रवि शास्त्री (Contribution of Ravi Shashtri to Indian Cricket Team - In Hindi) [ Current Affairs ]

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प्रस्तावना:- भारतीय क्रिकेट टीम के हरफनमौला क्रिकेटर रहे रवि शास्त्री ने पिछले साल जब टीम के निदेशक का पद संभाला तो बुरी तरह हार रही टीम ने विदेशी धरती पर संघर्ष का जज्बा दिखाना शुरू किया। इसके बाद विश्वकप तक आते-आते तो टीम ने अविश्वसनीय प्रदर्शन से सभी को चकित कर दिया। अब उन्हें भारतीय टीम का लंबी अवधि के लिए कोच नियुक्त करने की चर्चा जोरों पर हैं। यदि उन्हें कोच बनाया जाता है तो डेढ़ दशक के बाद टीम का कोच भारतीय होगा। तो क्या पूर्व में विदेशी कोच को रखना बीसीसीई की भूल कही जाएगी? या फिर कोच के रूप में कितने सफल रहेगें रवि शास्त्री इसके साथ ही उनका और एक दिवसीय टीम के कप्तान एम.एस. धोनी से रहा टकराव टीम की मनोदशा पर क्या प्रभाव डालेगा?

शास्त्रीजी:- जहां रविशंकर जयद्रथ शास्त्री की क्रिकेटीय प्रतिभा का सवाल है तो उन्हें असाधारण क्रिकेटर कहना ठीक नहीं होगा। वे ऐसे खिलाड़ी रहे है जो थोड़ी बल्लेबाजी और थोड़ी गेंदबाजी भी कर सकता था। लेकिन, जहां तक जीवटता का प्रश्न है, इस मुंबईकर का कोई जवाब नहीं था। उन्हें 1981 में टीम में तब शामिल किया गया जब बांए हाथ के स्पिनर दिलीप दोशी और दाएं हाथ के दूसरे स्पिनर शिवलाल यादव घायल थे। उस समय ऑस्ट्रेलिया में ही उसके खिलाफ श्रृंखला बराबर करके न्यजीलैंड पहुंची टीम के साथ शास्त्री जुड़े तो पहली बार भले ही भारत ने मैच गंवाया हो लेकिन उन्होंने 10 विकेट हासिल कर अपने प्रदर्शन से सभी को प्रभावित किया था। उनमें वीनू मांकड़ और बिशन सिंह बेदी जैसी गेंदबाजी की प्रतिभा कतई नहीं थी लेकिन जो जज्बा और ऊर्जा उनमें रही, उसके दम पर उन्होंने खुद को हरफनमौला के तौर पर स्थापित किया। दसवें से लेकर पहले नंबर तक बल्लेबाजी कर पाना कोई मामूली बात नहीं है।

यदि कोई खिलाड़ी महान प्रतिभाशाली हो तो यह जरूरी नहीं कि वह उतना ही सफल कोच भी साबित हो। इस बात के संदर्भ में यह बात कही जा सकती है कि रवि सीमित प्रतिभा संपन्न खिलाड़ी रहे लेकिन इस बात से कोई इनकार नहीं करेगा कि एम.एल. जयसिम्हा, कर्नाटक के सुब्रमण्यम, अशोक मांकड़ जैसे लोगों में शामिल हैं जो क्रिकेट के चतूरतम कप्तान हो सकते थे। ये सभी उसी तरह के मस्तिष्क और प्रवृति के व्यक्तित्व रहे हैं। ये सभी दुर्भाग्यशाली भी रहे हैं। रवि शास्त्री को तो 1987 में एक ही टेस्ट मैच में कप्तानी का मौका मिल सका जब तत्कालीन कप्तान दिलीप वेंगसरकर घायल हो गए थे। इसके बाद उन्हें इस पद के लिए दोबारा याद नहीं किया गया। इसके बाद रवि का खेल धीरे धीरे चयनकर्ताओं को अखरने लगा और इस खिलाड़ी ने तब संन्यास की घोषणा कर दी जब उसमें कम से कम पांच साल का क्रिकेट शेष था।

शास्त्री के पास इतना उर्वर मस्तिष्क है, जिसकी बानगी वे बतौर कमेंटेटर हमेशा देते रहे है। एक चिंतक के रूप में उन्हें देश का पहले नंबर का कमेंटेटर कहा जा सकता है। वो बिंदास अपने विचार पेश कर देने वाले कमेंटेटर रहे हैं। क्रिकेट में रणनीति समझा उनकी कमेंटरी में साफ झलकती रही है। शायद इसी समझ का इस्तेमाल करने के लिए उन्हें पिछले साल भारतीय क्रिकेट टीम का निदेशक बनाया गया। उस समय भारतीय टीम इंग्लैंड के दौरे पर थी और उसे ऑस्ट्रेलिया जाना था। इसके बाद वर्ल्ड कप भी सामने था। हालांकि इंग्लैंड और ऑस्ट्रेलिया में भारत श्रृंखला जीत तो नहीं सका लेकिन रवि शास्त्री के निदेशक बनने और खिलाड़ियों व उनके खेल में जिस तरह का निखार आया, वह काबिले तारीफ कहा जाएगा। कोच डंकन फ्लेचर सीमित भूमिका में आ गए थे और उनकी जगह निदेशक शास्त्री ने ले ली थी। इंग्लैंड और ऑस्ट्रेलिया में टीम जैसा खेली थी, उससे वर्ल्डकप उसके प्रदर्शन का अनुमान लगाने में भी लोग हिचकिचा रहे थे। टीम ने जिस शानदार ढंग से वर्ल्डकप में सेमीफाइनल का सफर तय किया, उसका बहुत बड़ा श्रेय रवि शास्त्री को भी जाता है।

निदेशक:- अगस्त 2014 में इंग्लैंड के खिलाफ टेस्ट श्रृंखला में लचर प्रदर्शन के बाद बीसीसीबाई ने एकदिवसीय श्रृंखला के लिए रवि शास्त्री को टीम निदेशक बनाया गया। उनकी अगुवाई में टीम इंडिया ने पांच एकदिवसीय मैचों की श्रृंखला 3-1 से जीती। एक मैच रद्द रहा। एकमात्र टी-ट्वेंटी में हारे। जनवरी 2015 में ऑस्ट्रेलिया दौरे पर भी रवि शास्त्री टीम के निदेशक की भूमिका में रहे। हालांकि टीम को पराजय झेलनी पड़ी लेकिन प्रदर्शन सुधरने लगा। विश्वकप में विजेता की दौड़ से बाहर समझे जानी वाली टीम इंडिया में बेहतरीन प्रदर्शन दिखाया और सेमिफाइनल तक पहुंची। शास्त्री के अनुसार उनके पास तीन कोच हैं, उन्हें फिलहाल अन्य कोच की जरूरत नहीं है। यदि आवश्यकता हुई तो वे टीम निदेशक के साथ मुख्य कोच की भूमिका भी निभा सकते हैं। 1985 ऑस्ट्रेलिया में बेंसन एंड हेजेेज सीरीज के दौरान वह ’चैपियन ऑफ चैपियंस’ चुन गए थे। उन्होंने बतौर हरफनमौला खिलाड़ी शानदार प्रदर्शन किया था। अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में ऐसे रिपनर के तौर पर प्रवेश किया था जो बैटिंग करने भी कर सकता था। नंबर 10 पर बैटिंग करने वाले रवि ऐसे ऑलराउंडर बन गए जिसने टीम इंडिया के लिए ओपनिंग भी की।

भारत के प्रथम श्रेणी के मैचों में उन्होंने सबसे पहले एक ओवर में छह छक्के मारने का रिकॉर्ड बनाया।

प्रशिक्षण:- टीम में जिस स्तर के खिलाड़ी होते है उन्हें प्रशिक्षण की आवश्यकता नहीं होती है। उन्हें तो केवल मेंटर की जरूरत होती है जो उनकी गलतियों को बताकर उसे सुधारने में मदद कर सके। उन्हें प्रेरित करे और मनोदशा को मजबूत बनाए। रवि शास्त्री ने वर्ल्डकप तक यही किया था। खिलाड़ियों के साथ उनका तालमेल अच्छा हो गया है। विराट कोहली के साथ भी उनका तालमेल अच्छा बन गया है। इन विदेशी कोचो से अतिरिक्त लाभ नहीं होता है इनके मुकाबले हमारे देश में अनेक विचारवान, रणनीतिकार खिलाड़ी मौजूद हैं तो पता नहीं विदेशी कोच की आवश्यकता क्यों पड़ती है?

वेतन:- ऐसा कहा जाता है कि रवि शास्त्री को क्रिकेट कोच के तौर पर मिलने वाली करीब सात करोड़ रूपए की राशि के मुकाबले सर्वाधिक है। रवि शास्त्री को कमेंटेटर के तौर पर कार्य करने बड़ा आर्थिक घाटा होता, उसे देखते हुए भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड उनके वेतन के लिए जो राशि तय कर रहा है, उसे बिल्कुल सही कहा जा सकता है। यदि पूर्णकालिक प्रमुख कोच के तौर पर उनका चयन सुनिनिश्चत होता है तो यह भारतीय क्रिकेट के हित में ही होगा। अलबत्ता यह जरूर है कि जिस तरह से एक दिवसीय मैचों और ट्वेंटी-ट्वेंटी मैंचों के लिए कप्तान महेंन्द्र सिंह धोनी और रवि शास्त्री के बीच टकराव की स्थिति बनी थी। देखना दिलचस्प यह होगा कि कप्तान धोनी कितने समय तक कमान संभाले रखने में कामयाब हो पाते हैं।

कोच:- शास्त्री जी एक अच्छे कम्यूनिकेटर (संचारक) हैं। वे सकारात्मक सोच वाले खिलाड़ी रहे हैं और मजबूत इरादे वाले व्यक्ति हैं। उनका व्यक्तित्व भी आक्रामक किस्म का है। आक्रामकता जरूरी नहीं कि बाहर प्रदर्शित की जाए बल्कि वह खेल की शैली में भी होती है। भले ही किसी खिलाड़ी के मानस पटल पर आक्रामकता हो लेकिन जरूरी नहीं कि वह उसका प्रदर्श्न करें। रवि शास्त्री ऐसे ही खिलाड़ी थे। खिलाड़ियों और कोच के सोचने में नजरिया का फर्क होता है। कोई खिलाड़ी या कोच आक्रामक होता है तो कोई रक्षात्मक होता हे। लेकिन इरादा एक ही होना चाहिए। हालांकि वास्तविक कोच तो वही होता है, जो किसी खिलाड़ी को शुरूआत से खेलना सिखाता है। या जिसने बचपन में ही क्रिकेट खेलना सिखाया हो। वही कोच जल्दी समझ जाता है कि वह खिलाड़ी कहां गलती कर रहा हे और उसे सुधारा कैसे जा सकता हे। किसी गेंदबाज या बल्लेबाज को बनाने वाला कोच ही बता सकता है कि गेंदबाज का रन-अप कैसा था या बल्लेबाज फुट मूवमेंट कैसा था और अब क्या बदलाव आएगा और कैसे उसे दुरस्त किया जाएगा? पर अंतराष्ट्रीय स्तर पर टीम का कोच किसी खिलाड़ी को न तो बना सकता है न उसकी बुनियादी खामियों को दूर कर सकता है। क्योंकि वह वीडियों देखकर यह तो बता सकता है कि खामी क्या है पर उसे ठीक नहीं कर सकता है।

श्स्त्री/धोनी:रवि शास्त्री को यदि भारतीय क्रिकेट टीम का पूर्णकालिक कोच बनाये जाने की केवल चर्चा ही है ओर वह इसलिए है क्योंकि वे टीम के साथ लंबे समय से जुड़े हुए हैं। वर्तमान में वे टीम के निदेशक है और उनके टीम प्रबंधन में उनके जुड़ने के कारण ही टीम अलग अंदाज में प्रदर्शन कर रही है। भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड यदि उन्हें कोच नियुक्त करता है तो उसे बहुत ही सूझबूझ भरा फैसला कहा जाएगा। धोनी बेहतरीन क्रिकेटर है और एक दिवसीय में तो वह बेजोड़ है। धोनी भी जानते हैं कि प्रदर्शन तो करके दिखाना ही होगा। जहां धोनी को मैं समझता हूं, यदि प्रदर्शन कमजोर पड़ेगा तो आगे बढ़कर वे खुद रिटायरमेंट की घोषणा कर देंगे। सब कुछ परिणाम पर ही निर्भर करेगा। यदि रवि शास्त्री भी बतौर कोच अच्छा प्रदर्शन नहीं करेंगे तो देखिएगा जितनी सकारात्मक बातें उनके बारे कहीं जा रही हैं वे सभी उल्टी पड़ जाएंगी। जहां तक धोनी के संबंधो की बात हे तो कहा जा सकता है कि दोनों ट्यूरिंग तो नहीं है जैसी कोहली और उनके बीच है।

मदन लाल, पूर्व क्रिकेटर

उपंसहार:- वे आम कोच की तरह नहीं है जो फिटनेस की रणनीति पर ही ध्यान देते हैं। वे जीत के लिए खेलना ही उनका स्वभाव है। उनमें यह कला हे कि वे जो कहते हैं, उस बात को मनवाना भी उन्हें आता है। इसलिए ऐसे खिलाड़़ी हमेशा रहने चाहिए ताकि हमारी भारतीय टीम को इनसे प्रोत्साहन मिल सके व यह टीम मजबूत बन सके।

- Published on: August 6, 2015