भारत-चीन व मंगोलिया संबंध (Prime Minister Narendra Modi’s Visit to Mongolia - India’s relation) [ Current Affairs ]

()

प्रस्तावना:- मोदी जी को प्रधानमंत्री बने लगभग एक वर्ष हो चुका है। इस वर्ष में उन्होंने देश के विकास के लिए कई सराहनीय कार्य किए है, इसके लिए उन्हें कई विदेशी यात्राएं भी करनी पड़ी है जिसमें कुछ विदेशी दौरे सफल भी रहे है। इसी विकास को आगे बढ़ाने के लिए वे अभी मई 2015 में चीन व मंगोलिया गए जहां उन्होंने भारत के विकास के लिए कई समझौते किए गए है।

भारत-चीन:- प्रधानमंत्री के तौर पर यह उनकी पहली चीन यात्रा है, लेकिन इसके पहले वे मुख्यमंत्री के तौर पर चार बार चीन जा चुके हैं। मुख्यमंत्री बनने के बाद वे शायद किसी भी देश में चार बार नहीं गए। इनके पहले भी कई मंत्री चीन गए लेकिन फिर भी सीमा विवाद ज्यों का त्यों बना हुआ है। संतोष की बात यह है कि इस विवाद के बावजूद दोनों देशों के आर्थिक और राजनीतिक संबंधो में कोई बड़ी रुकावट नहीं आ रही है। लेकिन इस विवाद कारण दोनों देशो में संदेह बना रहता है। चीन के साथ संबंध साधने की प्रधानमंत्री मोदी की कोशिश में जब आशा की किरण दिखाई दी जब चीन के प्रधानमंत्री ली केकियांग सीमा विवाद का एक-दूसरे को मान्य हल निकालने पर राजी हो गए। चीन भारत के प्रति नजरिए में बदलाव लाए। इस पर चीन के साथ रेलवे व शिक्षा समेत रिकॉर्ड 24 समझौतों पर दस्तखत से पहले मोदी जी ने चीनी सैलानियों को भारत की ओर से ई-वीजा सुविधा का ऐलान किया। मोदी ने यह ऐलान ली के साथ प्रेस कॉन्फ्रेंस के बजाय सिंघुआ विवि में छात्रों को संबोधित करते हुए कहा है।

मोदी जी ने कहा, रिश्तों को मजबूती के साथ आगे ले जाना है तो चीन को कुछ मुद्दों पर अपने नजरिये पर फिर से सोचना होगा। मोदी का इशारा एक अधिकृत कश्मीर में चीन के दखल, नत्थी वीजा, सीमा विवाद की ओर था। मोदी व ली केकियांग ने सीमा विवाद का न्यायसंगत, स्थायी व परस्पर स्वीकार्य हल खोजने को राजी हुए। साथ ही सरहद पर शांति की कोशिशें जारी रखने की प्रतिबद्धता भी जताई। चीन भारत के जम्मू-कश्मीर और अरुणाचल प्रदेश के नागरिकों को नत्थी वीजा देता आया है।

चीन का दावा है कि भारत ने उसकी 98,000 किमी जमीन दबा रखी है और भारत मानता है कि चीन ने उसकी 38,000 किमी जमीन को घेर रखा है। इस विवाद को हल करने के लिए मोदी को अधिक हिम्मत दिखानी होगी। क्योंकि चीन के राष्ट्रपति तो सर्वेसर्वा हैं। वे कुछ भी ले दे सकते हैं लेकिन भारत के प्रधानमंत्री के हाथ संसद ने बांध रखे हैं। यदि मोदी इस सीमा विवाद को हल कर सके तो भारत चीन घनिष्टता की सीमा का भी अंत हो जाएगा। यदि वे 1962 की बेड़ी को मोदी तोड़ सकें तो भारत चीन संबंधो का इतिहास, जो 1962 वर्षो से भी ज्यादा पुराना है, दोनों देशों के बीच सीमेंट का काम करेगा। ”मोदी ने कहा कि 20 साल पहले मैंने चीन के कई विद्धानों व आम लोगों से सुना था कि भारत हमारे गुरुओं का देश है। भारत पश्चिमी स्वर्ग है। यदि हमारा दूसरा जन्म हो तो भारत में हो। इसलिए भारत और चीन के हजारों वर्षो के आत्मीय और घनिष्ट संबंधो की उपेक्षा भी नहीं की जा सकती है। चीन को पता है कि भारत को साथ चलने का महत्व क्या है?

दोनों राष्ट्र सिर्फ राष्ट्र नहीं है ये दोनों महान सभ्यताएं है। ये सारे विश्व को रास्ता दिखा सकती हैं। लेकिन चीन चाहता है 21 वीं एशिया की सदी हो यह भारत के बिना नहीं हो सकती है। चीन व भारत साथ-साथ आगे बढ़ें, यह लक्ष्य तभी पूर्ण होगा जब उनके नेताओं में गहन इतिहास- दृष्टि और व्यापक भविष्य दृष्टि हो। इसका अर्थ यह नहीं है कि हम अपने तात्कालिक मुद्दों की उपेक्षा कर दें।

व्यापार:- सबसे पहले तो आपसी व्यापार पर ध्यान देना होगा। इस समय चीन भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक भागीदार है। दोनों देशों के बीच 72 अरब रुपए का सालाना व्यापार है। भारत चीन आर्थिक संबंधों में सबसे बड़ा बाधक भाषा का है। हमारे थोड़े-बहुत व्यापारी अंग्रेजी जानते हैं, लेकिन चीन व्यापारी तो केवल चीनी भाषा में ही काम करते है। यदि भारत में एक हजार छात्र भी चीनी भाषा जानते होते तो दोनों देशों का व्यापार कई गुना बढ़ जाता है व भारत और चीन मिलकर अपने-अपने देशों और विदेशों में भी संयुक्त उद्यम लगा सकते है। भारत, चीन को मजबुर कर सकता है कि वह भारत के राष्ट्रहितों की हानि करने की बजाय उसके साथ सहयोग करने में ही उसका फायदा है। यूं भी चीन के अमेरिका और जापान के साथ जिस तरह से खट्ठे मीठे संबंध हैं, उन्हें देखते हुए भारत के साथ मैत्री संबंध बढ़ाना ही उसके लिए बेहतर विकल्प है।

विकास:- दक्षिण एशिया में चीन के साथ भारत एक बड़ा देश है। लेकिन, भौगालिक रूप से बड़ा होने से कुछ नहीं होता। हमें आर्थिक रूप से और सैन्य दृष्टि से भी बड़ा देश होना चाहिए। यदि आप कमजोर पड़ते हैं तो अन्य मुल्क इसका फायदा उठाने लगते हैं। हमारी नीतियां कभी भी ऐसी नहीं रहीं कि हम पड़ोसी देशों के साथ बड़े भाई की भूमिका निभा पाएं। भारत ने अपने रुख में बदलाव करते हुए कार्यशैली को ना बदला तो अगले पांच से दस साल में चीन हमारे दरवाजे पर दिखाई देने वाला है।

देश को अपने विकास के साथ सीमाओं की सुरक्षा पर ध्यान देने के लिए यह भी करना पड़ेगा। अन्य देशों के सामने यह दिखाना होगा कि भारत भी किसी से कम नहीं है वरना घरेलू उलझनों में ही उलझ कर रह गए तो सीमा पर कोई चीन दिखाई देने वाला है। तब ना तो घरेलू समस्या सुलझा पांएगे और न सीमा की समस्या ही। इसलिए दोनों देश आपसी संहयोग से आर्थिक विकास की ओर विचार करें।

भारत मंगोलिया:- यहां की आबादी करीब 8,50,000 साल पहले से है। यहां के चगेंज खान ने किसी समय पूरे एशिया में कहर बरपाया था। इसे घोड़ों का देश भी कहा जाता है। मंगोलिया ने धर्म व राजनीतिक मामले में कई उतार चड़ाव देखे हैं। यह चीन व रूस से गिरा हुआ है। इसका दक्ष्णीि हिस्सा गोबी रेगिस्तान है। इसका क्षेत्रफल 15,66,000 वर्ग किमी है और आबादी 30,00,000 यानी आबादी का घनत्व 1.92 प्रतिवर्ग किमी है। प्रतिव्यक्ति आय 9,293 अमेरिकी डॉलर। नस्लो के हिसाब से 95 प्रतिशत मंगोल, 4 प्रतिशत कजाब और 1 प्रतिशत अन्य हैं। धर्मो के हिसाब से 53 प्रतिशत बौद्ध, 3 प्रतिशत शमनवादी और 3 प्रतिशत इस्लाम है। बौद्ध धर्म यहां नेपाल व तिब्बत होते हुए पहुचा है।

मंगोलिया ऐसा देश जो रुस से अलग होने के बाद फलने फूलने को बेताब है। यह वह देश है जहां बौद्ध संप्रदाय के अनुयायियों का बोलबाला रहा है लेकिन हालात से मजबूर होकर यह परम्परा और सांस्कृतिक विरासत को खोने लगा था। ऐसे में भारत ने नब्बे के दशक में वहां एक राजदूत को भेजा जो कहने को विदेशी था। पर उसे वहां के लोगो ने अपनों से अधिक सम्मान दिया। वहां के वासियो ने कहा कि यह व्यक्ति हमारे सांस्कृतिक विरासत व परम्परा को वापस लौटाने में हमारी मदद करेगा। इसी कारण से हमारे देश से मंगोलिया का जुड़ाव केवल कुछ समय का नहीं बल्कि बहुत पुराना है। दोनों देशो में विभिन्न क्षेत्रों में सहयोग के लिए 14 समझौतों पर हस्ताक्षर किए गए। इससे आर्थिक संबंध ओर अधिक मजबूत होगे।

सवाल:- जहां तक भारत के प्रधानमंत्री की मंगोलिया यात्रा का सवाल है तो इसे रणनीतिक तौर पर बहुत ही अच्छा कदम माना जाएगा। प्राकृतिक आपदा से जूझ रह देश के अनेक राज्य आर्थिक सहायता के लिए केंद्र सरकार की ओर देखते रहते हैं और ऐसे में भारत अन्य देशों को भारी -भरकम आर्थिक सहायता उपलब्ध कराता है तो यह सवाल उठना लाजिमी ही है कि क्या हमारी जरूरत अन्य देशों के मुकाबले कुछ भी नहीं हैं? विकसित देशों के आगे झोली फेलाने वाले हम, क्या आर्थिक रूप से इतने सक्षम हो गए हैं कि अन्य देशों की आर्थिक सहायता कर सकें? बात करें यदि मंगोलिया जाकर प्रधानमंत्री के एक अरब डॉलर की आर्थिक सहायता देने की, तो यह समझ से परे है यह विवेकपूर्ण निर्णय नहीं कहा जा सकता। मंगोलिया को इतनी बड़ी मदद देकर उन्होंने दिखावा किया है कि भारत कितना पैसे वाला देश हो गया है। अमर्त्य सेन के आकड़ों के मुताबिक देश में करीब 69 फीसदी आबादी गरीबी रेखा के नीचे हैं व किसान के भूमिअधिग्रहण होने से आर्थिक स्थिति ओर भी खराब हो गई है। ऐसे में यह सवाल उठना ही है कि मंगोलिया में इतने पैसे क्यों दिए। इसके जरिए भारत ने चीन को संदेश भेजा कि यदि वह भारत के पड़ोसी देश पाकिस्तान के जरिए भारत पर निगरानी करना चाहता है, श्रीलंका के जरिए भारत को आंख दिखाना चाहता है तो हम भी कम नहीं है। यह रणनीतिक सूझबूझ का परिचय देते हुए उठाया गया कदम है।

कारण:- मंगोलिया जाकर उसे आर्थिक सहायता देने के मायने यही है कि यदि चीन हमारे पड़ोसी मूल्क में घुसेगा तो हमें भी उसके पड़ोसी मूल्क में घूसना आता है वह उस देश में जिसके भारत के साथ सदियों पुराने संबंध रहे हैं। बौद्ध संप्रदाय भारत के रास्ते ही मंगोलिया पहुंचा और वहां पनपा था। भारत के जरिए ब्रीजिंग को स्पष्ट संदेश दिया है कि भारत अपनी संप्रभुता के साथ कोई समझौता नहीं करेगा। जो चाल चीन चल सकता है, उसका जवाब देना भारत को भी आता है।

आर्थिक सहायता:- भारत ने यह आर्थिक सहायता केवल मंगोलिया को ही नहीं की दी है बल्कि अनेक देशों को भी दी है जैसे -

  1. भूटान में 16-17 जून 2014 को 11 वीं पंचवर्षीय योजना के लिए 45 अरब व आर्थिक प्रोत्साहन योजना के लिए 5 अरब रुपए की सहायता की।
  2. नेपाल में 3-4 अगस्त 2014 को एक अरब डॉलर की सहायता की।
  3. सैथेल्स 10-11 मार्च 2015 को 7.5 करोड़ डॉलर की सहायता की।
  4. मॉरिशस 11-13 मार्च 2015 को विभिन्न परियोजनाओं के लिए मॉरिशस को 50 करोड़ डॉलर का रियायती ऋण दिया।
  5. श्रीलंका में 13-14 मार्च 2015 को रेलवे के बुनियादी ढांचे में सुधार के लिए 31.8 करोड़ डॉलर की मदद की।
  6. मंगोलिया को 16-17 मई 2015 को एक अरब डॉलर की सहायता की।( 63.51 अरब रुपए का कर्ज दिया।)

समाधान:- अन्य देश को इतनी भारी राशि देने की बजाय हमें अपने संसाधनों के जरिए उनकी जरूरतें पूरी करनी चाहिए। भले ही वह रेलवे में हो, इंफ्रास्ट्रक्चर में हो या अन्य विकास कार्य हो सकते है।

मोदी की विदेश नीति में स्पष्टता नहीं है। वे जरा बताएं कि भारत की संयुक्त राष्ट्र की सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्य की पैरवी के लिए मंगोलिया कितना वोट जुटा सकता है? दोनों देशों के प्रधानमंत्रियो के बीच शिखर वार्ता के बाद एक बयान जारी हुआ। इसमें कहा गया है कि ’समझौतों से दोनों देशों के बीच घनिष्ठ संबंधों का पता चलता है। दोनों देशों के बीच आर्थिक, रक्षा, विकास में सहयोग, सुरक्षा एवं दोनों देशों के बीच आवागमन बढ़ाने को लेकर समझौते किए गए है।’ मोदी जी ने कहा कि मंगोलिया भारत की एक्ट एशिया नीति का अभिन्न हिस्सा है। और भारत इस पड़ोसी देश के प्रति अपने दायित्वों को पूरा करेगा। मंगोलिया के प्रधानमंत्री ने भारत को आध्यात्मिक और करीबी पड़ोसी बताया है, इस पर मोदी जी ने कहा, इस नाते आने वाली सभी जिम्मेदारियों को हम पूरी तरह निभाएंगे।

सलाह:- एक संगठन है ब्रिक्स। इसमें ब्राजील, रूस, भारत, दक्षिण अफ्रीका और चीन है। इस वक्त ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका की अर्थव्यवस्था की हालत खराब दौर से गुजर रही है। अगर इन दोनों देशों की अर्थव्यवस्था को डॉलर दिए जाते तो ब्रिक्स मजबूत होता। इसका फायदा आगे चलकर भारत को भविष्य में होता।

उपसंहार:- ’मोदी जी बोले विश्व की 33 फीसदी आबादी भारतीय है या चीनी या फिर कोई अन्य देश हो। फिर भी हम एक दूसरे को कम जानते पहचानते हैं।’ लेकिन हमें अपने देश का विकास तो करना ही है हमें हर उस देश या विदेश से जिसमें आर्थिक रूप से फायदा होता है उनके साथ आर्थिक रूप से मजबूत होना पड़ेगा। अब इन दोनों देशों चीन व मंगोलिया के साथ किए समझौतों से क्या असर होता है इसका पता तो आने वाला समय ही बताएगा।

- Published on: July 23, 2015