अहमद प्रकरण (Essay in Hindi - Ahmad Case - An Analysis) [ Current Affairs ]

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प्रस्तावना: - अमरीका एक विदेशी देश है यहां पर ओर देशों की तरह घटनाएं होती रहती है। ऐसी एक घटना अभी हाल ही में हुई वह है सूडानी मूल के अमरीकी मुस्लिम ‘अहमद’ के साथ जो ‘ज्यादती’ हुई भले ही उसके पीछे स्कूल और पुलिस की जागरूकता बड़ा कारण थी लेकिन अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा की सदाशयता ने उस ज्यादती को बचा लिया। बच्चे के छाती पर लगी चोट को उन्होंने घाव बनने से पहले ही भर दिया। वह भी मात्र कुछ घंटों में। यहाँ महत्वपूर्ण प्रश्न यही है कि, क्या भारत में ऐसा संभव है या आने वाले समय में कभी हो पाएगा? हमारे यहाँ तो बड़े से बड़े राजनेता से लेकर अफसर तक को अपनी गलती मांगने में शर्म आती है, माफी मांग कर जख्मों को भरना तो बहुत दूर की बात है। क्या ये मसला केवल अमरीका से जुड़ा है या फिर पूरे विश्व से।

मामला: - यह बच्चा अहमद टेक्सास के इरविंग हाई स्कूल में पढ़ता है। स्कूल में छात्रों से मांगे प्रोजेक्ट के तहत वह पेसिंल केस की मदद से डिजिटल घड़ी बनाकर ले गया। जब उसने स्कूल के शिक्षकों को घड़ी को दिखाई तो बम होने के शक पर स्कूल प्रशासन ने पुलिस बुला ली। पुलिस ने अहमद को गिरफ्तार कर लिया।

जब पुलिस ने मामले की जांच की तो बम न होकर डिजिटल घड़ी होने की पुष्टि हुई। पुलिस को अहमद का रिकॉर्ड भी सही मिला। उस पर लगे सभी आरोप हटा लिए गए। अमेरिका के राष्ट्रपति ओबामा, फेसबुक सीईओ मार्क जुकरबर्ग ने उससे मिलने की इच्छा जाहिर कर अपने कार्यालय आमंत्रित किया।

अनुभव: - सुरक्षा की दृष्टि से ऐसी घटना पहली बार नहीं हुई है कई लोगों के साथ वहां ऐसा हुआ है। सूडानी किशोर अहमद मोहम्मद को तो न्याय मिल गया, लेकिन भारत से अमरीका जाने वाले और अमरीका में बसे भारतीयों के लिए कुछ कटु अनुभव भी है जो सुर्खियों में रहे है-

सुनंदो सेन- भारतवंशी सुनंदो सेन को 27 दिसंबर, 2012 में न्यूयॉर्क में किसी व्यक्ति ने सबवे ट्रेक पर धकेल दिया था। सेन की मृत्यु हो गई थी। इस आरोप में गिरफ्तार हुए आरोपित एरिका मेन्डेज ने कहा कि उसने समझा कि सुनंदो मुस्लिम है।

प्रभजोत सिंह: - कोलबिंया यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर पर 20 सितंबर, 2013 में न्यूनॉर्क में कुछ लोगों ने हमला कर दिया था। नस्ली हिंसा की इस घटना के दौरान हमलावर प्रभजोत को आतंकवादी व मुस्लिम कह कर संबोधित कर रहे थे।

सुरेश-अमित पटेल: - सुरेश को 6 फरवरी, 2015 को पुलिस वालों ने सवालों का जवाब नहीं देने पर इतना पीटा कि उन्हें लकवा मार गया। न्युजर्सी में 16 फरवरी को अमित पटेल की उनकी ही दुकान के भीतर गोली मार कर हत्या कर दी गई।

देवयानी: - हाल के वर्षों में न्यूनॉर्क में भारतीय राजनयिक देवयानी खोबरागड़े की गिरफ्तारी का मामला अंतराष्ट्रीय स्तर तक सुर्खियों में रहा। देवयानी पर अपनी नौकरानी के वीजा दस्तावेज और कम पगार देने का आरोप लगाया गया था। देवयानी अपनी बेटी को सकूल छोड़कर लौट रही थी कि पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया। देवयानी की तलाशी भी ली गई। इसमें अमरीका की चर्चित ‘स्ट्रिप सर्च’ भी शामिल है। भारत की ओर से इनका विरोध भी जताया गया। राजनयिकों से जुड़े विएना कन्वेंशन का हवाला भी दिया गया। लेकिन अमरीका का असहयोगात्मक रवैया ही रहा। भारत ने भी प्रतिकार स्वरूप कार्रवाई की। इस मुद्दे को लेकर भारत और अमरीका के बीच राजनयिक स्तर पर काफी समय तक खटास भी रही।

पहल: - अमेरिका के टेक्सास में सूडानी मूल के छात्र 14 साल के अहमद मोहम्मद की गिरफ्तारी के बाद रिहाई के कई निहितार्थ हैं। सरकारें कानून व्यवस्था को कायम रखने के लिए कई कदम उठाती हैं। इस दिशा में कभी-कभीर गलती भी हो जाती है। लेकिन सरकार की ओर से सुधार के कदम उठाने जरूर चाहिए। अमरीकी समाज में फिलहाल धर्म और नस्ल के नाम पर भेदभाव के अंश कायम हैं।

जांच: - किशोरवय के निर्दोष स्कूली बच्चे को जल्दी में गिरफ्तार करना वो किसी बिना जांच पड़ताल के यह निरूचत रूप से उस बच्चे के प्रति गलत कार्यवाई करना है। ऐसी घटनाओं हर बात की गहराई तक जाकर जांच करनी चाहिए। फिर भी हमें सिक्के के हर पक्ष को भी देखना चाहिए था। अमरीका में आईएस दहशत फेलाने के लिए आ दिन नए-नए पैंतरे अपना रहा है। सुडनानी मूल के किशोर के मामले में स्कूल प्रशासन और पुलिस की ओर से अत्यधिक सावधानी बरतते हुए गिरफ्तारी की कार्रवाई को अमल में लाया गया। पूरी पड़ताल करने के बाद जब वह निर्दोष पाया गया तो बिना कोई समय गंवाए उसकी रिहाई कर दी गई।

अमरीका में सुरक्षा सुनिश्चित करने में सावधानी बरतने का आलम ये है कि भारत के समेत कई देशों के नामचीन लोगों की एयरपोर्ट पर तलाशी ली जाती हैं भले ही मीडिया इस बारे में कितना भी हो हल्ला करे, शोर मचाए पर अमरीका ने एक ही जवाब दिया है कि सुरक्षा के प्रति मापदंडों का अपनाना उनका पहला कर्त्तव्य है।

प्रभाव : - इस भेदभाव को मिटाने के लिए अमरीकी राष्ट्रपति ने अहमद मोहम्मद की रिहाई के बाद उसे व्हाइट हाउस में न्योता दिया है। ओबामा अमरीका समाज को ये बताना चाहते है कि धर्म, नस्ल अथवा राष्ट्रीयता के आधार पर समाज में भेदभाव किया जाना मानवीय मूल्यों और अमरीकी संस्कृति के खिलाफ है।

भेदभाव: - देखने में आया है कि अमरीका में लोगों में ये भावना है कि रंग के आधार पर कुछ नस्लों के प्रति पूर्वाग्रह बना लिए जाते है। इससे पिछले दिनों के दौरान अमरीका में नस्लीय हिंसा की घटनाएं हो चुकी है। इसे अमरीकी समाज में खासा प्रतिकूल असर भी पड़ा। कई जगह दंगे हुए। इससे ज्यादा घातक बात यह है कि अमरीकी समाज अश्वैतों (इसमें अफ्रीका ही नहीं एशिया और दक्षिण अमरीकी भी शामिल) के प्रति पूर्वाग्रह और भी ज्यादा गहरे हो गए। ओबामा ने अहमद मोहम्मद को व्हाइट हाउस का निमंत्रण देकर समाज को ये संदेश देने की कोशिश की है कि इस प्रकार की घटनाओं के प्र्रति पूर्वाग्रह को दरकिनार करना चाहिए।

अमरीका में वर्तमान में एथनिक प्रोफाइलिंग कर दी जाती है। इसमें व्यक्ति की नस्ल अथवा धर्म के आधार पर बहुसंख्यक समाज एक धारणा बना लेता है। अमरीका में 9/11 के बाद एक धर्म विशेष के लोगों के प्रति अमरीकी बहुसंख्यक समाज बहुत पूर्वाग्रही हो गया है। लोग आपस में कहते हैं कि एक समूह विशेष से संबंध रखने वाले लोगों से दूरी बनाई जानी चाहिए। उनके साथ मेलजोल नहीं बढ़ाते हैं। साथ ही उस विशेष वर्ग के प्रति असुरक्षा की भावना रखते हैं। ओबामा के ये कदम समाज को सहिष्णुता की भावना को और अधिक विकसित करने पर जोर देने के लिए उठाया गया है। अमरीकी समाज को वर्तमान में इसकी आवश्यकता भी है। अमरीका अपने यहां नागरिक समानता का भले ही दावा करे पर सच तो यह है कि वहां के समाज में भी धर्म अथवा नस्ल के प्रति पूर्वाग्रह है।

असुरक्षा: - मुस्लिम अथवा किसी भी गैर श्वेत के प्रति वहां के लोग ‘कम्यूनिटी प्रोफाइलिंग’ के तौर पर बर्ताव करते हैं। ऐसा नहीं है कि अमरीका में अफ्रीकी मूल के लोगों को ही ऐसी घटनाओं से दो -चार होना पड़ता है। देखने में आया है कि भारतीय मंदिरों अथवा गुरुद्वारों पर भी अमरीका हमले हुए है। इसके पीछे अमरीकी बहुसंख्यक लोगों में छिपी असुरक्षा की भावना है। आज अमरीको में भी बड़ी संख्या में मुसलमान रहते है। लेकिन उन्हें अमरीका समाज के साथ तालमेल बैठाना होता है।

मिस्र में भी किसी भी आतंकी घटना को रोकने के प्रति सुरक्षा एजेंसियो द्वारा अत्यधिक सावधानी बरती जाती है है। ऐसे में अमरीका तो आतंकवाद का दंश झेल चुका है। उसके द्वारा ऐसा करना स्वाभाविक कदम हैं।

लोकतंत्र: - भारत के समान ही अमरीका में भी लोकतांत्रिक व्यवस्था है। निर्दोष व्यक्ति की गिरफ्तारी अथवा किसी समाज विशेष के प्रति गलत फेसले पर सरकार को अपनी गलती माननी चाहिए। हमारे देश में भी पूर्व में जाति अथवा धर्म के आधार सरकारों द्वारा अथवा उनके शासनकाल में हुई ‘गलतियों’ पर माफी मांगी गई है केंद्र और राज्य सरकारों की ओर से निर्दोष पर होने वाले अत्याचार पर मुआवजा देने की परंपरा रही है। कुछ मामलों में आज के दौर में जरूरत इस बात की है कि सरकारें अपने रवैये को और अधिक सुदृढ़ बनाए। इससे लोगों में सरकार के प्रति सकारात्मक सोच बनती है।

उपसंहार: - अमरीका वर्तमान में दुनिया का सबसे बड़ा शक्तिशाली देश है। दुनिया भर में अमरीका की वाह वाहई होती है। लेकिन विरोधाभास देखिए कि इस शक्तिशाली देश अमरीका के लोग अपने को सबसे असुरक्षित महसूस करते हैं। किशोर अहमद की जल्दबाजी में की गई गिरफ्तारी इसका सबसे बड़ा सबूत है। इसे दुनिया में बढ़ रहे आतंकवाद से भी जोड़कर भी देखा गया है। इसलिए सुरक्षा की दृष्टि से हर देश में निस्पक्ष रूप से हर पहलू पर जांच करने के बादी ही सही निर्णय पर पहुँचना चाहिए जिससे किसी को भी किसी प्रकार का नुकसान नहीं हो पाए।

- Published on: October 6, 2015