जनमत संग्रह Declaration of Delhi as Complete State - Initiative by Kejriwal - Article in Hindi [ Current Affairs ]

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प्रस्तावना: - दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा दिलाने के लिए मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने जनमत संग्रह की बात कही है। इसके लिए उन्होंने शहरी विकास विभाग से राय भी मांगी हैं। क्या उनके इस जनमत संगह की कोई वैधानिकता होगी? क्या जनमत संगह के आधार पर राज्य अपनी इच्छाएं पूरी कर सकते हैं? क्या इसे लोकतांत्रिक आधार पर सही ठहराया जा सकता है?

संविधान: - भारत के संविधान में जनमत संग्रह का कोई प्रावधान नहीं है। संसद को लगता है तो वह इस मामले में फैसला ले सकती है लेकिन कोई अन्य जनमत संग्रह कराए तो वह गलत ही होगा। जनमत संग्रह से केवल इतना ही हो सकता है कि इससे उन्हें अपनी बात कहने का मजबूत तर्क मिल जाए लेकिन उसे कानूनी मान्यता नहीं मिल सकती है। यदि भारतीय संविधान में जनमत संग्रह की अनुमति दे दी तो कभी कोई समूह या स्थानीय सरकार जनमत संग्रह करवाकर अलग होने की बात उठा सकती है। हो सकता है यह मांग राज्यों से, फिर किसी जिले से या किसी गांव से उठे। दरअसल, जनमत संग्रह लोकतांत्रिक आधार पर बहुत ही कारगर और सरल उपाय दिखाई देता हैं लेकिन भारतीय संविधान में इसका कोई स्थान नहीं है। राज्यों को भी अधिकार नहीं है कि वे जनमत संग्रह के आधार पर कोई फैसला कर पाएं। आजादी किसे अच्छी नहीं लगती है? जो भी आत्मनिर्भर होता है, उसे लगता है कि उसे आजादी मिले ताकि वह अपने विशिष्ट अधिकारों की बात कर सकें। ऐसे में इस बात में कोई संदेह नहीं है कि जनमत संग्रह तो हो सकता है कि लेंकिन उसकी वैधानिक मान्यता बिल्कुल भी नहीं हैं। यह सर्वेक्षण से रायशुमारी से अधिक महत्व नहीं रखता । भारतीय संविधान के मुताबिक ना तो किसी राज्य को अलग होने के जनमत संग्रह की अनुमति दी जा सकती है और ना ही इसकी वैधानिक मान्यता ही होगी। राज्यों की विधानसभाएं भी ऐसा कदम नहीं उठा सकतीं। ऐसा करना बहुत ही खतरनाक होगा। आज यदि उत्तरप्रदेश चाहे कि विदर्भ को अलग कर दिया जाए तो भी वे अपने स्तर पर जनमत संग्रह के आधार पर ऐसा नहीं कर सकते।

जहां तक राज्यों के गठन या केंद्र शासित प्रदेश से राज्य का दर्जा दिलाने का सवाल है तो उसके लिए हमारे संविधान की धारा एक, दो और तीन में उचित व्यवस्थाएं की हुई है। किसी राज्य की सीमाएं करनी हो, उसका नाम बदलना हो, फिर एक राज्य से अलग करे अन्य राज्य बनाने हों या फिर किसी क्षेत्र को राज्य का हिस्सा बनाना हो तो उसके लिए संविधान की इन धाराओं का इस्तेमाल होता है। जनमत संग्रह के आधार पर राज्य कोई फैसला लेने की बात करेंगे तो संविधान इसकी अनुमति नहीं देता है।

देश: - 80 से अधिक देशों में जनमत संग्रह का प्रावधान हैं। अब तक 60 से अधिक देश इसका उपयोग कर चुके हैं-

  1. स्वीडन -वर्ष 1955 में जनमत संग्रह के माध्यम से जनता से यह जाना गया कि सड़क पर दाई तरफ वाहन चलाए जाए या बाएं तरफ। 83 फीसदी मतदाताओं ने दाई तरफ ड्राईविंग के प्रावधान को जारी रखने का पक्ष लिया।
  2. ऑस्ट्रेलिया -राष्ट्रगान अपनाने को लेकर ऑस्ट्रेलिया में असमंजस बना हुआ था। जनमत संग्रह के माध्यम से वर्ष 1977 में राष्ट्रगान तय किया गया।
  3. स्विट्जरलैंड -वर्ष 2009 में देश की मस्जिदों में मीनार बनाई जाए या नहीं, इसे लेकर जनमत संग्रह कराया गया। जिसमें 57.5 प्रतिशत लोगों ने मीनारें नहीं बनाए जाने को लेकर वोट किया। स्विट्जरलैंड में 150 मस्जिदें हैं। इनमें से केवल चार मस्जिदों में ही मीनार हैं।
  4. इटली- वर्ष 2011 में परमाणु नाभिकीय नीति को लेकर जनमत संग्रह कराया गया। लेकिन 95 फीसदी जनता ने परमाणु कार्यक्रम को मना कर दिया जिससे इसे संसद में पेश नहीं कर सके।
  5. मिस्र - जनवरी 2014 में नए संविधान के लिए राष्ट्रव्यापी जनमत संग्रह कराया गया। 98.13 प्रतिशत लोगों ने नए संविधान बनाए जाने के पक्ष में मत दिया।
  6. स्कॉटलैड- 307 सालों से ब्रिटेन का हिस्सा रहे स्कॉटलैंड में सितबंर 2014 को ब्रिटेन से आजादी को लेकर जनमत संग्रह कराया गया। 54 फीसदी लोगों ने ग्रेट ब्रिटेन के साथ ही बने रहने को लेकर वोट किया।
  7. ग्रीस -भारी कर्ज से डूबे ग्रीस ने 5 जुलाई 2015 को यूरोजोन के कर्जदाता बैंक से मिलने वाले बेलआउट पैकेज की कड़ी शर्तों को मानने या नहीं इसी को लेकर जनमत संग्रह कराया जिसमें 61.31 फीसदी लोगों ने शर्तें नहीं मानने के पक्ष में वोट दिया।

इस देश में जनमत संग्रह हुआ और उसने यूरोजोन के कर्जदाता बैंक से मिलने वाले बेलआउट पैकेज की कड़ी शर्तों को मानने से इनकार कर दिया, उसे देखते हुए सैद्धांतिक रूप से यह लोकतंत्र का बहुत ही अच्छा उपकरण नजर आता है लेकिन हकीकत यह है कि यह प्रायोगिक नहीं है। जिस तरह से ग्रीस केवल जनमत संग्रह के परिणाम के आधार पर यूरोजोन के देशों पर अपनी बात का जोरदार तरीके से रख सकता है लेकिन जनमत संग्रह के परिणाम को मानने का अधिकार यूरोजोन के सदस्य देशों को हैं, उसी तरह से हमारे देश में कोई जनमत संग्रह करवाया भी जाए तो उसकी वैधानिकता नहीं के बराबर होगी।

राज्य: - जहां तक गोवा और सिक्कम का सवाल है तो पूर्व में ये दोनों ही भारत के राज्य नहीं थे। ऐसे में उन पर भारतीय संविधान लागू नहीं होता था। बाद में ये भारतीय राज्य बने। ऐसे में सिक्किम में वहां की जनता से जनमत संग्रह करवा कर उसकी राय पूछी गई थी और गोवा के लोगों से पूछा गया था कि वह महाराष्ट्र का हिस्सा बनना चाहता है कि नहींं। ये मामले अलग थे क्योंकि अलग राज्य बनाने के लिए हमारे संविधान में व्यवस्था है। इन्हें दिल्ली के मामले से जोड़कर देखना भी गलत होगा।

कश्मीर: - अकसर यह बात उठती है कि देश में कहीं जनमत संग्रह करवाया तो जम्मू-कश्मीर में भी जनमत संग्रह करवाना पड़ सकता है। खासतौर पर जम्मू-कश्मीर क्षेत्र किसके साथ रहना चाहता है, इस विषय पर जनमत संग्रह करवाना पड़ा तो हम परेशानी में पड़ जाएंगे। इस संदर्भ में एक बात स्पष्ट है कि जम्मू-कश्मीर का संविधान हमारे संविधान से अलग है लेकिन इसके साथ ही हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि जम्मू-कश्मीर के संविधान में साफ तौर पर लिखा है कि वह भारत का अविभाज्य अंग है। हां यह बात जरूर है कि जम्मू-कश्मीर के मामले पर संयुक्त राष्ट्र का कहना है कि यह राज्य भारत या पाकिस्तान जिसके भी साथ रहना चाहता है, इसका लोकतांत्रिक तरीके से फैसला हो। इस मुद्दे पर पाकिस्तान जनमत संगह की बात उठाता है और भारत इसे नहीं मानता है। जब एक बार जम्मू-कश्मीर ने अपना संविधान बना लिया, उसमें साफ तौर पर लिख दिया कि वह भारत का अविभाज्य अंग है तो वह हमारे साथ रहेगा या नहीं इस पर पुनर्विचार का कोई मामला ही नहीं बनता।

दिल्ली: - जब जनमत संग्रह की मान्यता ही नहीं है तो क्यों अरविंद केजरीवाल इसके लिए प्रयास कर रहे है। यदि वे दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा दिलाना चाहते हैं तो उसके लिए राजनीतिक माहौल बनाना होगा। सभी राजनीतिक दल से बातचीत करके, इस मामले में संसद को एकजूट करना होगा। संसद के स्तर पर ही कुछ बदलाव हो और तब जनमत संग्रह हो भी सकता है। लेकिन परेशानी यह है कि संसद में आम आदमी पार्टी के चार ही सांसद हैं। इनकी बात संसद में सुनी कैसी जाएगी या सुनी भी जाएगी कि नहीं, इसी पर प्रश्नचिन्ह है। दूसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि यदि दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा दिलाने को लेकर जनमत संगह करवाया जाए तो अनेक सवाल भारत के सामने उठ खड़े होंगे। हो सकता है कि जम्मू-कश्मीर के भारत में रहने के सवाल पर भी जनमत संगह कराने को लेकर सवाल उठने लगें। ऐसे में जनमत संग्रह की बात बेमानी लगती है

केजरीवाल चाहते है कि दिल्ली के मतदाता ही इस मामले पर फैसला लें कि दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा मिले या नहीं। यह मुद्दा अहम है और संदर्भ वही है इस बात के पीछे कि दिल्ली के मुख्यमंत्री को नैतिक के आधार पर सरकार चलाने के लिए अधिकार मिलने भी चाहिए कि नहीं। दिल्ली में सरकारो की शक्तियों अधिकारों का जो विभाजन है उसके कारण दो सरकारें एकदम तनी हुई हैं। दिल्ली सरकार कोई कामकाज नहीं कर पा रही है। पूर्व में ऐसी स्थिति बिलकुल नहीं थी। आपस में बातचीत करके, कुछ समझौतों के साथ काम चलता रहता था। इस बात से अधिक फर्क नहीं पड़ा कि केंद्र में अन्य पार्टी की सरकार है या दिल्ली में किसी अन्य पार्टी की। भले ही मतभेद हों, फिर भी मिलजुल कर काम हो ही रहे थे। लेकिन, अब यदि दिल्ली में कामकाज को लेकर मुख्यमंत्री के हाथ-पैर ही बांध देंगे, वह यह तय ही कर सकता है कि कौन उसकी सचिव हो कौन नहीं तो परेशानी तो आने ही वाली है।

दिल्ली को पूर्ण राज्य के मामले पर जनमत संग्रह के बहाने केजरीवाल शायद दिल्ली की जनता को यह आभास कराना चाहते हैं कि उनके अधिकार बहुत सीमित हैं। उनके काम में बहुत सी अड़चनें आ रही हैं। वे दबाव की रणनीति पर काम कर रहे हैं।

उपसंहार: - यदि जनमत संग्रह संविधान सम्मत होता और संसद में उनके पास पर्याप्त सांसद होते तो शायद जनमत संग्रह की बात कुछ कारगर हो पाती। ऐसा लगता है कि दिल्ली और केंद्र सरकार दोनों को ही सद्बृद्धि की जरूरत है। टकराव के रास्ते पर चलकर कुछ हासिल होने वाला नहीं है। कहीं ना कहीं दोनों ही स्तर पर समझदारी दिखाने की आवश्यकता है। केंद्रीय स्तर पर भी यह समझने की जरूरत है कि यदि केजरीवाल चुनी हुई सरकार के बाद भी काम नहीं कर पाएं और दिल्ली में उप-राज्यपाल को ही सरकार चलानी है तो फिर चुनाव करवाने की आवश्यकता क्या है। यह सही है कि दिल्ली पूर्ण नहीं लेकिन अर्ध राज्य तो है और अर्ध राज्य लेकिन शून्य राज्य तो नहीं है। उसकी सरकार को भी तो काम करने का मौका मिलना चाहिए। अलब्त्ता जनमत संग्रह के जरिए दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा दिलाने का प्रयास सही विकल्प नहीं है। यह केवल बहस के लिए अच्छा मुद्दा हो सकता है।

- Published on: August 7, 2015