चाइना- पाकिस्तान इकनॉमिक कॉरिडोर (China Pakistan Economic Corridor - Article in Hindi) [ Current Affairs ]

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प्रस्तावना: - अमरीका केे साथ बढ़ती भारत की नजदीकियों से चिंतित चीन अपनी ताकत को बढ़ाने के लिए नई कारगुजारियों में जुट गया है। पाकिस्तान में निवेश के बहाने काश्गर (चीन) से ग्वादर (पाकिस्तान) तक आर्थिक कॉरिडोर बनाकर चीन दक्षिण एशिया में अपनी ताकत बढ़ाने के साथ भारत को भी साधने की कोशिशों में जुटा है।

चीन: - इस साल अप्रेल में चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग इस्लामाबाद गए और उन्होंने चीन-पाक आर्थिक कॉरिडोर के लिए 46 अरब डॉलर की मदद पर दस्तखत किए। चीन ने इस पूरे सिल्क रूट के प्रोजेक्ट को ‘वन बेल्ट वन रोड’ नाम दिया है। चीन के लिए यह आर्थिक बेल्ट है इसलिए चीनी नजरिए से यह बहुत अहम है। चीन अपने जोखिम पर ही यह प्रोजेक्ट शुरू करेगा। पाकिस्तान का मकसद इतना ही है कि उसे कैसे भी पैसा मिल जाए ताकि कुछ विकास हो सके। पर अमरीका के अफगास्तािन से चले जाने के बाद चीन पर ही उसकी आर्थिक निर्भरता बढ़ती जाएगी। कच्चे तेल की जरूरत के मामले में चीन वर्तमान में 80 फीसदी आयात पर निर्भर है। कॉरिडोर के माध्यम से वह मध्य पूर्व के देशों से दूरी घटाने की बात कर रहा है। कॉरिडोर से केवल कच्चा तेल आयात ही सस्ता नहीं पड़ेगा बल्कि इसके जरिए चीन का निर्यात भी सुगम होगा।

मकसद: - इनके मकसद निम्न हैं-

  • इसके पीछे चीन का पहला मकसद है मलक्का जलडमरूमध्य की दुविधा से पार पाना, जिसका ज्यादातर इस्तेमाल ऊर्जा आपूर्ति के लिए होता है। मलक्का अमरीका द्वारा नियंत्रित होता रहा है, इसका तोड़ निकालने के लिए यह कॉरिडोर अहम होगा।
  • दूसरा मकसद इसके जरिए भारत के खिलाफ संतुलन स्थापित करना है। इस प्रोजेक्ट की निर्माण गतिविधियों को आंतककारियों से बचाने के लिए पाक और चीनी सैनिक वहां मौजूद रहेंगे तो भारत के खिलाफ संतुलन बनेगा।
  • तीसरा मकसद कश्मीर को लेकर है। कश्मीर जो कि भारत और पाक में बंटा है। चीन अभी ऐसा संकेत दे रहा है कि वो कश्मीर के लिए अपनी नीति पर नए सिरे से काम कर रहा है। यद्यपि वह कह रहा है कि यह बदलाव सिर्फ आर्थिक उद्देश्य के लिए ही है। पर वह अपनी नीति भारत के हितों को हानि पहुंचाने के इरादे से बदल रहा हैं। भारतीय संसद ने 1993 में एक प्रस्ताव पारित किया था कि पूरा कश्मीर भारत का हिस्सा है। पर पाक और चीन की परिभाषा में गिलगिट और बालटिस्तान को कश्मीर का हिस्सा नहीं माना जाता है। गिलगिट और बालटिस्तान उत्तरी हिस्सा माना जाता है। पर वे उत्तरी हिस्से को कश्मीर का हिस्सा नहीं मानते हैं। चीन के ढांचागत प्रोजेक्ट इन्हीं उत्तरी इलाकों-गिलगिट बालटिस्तान मेंं शुरू होंगे, इसके म द्देनजर चीन अपनी कश्मीर नीति नए सिरे से शुरू कर रहा है।
  • इस कॉरिडोर का चौथा मकसद अमरीका को संकेत भेजना। अब इस कॉरिडोर में स्थित पाकिस्तान के इलाकों में चीन की मौजूदगी होगी।

परियोजनाएं: - प्रस्तावित ‘चाइना- पाकिस्तान इकनॉमिक कॉरिडोर’ से पाकिस्तान को आर्थिक और रणनीतिक दृष्टि से फायदे ही फायदे नजर आ रहे है। इस कॉरिडोर के अंदर कई सारे छोटे-छोटे प्रोजेक्ट शामिल है जैसे सड़क निर्माण, 10400 मेंगावॉट की बिजली परियोजनाएं (जिसमें कोयला, पवन, सालर, तथा पन बिजली सभी प्रकार की परियोजनाएं), 1800 किमी लंबी रेलवे लाइन तथा चीन के काश्गर से पाक के ग्वादर बंदरगाह तक तेल पाइप लाइन, इसके अलावा सूचना-संचार जरूरतों के लिए ऑप्टिक फाइबर लाइन बिछाना। इस प्रकार पाक में बुनियादी ढांचा के विकास की दृष्टि से देखें तो यह पाक के लिए तो बहुत फायदे का साबित हो सकता है, अगर यह मनमाफिक क्रियान्वित हो जाए तो।

निवेश: -

  • पाक की धरती चीन के लिए भू-रणनीतिक महत्व रखती है। सड़क से लेकर समुद्र मार्ग तक वह दक्षिण एशिया में अपने सबसे बड़े प्रतिद्धंद्धी भारत को सरलता से घेर सकता है।
  • चीन अपनी हर रोज 1.80 करोड़ डॉलर खर्च करके 65 लाख बैरल कच्चा तेल मध्य पूर्व के देशों से आयात करता है। इस तेल आयात के लिए जहाजों को मलक्का की खाड़ी तक 9912 मील का सुर तय करना पड़ता है। काश्गर से ग्वादर तक कॉरिडोर बनने से यह दूरी मध्य चीन तक 3626 मील और पश्चिम चीन तक यह दूरी 2295 मीन ही रह जाएगी।
  • यदि इस कॉरिडोर से चीन वर्तमान आवश्यकता का 50 फीसदी कच्चा तेल भी आयात करता है तो उसे रोजाना 60 लाख डॉलर और हर साल दो अरब डॉलर की बचत होगी।

चिंता: -

  • परियोजना के तहत कॉरिडोर पाक अधिकृत कश्मीर से होकर गुजरेगा जिस पर भारत दावा करता रहा है। सवाल यह है कि विवादित क्षेत्र पर पाकिस्तान कैसे अनुमति दे सकता है और चीन को क्यों स्वीकार्य है? यह सीधे तौर पर भारत की संप्रभुता का उल्लंघन है।
  • पाक के ग्वादर बंदरगाह विकसित कर हिंद महासागर में चीनी नौसेना की मौजूदगी होगी जो भारत की सुरक्षा के लिए खतरा साबित हो सकती है।
  • नौसेना ही नहीं पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर की ओर से भी चीन की सेना की आवाजाही सुगम हो जाएगी। इस तरह भारत को घेरना अधिक सरल होगा।
  • अभी तक चीन कश्मीर के मुद्दे को भारत-पाक के बीच की समस्या मानकर तटस्थ रहा है लेकिन पाक अधिकृत कश्मीर से सड़क गुजरने के बाद यह बालिटस्तान गिलगित्त को पाक का हिस्सा मान सकता हैंं।

पाकस्तािन: - चीनी निवेश पर इसके नुकसान व फायदे इस इस प्रकार है-

फायदे -

  1. चीन और पाकिस्तान के बीच सालाना 16 अरब डॉलर का व्यापार होता है जो 12.57 फीसदी की गति से बढ़ रहा है। इसमें और तेजी आएगी।
  2. 46 अरब डॉलर के निवेश में से कॉरिडोर के लिए 11 अरब डॉलर ऋण के तौर पर मिलेगें। पाकिस्तान के लिए आधारभूत सेवा के लिए इतनी बड़ी राशि खर्च करना कठिन है।
  3. यदि चीन इतना बड़ा निवेश पाकिस्तान में कर पाया तो पाकिस्तान के लोगों को ही बड़ी संख्या में रोजगार मिलेगा।
  4. पाकिस्तान के घरेलू उद्योगों को भी घरेलू व्यापार के साथ निर्यात में भी इस मार्ग का लाभ मिलेगा। चीन की कंपनियों को पाकिस्तान में बिजली उत्पादन क्षेत्र में एक बड़ा कारोबार मिल जाएगा और बिजली की कमी से जूझ रह पाकिस्तान को बिजली मिल जाएगी। अन्य परियोजनाओं से भी पाकिस्तान को लाभ की उम्मीद है

नुकसान -

  1. किसी भी संप्रभु राष्ट्र के लिए अन्य देश को सड़क व समुद्री मार्ग की सुविधा देना सामरिक दृष्टि से खतरनाक हो सकता है।
  2. 35 अरब डॉलर भी ऋण हुआ तो पाक की सर्वाधिक आर्थिक निर्भरता चीन पर होगी। इन बढ़ते रिश्तों से अमरीका-पाक संबंध प्रभावित हो सकते हैं।
  3. अन्य परियोजनाओं में निवेश के लिए चीन पाक सरकार से रिवॉल्विंग लेटर ऑफ क्रेडिट मांगेगा जिसे देना पाकिस्तान के बैंकों के बस की बात नहीं हैं।
  4. पाक उद्योगों ने कॉरिडोर का लाभ नहीं लिया तो यह केवल उसके करदाताओं की कीमत पर चीनी व्यापार के लिए लाभकरी होगा।

भारत: - चीन का हमारे साथ लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल पर जमीनी सीमा का विवाद तो बरसों से चला आ रहा हैं पर अब वह भारत को जलसीमा में भी लगातार परख रहा है। जिस प्रकार चीन हमारे सीमाई मामलों में दखल देते है, वैसे ही भारत भी उसकी जलसीमा में दखल दे सकता है। मसलन, भारत भी दक्षिण चीन महासागर विवाद में शामिल हो सकता है। साथ ही जापान के साथ संकाकू दव्ीपसमूहों पर चीन के रूख के खिलाफ खड़ा हो सकता है। 14 देशों के साथ चीन की जमीनी अथवा सामुदायिक सीमाएं लगती हैं। इनमें से चीन का जापान और भारत के साथ सीमाई विवाद बार-बार उभरता रहा है।

चीन की समुद्री नीतियां हमेशा से ही अपने हित ताकने वाली रही है चाहे वह दक्षिण चीन सागर विवाद हो या जापान के दव्ीप समूहो का मसला। इस बीच चीनी पनडुब्बी के हिंद महासागर से गुजरने पर भारत की आपत्ति का चेतावनी भरे लहजे में चीन ने जवाब दिया कि सामरिक रूप से महत्वपूर्ण हिंद महासागर क्षेत्र में स्थिरता लाने में वह भारत की भूमिका स्वीकार करता है लेकिन इसे भारत का ‘आगन’ समझने की धारणा परेशानी का सबब बन सकती है। 21 वीं सदी में हिंद महासागर में टकराव की अमरीकी भविष्यवाणी पर चीन ने कहा, असहमति के बावजूद इस आशंका से इनकार भी नहीं है। उसी तरह से हमारे पूर्व विदेश मंत्री एसएम कृष्णा ने भी 2012 में कहा था कि चीन सागर नाम मात्र होने उस पर चीन का अधिकार नहीं हो जाता। इस तरह के बयानों का ज्यादा मतलब नहीं होता है। हकीकत इससे कहीं जटिल और अलग है।

भारत के पास पिछले दस साल से है ईरान स्थित चाबाहर बंदरगाह। भारत ने ईरान में आर्थिक गतिविधियां बढ़ाने के लिए चाबाहर पोर्ट का संचालन शुरू किया था। यह सामरिक लिहाज से भी अहम है। भारत यहां से पाकिस्तान और चीनी गतिविधियों पर बराबर नजर बनाए रख सकता है। यह 72 किमी की दूरी पर स्थित है चाबाहर पोर्ट ग्वादर पोर्ट से । चाबाहर पोर्ट भारत के लिए अफगानिस्तान और सेंट्रल एशिया के दरवाजे खोलता है। इसलिए भारत को इस पोर्ट के विस्तार पर जोर देना चाहिए। ताकि वह चीन से निपट सके।

व्यवहार: - यह कॉरिडोर उन क्षेत्रों से गुजरता है, जिनमें पाकिस्तान और चीन दोनों ही आतंकवाद से प्रभावित हैं। इसलिए इसकी व्यवहारिकता पर सवाल तो हैं। फिर इस कॉरिडोर के पूरे होने के लिए जो मियाद रखी गई वर्ष 2017, वह कुछ ज्यादा ही आशावादी है। यद्यपि कुछ प्रोजेक्ट्स एक दो साल बाद भी पूरे होने हैं, पर इतना जल्दी यह सब हो पाएगा, आज के हालात को देखते हुए यह मुश्किल लगता है। कॉरिडोर डॉलर निवेश किया जाना है। इसमें से 15.5 बिलियन डॉलर तो बिजली परियोजनाओं के विकास पर ही खर्च होगा। ये परियोजनाएं वे चीनी कंपनियां विकसित करेेंगी, जिनको चीन के बैंकों से ही इस काम के लिए ऋण मिलेगा।

कॉरिडोर: - इस कॉरिडोर का सबसे बड़ा हिस्सा पाकिस्तान के उस प्रांत ब्लूचिस्तान (क्षेत्रफल में लगभग दो तिहाई पाकिस्तान) में स्थित है, जो लंबे समय से अलगाववादी उग्रवाद की समय से जूझ रहा है। इन ब्लूचों को न खरीदा जा सकता है और नही बरगलाया जा सकता है। पाकिस्तान के इस सबसे बड़े प्रांत में बगावत की समस्या को काबू करना पाकिस्तान के लिए बहुत बड़ी कठिन समस्या है। इन ब्लूच उग्रवादियों ने पहले भी चाइनीज इंजीनियरों को मारा है तथा पाकिस्तान की गैस और तेल पाइनलाइनों को ध्वस्त किया है। तो आने वाले इन योजनाओं व कॉरिडोर को कैसे सुरक्षा करेंगे।

उपसंहार: - जहां तक चीन पाक कॉरिडोर का सवाल है तो अभी भी यह कॉरिडोर अवधारणा स्टेज पर ही है। अगर यह पूरा हो जाता है, जैसी कि अभी बात चल रही है, तो सुरक्षा की दृष्टि से भारत की चिंताएं निश्चित रूप से कुछ तो बढ़ जाएगी। लेकिन यह तब की बात है जबकि काश्गर-ग्वादर कॉरिडोर हकीकत में तब्दील हो जाता है, क्योंकि इसके बाद चीन की हिंद महासागर तक सीधे पहुंच हो जाएगी। लेकिन कॉरिडोर को अमली जामा पहनाना चीन और पाकिस्तान दोनों के लिए इतना आसान नहीं है। पाकिस्तान यह कह जरूर रहा है कि कॉरिडोर सुरक्षा के लिए अलग से सैनिक बल तैयार करेगा, पर उग्रवाद की समस्या से निपटने के पूराने इतिहास को देखे तो यह बात विश्वसनीय नहीं लगती।

- Published on: August 7, 2015