दालों का हाल Essay on Inflating Prices of Pulses in India - In Hindi [ Current Affairs ]

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प्रस्तावना: - दाल रोटी खाओ और प्रभु के गुण गाओ, कभी यह जुमला देश के आम आदमी की माली हालत को बयां करता था लेकिन, इसी आम आदमी की थाली से पहले प्याज और अब दालें गायब भी हो रही हैं। अरहर दाल के 200 रुपए किलो से अधिक बिकने का दबाव अब अन्य दालों पर पड़ने लगा है। दालों के भावों में आए उछाल के कारण सब्जियों के दाम भी आसमान पर हैं। भले ही इन हालात के लिए केवल वर्तमान सरकार नहीं पूर्ववर्ती सरकारें भी जिम्मेदार हों लेकिन लोग कहने लगे हैं, नहीं चाहिए अच्छे दिन, हमें तो हमारे बुरे दिन ही लौटा दो! यह सब किस कारण से हुआ है? इसके लिए क्या उपाय कर सकते है यह जानना बहुत आवश्यक है। यह मामला केवल आम जनता का नहीं बल्कि पूरे देशवासियों का है इसमें चाहे वे कोई भी श्रेणी के हो।

महंगाई: - महंगे प्याज से त्रस्त जनता को आंशिक राहत मिलने ही लगी थी कि पिछले लगभग दो माह से दालों, विशेषतौर पर अरहर और उड़द की दालों के भाव आसमान को छूने लगे हैं। बाजार में 2015 में अरहर की दाल 200 - 210 रुपए किलो और उड़द की दाल 190 - 195 रुपए किलो बिक रही है। दालों के भाव पिछले कुछ सालों से ऊंचे बने हुए हैं और ये आमजन की पहुंच से बाहर होती जा रही हैं। पिछले साल की तुलना में दालों की कीमतें 40 प्रतिशत बढ़ चुकी है। दालों में मंहगाई कहीं ज्यादा है। वित्तमंत्री भी मानते हैं कि चाहे दूसरी चीजों में महंगाई कुछ थमी हो लेकिन प्याज और दालों में महंगाई तेजी से बढ़ी है। सरकार ने दालों के आयात का तो हुक्म जारी किया ही है, 500 करोड़ रुपए का एक फंड भी बनाया है, जिससे आयातित दालों के ट्रांसपोर्ट और प्रसंस्करण की लागत को कम किया जा सके। यही नहीं आनन-फानन में सरकार ने व्यापारियों के लिए दालों की अधिकतम स्टॉक की सीमा भी लागू कर दी और अधिक स्टॉक रखने पर जब्ती के आदेश जारी कर दालों के दामों को बांधने का प्रयास भी किया है लेकिन ये उपाय भी दीर्घकालीन नहीं कहे जा सकते।

पैदावार: - यह दुख और आश्चर्य का विषय यह है कि कृषि प्रधान देश होते हुए भी, दुनिया में दालों का सबसे बड़ा उपभोक्ता देश उनके उत्पादन के लिए दूसरे देशों से आयात कर रहा है। भारतीय थाली में दालों का एक विशेष महत्त्व है। आम जनता जो अधिकांशत: शाकाहारी भोजन पर निर्भर करती है, को ये दालें आवश्यक प्रोटीन उपलब्ध कराती हैं। पारंपरिक रूप से लोग दालों का इस्तेमाल कर अपने लिए संतुलित आहार उपलब्ध करवा पाते हैं। लेकिन दालों के महंगे होने से घर का बजट ही नहीं बिगड़ता बल्कि गरीब की थाली से पोषण भी गायब हो जाता है।

देश में दालों की औसत मांग 220 लाख टन है। हर साल 35 लाख टन औसतन आयात होता है हर साल।

एक ओर जहां लोगों की आमदनी बढ़ी और दालों को खरीदने की क्षमता भी लेकिन दालों की पैदावार बढ़ने की गति अत्यधिक अपर्याप्त रही। 1960 - 61 में जहां दालों की पैदावार 130 लाख टन थी जो 2013 - 14 तक आते-आते वह मात्र 190 लाख टन तक ही बढ़ पाया यानि 50 प्रतिशत से कम वृद्धि। इसका कारण था दालों के अंतर्गत कृषि क्षेत्र का स्थिर रहना और प्रति हेक्टेयर पैदावार में बहुत कम वृद्धि होना। उल्लेखनीय है कि जहां 1964 - 65 में दालों की प्रति हेक्टेयर पैदावार 520 किलो थी, वह 2013 - 14 तक 760 किलो तक ही बढ़ सकी जबकि इस दौरान गेहूं की प्रति हेक्टेयर पैदावार 910 किलो से बढ़कर 3080 किलो हो गई। परिणामस्वरूप अनाजों (गेहूं, चावल एवं मोटे अनाज) की पैदावार 690 लाख टन से बढ़कर 2460 लाख टन हो गई यानी 3.6 गुना वृद्धि दर्ज की गई। दालों की पैदावार में वृद्धि कम होने के कारण दालों की प्रति व्यक्ति उपलब्धता 1960 - 61 में 69 ग्राम से घटकर 2013 - 14 में मात्र 42 ग्राम ही रह गई है। हालांकि अनाजों की प्रति व्यक्ति उपलब्धता भी केवल 400 ग्राम से बढ़कर लगभग 440 ग्राम तक ही पहुंच पाई है लेकिन दालों की प्रति व्यक्ति उपलब्धता में भारी कमी वास्तव में चिंता का विषय है।

आयात: - पिछले कुछ समय से किसी वस्तु की कमी और इसी कारण मंहगाई होने पर सरकार के पास एक आसान तरीका है कि उसका आयात बढ़ा दिया जाए और जैसे-तैसे कीमित पर काबू किया जाए। देश में दालों की पैदावार और खाद्य तेलों के उत्पादन कम होने और उनकी महंगाई से निजात पाने के लिए भी यही तरीके अपनाए गए। उसका असर यह हुआ कि आज हमारा देश आयातित दालों और तेलों पर निर्भर होने लगा है। यह सही है कि चावल, चाय, कॉफी, तम्बाकू, मसाले आदि इनका कृषि वस्तुओं का निर्यात भी भारत से होता है लेकिन इसके विपरित दालों और खाद्य तेलों के लिए विदेशों पर निर्भरता लगातार बढ़ती जा रही है। जहां 2005 - 06 में हम मात्र 56 करोड़ डॉलर की दालें आयात करते थे, 2014 - 15 में देश ने 2.8 अरब डॉलर की दालें आयात की। खाद्य तेलों की स्थिति ओर भी खराब है 2014 - 15 में हमने 10.6 अरब डॉलर के खाद्य तेल आयात किए। देश हर वर्ष औसतन 35 लाख टन दालों का आयात कर रहा है।

देश में विदेशी मुद्रा की भारी कमी के चलते इतनी बड़ी मात्रा में खाद्य तेलों और दालों का आयात सही नहीं ठहराया जा सकता है। जरूरी है कि इस आयात को घटाने का काम किया जाए। इसके लिए इन चीज़ों की देश में ही पैदावार को बढ़ाना होगा। उधर आमदनी और जनसंख्या बढ़ने के कारण देश में दालों की मांग औसतन 4.2 प्रतिशत की दर से बढ़ रही है, जबकि पैदावार स्थिर है।

प्रोत्साहन: - दालों की उचित कीमित पर आम इंसान को उपलब्ध कराना बहुत जरूरी है इसके लिए हमें देश में ही दालों की पैदावार को बढ़ाना पड़ेगा। आज तुअर दाल के भाव 150 किलों और आम जनता को इसे मजबूरी में खरीदना पड़ रहा है, ऐसे में सरकार को इसके उपाय के लिए दालों की पैदावार को ही प्रोत्साहन देना चाहिए। इससे इसके शुभ परिणाम निकल सकते है इसके अलावा किसानों की हालत भी सुधरेंगीे और गरीब की थाली में दाल वापस लौट आयेंगी।

कारण: - हमारे देश में पैदा होने वाली और आयातित दालों को मिलाकर इसकी जरूरत के मुताबिक उपलब्धता है। फिर समझ में नहीं आता दालों की कीमित में एक दम कैसे बढ़ गई है? इसमें हकीकत यह हे हमारे यहां किसानों को बाजार में दाल का दाम मुश्किल से 45 रुपए प्रति किलोग्राम की दर से मिलता है। दालों के भाव बढ़ने के अनेक कारण है जैसे की पैदावार कम होना। इसका दूसरा कारण है जमाखोरी व कालाबाजारी जिसके कारण से पर्याप्त स्टॉक के बावजूद दालों के दाम आसमान छूते दिख रहे हैैं। इसको देखते सरकार ने राज्यों को इस बात की छूट दी थी के वे आवश्यक वस्तु अधिनियम के तहत अपने यहां दाल की स्टॉक सीमा तय कर सकते हैं। जमाखोरों पर अंकुश लगाने के लिए राज्यों को यह काम तत्काल करना चाहिए था पर हैरत की बात यह थी कि उन्होंने ऐसा नहीं किया।

उपाय: - जमाखोंरो पर काबू कैसे हो इसके लिए मध्यप्रदेश का उदाहरण बेहतर है सरकार ने जिस दिन दालों की अधिकतम स्टॉक सीमा फिक्स कर छापेमारी की कार्रवाई शुरू की उस दिन अकेले राजधानी गोपाल में ही 2500 क्विंटल दालें जमाखोंरो के कब्जे से मुक्त करा ली गई। सतना, जबलपुर, व इन्दौर में भी करीब 3 हजार टन के आसपास दालें जब्त की गई। परिणाम यह हुआ कि एक ही दिन में वहां दालों के दाम 20 फीसदी कम हो गए।

स्टॉक सीमा: - मध्यप्रदेश सरकार की इस कार्य के लिए तो उनकी सराहना करनी चाहिए। लेकिन सवाल यह उठता है कि मुख्यमंत्री के पास डेढ़ माह से पड़ी हुई फाइल पर फैसला करने में देर क्यों हुई? राजस्थान में भी सरकार दालों की स्टॉक सीमा तय करनी ही चाहिए। दो दिन पहले ही केंन्द्र सरकार ने दालों का संग्रह करने वाले बड़े डिपार्टमेंटल स्टोर्स व ई-कॉमर्स कंपनियों पर भी स्टॉक सीमा तय कर दी है। यही सीमा दो माह पहले तय कर दी जाती तो क्या दालों के दाम काबू नहीं हो पाते? पर ऐसा नहीं हुआ।

उपसंहार: - सरकारें जमाखोरों पर अंकूश का महज ऐलान कर भूल जाती हैं। जब स्टॉक सीमा तय करने की बारी आती है तो केंन्द्र इसे राज्यों का विषय बताता है तो राज्य यह जिम्मेदारी केंन्द्र पर डालने में जुट जाती है। स्टॉक सीमा तय होते होते आयात किया गया स्टॉक भी उन्हीं के पास पहुंच जाता है जिनको जमाखोरी व कालाबाजारी के लिए जिम्मेदार माना जाता है। अत: सब एक दूसरे के ऊपर नाम लगाकर अपला पलड़ा झाड़ देते है। इससे तरह से हर तरफ से पिसता आम आदमी ही है। इसलिए मध्यप्रदेश की तरह हमारे यहां भी ऐसे कार्य जिसमें जनता की भलाई अधिक हो वह सबसे पहले करनी चाहिए।

- Published on: November 18, 2015