महेश्वर परियोजना (Maheswar Project - Essay in Hindi) [ Current Affairs ]

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प्रस्तावना: -सरकार किसी भी योजना में कैसे काम करती हैं, इसका नया उदाहरण है मध्यप्रदेश की महेश्वर परियोजना। सरकार ने यह परियोजना खुद शुरू की थी उसके बाद निजी क्षेत्रों को सौंप दी। पच्चीस साल उस पर काम चला। लागत 12 गुणा हो गई और अब इस अधूरी परियोजना को सरकार फिर अपने हाथों में ले रही है। ऐसी अधूरी योजनाएँ हमें देश के हर राज्यों में मिल जाएंगी। आखिर कौन है इन सबका जिम्मेदार और जनता क्यों सहन करे सरकार की यह लापरवाही। कंपनी, सरकारी अधिकारियों और विभिन्न राजनीतिक दलों के नेताओं की मिलीभगत के कारण जनता का धन भी बर्बाद हो रहा है।

सरकार: - आज हम देखते है कि ऐसी अधूरी योजनाएँ देश में हर जगह देखने को मिल जाएगी। सरकार व अन्य संस्थाओं के साथ यह हमारीे जिम्मेदारी नहीं है कि हम भी इस कार्य में उनकी मदद करे और सरकार को भी चाहिए कि वे जनता का पैसा बर्बाद किए बगैर इन परियोजना को पूरा करें। आज जितनी भी अधूरी योजनाएँ है उनमें सबसे बड़ी समस्या पैसे की होती है उसके बाद अन्य समस्याएँ शुरू होती है। पर सरकार को यह मानना होगा कि हर अच्छे काम को शुरू करने से पहले उस कार्य में दिक्कत आती है फिर धीरे-धारे सब काम होत चले जाते है।

परियोजना: - हाल ही में मध्यप्रदेश सरकार ने निर्णय लिया है कि महेश्वर बिजली परियोजना निजी कंपनी के हाथों से हटाकर वह अपने हाथों में लेगी। करीब 465 करोड़ रुपए की जिस योजना को 1992 में एस. कुमार्स समूह के हाथों में सौंपा गया उसे दो दशक बाद पुन: अपने हाथों में सरकार ने ले लिया है। वर्ष 1992 में निजीकरण के तत्काल बाद परियोजना की लागत बढ़ा दी गई और वर्ष 1996 में केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण ने परियोजना को 1, 669 करोड़ रुपए की कीमत पर तकनीकी-आर्थिक मंजूरी दी। परियोजना से बनने वाली बिजली के लिए 35 वर्ष का ’विद्युत क्रय समझौता हुआ जिसके अनुसार बिजली की कीमत परियोजना की कीमत के आधार पर तय होगी और बिजली बने या न बने बिके या न बिके, राज्य सरकार के विद्युत मंडल को निजी परियोजनाकर्ता को करोड़ों रुपए प्रति वर्ष देने ही होगे, यह समझौता पूरी तरह से जन विरोधी था। निजी परियोजनाकर्ता ने सार्वजानिक वित्तीय संस्थाओं और मध्यप्रदेश राज्य औद्योगिक विकास निगम से वित्तीय मदद हासिल करते ही सार्वजनिक पैसे की बर्बादी शुरू कर दी। परियोजना में पैसा लगा रही वित्तीय संस्थाओं की मार्च, 2000 की रिपोर्ट में खुलासा हुआ कि परियोजनाकर्ता ने महेश्वर परियोजना के लिए दिया गया 106 करोड़ रु. परियोजना में न लगाकर अन्य कंपनियों को दे दिया गया जिसका महेश्वर परियोजना से कोई संबंध नहीं था।

खेल: - अफसरों और नेताओं की मिलीभगत का अंदाज इस तथ्य से भी लगाया जा सकता है कि पहले राज्य औद्योगिक विकास निगम की शिकायत पर परियोजनाकर्ता के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की गई। लेकिन फिर इसी निगम ने निजी परियोजनाकर्ता पर मेहरबानी दिखा बकाया 103 करोड़ रु. में से 26 करोड़ माफ किए। परियोजनाकर्ता की संपूर्ण संपत्ति से कुर्की हटा ली गई। इन सब रियायतों के बाद भी परियोजनाकर्ता ने समझौते के अनुसार पैसा वापस नहीं दिया। चौथी बार, सीएजी ने मार्च, 2005 की रिपोर्ट में कड़ी टिप्पणी कर कहा, परियोजनाकर्ता को छूट देना जनता के पैसे का नुकसान है और कैसे बिना किसी की गांरटी व सुरक्षा के समझौता कर लिया गया। इतनी गड़बड़ियों के बावजूद 16 सितंबर, 2005 को सरकार के औद्योगिक विकास निगम ने परियोजनाकर्ता से एक नया समझौता किया। इस बार परियोजनाकर्ता से 55 करोड़ के 20 पोस्ट डेटेड चेक लेकर, पावर फाइनेंस कॉरपोरेशन, हुडको और रूरल इलेक्ट्रिफिकेशन कारपोरेशन ने न सिर्फ परियोजना में अरबों रुपए लगा दिए वहीं परियोजनाकर्ता के पुन: डिफॉल्टर होने पर मध्यप्रदेश सरकार ने खुद पैसा देने की गांरटी लेली और सरकार के विद्युत मंडल से एस्क्रो गांरटी दिलवा दी। इस बार ओर कमाल हो गया यह सब पैसा लेने के बाद परियोजनाकर्ता ने अपना बैंक अकाउंट बंद कर दिया जिससे औद्योगिक विकास निगम को दिए सभी 20 चेक बाउंस हो गए। परियोजनाकर्ता का पैसा तो कुछ नहीं गया पर वो जो सरकार की गांरटी थी उसके कारण निजी परियोजनाकर्ता द्वारा पैसा वापस न करने की एवज में विद्युत मंडल को 105 करोड़ रुपए देने पड़े इस समझौते के समय तक परियोजना में लगभग 400 करोड़ रुपए लगे थे, पर इस समझौते के बाद अभी तक कुल लगभग 2, 400 करोड़ रुपए सार्वजनिक बैंकों व वित्तीय संस्थाओं के लगा दिए गए। सिलसिला जारी है। उदाहरण के तौर पर किसान के छोटे से कर्ज की वसुली पर उसके घर का सामान उठा लेती है बैक, वित्तीय संस्थाएँ। पर यहाँ सरकार व संस्थाएँ परियोजनाकर्ता से अरबों रुपए बकाया होने पर भी उससे वसुली नहीं कर पाती है। गत दो दशक में एक रुपया भी परियोजनाकर्ता से वसुल नहीं कर पाई है।

पुर्नवास: - दूसरा बड़ा पहलु इस परियोजना से 61 गांवों के 10, 000 परिवारों के पुर्नवास का था। वर्ष 2001 में पर्यावरण मंत्रालय ने मंजूरी देते समय शर्त लगाई थी कि दिसंबर, 2001 तक सभी प्रभावितों के पुर्नवास की संपूर्ण योजना प्रस्तुत कर दी जाए तथा विस्थापितों का संपूर्ण पुनर्वास बांध के निर्माण के पहले पूरा किया जाए। लेकिन परियोजनाकर्ता ने न तो पुनर्वास योजना प्रस्तुत की और न ही पुनर्वास किया। लेकिन बांध की दीवार जरूर पूरी खड़ी कर दी, जिसके कारण पिछले सालों में विस्थापितों के 800 मकान बिना मुआवजे व पुनर्वास के डूब गए हैं। विडंबना है कि जहाँ सरकारों ने निजी परियोजनाकर्ता को करोड़ों रु. की वित्तीय अनियमितताएं की छूट दी, वहीं उन्होंने यह भी अनदेखा कर दिया कि कानून का उल्लंघन कर विस्थापितों का पुनर्वास नहीं किया जा रहा है। विस्थापितों ने महंगी बिजली, अनियमितताओं और पुनर्वास की बात पिछले 2 दशक से लगातार उठाई तो उन्हें विकास विरोधी करार दिया गया। सरकार ने जमीन पर डंडे चलाए तो निजी परियोजनाकर्ता ने आंदोलनकारियों के खिलाफ न्यायालय में झूठे केस लगाये, जिसे वह सिदव् भी न कर सके। सबसे गंभीर बात यह हैं कि चाहे वह कांग्रेस की दिग्विजय सिंह की सरकार हो या भाजपा की, सभी ने खुली अनियमितताओं और सीएजी रिपोर्ट की तमाम रिपोर्टों में गंभीर टिप्पणियों के बावजूद निजी परियोजनाकर्ता को लाभ पंहुचाया। दिग्विजय सिंह द्वारा मुख्यमंत्री ने रहते हुए भी, तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के सामने बार-बार परियोजना की पैरवी की गई। इसी प्रकार जब तत्कालीन पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने वर्ष 2010 में पुनर्वास की अति गंभीर स्थिति को देखते हुए बांध का काम रोका तो मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने उपवास भी कर डाला।

नुकसान: - आज परियोजना की लागत 6, 000 करोड़ रुपए से अधिक हो गई है। और उससे बनने वाली बिजली की कीमत 13 रुपए प्रति यूनिट। विस्थापितों के पुनर्वास पर 1500 करोड़ से अधिक खर्च होगे। अब सरकार कह रही है कि वह इसे अपने हाथ में लेगी। 465 करोड़ नहीं थे, तो निजी कंपनी कोदिया और अब 6, 000 करोड़ रुपए होने के बाद वापस अपने हाथ में ले रहे हैं। सरकार कह रही है कि सार्वजनिक पैसे के ब्याज को माफ कर एवं अन्य उपाय वह इसकी बिजली की कीमत 5.32 रुपए प्रति यूनिट लाएगे। एमपी में बिजली आज सरप्लस हैं हम अपनी बिजली राज्य के बाहर 3.12 रुपए प्रति यूनिट से ज्यादा का नुकसान अर्थात मध्य प्रदेश की जनता का सालाना 200 करोड़ का नुकसान होगा।

उपसंहार: -महंगाई, गरीबी, बेरोजगारी झेल रहे हमारे प्रदेश में, जिसमें किसान आत्महत्या कर रहे हों, क्या हम यह बर्बादी सहन कर सकते हैं? यह कहानी है एक बिजली परियोजना की जिसमें पिछले दो दशकों में निजी परियोजनकर्ता, नेताओं और अफसरों की मिलीभगत के कारण सरकारी खाते से अरबों रुपए की बर्बादी हुई। क्या इसकी जिम्मेदारी ठहराना जरूरी नहीं? जनता भी चाहती है कि जब कोई परियोजना सरकार द्वारा देश के विकास के लिए शुरू होती है तो उसे सही समय पर उचित पैसा लगाकर पूरा किया जाए ताकि ऐसी योजनाओं का लाभ हर वर्ग के लोगों को मिल सके।

- Published on: December 18, 2015