Essay on Availability of Online Drugs in Hindi ऑनलाइन दवाएं [ Current Affairs ]

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प्रस्तावना: - केंद्र सरकार आम आदमी को दवाओं की ऑनलाइन दवा खरीद सुविधा उपलब्ध कराने पर विचार विमर्श कर रही है। मामला हालांकि शुरुआती चरण में है लेकिन अभी से इसके विरोध में देश भर के थोक और खुदरा दवा विक्रताओं ने लाभबंद होना शुरू कर दिया है। इसी महीने की 14 तारीख को उन्होंने देशव्यापी हड़ताल भी की हैं। आम आदमी को ऑनलाइन दवाइयां मिलने का क्या लाभ होगा? क्या उन्हें इनके माध्यम से सस्ती दरों में दवाएं उपलब्ध होगी। ऑनलाइन दवा के लिए डॉक्टर का प्रेस्क्रिप्शन कितना जरूरी होगा यह अभी पता नहीं है। थोक व खुदरा विक्रेताओं को इसे क्या हानि उठानी पड़ेगी इसके बारे में भी कुछ नहीं पता।

फैसला: - हमें किसी भी मामले में फेसले से पहले उसकी अच्छी तरह जाँच-पड़ताल करनी चाहिए फिर ही उस मामले में आगे कदम उठाना चाहिए। इसलिए ऑनलाइन की दवा ब्रिकी की भी यह जाँच होनी चाहिए। जब बात सबकी सेहत से जुड़ी हुई है तो उसकी जाँच करना ओर अहम बन जाता है। यह बहुत ही जिम्मेदारी का काम हैं जाँच होने के बाद कोई भी तकनीक का दुरूप्रयोग न करें।

तकनीक: - ऑनलाइन कारोबार को लेकर एक नई पावर कमेटी बनाई हैं। जिसमें राज्यों के ड्रग कट्रोलर हैं, हमारे विभाग से कुछ लोग है और बहुत से विशेषज्ञ हैं। इसके अलावा विभिन्न ड्रग एवं केमिस्ट एसोसिएशनों के बहुत से लोग है। हम अभी तक इस समिति की दो बैठकें कर चुके हैं। फिलहाल विचार-विमर्श चल रहा है। हमारा मानना है कि जब तक तकनीक के इस्तेमाल को लेकर हम पूरी तरह से संतुष्ट नहीं हो, तब तक दवा संबंधी विधेयक में कोई बदलाव नहीं किए जाने चाहिए। हमें इस तकनीक के इस्तेमाल से अच्छे लोगों से भय नहीं है लेकिन बहुत से ऐसे असामाजिक लोग भी हैं जो तकनीक का दुरुपयोग कर सकते हैं। उनसे ही यह भय लगता है। किसी भी नियम कानून में जल्दबाजी में परिवर्तन ठीक नहीं होता है। परिवर्तन से पहले हर पक्ष को समझना और उसका आकलन करना बहुत जरूरी होता है। इन्हीं बातों पर हम विचार कर रहे हैं। यही कारण है कि इस मामले में अंतराष्ट्रीय स्तर पर भी बात कर रहे हैं।

यूरोप व अमरीका: - हम लोग यूरोप के लोगों से भी संपर्क में हैं। ब्रिटेन के नियामक ने इस मामले में हमारी सहायता की बात कही है। फिर भी हर जगह परिस्थितियां अलग-अलग होती है। अमरीका में इस तरह की प्रेक्टिस है लेकिन वहां से तुलना करना ठीक नहीं है। वहां पर मरीज और उसके परिजन बहुत जागरूक होते हैं। इसके अलावा वहां पर बहुत सी व्यवस्थाएं कंप्युटरीकृत हो चुकी हैं। हमारे देश की सामाजिक परिस्थितियां बिल्कुल अलग हैं। यहां की चिकित्सा व्यवस्था और आर्थिक स्थितियां भी वहां से काफी अलग है। नियामक के तौर पर हमारा दायित्व है कि हम मरीज के हित में खुले दिल से फैसला लें। उसकी जरूरत हमारे लिए सर्वोच्च प्राथमिकता है। यही कारण है कि तकनीक के इस्तेमाल से संबंधित सारे सकारात्मक और नकारात्मक पक्षों का आकलन कर रहे हैं।

मरीज व डॉक्टर: - आमतौर पर डॉक्टर जब मरीज को दवाइयां देते हैं तो उनसे अपेक्षा रहती है कि वे दवाइयों के प्रभाव और दुष्प्रभाव के बारे में उन्हें बताएं। लेकिन ऑनलाइन ब्रिकी में किस तरह से यह सब हो सकेगा, इस बारे में कोई स्पष्टता नहीं है।

श्रेणियां : - ड्रग एंड कॉस्मैटिक्स एक्ट 1945 के तहत दवाओं को विभिन्न श्रेणियों में बांटा गया है। इसमें दवाओं के संग्रहण, बिक्री, और डिसप्ले के बारे में दिशा-निर्देश हैं। शेडयूल जी, एच, एक्स और जे अंतर्गत शामिल दवाओं के लिए डॉक्टर का पर्चा समेत अन्य प्रावधानों की पालना जरूरी है।

ऑनलाइन फार्मेसी : -के नियमन के लिए केंद ने महाराष्ट्र के खाद्य एवं दवा प्रशासन (एफडीए) कमिश्नर हर्षदीप कांबली की अध्यक्षता में उपसमिति गठित की है। ज्ञात हो कि एफडीए ने पिछले दिनों दवा बेचने पर कुछ नामी ऑनलाइन कंपनियों पर छापे मारे थे। देश में वर्तमाान में दो तरह से ई-फार्मेसी का कारोबार चल रहा है। कुछ ऑनलाइन वेबसाइट्स पाटर्नर फार्मेसियों से दवा खरीद कर उपभोक्ता के घर तक दवाओं की डिलीवरी करती हैं। कुछ फार्मेसियो ऑनलाइन ऑर्डर पर अपने आउटलैट के जरिए दवा पहुंचाती है।

ऑनलाइन: - सूचना-क्रांति ने हमारी खरीददारी के तरीके को बदल दिया है। देश में अब किराना भी ऑनलाइन मिल रहा है। ये उपभोक्ताओं के लिए फायदे की बात है। इससे उन्हें अपने पैसे की पूरी कीमत मिलती है। ऑनलाइन तुलना कर सकते हैंं। कंपनियां भी उपभोक्ताओं को अपनी ओर आकर्षित करने के लिए नई-नई स्कीम लाती हैं। ऑनलाइन खरीददारी में दवाएं भी शामिल हो गई हैं। पश्चिमी देशों में ई-फार्मेसी का चलन लगभग एक दशक से हैं। वहां डॉक्टरों का रजिस्ट्रेशन, मरीज का आईडी और यहां तक की डॉक्टर का मरीज को दिया गया प्रेस्क्रिप्शन तक ऑनलाइन होता है। यानी ई-फार्मेसी के लिए सभी आवश्यक परिस्थितियां और नियम-कायदे मौजूद हैं। मरीज अपनी सुविधा के अनुसार किसी भी ऑनलाइन वेबसाइट से दवा खरीदने को स्वतंत्र होता है। यूरोप के कई देशों में भी यही स्थिति है।

अब भारत में भी कई कंपनियां ऑनलाइन फार्मेसी के क्षेत्र में उतरने के लिए ब्लूप्रिंट तैयार कर रही हैंं। एक अनुमान के मुताबिक आने वाले दो वर्ष के दौरान देश में 100 से अधिक अन्य कंपनियां भी ऑनलाइन फार्मेसी यानी ई-फार्मेसी के क्षेत्र में आ जाएगी। ऑनलाइन फार्मेसी के बढ़ते चलन से उपभोक्ताओं को फायदा होगा, लेकिन इसके लिए एक प्रभावी तंत्र की आवश्यकता है।

व्यवसाय: - दवा व्यवसाय अन्य व्यापार की तरह नहीं है जिसमें उपभोक्ता अपनी पसंद के अनुसार वस्तु खरीद कर उपयोग कर सकता है। दवा लिखने वाले डॉक्टर से लेकर केमिस्ट तक बहुत ही जिम्मेदारी से काम किया जाता है। कहीं चूक ना रह जाए, इसके लिए सतर्कता भी बरतनी होती है। यदि ऑनलाइन दवाओं की खरीद को सरकार कानूनीजामा पहनाती है तो इस सतर्कता के साथ बहुत बड़ा खिलवाड़ होगा।

आम आदमी: - दवाओं की खरीद पर उनके लिए कमीशन का निर्धारण सरकार करती है। यदि थोक विक्रेता सरकार द्वारा नियंत्रित दवा बेचता है तो 8 फीसदी और अनियंत्रित दवा बेचता है तो 10 फीसदी कमीशन मिलता है। इसी तरह खुदरा विक्रेताओं के लिए नियंत्रित दवा पर 16 फीसदी कमीशन सरकार ने निर्धारित कर रखा है। अनियंत्रित दवा के लिए खुदरा विक्रेता के लिए कमीशन 20 फीसदी तक होता है। ऑनलाइन दवा के कारोबार में आने वाली दवा कंपनियां यही दावा करते हुए दवाएं बेचने की कोशिश में हैं कि वे आम आदमी को इस कमीशन के चक्कर से मुक्त कर सस्ती दवाएं उपलब्ध करा देंगी। इसके साथ ही लोगों को कम कीमत की दवा उनके घर तक उपलब्ध होंगी।

नुकसान: - सही तौर पर देखने में यह बात निस्संदेह बहुत ही आकर्षक लगती है लेकिन यहां जो जोखिम हैं वे सस्ती दवा से कहीं बड़े हैं। मोटे अनुमान के मुताबिक देश में 7.70 लाख दवा विक्रेताओं की दुकानें हैं और इन दुकानों के माध्यम से करीब 50 लाख लोगों की रोजी-रोटी चलती है। जब कमीशन काट कर सस्ती दवाएं उपलब्ध होंगी तो इन सभी के रोजगार पर सीधा असर पड़ेगा। सवाल सबसे बड़ा यह है कि क्या इनके रोजगार का सरकार की ओर से कोई इंतजाम किया जाएगा? दूर-दराज के बहुत से इलाकों में ऐसे दवा विक्रेता हैं जिन्हें ग्राहक निजी तौर पर जानता है। आपात परिस्थिति में इनसे देर रात दुकान खुलवाकर दवाएं लेना आसान होता है। इसके अलावा यदि पांच दिन की दवा खरीदने के बाद डॉक्टर दो दिन बाद दवा बदल भी दे तो, खुदरा विक्रेता के लिए दूसरी दवा लेना आसान होगा। आम व्यक्ति को ऑनलाइन दवा खरीदने से फायदे कम और नुकसान अधिक होने वाला हैं।

जांच: - ऑनलाइन दवा खरीद के लिए डॉक्टर के प्रेस्क्रिप्शन के आधार पर दवाएं खरीदी जा सकेंगी या नहीं, यह स्पष्ट नहीं है। बिना प्रेस्क्रिप्शन के दवा खरीदना बेहद जोखिम भरा होगा। हां, व्यक्ति प्रेस्क्रिप्शन को स्कैन करके दवा कंपनी को भेजा जा सकता है और कंपनी में विशेषज्ञ फार्मासिस्ट उसे पढ़कर दवाएं भेज भी सकता है लेकिन, दवा लिखने वाले की प्रामाणिकता को जांचने की जिम्मेदारी दवा कंपनियां ले पाएंगी, इसमें भारी संदेह है। वर्तमान में खुदरा दवा विक्रेता डॉक्टर की लिखी दवाइयों पर असमंजस की स्थिति में फोन पर डॉक्टर से संपर्क करके संतुष्टि भी कर लेता है। क्या इतनी विश्वसनीयता के साथ ऑनलाइन दवा बिक्री कंपनियां सेवाएं दे पाएंगी? यह बात समझ से परे है।

नज़र: - ऑनलाइन दवा किसको और कैसे बेच रहे हो इस पर नज़र होनी चाहिए। इसके लिए सरकार को प्रणाली विकसित करनी चाहिए। ऑनलाइन दवा में बेचने में किसी भी अन्य उत्पाद से ज्यादा सतर्कता की जरूरत है। देश में ऑनलाइन फार्मेसी को अधिक कारगर और उपभोक्ता हितो के अनुकूल बनाने के लिए सरकार को ऑनलाइन फार्मेसी लाइसेंस जारी करने के लिए विस्तृत जांच करनी होगी।

देखने में आया कि कुछ ऑनलाइन फार्मेसी अपना फर्जी आईपी एड्रेस देती हैं। जिसके चलते गलत अथवा अवधिपार दवा उपभोक्ता को मिलने की स्थिति में ऑनलाइन फार्मेसी का पता ही नहीं चलता है। संबंधित ऑनलाइन फार्मेसी को लाइसेंस देने से पहले उसका ट्रेक रिकॉर्ड, बैंक स्टेटमेंट और अन्य जानकारियां भी सरकार के पास होनी चाहिए।

अहित: - जहां दवा विक्रेताओं की हड़ताल का सवाल है तो हम यही कहेंगे की लोकतंत्र में उन्हें अधिकार है कि वे ऐसा कर सकते हैं। लेकिन, उनसे हम केवल आग्रह कर सकते है कि वे इस तरह का फैसला न ले क्योंकि दवाइयां बेचना बहुत जिम्मेदारी का और बेहद जरूरी काम है इस बात को वे समझते भी है और यही कारण है कि कर्फ्यू जैसी परिस्थिति में भी दवाइयों की दुकानों को मुक्त रखते हैं। ऐसे में उन्हें धैर्य रखने की आवश्यकता है। कोई भी फैसला लेने से पहले अन्य सभी के हितों का ध्यान रखेगें।

उपंसहार: - अकक्सर कहा जाता है हमारे देश में ऑनलाइन फार्मेसी के लिए आधारभूत तकनीकी ढांचा उपलब्ध नहीं है। लेकिन सरकार यदि दृढ़ निश्चिय या इच्छा शक्ति बनाए जो यह काम इतना मुश्किल भी नहीं है। वर्तमान में देश ऑनलाइन फार्मेसी के जरिए लाइफस्टाइल से जुड़ी दवाए मंगवाले का प्रचलन अधिक है इसे देखते हुए डॉक्टर व मरीजों पर्चो को ऑनलाइन डेटा बैंक में दर्ज किया जा सकता है। इससे नशीली दवाओं के ऑनलाइन बेचने की आशंका पर काफी हद तक नियंत्रण रखा जा सकता है। बस जरूरमत एक प्रयास की जो हमें मंजिल तक पहुंचाएगा।

- Published on: November 18, 2015