मैगी (Nestle Maggi Noodles banned in India - Article in Hindi) [ Current Affairs ]

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प्रस्तावना:- हाल ही में नेस्ले इंडिया के लोकप्रिय उत्पाद ’मैगी नूडल्स’ में तय मात्रा से अधिक सीसा (लैड)पाया गया। कुछ राज्यों ने इसकी ब्रिकी पर पाबंदी लगा दी तो कुछ ने जांच शुरू कर दी। ऐसा पहली बार नहीं हुआ है कि किसी एक खाद्य पदार्थ में तय मानकों के विपरीत पदार्थों का इस्तेमाल हुआ हो लेकिन सवाल यह है कि चाहे खाद्य पदार्थ हो या कोई अन्य उत्पाद, नुकसान की स्थिति में ही हम क्यों जागते हैं? बहुत से उत्पाद है जो अन्य देशों के मानको पर खरे नहीं हैं लेकिन हमारे यहां धड़ल्ले से बिकते हैं। समय रहते उनमे कदम क्यों नहीं उठाए जाते? क्यों समय पर जांच नहीं होती ? बहुत से प्रसिदव् कलाकार इन उत्पादों का विज्ञापन करते हैं तो इनके खिलाफ भी कार्रवाई नहीं होनी चाहिए? जबकि यह उत्पादक 33 साल तक बिना मानक के बिका हैं।

ब्रांड:- यह भरोसे का (ट्रस्ट मार्क) का प्रतीक होता है। भारत में ब्रांडेड चीजें खरीदने वाले कभी पैकजिंग पर बारिक अक्षरों में दी गई जानकारी नहीं पढ़ते। सिर्फ 2.3 फीसदी ही पैकेजिंग पर बड़े अक्षरों में लिखे ब्रांड नेम के अलावा कुछ पढ़ते हैं। अनेक बार ऐसा देखने में आता है कि हमारे देश में उत्पादों को लेकर हम बहुत देर से जागरूक होते है। हमारे दैनिक जीवन में उपयोग आने वाले बहुत से पदार्थ ऐसे हैं जो हमारे लिए नुकसानदायक है लेकिन हमें इसके बारे में नियमित प्रयोग के बाद पता चलता है। ऐसा नहीं कि देश में विदेशी सामग्री यूं ही इस्तेमाल होने लग जाती है या फिर विदेशी कंपनी भारत में कुछ बनाकर बेच दे तो सब चल जाएगा। हकीकत यह है कि हमारे देश में नियम हैं, कानून हैं लेकिन संसाधनों के अभाव में पूरी निगरानी नहीं हो पाती है। देश में मानव संसाधन, प्रयोगशालाओं और प्रभावी प्रवर्तन की बहुत कमी हैं। इनकी पर्याप्त व्यवस्था नहीं हो पाने से जांच में विलंब होता रहता है। इसका लाभ कंपनियों और छोटे व्यापारी भी उठाते हैं। भारतीय मानक ब्यूरों की ओर से या राज्य में विभन्न एंजेसियों के माध्यम से जांच होती हैं लेकिन ये सब नियमित न होकर, कभी कभार वाली स्थिति में होती हैं। अब नुडल्स में मिलने वाले सीसे को ही लिजिए। तय मात्रा से अधिक पाये जाने पर कुछ राज्यों में मैगी नूडल्स में पाबंदी हो गई है। कई राज्यों में नूडल्स के लोकप्रिय ब्रांड मैगी के नमूनों की जांच हुई जिसमें निर्धारित 2.5 पीपीएम (प्रति 10 लाख् में अंश) से अधिक सीसा पाया गया। यूपी में लिए गए नमूनों में सीसे की मात्रा का स्तर 17.2 पीपीएम पाया गया हैं। नेस्ले के वैश्विक कारोबार में भारत का योगदान सिर्फ1.8 फीसदी हैं, लेकिन नेस्ले के ग्लोबल सीईओ ने नई दिल्ली आकर स्थित संभावने की कोशिश की। इसे ही लीडिंग फ्राम द फ्रंट कहते हैं। इससे पता चलता है कि कंपनी उपभोक्ता के साथ रिश्ते और ब्रांड को कितना महत्व देती है।

सर्वेक्षण:- हमने जब एक एक सर्वे किया तो अधिकांश लोगों ने बताया कि वे सेलेब्रिट्री दव्ारा प्रभावित होकर उत्पाद खरीदते है। व इसमें दो ऐसे तत्व पाए गए है जो स्वास्थ्य के लिए बहुत हानिकारक हैं। पहला सीसा दूसरा मोनोसोडियम ग्लूटामेट। हालांकि उत्पाद के साथ जुड़े अभिनेता के दम पर ही उत्पाद को सफलता नहीं मिल सकती। बाजार में उस उत्पाद की जरूरत पर भी बहुत कुछ निर्भर करता है। मसलन मैगी सिर्फ किसी सितारे की वजह से बिकी, ऐसा कहना सही नहीं है। असल में जब मैगी भारतीय बाजार में लॉन्च हुई तो हमारे यहां ऐसा कोई अन्य उत्पाद मौजूद ही नहीं था। महज दो मिनिट में पकने वाले भोजन के तौर पर इसे पेश किया गया। धीरे-धीरे नूडल का मतलब ही मैगी हो गया। अब इस उत्पाद में सीसे जैसा पदार्थ 17 फीसदी तक अधिक मात्रा में मिला है तो यह बेहद चिंताजनक है क्योंकि यह हर घर में खाया जाने वाला उत्पाद हो गया है। हम अन्य उत्पादों की तुलना में सितारों दव्ारा किए जाने वाले विज्ञापन को ज्यादा महत्व दिया हैं। बार-बार टीवी व अखबार में दिखने वाले विज्ञापन यकीनन हमारे मन-मस्तिष्क पर छाप छोड़ जाते हैं। उत्पादों की लेबलिंग में जो लिखा होता है उसकी जांच होनी चाहिए। अगर कंपनी उसका पालन नहीं कर रही है तो उस उत्पाद पर प्रतिबंध लगा देने चाहिए। मैगी ही नहीं ऐसे कई उत्पाद है जिनसे वास्तविक पदार्थ की जगह उनका विकल्प इस्तेमाल किया जाता है, जो हमारे स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हैं। इसलिए मैगी ने अब भारतीय बाजार से सारा स्टॉक वापस नेले का बड़ा और साहसी कदम उठा ही चुकी है। यह एक तरह का शुद्धीकरण है। अब बाजार भौतिक और भावनात्मक रूप से स्वच्छ है।

मॉडल्स :-यह बहुत ही अजीब बात है कि मॉडलों के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराने की बात हो रही है। जरा सोचिए कि यह कितना अजीब होगा, यदि कोई व्यक्ति किसी राज्य का ब्रांड एंबेसेडर है और उस राज्य में कोई दुर्घटना हो जाए तो ब्रांड एंबेसेडर को दोषी नहीं ठहराते हुए उस पर मुकादमा चलाया जाए। इस आधार पर यदि नूडल्स में गड़बड़ी पाई गई तो इसके लिए उनका विज्ञापन करने वालों के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराने की बात समझ से परे हैं। यह जरूर है कि प्रसिद्ध शख्सियतें हैं इसलिए उन्हें विज्ञापन करते हैं तो गलत भी नहीं है लेकिन जो शख्सियतें भारत सरकार से पुरस्कार प्राप्त हैं। उदाहरण के तौर पर सचिन तेंदुलकर, अमिताभ बच्चन आदि यदि ये विज्ञापन करते हैं तो फिर नैतिकता के सवाल खड़े होते हैं। नैतिक रूप से उन्हें कहां आवश्यकता है कि वे विज्ञापनों के जरिए आय अर्जित करें ऐसे में उन्हें इससे बचना ही चाहिए। बाजार में जो उत्पाद महिलाओं और बच्चों से जुड़े होते हैं, जब उनका विज्ञापन सेलेब्रिटी दव्ारा किया जाता है तो उसका असर ज्यादा पड़ता है। अधिकांशत: कंपनियां अपने उत्पाद की एक छवि बनाने, उसे स्थापित करने के लिए सितारों को जोड़ती हैं। जब मैगी जैसे उत्पाद का विज्ञापन माधुरी दीक्षित और अमिताभ बच्चन करते हैं तो जाहिर तौर पर लोग उस ओर आकर्षित होते हैं। उत्पाद के ज्यादा से ज्यादा प्रचार और उसकी बिक्री बढ़ाने के लिए विज्ञापन में सेलिब्रिटी का उपयोग जरूरी सा माना जाता है। इस तथ्य से इनकार नहीं किया जा सकता है कि सितारों दव्ारा उत्पाद का विज्ञापन करने पर उसकी ब्रिकी बढ़ती है।

स्वास्थ्य:- भारत में इतना भ्रष्टाचार है कि उत्पादों की जांच करना और गड़बड़ उत्पादों पर लगाम लगाना मुश्किल हो गया है। यह मसला सीधे - सीधे हमारे स्वास्थ्य से जुड़ा होता है। सरकार को फूड एंड सेफ्टी के बारे में सख्त सिस्टम स्थापित करना चाहिए। जांच तंत्र विकसित करना चाहिए। हर एक राज्य में एक लेबोरेट्री होनी चाहिए, उनमें आधुनिक उपकरण हों और प्रशिक्षित स्टाफ हो, जो त्वरित जांच करने में सक्षम हो। हमें अंतराष्ट्रीय मानकों के हिसाब से काम करने की जरूरत है। सरकार उपभोक्ताओं तक सुरक्षित खाद्य पदार्थों की पहुंच तभी सुनिश्चित कर सकती है, जब वह इस क्षेत्र में संसाधनों के लिए निवेश करें। अभी जिस किसी उत्पाद में गड़बड़ी पाई गई, उस पर तुरंत मामला दर्ज कराना चाहिए था। संबंधित कंपनी पर फौरन कार्रवाई होनी चाहिए थी। पर अभी ऐसा नहीं हो पाया हैं। ऐसा इसलिए नहीं हो रहा है कि सैम्पलिंग को पास कराने के लिए जमकर घूसखोरी होती है इसलिए कमतर उत्पाद भी बाजार में बिकते हैं। हमारी नई पीढ़ी तो जमकर मैगी जैसे उत्पाद का उपभोग कर रही है। हालांकि सभी जगह मैगी में गड़बडियां नहीं मिली हैं। महाराष्ट्र गोवा में जांच हुई, वहां गड़बड़ी नहीं मिली। खाने की चीजों में सीसे की अधिकता के कारण मनुष्य के शरीर में रक्तचाप, किडनी और स्नायविक तंत्र की समस्याएं बढ़ती चली जाती हैं। दूसरी तरफ एक ओर मोलोसोडियम ग्लूटामेट नामक रसायन भी खतरे के बिंदू से ज्यादा हैं। इस रसायन के कारण भी अनेक गंभीर बीमारी होती है जैसे कि मानसिक बीमारी आदि। सिर्फ मैगी ही नहीं ये जहरीले रसायन प्रदार्थ पीज्ज़ा, बर्गर, पेटिस, कोला जैसे अनेक जंक फूड में मिला हुआ है।

कानून:- 2006 में सरकार ने खाद्य- सुरक्षा और शुद्धता कानून पास किया था, जिसके अंर्तगत साधारण जुर्माने से मौत की सजा तक का प्रावधान था, लेकिन क्या आज तक किसी को भी फांसी पर लटकाया गया? संसद में प्रस्तुत एक रिर्पोट के अनुसार पिछले साल खाद्य-अशुद्धता के 10,200 मामले पकड़े गए थे, जिनमें से सिर्फ 913 को सजा मिली याने 10 प्रतिशत भी नहीं।

जनता:- इन सब में सबसे बड़ी जिम्मेदारी जनता की है। जनता इन चीजों को आंख मींचकर इस्तेमाल क्यों करती है? यदि वह इनका बहिष्कार करने लगे तो ये मुनाफाखोर कंपनियां भारत से भाग खड़ी होंगी। चीन, जापान, और इंडोनेशिया के बाद भारत ही मैगी की सुखी सेवइयां का सबसे बड़ा उपभोक्ता हैं। हमारे देश के मध्यम वर्ग का और खासकर उसके जवानों का प्रिय भोजन है। यह चीज इसलिए पंसद नहीं है कि यह स्वादिष्ट चीजें भारत में नहीं बनती। बल्कि कुछ विदेशी चीजें ऐसी हैं, जो बिना किसी कारण महान दिखने लगती हैं। इसका एक ही कारण है वह हमारी गुलाम मानसिकता।

चेतन भगत के अनुसार कोई भी चीज महीनों तक सुखाया गया हो, उसमें गूंथा हुआ आटा हो, वह आपकी सेहत के लिए अच्छी नहीं होती है। मैगी कभी सेहत के लिए अच्छी थी ही नहीं।

उपसंहार:- इन सब में परिणाम यह होता है कि देश में बीमारियां और अपराध बढ़ रहे हैं इन प्रवृतियों पर सिर्फ कानून काबू नहीं पा सकता। यह नेताओं के भी बस की बात नहीं है। इसके समाधान के लिए हम सबको आगे आना होगा। भारत के अन्य सारे ब्रांड के लिए सबक है- खुद को कभी कंज्यूमर के लिए हमेशा स्वीकार्य मानकर मत चलिए। फुर्ती से अपना आत्म- परीक्षण कीजिए। आपके सही होने से नहीं चलेगा, आप सही हैं, ऐसा दिखना भी चाहिए।

- Published on: July 23, 2015