और आरक्षण का मुद्दा उछाल दिया। वाजपेयी की तरह मोदी जी को भी एक मध्यम मार्ग लेना होगा। मोदी जी पहले गुजरात के मुखिया थे लेकिन अब वे देश की कमान है। उन्होंने अमित शाह के साथ जोड़ी बना ली।

अगर मोदी पूर्ण बहुमत में न होते तो मोदी जी बेहतर काम कर पाते। इसलिए पूर्ण बहुमत ही मोदी के बेड़ियां बन गया है। लगातार गैर जरूरी बयानबाजी से मोदी की छवि बिगड़ी है। इसके साथ असहिष्णुता मार्च ने मोदी जी की छवि अधिक खराब की है। उनकी सरकार में खुद सहयोगी दल, शिवसेना, अकाली दल से अच्छे संबंध नहीं है। यह सब नकारात्मक संदेश जनता में जाता है। इसके लिए जरूरी है कि मोदी को अपना फोकस सिर्फ और सिर्फ विकास पर रखना चाहिए। सबसे पहले मोदी जी को लोकसभा चुनावों के दौरान किए गए अपने वादों को पूरा करना होगा लोगों के अच्छे दिन लाने वाले नारे को हकीकत में बदलना होगा। दिल्ली चुनाव के बाद भाजपा ने आत्मचिंतन नहीं किया। बिहार चुनाव उसके लिए कड़वी दवा की तरह है। गंभीरता से कार्यशैली में बदलाव करना होगा।

मोदी: - वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव के परिणाम को ही लें। कि देश में जात-पात की राजनीति खत्म हो गई है। धर्म की राजनीति हावी हो गई है। मोदी नए करिश्माई नेता के रूप में उभर कर सामने आ है। दिल्ली चुनाव से पहले उन्होंने हाथ में जिस चुनाव की जिम्मेदारी ली, वहां भाजपा को जीत मिलती गई। हरियाणा, महाराष्ट्र और झारखंड इसके उदाहरण बने। जम्मू-कश्मीर को भी इसमें शामिल किया जा सकता है। इन सफलताओं के बाद तो भाजपा में मोदी और शाह ने जो चाहा वही हुआ। यहां पर गौर करने वाली बात तो यह थी कि अधिकांश राज्यों में कांग्रेस की ही सरकारें थी। जिनके खिलाफ नकारात्मक माहौल अधिक था जिसका लाभ भाजपा को मिला पर श्रेय मोदी और शाह को मिला।

लगातार जीत के बाद दिल्ली में 10 माह की केंद्र में मोदी सरकार की पहली बड़ी परीक्षा थी। यहां पर भी कांग्रेस के खिलाफ जनता का गुस्सा 2013 के विधानसभा चुनाव और उसके बाद लोकसभा चुनाव में उतर चुका था। इस पहली परीक्षा में मोदी और शाह की जोड़ी फेल हो गई।

दिल्ली चुनाव में न राजनीति की चली, न धर्म की, और न जात-पात की हालांकि इसके प्रयास जरूर हुए। भाजपा के नेताओं ने विवादास्पद बयान देकर ध्रवीकरण की कोशिशें की थी। दिल्ली के चुनाव परिणाम के बाद कहा भी जाने लगा था कि देश के मतदाता का मूड बदलने लगा है। मोदी का जादू कमजोर हो गया है। पर भाजपा के रणनीतिकार मानने को तैयार ही नहीं हुए। बिहार के परिणामों ने इस पर मुहर लगा दी थी। पर यहां पर भी गौर करना होगा कि भाजपा की दुर्गति केवल जात-पात की राजनीति के चलते नहीं हुई है। पर इसको एक कारण माना जा सकता है पर बाकी वजह भाजपा के रणनीतिकारों की ही रही। पर अमित शाह की नाकामियों से ज्यादा बहस जात-पात की राजनीति को लेकर ही हो रही है। अब जिन राज्यों में चुनाव होने हैं, उनमें केवल उत्तर प्रदेश एक ऐसा राज्य है, जहां पर जाति की राजनीति है।

राजनीति: - में कभी कोई स्थायी दोस्त दुश्मन नहीं होता है। इसलिए कब कौनसा राजनीतिक दल किस के साथ तालमेल कर चुनाव मैदान में उतरता है यह तात्कालिक परिस्थतियों में निर्भर करता है। पिछले सालों में लगभग दो दशक तो गठबंधन की राजनीति से ही प्रभावित ही रहे हैं। बिहार विधानसभा के ताजा चुनाव में भाजपा को बाहर करने के लिए करीब ढाई दशक तक एक-दूसरे के खिलाफ ताल ठोकते रहे नीतीश कुमार व लालू प्रसाद एक हो गए। महाराष्ट्र विधानसभा चुनावों से पहले ढाई दशकों का भाजपा और शिवसेना का साथ छूटा तो लगभग पंद्रह साल पुराना कांग्रेस और राकापा का गठबंधन भी टूटा। फिर भी महाराष्ट्र में सत्ता में बने रहने की चाहत ने भाजपा शिवसेना गठबंधन से हो गया। विभिन्न दल समय-समय पर अपने -अपने स्वार्थो के चलते किसी न किसी गठबंधन में शामिल होते रहे व उससे बाहर निकलते गए। अब कांग्रेस ने यह अच्छी तरह समझ लिया है कि सत्ता का साथ बनाए रखने के लिए गठबंधन अच्छा रास्ता हैं

उपसंहार: - सत्ता के लिए समय के अनुसार दलों का गठबंधन और महागठबंधन भले ही राजनीतिक मजबूरियों के कारण बनते-बिगड़ते रहते हैं लेकिन क्षेत्रीय दलों के उभरते स्वरूप ने मोटे तौर पर कांग्रेस व भाजपा जैसी राष्ट्रीय स्तर के राजनीतिक दलों को कमजोर ही किया है। यह बहुत ही चिंता का विषय है कि कांग्रेस जैसा राजनीतिक दल सत्ता को प्राप्त करने व अपना अस्तित्व बचाने के लिए राजनीतिक बैशाखियों का सहारा ले रहा हे। बिहार में कांग्रेस व भाजपा दोनों का ही राजनीतिक संगठन कमजोर पड़ा है।

- Published on: December 18, 2015