बोफोर्स (Boforce Guns Case - Published in Sweden Newspaper - in Hindi) [ Current Affairs ]

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प्रस्तावना:- एक बार फिर यह मुद्दा इसलिए गरमाया है। क्योंकि राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने स्वीडन के एक अखबार को दिए साक्षात्कार में बोफोर्स तोप सौदे को घोटाला मानने से इनकार कर दिया है। यह सौदा बहुत ही विवादास्पद रहा है। बोफोर्स तोपों के सौदे में दलाली की खबरों के बाद इसकी गुणवत्ता पर अनेक सवाल उठाए गए थे लेकिन जिन लोगों ने ये सवाल उठाए, उन्होंने ही करगिल युद्ध के बाद इन तोपों की गुणवत्ता को बेहतर भी बताया गया।

राष्ट्रपति:- प्रणब मुखर्जी ने कहा है कि पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी के कार्यकाल में बोफोर्स तोप सौदे में दलाली को लेकर हुआ विवाद कोई घोटाला नहीं था बल्कि यह सिर्फ मीडिया ट्रायल था। कोर्ट ने भी बोफोर्स कांड को कोई स्कैंडल या घोटाला नहीं कहा है। उन्होंने यह भी कहा है कि बोफोर्स कांड के बाद वे रक्षा मंत्री बने थे और तब सभी जनरल ने कहा था कि सेना के पास मौजूदा बोफोर्स सबसे अच्छी तोप है।

उनके इस बयान के दो पक्ष हैं-

  • एक तो बोफोर्स कांड घोटाला था या नहीं?
  • दूसरा बोफोर्स तोपें अच्छी थीं या नहीं?

घोटाला:- पहले बात घोटाले को लेकर करते हैं। यदि राष्ट्रपति अधिकृत तौर पर कह रहे हैं तो उस बात पर हमें कोई विवाद खड़ा नहीं करना चाहिए। हमारी केवल सोच या धारणा है कि बोफोर्स तोप सौदों में दलाली ली गई लेकिन किसने ली, कहां ली यह कुछ भी साबित नहीं हो सका। ये केवल आरोप के स्तर पर ही बातें रही हैं। जब कोई बात कोर्ट में साबित ही न हो पाए तो उस बात को दावे के साथ कहना भी गलत ही होगा। जहां तक रक्षा सौदों में ली गई दलाली का मामला है तो शायद ही संसार में ऐसा कोई हथियारों का सौदा होता हो जिसमें कमीशन ना लिया जाता हो या लॉबिंग नहीं होती हो।

कुछ देशों में इसे वैधानिक रूप से सही मानते हैं और पांच फीसदी या 10 फीसदी जो भी तय हो, उस आधार पर कमीशन लिया-दिया जाता है। हमारे देश में राष्ट्र की सुरक्षा के लिए किए जाने वाले हथियारों के सौदों के मामले में लेन देन को नैतिक तौर पर उचित नहीं माना जाता है लेकिन हमारे यहां भी हथियारों के सौदों के लिए भी लॉबिंग तो होती ही है इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है। इस लॉबिंग के संदर्भ में स्पष्ट धारणा है कि हथियारों की गुणवत्ता को लेकर ईमानदारी होनी ही चाहिए और देश की सुरक्षा के मामले में किसी तरह की चूक बर्दाश्त नहीं होनी चाहिए। निजी तौर पर गुणवत्ता के मामले में बोफोर्स तोपें ठीक थीं लेकिन कुछ ना कुछ घोटाला जरूर हुआ जो साबित नहीं हो सका।

मीडिया:- सवाल यह उठता है कि मीडिया के दव्ारा उजागर किसी घोटाले या भ्रष्टाचार को कितना सही माना जाए? जबकि इसके आधार पर एक सरकार का पतन हो गया। भारत से स्वीडन तक सरकारी तौर पर, संसदीय समितियों और तमाम एजेंसियों की ओर से जांच की गई। फिर भी आज तक किसी न्यायालय में इसे साबित कर पाना या न्यायालय का फैसला नहीं आ पाना क्या साफ संकेत नहीं था कि मात्र मीडिया को हथियार बनाकर राजनीतिज्ञ अपना काम निकाल लेते है? तीन दशक से यह मुद्दा राजनीति का हथियार बना हुआ है। आश्चर्य की बात तो यह है कि हर सरकार के रक्षा मंत्री ने बोफोर्स तोपों को बेहतरीन बताया है। इस घोटाले ने विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र में किसी संवेदनशील मुद्दे पर फैसला नहीं कर पाने से न्यायिक व्यवस्था की पोल भी खोली दी है। साथ ही जांच एजेंसियों का सच भी सबके सामने ला दिया है। होना तो यह था कि मीडियां या एजेंसियों में जो कुछ भी उजागर हो उसकी समयबद्ध निष्पक्ष जांच की जाती एवं न्यायालय में समयबद्ध सुनवाई हो पाती ताकि कोई दोषी हो तो उसकी सजा मिलती। अगर वह निर्दोष हो तो बरी हो जाते। इस तरह जांच होने से ना तो राजनेता इसका फायदा उठा पाते और ना ही अनर्गल प्रचार से मतदाता को भ्रमित कर पाते। जांच और न्याय में समय लगने से राजनीति करने वालों को मौका मिल जाता है जो कि न तो किसी व्यक्ति विशेष और ना ही देश हित में होता है। यह मुद्दा मीडिया को भी ओर जवाबदेही अपनाने का संदेश देता है।

समझौता:- जहां तक जानकारी है कि बोफोर्स तोप सौदे में तोप की ज्यादा कीमत अदा की गई, यह बात सत्य है। यही बात इस ओर संकेत भी करती है कि इस सौदे में कमीशन दिया गया। इस बात को समझना होगा कि दुनिया के लगभग सभी देशों में इस प्रकार के सौदों में कमीशन अदा किया जाता रहा है और बोफोर्स तोप सौदा इस मामले में अछूता रहा होगा, ऐसी उम्मीद करना ठीक नहीं है। बोफोर्स तोपें ही क्यों खरीदी गई, अन्य तोपें भी खरीदी जा सकती थीं। अन्य प्रतिस्पर्धी तोपों की किस प्रकार से तुलना की गई और क्या बोफोर्स तोप के मामले में राजनीतिक पक्ष लिया गया, इन बातों का विशेष अर्थ नहीं है क्योंकि तोपों की गुणवत्ता को लेकर किसी को भी संदेह नहीं है। इन तोपों के इस्तेमाल से यह साबित भी हुई है।

बोफोर्स तोपें:- जब यह सौदा हो रहा था तब तोपों की गुणवत्ता को लेकर कुछ संदेह जरूर रहा था पर बाद में यह संदेह दूर भी हो गया। गन तो आखिर गन होती है, उसमें बहुत अधिक फर्क नहीं होता। वह फ्रांस की है, स्वीडन की हैं या स्विट्जरलैंड या कहीं और की, उसकी गुणवत्ता में बहुत अधिक अंतर नहीं होता। अतंर होता है उस गन या तोप के साथ जोड़ी गई सुविधाओं के कारण। समझौते के तौर पर बाते निम्न हुई थी-

  1. 1986 में भारत सरकार और स्वीडिश हथियार निर्माता कंपनी ए बी बोफोर्स के बीच 155 एम एम की 400 तोपों की आपूर्ति का समझौता हुआ था।
  2. 1987 में पहली बार स्वीडिश रेडियों पर खबर प्रसारित हुई कि 1986 में बोफोर्स तोप सौदे का अनुबंध प्राप्त करने के लिए बोफोर्स कंपनी ने भारतीय राजनेताओं को रिश्वत दी थी।
  3. 1500 करोड़ रुपए की डील हुई थी। 64 करोड़ रुपए की दलाली की बात सामने आई थी।

इसके अलावा हम कह सकते हैं कि हमारी जरूरत के मुताबिक तोपें कितनी कारगर रहने वाली हैं, इन बिंदुओं पर ध्यान देना होता है-

  • हमें पहाड़ो पर तैनात करने लायक हो।
  • मैदान में या ऊंचे पहाड़ों के संकरे रास्तों में तोपों को मोड़ने में आसानी हो।

इन बातों को ध्यान में रखकर भी तोपें खरीदनी होती हैं। शुरू में बोफोर्स तोपों को लेकर उत्पन्न संदेह दूर हो गया और किसी प्रभाव में दूर हुआ या फिर कोई अन्य कारण रहे, इस पर कोई टिप्पणी नहीं की जा सकती है। लेकिन इतना जरूर कहा जा सकता है कि करगिल की लड़ाई में बोफोर्स तोपें बहुत कारगर रहीं थी। इनकी मारक क्षमता बहुत अच्छी रही थी।

लॉबिंग:- कुछ देशों में अधिकृत तौर पर हथियारों के सौदों में लॉबिंग होती है और भारत में इसे नैतिक तौर पर गलत समझा जाता है लेकिन अंदर ही अंदर लॉबिंग होती तो है ही। इन परिस्थितियों में पता नहीं चलता कि किसे मिला और कितना मिला। रक्षा सौदों में इस तरह की दलाली को अधिकृत कर दिया जाए तो ज्यादा बेहतर होगा और बातें स्पष्ट रहेंगी। इस बात का आदर्श रूप में ध्यान रखा जाना चाहिए कि खराब गुणवत्ता से किसी प्रकार का समझौता न किया जाए। खराब गुणवत्ता वाले उपकरणों के चयन पर तो कोई माफी बनती ही नहीं है। यदि रक्षा सौदों में किसी भी प्रकार का कमीशन ना दिया जाए तो इसके लिए बहुत ही ईमानदारी लोग चाहिए अन्यथा पर्दे के पीछे यह खेल चलता ही रहेगा।

प्रचार:- दरअसल, बोफोर्स खरीद का मसला उस दौर में अखबारों में इतना चर्चित हुआ कि लोगों में इसको लेकर शक पैदा हो गया था। भले ही भारत की किसी भी अदालत में इसे ’स्कैडल’ नहीं बताया। पर पूरे घटनाक्रम में कुछ ऐसी अस्पष्ट बातें थीं, जिनसे शक गहराता चला गया। उस दौर राजीव गांधी के नजदीकी और उनकी सरकार में रक्षा मंत्री रहे वीं पी सिंह ने राजीव जी को छोड़ दिया था। पर यह स्पष्ट नहीं हुआ कि वी पी सिंह ने गांधी जी का साथ क्यों छोड़ दिया। फिर जब वे चुनावी प्रचार के लिए जनता के बीच गए तो उन्होंने बोफोर्स मामले के मसले को खूब उठाया। इससे लोगों को यह अहसास हुआ कि वी पी सिंह को शायद बोफोर्स खरीद के बारे में कुछ जानकारियां थीं इसलिए वे इस विषय को बार-बार खड़ा करते रहे।

दूसरी बात, यह भी सुनने में आया था कि रक्षा मंत्रालय के भीतर बोफोर्स खरीद की फाइल बार-बार ऊपर नीचे होती रही। एक वरिष्ठ सचिव थे गोपी अरोड़ा, उन्होंने भी एक बार लिखा था कि सरकार दव्ारा उन पर दबाव डाला गया था कि बोफोर्स खरीद की फाइल को जल्दी स्वीकृत किया जाए। इसी प्रकार राजीव गांधी की सरकार में रक्षा राज्य मंत्री रहे अरुण सिंह भी बोफोर्स पर विवाद बढ़ता देख राजीव गांधी का साथ छोड़कर चले गए। सवाल तत्कालीन सैन्य प्रमुख जनरल के सुंदर जी के एक साक्षात्कार से भी उठे, जिसमें उन्होंने कहा था कि फौज शुरुआत में बोफोर्स का चयन करने में ज्यादा सहमत नहीं थीं।

यह भी कहा जाता है कि 85 से 200 करोड़ तक दलाली दी गई थी। यह दलाली फौज के स्तर पर नहीं, बल्कि नेताओं और नौकरशाहों के स्तर पर दी गई थी। दरअसल, उस जमाने में रक्षा खरीद में एजेंट ज्यादा शामिल होते थे। खुद स्वीडिश रिपोर्टं के हवाले से सामने आता रहा कि बोफोर्स ने पैसे दिए थे। अब जाहिर है कि यह पैसा भारत में ही दिया गया होगा।

जनरल:- सुंदर जी ने अपने देहांत से पहले एक साक्षात्कार में कहा था कि बोफोर्स की खास तकनीक थी, उसकी ’शूट एंड स्कूट’ क्षमता। इसका मतलब यह होता है कि लड़ाई के दौरान जब बोफोर्स से गोलाबारी की जाती है तो यह दुश्मन को अंदाजा नहीं होने देती कि सामने वाली फौज किस स्थान से हमला कर रही है। यानी इससे गोलाबारी कर तुरंत स्थान बदलनें में सहूलियत रहती है। इससे दुश्मन देश को सेना को भ्रम बना रहता है। करगिल में बोफोर्स ने इसी तकनीक चलते कमाल कर दिखाया था, इससे यह साबित हुआ कि यह हथियार कितना बेहतर है।

उपसंहार:- जब रक्षा संबंधित उपकरणों या हथियारों के सौदे होते हैं तो कमीशन अदा किया जाता है लेकिन इस मामले में ध्यान रखने की बात यही होती है कि गुणवत्ता को लेकर समझौता नहीं किया जाना चाहिए। बोफोर्स तोपों के मामले में भी गुणवत्ता को लेकर किसी प्रकार का समझौता नहीं हुआ है। चाहे करगिल युद्ध को मौका रहा हो या फिर कोई और मौका, बोफोर्स तोपों का बेहतर इस्तेमाल किया गया था। गुणवत्ता के लिहाज से तोपें कमजोर साबित नहीं हुई व न ही यह साबित हुआ कि यह किसी प्रकार का घोटाला था।

- Published on: July 23, 2015