मार्स मंगलयान (Mars Mangalyan - In Hindi - 2014) [ Current Affairs ]

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प्रस्तावना: अन्तरिक्ष ने प्रारम्भ से ही मानव को अपनी ओर आकर्षित किया है। पहले मनुष्य अपनी कल्पना और कहानियों के माध्यम से अन्तरिक्ष की सैर किया करता था। अपनी इस कल्पना को साकार करने के संकल्प के साथ मानव ने अन्तरिक अनुसंधान प्रारम्भ किया और उसे बीसवीं सदी के मध्य के दशक में इस क्षेत्र में अभूतपूर्वक सफलता प्राप्त हो ही गई। आज मनुष्य ने केवल अन्तरिक के कई रहस्यों को जान गया है, बल्कि वह अन्तरिक की सैर करने के अपने सपने को भी साकार कर चुका है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण है मंगलयान की कामयाबी इस अभियान में एक बार फिर इस आलोचना को खारिज कर दिया है कि भारत जैसे देश में अन्तरिक्ष कार्यक्रम चलाना पैसे की बर्बादी है। पहली बात तो हम भारतीय अन्तरिक्ष शोध संगठन (इसरो) के कार्यक्रमों पर हर साल 1 अरब डॉल्र खर्च करते है, जो अमेरिकी अन्तरिक्ष एजेन्सी ‘नासा’ के बजट का सिर्फ 6 फीसदी है। मंगल अभियान की ही बात करें तो इस पर 450 करोड़ रूपये खर्च आया, जो देश के जी.डी.पी. का सिर्फ 0.0038 प्रतिशत है। (आम भारतीय के मंगल का मिशन)

आधा बजट लोगों के लिए मदद के लिए

इसरो चेयरमैन के. राधाकृष्णन के मुताबिक इसरो अपने बजट का सिर्फ 7 फीसदी मंगल अभियान जैसे विशुद्ध विज्ञान कार्यक्रमों पर खर्च करता है। बजट का ज्यादातर हिस्सा ऐसी परियोजनाओं में लगाया जाता है, तो देश के निर्धनतम तबके के काम आती है।

देश को बनाया सॉफ्ट पॉवर

सॉफ्ट वेयर इण्डस्ट्री के कारण देश को सूचना तकनीक की विश्व राजधानी माना जाता है। यह बैंगलूरू और बेस्टन को रियल टाईम में जोड़ने वाले संचार उपग्रहों के बिना सम्भव नहीं होगा। 500 से अधिक टीवी चैनल इसके जरिये प्रसारण कर रहे हैं। इस तरह इसने देश के लोकतंत्र को मजबूत किया है। इतना ही नहीं देश के अन्तरिक्ष कार्यक्रम के तहत विकसित 290 टेक्नोलॉजी उद्योगों को हस्तान्तरिक की गई है।

अमेरिकी कृषि विभाग को डाटा

अभी हाल तक अमेरिका का कृषि विभाग उपज का अनुमान लगाने के लिए भारत के रिसोर्स सैट उपग्रह से डाटा लिया करता था। अब तक हमने अन्तरिक्ष में 70 उपग्रह भेजे हैं, जिनमें 40 उपग्रह अन्य देशों के हैं, जिनमें जर्मनी व दक्षिण कोरिया शामिल हैं। इस तरह अन्तरिक्ष आधारित एप्लीकेशन में हम ग्लोबल लीडर हैं। जहाँ तक लागत का सवाल है, मंगलयान की कम लागत की काफी चर्चा हुई है। धरती से मंगल ग्रह के बीच 67 करोड़ कि.मी. दूरी के हिसाब से 670 रूपये प्रति कि.मी. खर्च आया है। मंगल अभियान में ताकतवर इंजन की जरूरत थी, इसलिए पुराने मॉडल में क्रायो टेक्नोलॉजी लगाई गई। मंगलयान को लॉन्च करने वाले पी.एस.एल.वी. की यह 25वीं उड़ान थी, जो 24 सितम्बर को मंगलयान को पहले ही प्रयास में कक्षा में स्थापित किया, जो दुनिया के किसी भी अन्तरिक एजेन्सी के लिए ईर्ष्या का विषय बन सकता है। मंगलयान के लगभग सारे उपकरण भारत में बनाए गए और तकनीक विकसित करने वाले वैज्ञानिक भी भारतीय है, जिससे लागत घट जाती है। इसरो की शुरूआत कोकोनट प्लान्टेशन से हुई थी और वहीं से सादगी और किफायत की परम्परा प्रारम्भ हुई। यूरोप में अन्तरिक्ष वैज्ञानिक हफ्ते में 35 घण्टे काम करते हैं,ज बकि हमारे यहाँ प्रतिशत 18 घण्टे आम बात है। लॉन्च की अवधि में तो वैज्ञानिक प्रतिदिन 20 घण्टे काम करते हैं। समय पर लॉन्च होने से लागत काबू में रहती है।

पैंग सिहाओ, रिसर्चर, चाइना अकेडमी ऑफ स्पेस टेक्नोलॉजी का कहना - ऑर्बिटर को मंगल की कक्षा में भेजना टोक्यो से गोल्फ बॉल को एक हिट में पेरिस के गोल्फ कोर्स के होल में डालने जितना कठिन है।

प्रधान मंत्री नरेन्द्र मोदी जी के अनुसार - ‘हमारे वैज्ञानिकों ने इतिहास रचा है। हमने अज्ञात में पहुँचने का साहस दिखा है।’ उल्लेखनीय है कि एस.ओ.एम. मंगल तक जाने का सबसे सस्ता अभियान रहा है। इसे अपेक्षाकृत कम समय में पूरा किया गया है। दोहराव के बावजूद यह जिक्र भी जरूर होना चाहिए कि इस सफलता के साथ भारत दुनिया का पहला देश बना है, जो पहले प्रयास में ही अपने यान को मंगल ग्रह की कक्षा में स्थापित कर सका है। महज इस बात को सोचना ही अपनी क्षमताओं में आत्मविश्वास को बढ़ा देता है। यह हौसला आगे और वैज्ञानिक कामयाबियों का आधार बनेगा। दरअसल, यह सफलता राष्ट्रीय जीवन में सुखद अनुभूति का दीर्घकालिक स्त्रोत बनी रहेगी।

मंगलयान का मंगल ग्रह की कक्षा में स्थापित होना राष्ट्रीय गौरव का विषय है। इसरो के वैज्ञानिकों ने पेश किया लक्ष्य की स्पष्टता, अनुशासन और कड़ी मेहनत का अनोखा उदाहरण है।

चेतन भगत, अंग्रेजी के प्रसिद्ध युवा उपन्यासकार ने कहा इसरों के मंगलयान या मार्स ऑर्बिटर मिशन जैसी कुछ ही भारतीय उपलब्धियाँ ऐसी है, जिनसे तत्काल राष्ट्रीय गौरव की भावना पैदा हुई हो। प्रसार माध्यमों में सराहना की बाढ़ आ गई, ट्िवटर व फेसबुक ने जश्न मनाया। हर राजनेता और सेलेब्रिटी कई दिनों तक इसरो को बधाइयाँ देते रहे। इसरो के स्टॉफ की धुन और अत्याधुनिक विज्ञान ने इस अभियान को सफल बनाया। इस सफलता पर भारत का गौरवान्वित महसूस करना पूरी तरह जायज है।

यदि वाकई हम इसरो को बधाई देना चाहते है तो हम अपने जीवन में विज्ञान को थोड़ा ज्यादा सम्मान दें। विज्ञान के केन्द्र में ही तब तक तार्किक चिन्तन और सवाल पूछने की प्रवृत्ति है, जब तक कि किसी तर्कपूर्ण समाधान पर न पहुँचा जाए।

यदि भारत आधुनिक विश्व का हिस्सा बनना चाहता है तो हमें थोड़ा और वैज्ञानिक रूख अपनाना होगा। हम आधुनिक दुनिया का अंग बनना तो चाहते है, विकसित देश जब हमें मान्यता देते है तो जो जुनूनी खुशी हम जाहिर करते हैं वह तो यही बताती है। सफल मंगल अभियान दुनिया को देखने के हमारे नजरिये में निर्णायक मोड़ बने। हमारे दिल में ईश्वर का अस्तित्व रहें पर इसके साथ हमारे दिमाग में विज्ञान को भी जगह दें।

अभिमत

मंगलयान की सफलता ने क्या हमें अन्धविश्वास छोड़कर वैज्ञानिक सोच अपनाने के लिए प्रेरित किया है?

जीवन में विज्ञान का मंगल स्थापित करें।

ऐसी सफलता अन्य क्षेत्रों में भी क्यों नहीं?

यह पृष्ठभूमि इसलिए कि मंगलयान की सफलता ने बता दिया है कि अन्य क्षेत्रों में भी ऐसी उपलब्धियाँ हासिल कर लेने की हममें क्षमता मौजूद है, लेकिन अब तक इसका पूरा दोहर नहीं हो सकता है। जानकार बताते है कि अच्छा नेतृत्व और बेहतर माहौल मिले तो देश में ऐसे उद्यमियों की भी कमी नहीं है जो देश को फिर सोने की चिड़िया बना सकें। विदेशों की ओर अधिक ताक-झांक करने की अपेक्षा इस मूल समस्या से कारणों की तलाश व उसे निराकरण की ओर अधिक ध्यान देने की जरूरत है कि मंगल अभियान की सफलता दूसरे क्षेत्रों में क्यों नहीं दोहराई जा सकती है। हम क्यों नहीं वहाँ पहुँच सकते, जहाँ हम पहले शताब्दी में थे?

मंगल मिशन का मजाक

न्यू यॉर्क में भारतवासियों के विरोध के आगे झुकते हुए प्रतिष्ठित अमेरिकी अखबार द न्यू यॉर्क टाईम्स ने दिनांक 06.10.2014 सुबह अपने उस विवादास्पर कार्टून के लिए माफी मांग ली, जिसमें भारत के मंगलयान अभियान का मजाक उड़ाया गया था।

अखबार ने फेसबुक वॉल पर लिखा, कई पाठकों ने न्यू यॉर्क टाईम्स इन्टरनेशल में छपे उस सम्पादकीय कार्टून की शिकायत की है, जो भारत के अन्तरिक प्रयासों पर बनाया गया था। यह कार्टून सिंगापुर के हेंग किम सॉन्ग ने बनाया था। सम्पादकीय पेज के एडिटर एण्ड्रयू रोसेंथल ने कहा, हेंग ने कार्टून में यह दर्शाना कि अन्तरिक अभियान पर अब अमीरों का ही कब्जा नहीं रह गया है, जिसका मतलब पश्चिमी देशों से था। इस कार्टून में दिखाया गया था कि ग्रामीण वेशभूषा का शख्स गाय लेकर एलीट स्पेस क्लब का दरवाजा खटखटा रहा है और अन्दर सम्भ्रात से दिख रहे कुछ लोग बैठे हैं। इस कार्टून की चौतरफा आलोचना हुई थी।

मंगल पर पानी : खोज के लिए नया तरीका

वाशिंगटन - ज्यावालमुखी चट्टानों की संरचना में तत्वों की मात्राएँ तय करने के लिए इस्तेमाल में लाए जाने वाले ग्राउण्डमास क्रिस्टलीनिटी नामक संकेतक की मदद से मंगल पर पानी खोजा जा सकता है। यह जानकारी एक अध्ययन में दी गई है।

मंगलयान के करीब से गुजरेगा धूमकेतु

बैंगलुरू से मंगल ग्रह की कक्षा में परिक्रमा कर रहा भारतीय उपग्रह मंगलयान 20 अक्टूबर को अद्भूत खगोलीय घटना का गवाह बनेगा। उस दिन धूमकेतु ‘साइडिंग स्प्रिंग (धूमकेतु सी/2013ए) मंगल ग्रह के करीब से होकर गुजरेगा। पहले आशंका थी कि धूमकेतु मंगलयान से टकरा न जाए मगर अनुमानों के मुुताबिक यह ग्रह की सतह से लगभग 1,35,000 किलोमीटर की दूरी से निकल जाएगा। उस वक्त मंगलयान अमेरिकी उपग्रह मावेन की तरह मंगल ग्रह की ओट में रहेगा।

अनूठा मौका

अपनी तरह का पहला मौका होगा, जब दूसरे ग्रह के करीब से गुजर रहे धूमकेतु पर दो उपग्रह नजर रखेंगे। उम्मीद है साईडिंग स्प्रिंग मंगल के नजदीक से गुजरेगा तो यान उसकी तस्वीरें उतार सकताहै। इस बीच खगोलविदों का कहना है कि धूमकेतु के गुजरने के बाद अवशेषों से मंगल ग्रह पर उल्कावृष्टि हो सकती है। पृथ्वी पर उल्कावृष्टि सामान्य घटना है, मगर दूसरे ग्रह पर घटित होते देखना रोमांचकारी है।

रोमांच संग आशंका

मंगल ग्रह पर उल्कावृष्टि से रोमांचकारी दृश्य की उम्मीद की जा रही है, वहीं आशंका भी है कि कहीं धूमकेतु के छोड़े हुए अवशेष लाल ग्रह की परिक्रमा कर रहे मंगलयान के उपकरणों को क्षति नहीं पहुँचाए। दरअसल, धूमकेतु गैस एवं धुलकणों की एक लम्बी धारा (पूंछ) छोड़ते जाते है। उपग्रह इनकी चपेट में आए तो उपकरणों को क्षति हो सकती है। मंगलयान परियोजना के निदेशक वी. केशव राजू ने कहा, इसरो वैज्ञानिक धूमकेतु पर नजर रखेंगे और यान की सुरक्षा सुनिश्चित करेंगे। घटना के अवलोकन एवं सुरक्षा के संतुलन स्थापित करेंगे। इसरो की प्राथमिकता धूमकेतु से निकलने वाले धूलकणों के बादल से यान को बचाना है।

धूमकेतु से भारी मात्रा में पानी निकल रहा है। पानी बनने की गति करीब 50 लीटर प्रति सैकण्ड है। इस गति से देखा जाए तो साईडिंग स्प्रिंग नाम का यह धूमकेतु 14 घण्टे में एक ओलंपिक मैदान के आकार के स्वीमिंग पुल (तरणताल) को भर सकता है। नासा ने मई में इस धूमकेतु को देखा था।

मंगलयान ने भेजी उपग्रह कोबोस की तस्वीरें

नई दिल्ली - मंगल की कक्षा में स्थापित होने के 20 दिन बाद भारतीय उपग्रह मंगलयान ने लाल ग्रह के प्राकृतिक उपग्रह (फोबोस) की तस्वीरें भेजी हैं। इसरो ने बताया कि इन तस्वीरों में फोबोस अपनी कक्षा में पश्चिम से पूर्व की ओर जाता हुआ दिखाई दे रहा है। ये तस्वीरें 66275 कि.मी. की ऊँचाई से ली गई है। मंगलयान को 24 सितम्बर को मंगल की कक्षा में स्थापित किया गया था। यह करीब छ: महिने सेवा में रहेगा। मंगल के दो उपग्रह है फोबोस और डेमोस। दोनों की खोज वर्ष 1877 में की गई थी। नासा के मुताबिक फोबोस एक दिन में तीन बार मंगल के चक्कर लगाता है। जबकि डेमोस प्रति 100 वर्ष में 1.8 मीटर की दर से मंगल की तरफ खिसक रहा है।

मंगलयान का नाम - मंगलयान दस माह में 65 करोड़ कि.मी. चलकर बुधवार, 24 सितम्बर को सुबह मंगल तक पहुँच गया। पहली ही बार वह अपनी कक्षा में स्थापित हो गया। इस पर मोदी जी ने कहा है कि मिशन का नाम मॉम रखा गया, क्योंकि मॉम कभी निराश नहीं करती। इस मिशन का नाम ‘मार्स ऑर्बिटर मिशन’ यानि ‘मॉम’ है। हमारे अलावा अमेरिका, रूस व ईयू ही मंगल तक पहुँचे है।

अब मंगल पर लिखवाएं नाम - आप अपना नाम अब मंगल ग्रह पर अंकित करा सकते है। अमेरिकी अन्तरिक्ष एजेन्सी नासा ओरियन अन्तरिक्षयान के जरिये यह मौका दे रही है। आगामी 4 दिसम्बर को इस यान की परीक्षण उड़ान है। लगभग 95 हजारे लोग पहले ही इस मुहिम के लिए अपना नाम दर्ज करा चुके है। इसके लिए आपको नासा (ओरियन मार्स विजिट) की वेबसाइट पर साईन ईन करना होगा और कुछ सूचनाएँ भरनी होगी। इसके बाद वेबसाइट आपके नाम का डिजिटल बोर्डिंग पास जारी करेगा। इसके बाद आपको एक संदेश प्राप्त होगा, सफल। आपका नाम ओरियन उड़ान परीक्षण के जरिये मंगल तक पहुँच जायेगा। सभी नाम एक माइक्रोचिप पर दर्ज होंगे। ओरियन उड़ान परीक्षण में अपना नाम दर्ज कराने की अन्तिम तिथि 31 अक्टूबर तय की गई है। ओरियम प्रोग्राम मैनेजर मार्क गेयर ने कहा, खाज और लोगों को भविष्य में मंगल ग्रह तक पहुँचाने के लिए नासा कड़ी मेहनत कर रहा है।

उपसंहार

अन्तरिक अनुसंधान से विश्व अत्यधिक लाभान्वित हुआ है। अन्तरिक्ष में भेजे गए उपग्रहों के कारण ही सूचना - क्रान्ति की शुरूआत करने में सफलता प्राप्त हुई है। विभिन्न अन्तरिक यात्रियों दव्ारा चन्द्रमा की सतह के सम्बन्ध में किए गए अध्ययनों से चन्द्रमा की भौगोलिक संरचना एवं उसमें उपस्थित पदार्थों के सम्बन्ध में अनेक बातों का पता चला है। मंगल, शुक्र एवं अन्य ग्रहों के रहस्यों को जानने के लिए भेजे गए यानों से इन ग्रहों के सम्बन्ध में कई बातों का पता चलता है। वैज्ञानिकों का यह भी मानना है कि मंगल ग्रह पर जीवन की सम्भावनाएँ हो सकती है।

अन्तरिक्ष युग में प्रवेश करने के बाद से मानव ने इस क्षेत्र में अनेक अभूतपूर्व उपलब्धियाँ हासिल की है। जिस तरह से वह इस क्षेत्र में प्रगति के पथ पर अग्रसर है, उससे यह अनुमान लगाया जा सकता है कि वह दिन दूर नहीं जब मानव अन्तरिक्ष में अपनी बस्तियाँ बनाने में भी कामयाब हो जायेगा।

- Published on: November 17, 2014