फंड (निवेश) बैलून मॉर्टगेज Investment funds and Balloon Mortgage Article in Hindi [ Current Affairs ]

()

प्रस्तावना: - आज कल हमारे देश में कई प्रकार के निवेश चलते है। वह इसलिए क्योंकि जो लोग अपना बचा हुआ पैसा निवेश करते है उन्हें उस पैसा का अच्छा रिटर्न मिल सके। आगे अपने व अपने परिवार का भविष्य सुरक्षित कर सके। इसलिए लोगों के लिए निम्न प्रकार के निवेश इस प्रकार है-

बैलून मॉर्टगेज: - बैलून मॉर्टगेज का चलन भारत में नया हैै। हालांकि इसका इस्तेमाल प्रॉपर्टी के लिए जा रहे लोन को जल्द चुकाने या फिर मैथ्योरिटी पूरी होने पर कुछ पैसा कर फिर से मॉर्टगेज लेने की सुविधा के लिए किया जाता हैं इस तरह के मॉर्टगेज में समय सीमा लॉन्ग टर्म लोन के समान नहीं रहती हैं हालांकि आप हर माह किश्त भी रख सकते हैं। यह पांच से सात साल की मैच्योरिटी वाले रहते हैं। मैच्योरिटी पूरी होने पर कई विकल्प सामने रहते है। यदि आप प्रॉपटी में इन्वेस्ट करने के बारे में सोच रहे हैं और चाहते हैं कि कर्ज की मासिक किस्त भी कम हो तो बैलून मॉर्टगेज एक अच्छी स्कीम मानी जा सकती है।

क्या होता है बैलून: - बैलून पेंमेंट वह समूची राशि होती है, जो लोन से संबंदव् रखती है। हालांकि इसमें नियमित रूप से होने वाले रीपमेंट चार्ज से ज्यादा राशि भरी जाती है। यह नियमित अंतराल पर अदा करना होता है या फिर पूरी राशि का भुगतान लोन की अवधि समाप्त होने पर किया जाता हैं पंरपरागत रूप से लंबे समय तक चलने वाले मॉर्टगेज से अलग बैलून मॉर्टगेज कम समय के लिए किया जाता है। कर्ज लेने वाले के सामने कई विकल्प सामने रहते हैं। पांच वर्ष के अंत में या तो शेष मूलधन चूका दें, या नया मॉर्टगेज लोन लें या घर को बेच दें।

आसान: - इस तरह के मॉर्टगेज में होम लोन कम डाउन पेमेंट पर मिल जाता है। इसके लिए जरूरी है कि कुछ पात्रता का होना। यदि आपके पास फिलहाल नगदी नहीं है, लेकिन आपको उम्मीद है कि कुछ ही वर्षों में आपके पास खासी राशि आ जाएगी तो आप इस विकल्प के जरिए घर के लिए कर्ज ले सकते हैं। इस तरह के बैलून लोन में कम ब्याज दर भी रहती हें जबकि अन्य में ज्यादा। इसके साथ ही इस तरह के कर्ज कम अवधि के लिए रहते हैं। इसलिए इसे कई लोग कम जोखिम वाला मानतेे हैं।

यदि कर्ज लेने वाला समय पूरा होने पर पूरा पैसा नहीं भर पा रहा है, तो शेष राशि का फिर से फाइनेंस कराया जा सकता है। फिर भी जो रीफाइनेंस मॉर्टगेज में जो ब्याज की दर है, वह बाजार की दर के अनुसार ही होगी। इसका मतलब है कि कर्ज लेने वाले को ऊंची दर पर ब्याज भुगतान कराना होगा।

नुकसान: - इसमेें सबसे बड़ी परेशानी मैच्योरिटी होने पर एकमुरूत राशि जमा करने की हे। यदि आप इस तरह के मॉर्टगेज से पैसा लेने की सोच रहे हैं तो जरूरी है कि आप यह सुनिश्चित कर लें कि मैच्योरिटी होने पर आपके पास एक बड़ी राशि आने वाली है। क्योंकि एकमुश्त राशि जमा करना काफी महंगा सौदा रहता है। यदि किसी परिवार में औसत आय में इतना पैसा नहीं जुटाया जा सकता तो इसे लेना परेशानी खड़ी कर सकता है।

हमारे देश में यह कॉन्सेप्ट ज्यादा पुराना नहीं है। पांच साल पहले यह यहां चलन में आया है। यह उन लोगों के लिए ज्यादा ठीक रहता है, जो कमर्शियल रीयल इस्टेट में ज्यादा रूचि रखते हैं, साथ ही जो लोग इनकम टैक्स सेविंग के लिए रीयल इस्टेट निवेश करते हैं। कई बार इसकी तुलना एडजस्टेबल रेट मॉर्टगेज यानी एआरएम से की जाती रही हैं लेकिन एआरएम में एक तय अवधि के बाद ब्याज दर बदल जाती हैं बैलून मॉर्टगेज के विपरीत अवधि पूरी होने पर पूरी राशि का भुगतान नहीं करना होता है।

मॉर्टगेज मार्केट से न केवल बैंकों को फायदा हुआ है, वरन इससे इन्वेस्टर भी लाभान्वित हुए हैं। उन्हें इसमें कई तरह की विशेषताओं के प्रोडक्ट मिले हैं, जिससे वे अपनी सुविधा के अनुसार लोन ले सकते हैं और चुका सकते हैं।

गोल्ड मॉनेटाइजेशन: - बजट में सरकार ने गोल्ड मॉनेटाइजेशन की घोषणा की थी, जो कुछ समय पहले ही लागू की गई है। सोने के लिए भारतीय जनमानस में अजीब आकर्षण और भावनांए रही हैं। धनतेरस, अक्षय तृतीया आदि पर लोग सोना खरीदते हैं और इसे निवेश की रणनीति के तौर पर मानते हैं। वर्ल्ड गोल्ड कांउसिल के अनुसार भारत सोने की सर्वाधिक खपत वाला देश है और साथ ही सबसे बड़े आयोतकों में से एक है। इस कारण हाल ही के वर्षो में चालू खाता घाटा भी बढ़ा है। यह सुझाया गया है कि ऐसा कुछ तरीका निकाला जाए जिससे देश में सोना हो, उसका प्रयोग करते हुए, देश से विदेशी मुद्रा को जाने से रोका जा सके। इसलिए वितमंत्री ने अपने बजट में गोल्ड मॉनेटाइजेशन (जीएमएस) की घोषणा की थी। इसके तीन मकसद है-

  1. पहला जिन घरों या संस्थाओं के पास सोना-जवाहरात है, वे बैंको को देकर उससे लोन ले सकें।
  2. दूसरा सोने के आयात को कम किया जा सके।
  3. तीसरा देश में ही मौजूद सोने की जरूरत को पूरा कर सके।

चूंकि सोना अनुत्पादक या डेड असेट माना जाने लगा है, इस कारण से इस तरह की पहले मकसद को माना गया। लेकिन फिर भी कई लोग भावनात्मक स्तर पर इसे अपना नहीं पा रहे हैं। वे घर में पुश्तैनी सोना गलाने के पक्ष में नहीं हैं। फिर भी देखना यह है कि किस तरह से सोना गलाकर उसे गोल्ड सेविंग अकाउंट में तब्दील किया जाता है।

शुद्धता: - गोल्ड मॉनेटाइजेशन स्कीम में इन्वेस्टर और इंस्टीट्यूशन न्यूनतम तीस ग्राम सोना किसी भी स्वरूप में ला सकते हैं। भले ही सिक्का हो, या टेटे हुए आभूषण। इसे बैंक में जमा कराने के लिए ला सकते हैं। इसकी शुद्धता को देश के 350 हॉलमार्क सेंटरों पर परखा जा जाता है। ये सेंटर भारतीय मानक ब्यूरो (बीआईएस) द्वारा सर्टिफिकेट प्राप्त हैं। इसके लिए कुछ फिस लगेगी। ये बेहद कम समय में जांच लेंगे कि सोना कैसा है।

प्रारम्भिक जांच में प्यूरीटी टेस्टिंग सेंटर में आपका सोना प्रीलिमनरी एक्सआरएफ मशीन से परखेंगे। इससे आपको पता चल जाएगा कि आपका सोना कितना शुदव् है। यदि आप बैंक में सोना जमा कराने को राजी है तो आपको केवायसी फॉर्म भरना होगा और सोना गलाने की अनुमति देनी होगी।

सर्टिफिकेट: - आपकी अनुमति मिलने के बाद ही सोना गलाया जाता है। यह उसी सेंटर पर होगीं। आग में आपके जेवरों को गलाने पर सोने से अशुद्धि दूर हो जाएगी। साथ ही रत्न व नग लगे है वे अलग हो जाएगे ओर उनके बाद वजन होगा। अब यह आप पर निर्भर होगा कि इस सोने देने के एवज में जो पैसा मिल रहा है, वह लेना हैे या नहीं। यदि आप तैयार नहीं हैं तो आपको सेंटर पर सोने की जांच की फिस देनी होगी। यदि आप सोना जमा कराने के लिए तैयार हैं तों यह फीस बैंक देगा। आपको एक सर्टिफिकेट दिया जाएगा। यह सोने की शुद्धता और सोना जमा कराने का होगा।

गोल्ड सेविंग अकाउंट: - जब आप प्यूरीटी टेस्टिंग सेंटर पर गोल्ड डिपॉजिट का सर्टिफिकेट देंगे तो बैंक आपका ‘गोल्ड सेविंग अकाउंट’ खोल देगा। जितना वजन सोने में है, उसका दाम आपको दे दिया जाएगा। इसी प्रकार प्यूरिटी वेरिफिकेशन सेंटर भी बैंक को सूचित करेगा कि सोना जमा किया जा चुका है। इसकी अवधि न्यूनतम 1 साल की होगी और बाद में इसे और बढ़ाया जा सकता है। यह ठीक एफडी की तरह होगा। इस अवधि को बीच में तोड़ने की अनुमति होगी। इस पैसे पर जो ब्याज है उसे बैंक द्वारा ही तय किया जाएगा। यह आपको 30 / 60 दिन में ब्याज देने लगेगा। मूलधन व ब्याज सोने के हिसाब से मिलेगा। उदाहरण के लिए 100 ग्राम सोने को जमा कर रहे हैं तो आपको साल भर में 1 फीसदी ब्याज मिलेगा। यदि एक साल की परिपक्वता अवधि है तो आपको साल भर बाद 101 ग्राम सोना मिलेगा।

यह सही है कि सोने से पैसा खड़ा करने का विचार ठीक है, लेकिन इसकी प्रक्रिया बेहद जटिल है। न ही इससे कोई अच्छी इनकम खड़ी होती दिखती हैं। यदि आप गोल्ड ईटीएफ से सोना लेते हैं, या गोल्ड म्युच्युअल फंड में निवेश करते हैं तो यह ज्यादा बेहतर विकल्प दिखाई देता है, क्योंकि इसमें ज्यादा कर भी नहीं है। इससे आपको न केवल सोने से लाभ होता है, वरन आपको ब्याज का फायदा भी मिल जाता है।

हेज फंड: - हेज शब्द अंग्रेजी का है, इसका अर्थ है मैदान में झाड़ियों की कतार लगाना, ताकि किसी भी तरह के जोखिम से बचने के लिए सीमा बना ली जाए। पूर्व में हेज फंड्स बाजार में आमतौर पर होने वाली गिरावट आदि से अपने पैसे को बचाने के लिए रहते हैं, इसलिए इसका नाम हेज फंड है। 1920 में अमेरिका में शेयर बाजार में तेजी की स्थिति थी। अमीर लोगों के लिए कई तरह के निवेश विकल्प मौजूद थे। समाजवादी अल्फ्रेड डब्ल्यू जोन्स ने सबसे पहले ‘हेज फंड’ शब्द का इस्तेमाल किया था। पहला हेज फंड 1949 में बनाया था।

काम : - हम जानते हैं कि कंपनी के शेयरों की कीमतों में काफी उतार-चढ़ाव आता रहता है। या तो एक माह में ये 150 के भाव पहुंच जाते है या फिर आधा ही रह जाए। बाजार की सीधी साधी फिलोसॉफी है जितना ज्यादा रिटर्न, उतना ही जोखिम, लेकिन उदारहण वाला व्यक्ति जिग्नेश भाई ज्यादा जोखिम नहीं लेना चाहते हैं। इसके लिए वे एक कॉन्ट्रेक्ट करते हैं, जिसमे में एक माह बाद 100 रू. में लिए शेयर को एक तय तिथि पर 95 रू में बेचना चाहते हैं और इसके लिए वे 2 रू की प्रीमियम भी देने को तैयार हैं। इसे पुट ऑप्शन कहते हैं। जिस तिथि को शेयर बेचना था, उस दिन उसके भाव 140 रू हो गए। ऐसे में वह कॉन्ट्रेक्ट में दी गई कीमत यानी 95 रू में बेचने के लिए बाध्य नहीं है, वह अपना शेयर 140 रू में ही बेचेंगे और 38 रू का मुनाफा कमाएंगे। इस तरह से जिग्नेश भाई ने शेयर को हेज्ड कर लिया। इसके लिए उसने पुट ऑप्शन की मदद ली।

हेज वह तरीका है जिससे किसी भी पोर्टफालियों की रिसक को कम किया जा सकता है। कुछ हेज फंड मैनेजर्स को हर्डल रेट का अनुपालन करना होता है। जब तक हर्डल रेट नहीं पहुंचता है तब तक इन्वेस्टर को पूरा मुनाफा नहीं मिलता है।

हेज फंड प्रकार है : -

  1. एब्सोल्यूट रिटर्न फंड - कई बार इसे नॉन डायरेक्शनल फंड भी कहा जाता है। इसमें इस बात का फर्क नहीं पड़ता कि बाजार में किस दिशा में जा रहा है। एक तय रिर्टन आपको मिलता रहता है। इसे प्योर अल्फा फंड भी कहा जाता है। एक परंपरागत इन्वेस्टर के लिए यही फंड ठीक रहता है। इसमें जोखिम कम रहता है। कुछ लोगो का कहना है कि यह भी म्युच्यूअल फंड की तरह हो जाता है। इसमें रिटर्न 8 से 10 फीसदी के करीब रहता है।
  2. डायरेक्शन फंड - ये भी हेज फंड होते हे लेकिन पूरे नहीं। इसके मैनेजर्स बाजार में कुछ खरीदी करते हैं, लेकिन वे उम्मीद से अधिक रिटर्न लेने की कोशिशे करते हैं। इसका कारण यह है कि इसका कुछ पैसा शेयर बाजार में लगाया जाता हैं। इन्हे बीटा फंड भी कहा जाता है। इसमें रिटर्न स्थिर नहीं रह पाता है। कई बार यह अधिक का रिटर्न देता है। कई बार लुढ़क जाते है।
  3. भारत में फिलहाल 15 ऐसे फंड सेबी में पंजीकृत हैं। जैसे कार्वी कैपिटल, मोतीलाल ओसवाल, आईआईएफएल और एडिलविस आदि। केवल बड़े निवेशक जिन्हें एचएन 1 मानते हैं, वे ही इसमें आ पाते हैं। सेबी ने नियम बनाया है, जिसके तहत इसमें प्रवेश करने के लिए कम से कम 1 करोड़ रू तो लगाने ही होंगे, जबकि विदेशी ऑफ शोर फंड में यह 5 लाख डॉलर है।

फंड मैनेजर्स व म्युच्युअल फंड अतंर: -

  • फंड मैनेजर्स वे पार्टनर होते हैं, जो इन्वेस्टमेंट करते हैं और पार्टनरशिप को भी मैनेज करते हैं। उनके काम के लिए उनको काफी पैसा मिलता है।
  • म्युच्युअल फंड मैनेजर्स से अलग इसलिए है, क्योंकि म्युच्युअल में केवल फीस ही मिलती है। मुनाफे में मैनेजिंग पार्टनर्स और निवेशक का ब्याज रहता हैं।

अमेरिकी फेडरल रिजर्व के पूर्व प्रमुख बेन बरनान के जिनके एक बयान से दुनियाभर के बाजार प्रभावित हो जाते थे, फेडरल रिजर्व से रिटायर इन्वेस्टमेंट ग्रुप नामक हेज फंड में सीनियर मैनेजर हैं।

इंश्योरेंस: - अधिकत्तर नौकरीपैशा लोगों के लिए साल में एक मौका रहता है कि वे टैक्स बचाते हुए कोई इन्वेस्टमेंट कर दें। आज भी टैक्स सेविंग के मामले में इंश्योरेंस को सबसे अच्छा विकल्प माना जाता है। इसके कई कारण है जैसे कम आय, परिवार में आश्रित सदस्यों की संख्या, ज्यादा खर्चे, खर्चीले शोक आदि। इसकी कारण से इंश्योरेेंस में इन्वेस्ट करना बेहतर होता है।

उपसंहार: - आज हमने विभिन्न प्रकार के निवेश के बारे में जाना है जिसमें कुछ अमीर, कुछ गरीब व मध्यम लोगों के लिए सबसे बेहतर निवेश हैं। इन स्कीमों में निवेश करने से अच्छा खासा रिटर्न मिलता हैंं। जिससे आने वाला भविष्य सुरक्षित रहता है।

- Published on: August 7, 2015