एआईपीएमटी पर्चे लीक (Paper Leak Case in AIPMT Exam conducted by CBSE in Hindi) [ Current Affairs ]

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प्रस्तावना:- प्रतियोगी परिक्षाओं के पर्चे लीक करने से लेकर केंद्रों पर नकल होना और फिर गड़बड़ियां सामने आने पर परीक्षा रद्द हो जाना एवं अंत में परीक्षा आयोजित कराने वाली संस्थाओं दव्ारा बेबसी जाहिर कर देना, अब यह एक सिलसिला ही चल पड़ा है। देश के बड़े-बड़े इम्तिहान भी इससे अछूते नहीं रहे। इस साल 2015 में हुई एआईपीएमटी का हश्र भी यही हुआ, जो मेडिकल क्षेत्र में प्रतिष्ठा का प्रतीक मानी जाती है। हरेक परीक्षा में पर्चे निकालने वाले गिरोह के कारण सभी छात्रों को हर्जाना भरना पड़ता है।

गैंग:- 3 मई 2015 को देशभर में एआईपीएमटी आयोजित कराई गई। उसके बाद रोहतक पुलिस को किसी गैंग दव्ारा पेपर लीक और कुछ परीक्षार्थियों को केंद्रो में उत्तर बताए जाने की जानकारी मिली। पुलिस ने कुछ परीक्षा केंद्रों पर छापा मारा और 4 लोगों को गिरफ्तार किया गया। इसके बाद 5 मई को रोहतक जिले का रूपसिंह डांगी मास्टरमाइंड निकला। परीक्षा शुरू होने के चंद मिनटों के भीतर ही डांगी की गैंग के लोगों ने पेपर हल करना शुरू कर दिया। कुछ परीक्षा केंद्रों के बाहर खड़ें बिचौलियों, जो ब्लूटूथ डिवाइस से जुड़े हुए थे, को व्हाट्सएप पर उत्तर भेजे जाने लगे। केंद्रों के भीतर कुछ छात्रों के कानों में लगे माइको ईयरफोन, जो उनके कपड़ों में छिपे सिमकार्ड से जुड़े हुए थे, के जरिए बिचौलिए उत्तर बताने लगे। इस प्रकार डांगी के लोग केंद्रों के हर तरफ थें। दी। 5 जून हरियाणा पुलिस ने डांगी का पता बताने के लिए एक लाख रूपए के इनाम की घोषणा की।

परीक्षा:- 21 मई को कुछ अभिभावक दोबारा परीक्षा आयेजित कराने के लिए सुप्रीम कोर्ट गए। 3 जून सुप्रीम कोर्ट ने एआईपीएमटी के परीक्षा परिणाम पर रोक लगा दी। 16 जुन सुप्रीम कोर्ट एआईपीएमटी के परीक्षा परिणाम को रद्द किया और चार सप्ताह में दोबारा परीक्षा कराने का आदेश दिया। इस मामले की सुनवाई 33 दिन तक चली अपने फैसले में कोर्ट ने कहा कि परीक्षा की पारदर्शिता के लिए इम्तिहान दोबारा कराए जाएं। जो अब दिनांक 25 जुलाई को होगी।

एआईपीएमटी में 3700 सीट हैं। हर साल लगभग 6.3 लाख छात्र इम्तिहान देते है। 183 सरकारी मेडिकल कॉलेज हैं। देशभर में एमबीबीएस की, सरकारी कॉलेजों में 24,935 सीटे हैं। 15 प्रतिशत कोटा रखा जाता है एआईपीएमटी के लिए इन कुल सीटों का।

गोपनीयता:- तीन घंटे में ऐसी लिखित परीक्षा, जिसके प्रश्न गोपनीय हों ऐसी व्यवस्था जहां-जहां भी हो, वह 100 फीसदी लीक प्रूफ नहीं हो सकती। परीक्षा की ऐसी प्रणाली अधिक से अधिक से 99 फीसदी गोपनीय हो सकती है, पर 100 फीसदी नहीं। परीक्षा की इस तरह की प्रणाली में चार-पांच कमजोर कड़ियां होती हैं, जहां से पेपर लीक होने की संभावना बनी रहती है। यह कमजोर कडियां कुछ इस प्रकार होती हैं-

प्रश्न पत्र बनाने वाला, मॉडरेट करने वाला, प्रिटिंग करने वाला और पेपर बनाने वाली संस्था के शीर्ष अधिकारी। कभी कभार पेपर को ट्रांसपोर्ट करने वाला भी कमजोर कड़ी बन सकता है। इनमें सबसे कमजोर कड़ी है प्रिटिंग प्रेस। संघ लोक सेवा आयोग का भी पेपर एक बार लीक हो चुका है, वह भी प्रिटिंग प्रेस से ही लीक हुआ था। रांची स्थित एक प्रिटिंग प्रेस में यह पेपर लीक हुआ था। अन्य कमजोर कड़ियों का तोड़ तो फिर भी इस तरह निकाला जा सकता है कि तीन-तीन प्रश्न पत्र तैयार कराए जाएं और मॉडरेटर भी एक से अधिक रखे जा सकते हैं, पर प्रिटिंग के दौरान पेपर की गोपनीयता भंग न होने देना, आज भी एक बड़ी चुनौती बना हुआ है।

दो विश्वविद्यालयों, प्रतिस्पर्धी परीक्षाएं आयोजित करने वाली दो बड़ी संस्थाओं के मुख्य प्रशासक के अनुभव से यह कह सकता हूं कि प्रिटिंग प्रेस और मॉडरेटर पेपर लीक होने के क्रम में दो सबसे कमजोर कड़ियां है।

कॅरियर:- विशेषकर प्रतिस्पर्धी परीक्षाओं का पेपर लीक होने से बचाना निश्चित रूप से बड़ी चुनौती है। तुलनात्मक रूप से इसे इस तरह समझा जा सकता है कि अगर कोई कुंभ के मेले में हजार रूपये का नोट हाथ में लेकर जाए तो फिर उसकी सुरक्षा कितनी बड़ी चुनौती होगी? वैसा ही हाल हमारे देश में प्रतियोगी परीक्षाओं का हो गया है। इन प्रतियोगी परीक्षाओं में एक-एक नंबर पर हजारों छात्रों का भविष्य दांव पर लगा होता है, पूरा कॅरियर ही इन परीक्षा के परिणामों पर निर्भर करता है। ऐसे में सिर्फ परीक्षा आयोजित करने वाली संस्था का हित इसमें होता है कि पेपर गोपनीय रहे पर अन्य सभी लोग-लाखों परीक्षार्थी और उनके शुभचिंतक अपना हित इसी में देखते हैं कि प्रश्नपत्र गोपनीय नहीं रहे और उन्हें मिल जाए, जिससे उनका चयन हो जाए। इसलिए वे इसकी गोपनीयता भंग करने की हर संभव कोशिश करते हैं।

प्रिटिंग प्रेस:- इसका हल यही है कि प्रश्नपत्र उन्ही प्रिटिंग प्रेस को मुद्रण के लिए दिए जाएं जो कि लंबे समय से गोपनीयता और विश्वसनीयता की कसौटी पर खड़े उतरे है। हर संस्थान की सूची में ऐसे कुछ प्रिंटर्स होते हैं जो कि ’कॉन्फिडेंशियल’ प्रिटिंग करते है। पर कई बार इन प्रिटिंग प्रेस से ही पेपर लीक हो जाते हैं। कभी आंशिक रूप से तो कभी पूरा पेपर। विश्वविद्यालय के स्तरों पर तो ऐसी घटनाएं होती ही रहती हैं, उन पर ज्यादा चर्चा नहीं होती। पर जब ऊंचे कॅरियर से जुड़ी परीक्षाओं के मामले में ऐसा होता है, तो फिर बहुत हंगामा और विवाद हो जाता है। अब सवाल है कि विदेशों में अर्थात विकसित देशों और चीन आदि देशों में ऐसा क्यों नहीं होता? इसका सक्षिप्त जवाब यही है कि इन देशों में बड़े कॅरियरों का चयन करने के लिए इस तरह की लिखित और गोपनीय परीक्षाएं नहीं होती है।

आत्मावलोकन:- मेडिकल या इंजीनियरिंग की प्रवेश परीक्षा में बैठने वाले परीक्षार्थियों की तीन तरह की श्रेणियां होती हैं-

  • पहली श्रेणी में वे छात्र होते हैं जो निरंतर तैयारी करते हैं। जो जान लगाकर मेहनत करते हैं। उन्हें परीक्षा रद्द होने या इसकी तिथि आगे खिसकने से उन्हें बहुत अधिक निराशा होती है। ऐसे छात्रों को लगता है कि समय निकल गया है। कब कॉलेज में प्रवेश मिलेगा? कैसे और कब सेमेस्टर शुरू होंगे। ऐसे लोगों के लिए समय की बहुत ही महत्वपूर्ण होता है।
  • दूसरी श्रेणी में दो वर्ग होते हैं, एक तो अपने आप डॉक्टर बनना चाहते हैं लेकिन बहुत मेहनत नहीं कर पाए है। दूसरे वर्ग में वे विद्यार्थी आते हैं जो बहुत मेहनती होते हैं और उनका व्यक्तित्व परफेक्शनिस्ट जैसा होता है। उन पर दवाब होता है कि माता- पिता डॉक्टर बनाना चाहते हैं। उन्हें लगता है कि थोड़ा समय और मिल गया।
  • तीसरी श्रेणी के छात्र बहुत ही डेस्टक्टिव यानी बहुत ही घातक होते हैं। इनकी नकारात्मक सोच होती है कि न तो खुद कुछ करेगें। न ही करने देंगे। ऐसे व्यक्तित्वों को ढूंढना पड़ेगा। इनकी काउंसलिंग होनी चाहिए। सरकार को भी देखना चाहिए कि किसी भी स्थिति में परीक्षा आगे ना खिसके न ही रद्द हो। यदि किसी कारणवश ऐसा करना पड़ता है तो यह तीसरी श्रेणी के गुंडागर्दी करने वाले छात्रों की जीत ही कही जाएगी।

फिक्र तो शुरूआती दो श्रेणियों के बच्चों की है कि इन बच्चों के भविष्य की तैयारी में लगा कीमती समय बर्बाद हो गया क्योंकि अब कॉलेज में एडमिशन देर से होगा और सेमेस्टर देर से शुरू हाेेंगे। ऐसे में अगर उन्हें अंतराष्ट्रीय स्तर पर आगे बढ़ना हो तो उनके भी तो निर्धारित समय पर ही काम होते हैं। उनके नियम कायदे हैं। अलग से तय समय पर प्रवेश परीक्षाएं भी होती हैं। इसके लिए यदि देरी होती है तो वे चूक जाते हैं। यह तो श्रृंखला है क्रियाओं और फिर प्रतिक्रियाओं की, जिसके कारण दोनों ही श्रेणी के छात्रों को जबरदस्त नुकसान उठाना पड़ता है। हमें उन गुंडागर्दी करने वाले करीब 20 फीसदी छात्रों की बात करनी चाहिए, जिनके कारण अन्य परीक्षार्थियों को परेशानियां उठानी पड़ती हैं। सोचना पड़ेगा कि इन्हें कैसे पकड़ा जाए? बल्कि इसके लिए हमें पहले आत्मावलोकन करना चाहिए। हमें देखना पड़ेगा कि जिनके हाथ में प्रश्नपत्र है, उन्हें कितनी ईमानदारी से तैयार किया गया है? इसके लिए कितनी गोपनीयता से बरती गई है? कोई प्रश्नपत्र लीक का मामला तो नहीं है? बहुत से स्तरों पर कार्य होना चाहिए। पेपर आउट ऑफ कोर्स आता है। इसका मतलब पेपर सेंटर ने इसे गंभीरता नहीं दिखाई। सिलेबस नहीं देखा। किसी बच्चे पर कोई अध्यापक हाथ उठाए तो उसके लिए तो ’प्रोटेक्शन फॉर चाइल्ड राइट्स कमीशन’ बनाया जा सकता है। लेकिन यह कोई नहीं सोचता कि बच्चे जब अपराध करने पर उतरते है तो सीखते किससे हैं? वे बड़ो से ही सीखते हैं। तब यह अपराध की प्रवृति धीरे धीरे आगे बढ़ती जाती है।

समाधान:- सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय तो पूरी तरह से सही है कि सीबीएसई दव्ारा आयोजित एआईपीएमटी की पूरी परीक्षा ही रद्द कर दी गई है। इतनी बड़ी परीक्षाओं में पेपर लीक होने जैसी घटनाओं को कतई बर्दाश्त नहीं किया जा सकता। आगे से इस तरह घटनाएं नहीं हों, इसका उपाय यही है कि जो इन घटनाओं के जिम्मेदार लोग हों, उनको सख्त सजा दी जाए। सिर्फ प्रश्न पत्र दोबारा कराना इस समस्या का हल नहीं है। दूसरे जो बच्चे 11वीं में आ गए है उन्हे उसी समय अपने कॅरियर की चिंता होती है। लेकिन उनमेे जो नकारात्मक सोच वाले बच्चे है उन्हें रिकॉर्ड में लाना चाहिए। इसके लिए स्कूल के प्राचार्य और अभिभावक भी उन बच्चों के साथ मिलकर उनकी नकारात्मक सोच को बदल सकते है ताकि कोई नकारत्मक वाला बच्चा अपराध बोध में न जाए।

उपसंहार:- संपूर्ण समाज को आत्मावलोकन करना होगा। केवल बच्चों की ही नहीं, शिक्षकों और अभिभावकों को अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी। पेपर लीक आदि के पीछे जो लोग भी है उनको ऐसी सजा दी जानी चाहिए जिससे भविष्य में कोई ऐसा करने की सोचे भी नहीं। पर हमारे देश में प्राय: यह नहीं हो पाता, इसलिए बार-बार इस तरह की घटनाएं सामने आती रहती हैं। पर इन सब में सबसे बड़ा नुकसान इन बच्चों के भविष्य का होता है जो रात दिन अपना कॅरियर बनाने में लगे रहते है। अब आने वाली परीक्षा में पारदर्शिता हो जिससे सब बच्चों का भविष्य उज्जवल हो सके यही हमारी शुभकामना हैं।

- Published on: August 6, 2015