अनोखा समझौता (Marriage Agreement - Unique Solution to Social Problems of Women - Essay in Hindi) [ Current Affairs ]

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प्रस्तावना: - महिलाओं की हकों की दशा में केंद्र सरकार ने विवाह से पूर्व लिखित करार का प्रस्ताव तैयार किया है। बदलते सामाजिक परिदृश्य के मद्देनजर सरकार की ओर से कवायद की जा रही है। यानी तलाक की स्थिति में महिला को कोर्ट-कचहरी के चक्कर नहीं काटने पड़े इसके लिए इस प्रस्ताव के स्तर पर प्रगतिशील सोच वाला ये मसौदा एक ऐतिहासिक प्रतीत होता है। पश्चिमी देशों में ऐसे करार का चलन है। लेकिन हमारे देश के सामाजिक ताने-बाने में ये नई अवधारणा कितनी स्वीकार होगी यह कहना कठिन है इसे लेकर कुछ सवालिया निशान भी है। तमाम दावों के बावजूद पुरुष सत्तात्मक समाज क्या इसे मंजूर करेगा? संदेह इसलिए भी होता है क्योंकि लोकसभा और विधानसभा में महिलाओं को 33 फीसदी कानूनी जामा पहनाने में भी इसी मानसिकता की चुनौती स्वीकार करनी पड़ेगी। समाज को भी विवाह रूपी संस्था के प्रति नजरिए में बदलाव लाना होगा।

पक्ष: - शादी के पूर्व वर और वधु दोनों ही पक्षों के बीच लिखित समझौता की बात बीते कुछ समय से अपने देश में भी उठने लगी हैं। अभी इस मामले में मेनका गांधी ने अपनी ओर से पहल की है और केंद्रीय कानून मंत्री को इस बारे में प्रस्ताव दिया है। इस कानून के बनने और लागू होने की राह में हजार मुश्किलों के बावजूद यह बेहद स्वागत योग्य कदम है। जन्म-जन्मांतर के संबंधों की बात से यह कानून एक कदम आगे निकलकर तर्क की बात करता है और इसे दो लोगों के बीच संबंधों में किसी बात को लेकर दरार पैदा हो सकती है, खटास आ सकती है। जीना मुहाल हो सकता है, इन व्यवहारिक तर्कों को समझता है। अन्यथा, भारतीय समाज में दो लोगों की उम्र व जीवनयापन की व्यवस्था यानी रोजी-रोटी का जुगाड़ होने पर शादी कर देने को जिम्मेदारी समझकर निभा दी जाती है। वैवाहिक जीवन को कैसे व्यवहार परक और आनंदमय बनाया जा सके, इस बारे में शायद ही बातचीत होती है। मौजूदा समझौते के प्रस्ताव को देखकर फिलहाल यह समझ में आता है कि इसके व्यावहारिक पक्ष को भी ध्यान में रखा गया है। कानून का ड्राफ्ट जब तैयार होगा तब शायद इसकी कमियां भी सामने आएगी।

कानून: - भारतीय समाज में स्त्रियों की स्थिति बहुत ही दयनीय है। उनके हित में घरेलू हिंसा कानून बन तो गया लेकिन उसके लिए आधारभूत संरचना, बजट और सजगता का माहौल तैयार किया जाना चाहिए था। जो अभी तक नहीं बनाया जा सका। घरेलू हिंसा कानून के मामले के निपटारों के बारे में जिला स्तर पर केवल कलक्टर को ही विचार करने को अधिकार दिया गया है। कलक्टर की प्रशासनिक व्यवस्थाएं पहले से ही बहुत हैं और ऐसे में उनसे जिले भर की घरेलू हिंसा की शिकार महिलाओं की शिकायत को सुनना और उस पर कार्रवाई असंभव है। यही हालात महिलाओं से जुड़े दूसरों कानूनों की भी है। जाहिर है कि ऐसे हालात में शादी पूर्व लिखित करार की बात लागू करवाना एक बड़ी मुश्किल वाला कार्य है। महिलाओं से जुड़े कानूनों और अधिनियिम को लागू करने में सरकार और उसकी मशीनरी फुर्ती नहीं दिखाती है। कानून की धार बुनियादी ढांचा और बजट के आवंटन जैसी बातों में उलझाकर बंद कर दी जाती है। अगर इस कानून के प्रस्ताव पर गौर किया गया और इसे मंजूरी मिल गई तो वर-वधु दोनों के लिहाज से संबंधों से अलग होने के मुश्किल क्षणों में लिखित समझौता से उनकी राह थोड़ी आसान जरूर होगी। फिलहाल देश में महिलाओं की हालत के मद्देनजर और उन्हें सुरक्षा मुहैया कराने के लिए विशेष कानून बनाए जाने की दरकार अभी बनी हुई है। लेकिन भविष्य में जब हमारा समाज स्त्रियों से व्यवहार में बराबरी का व्यवहार करने लग जाएगा तब जेंडा न्यूट्रल कानून बनाना पड़ेगा। हालांकि इस प्रस्ताव को कानून बनवाने की राह में सबसे ज्यादा मुश्किल तो हिंदू विवाह अधिनियम कानून के प्रावधानों की वजह से आनी है। हिंदू विवाह को कॉन्ट्रेक्ट नहीं माना जाता। इसलिए प्रस्ताव को कानून बदलने में सबसे पहली बाधा तो यहीं से शुरू होने वाली हैं। अगर यहां पर सहमति मिल भी जाती है तो आगे लोकसभा में यह प्रस्ताव पास करवाने की मुश्किल आएगी। लेकिन लोकसभा में केंद्र सरकार का बहुमत है तो वहां शायद इसे मंजूरी मिल सकती है। तब तक फिर इस समझौते को दूसरे चरण में राज्यसभा में पारित करवा पाना बहुत कठिन होगा।

प्रीनप्स: - पश्चिमी देशों में शादी से पहले समझौते को प्रीनप्स कहते हैं। इन देशों में विवाह से पहले ही वर और वधु बाद में तलाक की स्थिति में आपसी रजामंदी से संपति के बंटवारे के लिए प्रीनप्स का इस्तेमाल करते हैं। तलाक की स्थिति में कोर्ट-कचहरी के अधिक चक्कर नहीं काटने पड़ते हैं। अमरीका में नामचीन हस्तियों में तलाक की स्थिति में प्रीनप्स काफी सुर्खियां भी बटोरते हैं। प्रीनप्स यानी प्री नप्चुअल एग्रीमेंट (विवाह पूर्व समझौता) पश्चिमी देशों में विवाह के दौरान भी महिलाओं के अधिकारों की रक्षा सुनिश्चित करता है। बेल्जियम और नीदरलैंड्‌स में प्रीनप्स विवाह के दौरान भी महिलाओं के उनके वित्तीय अधिकार प्रदान करता है। कनाडा, फ्रांस, इटली और जर्मनी में प्रीनप्स के साथ-साथ मेट्रिमोनियल प्रॉपटी सिस्टम भी लागू करता है। इसके द्वारा संपति का बंटवारा होता है।

फ्रांस में सीमोन द बोअुवार और ज्यां पाल सार्त्र ने शादी नहीं की थी। उन्होंने साथ रहने के लिए आपस में कुछ शर्ते तय की थी। और उसके लिए एक समझौता किया था। दोनों के बीच हुआ समझौता एक ऐतिहासिक कानूनी दस्तावेज है। भारत में अभी भी यह चलन में नहीं आ पाया है।

अहम मसला: - प्रीनप्स को पश्चिमी देशों में वैधानिकता मिलने के पीछे बड़ा कारण है वहां की सामाजिक व्यवस्था। अधिकांश पश्चिमी देशों में विवाह को सामाजिक समझौता माना जाता है। इसके पीछे अवधारणा है कि महिला-पुरुष एक सामाजिक समझौते के तहत विवाह रूपी संस्था में प्रवेश करते हैं। ऐसे में प्रीनप्स को वहां के समाज ने मंजूरी प्रदान की है। भारत में अधिकांश विवाह परिवार के बुर्जुगों के राय-मशविरे और पसंद नापसंद के आधार पर होते हैं विवाह पूर्व कोई लिखित करार करना व्यवहार रूप में कानूनी लिखा-पढ़ी की नकारात्मक श्रेणी में आएगा। ऐसे में इसे सामाजिक स्वीकार्यता मिलने में मुश्किलें आ सकती हैं।

समझौता कानून: - अपने देश में स्त्रियों को संपति या सत्ता में साझेदारी दिलाने का कोई कानून बनाना इतना आसान नहीं है। मौजूदा संसद में सांसदों में पुरुष 92 फीसदी के करीब हें। इन हालात में अगर और मगर के बीच यदि कानून बन पाए तो उसे लागू कर पाना बेहद ही मुश्किल होगा। हिंदू विवाह कानून की चुनौतियां इसके आड़े आएगी। इस कानून की अड़चनों को आप शादी का रजिस्ट्रेशन करवाने के संदर्भ में समझ सकेंगे। सुप्रीम कोर्ट के बार-बार कहने के बावजूद आजतक सभी राज्यों में शादियों का रजिस्ट्रेशन अनिवार्य तौर पर लागू नहीं करवाया जा सका है। अदालत में अभी भी शादी के लिए बहुत कम जोड़े, या उनके अभिभावक शादी कराने को राजी हो पाते हैं। भारत में तलाक की नौबत उत्पन्न होती हे तो अदालत की मौजूदा प्रक्रिया में उनकी मुश्किलें और बढ़ जाती हैं। इन हालात में यदि वर-वधु के बीच समझौते का लिखित दस्तावेज होगा तो यह दोनों ही पक्षों को लाभान्वित करेगा। यह कानून स्त्रियों को सुरक्षा तो देगा ही लेकिन इसका फायदा पुरुषों को भी मिलेगा। महिलाएं तलाक के बाद स्वयं व अपने बच्चों का पालन-पोषण कैसे करें, यह उनके लिए बहुत बड़ी चुनौती होती है। अभी यह सिर्फ प्रस्ताव के स्तर पर है इसलिए इसके बारे में बहुत कुछ भरोसे से नहीं कहा जा सकता है। यह कानून बने तो इसका खुलकर स्वागत किया जाए।

अरविंद जैन अधिवक्ता, दिल्ली हाईकोर्ट

भारत: -पहली बात यह है कि शादी से पहले लिखित अनुबंध का जो प्रावधान सरकार करना चाह रही है वह भारत जैसे देश में कतई संभव नहीं है। ऐसा प्रावधान होने पर महिलाओं के लिए वकीलों के चक्कर लगाने व विवाह पूर्व अनुबंध का ड्राप्ट तैयार करने का काम बढ़ जाएगा। मूलत: यह काम उस वर्ग के लोगों का है जिनके पास खूब पैसा है और विवाह के लिए अपनी शर्ते चाहते हें। ऐसा नहीं है कि विदेशों में भी ऐसे अनुबंध महिलाओं की रक्षा के लिए होते है। ऐसा प्रावधान करने से महिलाओं के पक्ष में मजबूत आधार बन जाएगा तो यह गलत हैं। दरअसल ऐसे अनुबंध महज पैसों के लेनदेन से जुड़े होते है। विदेशों में भी सब ऐसे अनंबंध नहीं करते केवल उस तरह के अनंबंध होते है कि तलाक के बाद किसे क्या मिलेगा?

दहेज: - यह हमारे देश में महिलाओं के प्रति बड़ी समस्या है लड़कियों को पिता की संपति में हिस्सा नहीं मिलता है। उल्टे विवाह के समय दहेज में वर पक्ष काफी रकम ऐठ लेता है यह सिलसिला एक बार ही नहीं बल्कि यह दौर सालों तक चलता रहता है। अब पूवोत्तर व दक्षिण में पहले दहेज नहीं लिया जाता था। पर अब वहां पर भी दहेज लिया जाने लगा है। कहीं न कहीं यह हमारे राजनीतिक अर्थशास्त्र का हिस्सा बन गया हे। यह राजनीतिक का हिस्सा इसलिए बन गए है कि जो काम पहले नहीं हुआ वह अब होगा। मौटे तोर पर बेटियों पैदा मत करो बेटे पैदा करों तो दहेज देना नहीं पड़ेगा।

कविता कृष्णन सचिव, एआईपीडब्ल्यूए

उपसंहार: - बेटे के जन्म से लेकर कॅरियर तक के लिए धन वसूली करने की बात तो अब सामान्य सी हो गई है। हम इसी बड़ी समस्या से जूझ रहे हैं। ऐसे हालातों में शादी के बाद महिलाओं के लिए तलाक और घरेलू हिंसा के मामले बढ़ते ही जा रहे हैं। तलाक हो जाए तो भी कुछ नहीं मिलता है गुजारा भत्ता नाम मात्र का होता है हैरत की बात तो यह है कि हम बिना समझौता के दहेज व्यवस्था को कानून होने के बाद भी नहीं रोक पाए। इसलिए विवाह पूर्व समझौता ही हमारे लिए एक क्रूर मजाक है ऐसा हुआ तो कोरी बकवास से ज्यादा कुछ नहीं होगा। समझ में नहीं आता कि ऐसे विचारों के लिए महिला संगठनों से बात क्यों नहीं की जाती? जरूरत महिला के सुरक्षा के मौजूदा प्रावधान को ज्यादा सख्त करने की है।

अहम मसला: - प्रीनप्स को पश्चिमी देशों में वैधानिकता मिलने के पीछे बड़ा कारण है वहां की सामाजिक व्यवस्था। अधिकांश पश्चिमी देशों में विवाह को सामाजिक समझौता माना जाता है। इसके पीछे अवधारणा है कि महिला-पुरुष एक सामाजिक समझौते के तहत विवाह रूपी संस्था में प्रवेश करते हैं। ऐसे में प्रीनप्स को वहां के समाज ने मंजूरी प्रदान की हे। भारत में अधिकांश विवाह परिवार के बुर्जुगों के राय-मशविरे और पसंद नापसंद के आधार पर होते हैं विवाह पूर्व कोई लिखित करार करना व्यवहार रूप में कानूनी लिखा-पढ़ी की नकारात्मक श्रेणी में आएगा। ऐसे में इसे सामाजिक स्वीकार्यता मिलने में मुश्किलें आ सकती हैं।

- Published on: December 16, 2015