वन्य जीव व इंसान Essay on Importance of Wildlife and Human as Culprit - in Hindi [ Current Affairs ]

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प्रस्तावना: - आबादी वाले क्षेत्र में जंगली जानवरों का घुसकर पालतु जानवरों का शिकार करना बड़ी घटना होती थी। लेकिन, अब ऐसी घटनाएं न केवल आम हो गई हैं बल्कि इन जानवरों का इंसानों को घायल करने या मारने के समाचार भी मिलने लगे हैं। राजस्थान में तो तेंदुए का इंसानों की बस्ती में घुसकर आतंक मचाना बहुत बढ़ गया है। देश के अन्य राज्यों में खासतौर पर छत्तीसगढ़ में दंतैल खूब आतंक मचाते हैं। अन्य शहर में भी कोई न कोई जानवर घुसकर इंसान को नुकसान पहुचाता रहता है यहां तक कि उसे मार ही डालता हैं। क्यों नहीं लग पाती ऐसी घटनाओं पर लगाम? क्यों खत्म हो रहा है जंगल से जानवरों का राज एवं जंगलो में इंसान क्यों घुस रहा हैं।

वन क्षेत्र: - एक समय था जबकि सवाई माधोपुर, कोटा, बूंदी, चित्तौड़, झालावाड़ के आसपास बहुत बड़ा वन क्षेत्र था। लेकिन यहा कई बांध बन गए है। टुकड़ों में बंटे जंगलों में जानवरों को रखने की क्षमता कम हो गई। लंबे समय तक बांधों के निर्माण के दौरान वहां रहे मजदूरों ने भी जंगल को विशेषतौर पर नुकसान पहुंचाया है।

राजस्थान: - के आबादी वाले क्षेत्रों में जिस जानवर के सबसे अधिक घुस आने और इंसानों पर उसके हमलों की बात हो रही है वह है तेंदुआ। यह घटनाएं पिछले एक दशक में ही तेजी से बढ़ी हैं। मोटे तोर पर इसके कारण जो दिखाई देते है वह सबसे पहले तो जंगलों की कटाई है और दूसरा जंगलों में बढ़ता पर्यटन। यूं तो देशभर के जंगल ही खोखले हो रहे हैं लेकिन हम राजस्थान की बात करें तो यहां वन्य जीवों के रहने की जगह सिमटती जा रही है। क्योंकि यहां के लोग वनों की हर चीज़ का उपयोग तेजी से कर है जिससे जानवरों के रहने का स्थान बच ही नहीं पा रहा है।

छत्तीसगढ़: - में वन विभाग के आंकड़ों के अनुसार हाथियों की संख्या में इजाफा हुआ। 2010 में इनकी संख्या 242 थी जो 2014 में 351 हो गई। हालांकि विशेषज्ञों राय में यह आंकड़ा इसलिए सही नहीं है क्योंकि नक्सली इलाकों में गणना कठिन है। हमारे देश में छत्तीसगढ़ वन संपदा के लिहाज से संपन्न राज्य है लेकिन जिस तरह से जंगलों की कटाई हुई है, जानवर इंसानों की बस्ती में सरलता से घुसने लगे हैं। यहां दंतैल यानी नर हाथियों का अकसर आतंक देखने को मिलता है। अकसर हाथियों द्वारा इंसान को मार देने, घरों को उजाड़ने और फसलों को नष्ट करने की खबरें सुनने को मिलती हैं। ऐसा नहीं है कि हाथियों पर काबू नहीं पाया जा सकता हो लेकिन जानकारियों के अभाव में ऐसा नहीं हो पाता।

बफर: - ऐसा क्षेत्र जहां पर आदमी और जानवर दोनों जा सकते हैं, उसे जंगल का बफर क्षेत्र कहा जाता है।

रणथम्भौर: - यहा वन का कोर क्षेत्र वर्तमान में 1113.364 वर्गकिलोमीटर है और बिफर क्षेत्र 297.9265 वर्गकिलोमीटर है। यह बफर क्षेत्र जो चारों और होना चाहिए थे वह एक ही तरफ सिमट गया है। पिछले दिनों अत्यधिक पर्यटन के कारण न्यायालय ने वहां 20 फीसदी कोर क्षेत्र में ही पर्यटन की अनुमति दी थी, इससे अधिक नहीं लेकिन सरकार ने इसके बफर क्षेत्र को कोर वन क्षेत्र को कोर क्षेत्र में अधिसूचित कर दिया और इस तरह कोर क्षेत्र 20 से 25 साल में विकसित होता गया है, कागजो में उसके विस्तार से उसके 20 फीसदी क्षेत्र में पर्यटन बढ़ गया और विकास धीमा हो गया। इसके अलावा चारागाह क्षेत्र समाप्त हो गया और जानवरों की जगह इंसान का अतिक्रमण होन लगा।

तेंदुआ: - देश भर में करीब 3.50 लाख वर्गकिलोमीटर क्षेत्र के सर्वे के आधार 14 हजार तेंदुए हैं और हमारे राजस्थान में 171 ही हैं। इनके स्वभाव में यह होता है कि ये घने जंगलों में रहने वाले बाघ से टक्कर नहीं लेता। इसलिए बाहरी क्षेत्र में ही रहता है। इसके खाने के लिए निर्भरता आबादी वाले क्षेत्र में पालतु पशुओं पर बढ़ने लगी है। यह बात समझनी चाहिए कि तेंदुआ एक नियमित व्यवहार करता है वह खुले बदन घूमने वाले बच्चों और कुत्ते के बीच भेद नहीं कर पाता। वह इंसान या उसके बच्चे को पकड़ने के इरादे से आबादी में नहीं घुसता बल्कि उसकी प्रवृति चुपके या चोरी से पालतु जानवर उठाने की है, उसके लिए खुले बदन घूमने वाले बच्चे और कुत्ते में विशेष अंतर नहीं होता। यही वजह है कि आमतौर पर बच्चों को अपना शिकार बना लेता है। तेजी से होती वन कटाई के कारण और भोजन की कमी के कारण ये आबादी वाले क्षेत्र में घुसने लगे हैं।

हाथी: - हाथियों के समूह का नेतृत्व जो हथनी करती है उसे कुलमाता कहा जाता है। जब हर नर हाथी पांच से सात वर्ष का हो जाता है तो कुलमाता उसे समूह से दूर कर देती है। ऐसा वह इसलिए करती है कि क्योंकि वह अपने समूह की हथनियों के साथ संपर्क (इनब्रीडिंग) नहीं कर सके। समूह से अलग मदमस्त हुआ दतैंल किसी से भी टकराता है। वह कहीं भी किसी के भी घर, खेत आदि में घुस जाता है और आक्रमण कर देता है फिर उसे पालतु हाथियों के साथ घेरकर काबू किया जा सकता है या फिर उसे वन अधिकारी पटाखे चलाकर दूर भगा सकते हैं। हाथी अन्य जंगली जानवरों के मुकाबले सबसे बड़ा जानवर है और इसकी खुराक अन्य के मुकाबले काफी अधिक होती है। यही कारण है हाथियों को समूह एक राज्य से दूसरे राज्य उसके बाद आगे के राज्य में वे जाते रहते है इनका विचरण 2000 किलोमीटर से अधिक है इतने विचरण के लिए उन्हें जंगल व पानी चाहिए होता है। लेकिन वनों की कटाई के कारण पानी की कमी हो जाती है। ऐसे में उनके पास कोई रास्ता नहीं होता कि अपनी भूख और प्यास को मिटाने के लिए आबादी के क्षेत्रों में घुसें।

बचाव: - हाथियों से बचाव के लिए किसान अकसर रातों को जागते हैं। कई बार निकट आए हाथी को करंट लगाकर मार देते हैं। इससे बेहतर होगा कि हम हाथी के गले में रेडियों कॉलर डाल दें। फिर उसके विचरण के आधार पर पता लगाएं कि हाथियों का समूह कहां पर हैं? इसके अलावा हाथ्याेिं के लिए अलग से रहवास बनाना और उनके लिए पर्याप्त पानी के इतंजाम करना भी बहुत आवश्यक है। इसके अलावा यदि घने जंगलों में खदाने होगी और वहां विस्फोटों की आवाजें होगी तो भी हाथी उस स्थान से दूर भागते हैं।

आहार चक्र: - देश को कोई भी कोना ऐसा नहीं है जहां जीव जन्तुओं का पूरी आहार चक्र ही बाधित हो गया है। सबसे बड़ी बात यह है कि घास प्रबंधन अर्थात शाकाहारी जानवरों के लिए भोजन का प्रबंध बिगड़ गया है। जब इनका भोजन अर्थात चारा जंगलों में नहीं होगा तो यह जानवर अपने भोजन की तलाश में शहर व गांवों की ओर जाएंगे। भोजन व पानी के अभाव में जब यह जानवर ही नहीं रहेगें तो मांसाहारी जानवर जंगल में कैसे रह पाएंगे।

मृत्यु: - जब यह जानवर शहर या गांवों की ओर भोजन पानी की तलाश में जाते है तो या यह किसी गाड़ी की चपेट में आ जाने से मर जाते है या फिर कई बार ग्रामीणों के प्रतिशोध के कारण ये जानवर मार दिए जाते है। ऐसे ही एक जगह ऐसा वाक्या हुआ था वो था मध्यप्रदेश से भटककर एक बाघिन को छत्तीसगढ़ में ग्रामीणों ने पीट-पीट कर मार डाला।

विभाग: - हमारे इन विभाग की स्थिति यह है कि वह प्राथमिक जानकारी पर कार्रवाई नहीं करता। यदि वन विभाग इस बात पर कार्रवाई करे कि तेंदुआ आबादी क्षेत्र में घुसकर पालतु जानवर को ले गया है तो भी उससे इंसानों को बचा सकते हैं। सब डिवीजन स्तर पर ट्राइंकुलाइर से बेहोश कर वन में तेंदुए को छोड़ने की व्यवस्था नहीं होती। इसे बड़े कार्यालय की सहायता से ऐसा करना होता है।

जरूरत भीलवाड़ा में हो तो इसकी व्यवस्था उदयपुर से ही जाती है। इसमें समय लग जाता है। इसी तरह लोग भी तेंदुए की प्रवृत्ति के बारे में कम ही जानते हैं। उसकी एक ही तरीके से मार करने वाली प्रवृत्ति यदि लोगों को बता दी जाए तो भी लोग सावधान हो सकते हैं। इसके अलावा बच्चों को रंगीन कपड़े पहनाकर रखना चाहिए।

जंगल: - कुदरती संतुलन कायम रखने के लिए कुल क्षेत्रफल का 1/3 होना जंगल होना चाहिए। 1970 के बाद से हमारे वन क्षेत्र में लगातार कमी आई। 2010 - 11 की रिपोर्ट के मुताबिक देश में 14 राज्यों में न्यूनतम शर्त से भी जंगल का रकबा कम हुआ।

कानून: - देश के वन्य जीवन की रक्षा करने अवैध शिकार की रोकथाम करने तथा वन्य जीवों की तस्करी रोकने के लिए भारत सरकार ने वन्य जीव (संरक्षण) अधिनियम 1972 लागू किया। इस अधिनियम को जनवरी 2003 में संशोधित कर सजा व जुर्माना केे प्रावधानों को और मजबूत किया गया। सबसे पहले देश में वन्य जीवों को विलुप्त होने से रोकने के लिए 1872 में ’ वाइल्ड एलिकेट प्रोटेक्शन एक्ट’ पारित किया गया था। इसके बाद समय-समय पर कानूनों में संशोधन किए जाते रहे।

लचर कानून: - इस कानून के कारण हमारे यहां वन्य जीवों के शिकार के प्रकरणों में सजा भी कम होती है। अन्तराष्ट्रीय शिकारी गिरोह भी इसी का फायदा उठाकर कभी शक्तिवर्धक औषिधियों व कभी कीमती खाल के लालच में आ जाते हैं। शिकारी गिरोह भी जिस समुदाय से आते हैं वे इतने बैखोफ हैं कि खुद वन अधिकारी भी उनसे भय खाते हैं।

उपंसहार: - इंसानी बस्तियों में वन्य जीवों की घुसपैठ पर चिंता करने से पहले हमें यह सोचना होगा कि आखिर किन इलाकों में मानव का दखल बढ़ गया है। वन क्षेत्र का घनत्व कम हो गया है खेती के लिए भूमि पर अतिक्रमण किए जा रहे है और तो और शहरीकरण की होड़ में वन क्षेत्रों तक आबादी में तब्दील होने लगे। इसके लिए वन क्षेत्र में इंसान को घुसने नहीं देना चाहिए। ऐसा तब ही संभव जब हम सब इस बात को समझें कि जीने का हक सबको हैं। यह हक कोई किसी से नहीं छीन सकता हैं। इसके लिए दोनों में यह सबसे आवश्यक बात है कि इनमें सतुंलन बनाए रखें।

- Published on: November 18, 2015