उच्च शिक्षा रैकिंग (अंको का स्थान) 2016 (Higher Education Ranking - Essay in Hindi) [ Current Affairs ]

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प्रस्तावना: - मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने अप्रेल के प्रारंभ में विश्वविद्यालयों व महाविद्यालयों पर अखिल भारतीय रैकिंग 2016 जारी की है। सरकार की ओर से रैकिंग जारी करने का यह पहला प्रयास है। इस पहल के साथ ही सरकार दव्ारा अब प्रतिवर्ष जारी किए जाने वाले इस दस्तावेज की तुलना स्वत: ही महाविद्यालय में दाखिले के लिए सत्र की शुरूआत से पहले सामचार पत्रिकाओं में जारी रैकिंग से की जा सकेगी। लेकिन, सवाल उठता है कि क्या छात्रों और अभिभावकों को पढ़ाई के लिए विषय या संस्थान चुनने जैसा अहम निर्णय लेते समय ऐसी रैकिंग पर विचार करना चाहिए। इसका छोटा सा जवाब है, उन्हें पूरी तरह से इन पर निर्भर नहीं रहना चाहिए। मोटै तौर पर कुछ बिन्दु ऐसें हैं। जिनका ध्यान भी दाखिले के लिए संस्थान का चयन करते समय रखा जाना चाहिए। महाविद्यालयों या विश्वविद्यालयों की रैकिंग की उपयोगिता के आकलन का सर्वाधिक महत्वपूर्ण और आवश्यक मापदंड उनकी विश्वसनीयता है।

रैंकिंग: - सवाल यह भी उठता है कि रैंकिंग करती आई विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं और अब सरकार ने रैंकिंग के लिए इस विश्वसनीयता परीक्षण किया है। किसी भी रैंकिंग प्रणाली के संस्थानों के पास उपलब्ध आंकड़े और उन आंकड़ों की व्याख्या करने के लिए अपनाया गया तरीका ही अहम घटक होते हैं। इन दोनों की अपनी सीमाएं हैं और कोई भी रैंकिंग प्रणाली इन दोनों की कसौटी पर पूरी तरह खरी नहीं उतरती, भले ही वे क्वाक्वैरली सिमंड्‌स (क्यूएस) तथा (समय उच्च शिक्षा) टाइम्स हायर एजुकेशन (टीएचई) जैसी अंतरराष्ट्रीय रैंकिंग संस्थाएं ही क्यो न हों। इसलिए इनकी सार्थकता पर सवाल उठना लाजिमी है।

आंकड़ों की बाध्यता: - भारतीय रैंकिंग (अंको के स्थान) की भूमिका में भविष्य में ’ईमानदार’ और ’विश्वसनीय’ आकंड़ों की ओर अधिक गहराई से ध्यान देने और रैंकिंग तंत्र में मौजूदा खामियों को स्वीकार करने की जरूरत है। जानकारी में सामने आया हे कि आकंड़ों की उपलब्धता के आधार पर रैंकिंग की विश्वसनीयता के साथ समझौता किया जाता है। इस प्रकार, रैंकिंग के संदर्भ में सरकार और अन्य संगठनों को आकंड़ों की तीन प्रकार की बाध्यताओं का सामना करना पड़ता है। जो निम्न हैं-

  • पहली, भारतीय संस्थान रैंकिंग संगठनों को आंकड़े उपलब्ध कराने के प्रति उदासीन रवैया रखते है। इसलिए ये आंकड़े हासिल करना कोई आसान काम नहीं है। इसका एक कारण यह भी है कि भारतीय संस्थानो संबंधी ऑनलाइन जानकारी पूर्णत: उपलब्ध नहीं है। ये समय-समय पर अपडेट भी नहीं की जाती इसलिए इनमें प्रासंगिक जानकारियों का अभाव रहता है। यही कारण है रैंकिंग संस्थानों के लिए संस्थानों के आकंड़े जुटाना निहायत ही मुश्किल काम है। भारतीय रैंकिंग के सदंर्भ में बात की जाए तो सरकार का इरादा छह प्रकार के शैक्षिक संस्थानों की रैंकिंग करने का है, ये हैं। विश्वविद्यालय, महाविद्यालय, इंजीनियरिंग, मैनेजमेंट (व्यवस्था), आर्किटैक्चर और फार्मेंसीसंस्थान। अंत में तय किया गया कि महाविद्यालय और आर्किटैक्चर संस्थानों की रैंकिंग न की जाए क्योंकि इनमें से केवल कुछ ने ही आवश्यक आकंड़े उपलबध करवाए है। इस तरह कम से कम उन 40 प्रतिशत छात्रों के लिए भारतीय रैंकिंग-2016 बेमानी हो जाती है जो कला, मानविकी या सामाजिक विज्ञान की डिग्री (प्रमाण-पत्र) के लिए महाविद्यालय जाते हैं। दूसरी श्रेणियों में भी अपेक्षाकृत बहुत कम संस्थानों दव्ारा उपलब्ध आंकड़ों से ही यह रैंकिंग तैयार की गई है। उदाहरण के लिए, विश्वविद्यालयों की रैंकिंग केवल 233 संस्थानों के आंकड़ों के आधार पर की गई है, जो कुल विश्वविद्यालयों की संख्या का मात्र 33 प्रतिशत है। इन संख्याओं और इस आधार पर कि केवल कुछ ही संस्थानों ने आकंड़े उपलब्ध नहीं करवाए, तो भी यह रैंकिंग प्रावधायी ही मानी जाएगी।
  • दूसरी महत्वपूर्ण बात, उपलब्ध आंकड़ों की गुणवत्ता की भी समस्या है। जो आकंड़े उपलब्ध हैं, उनकी गुणवत्ता पर संशय है। कुछ निष्पक्ष स्त्रोतों से प्राप्त जानकारी पर भरोसा किया जा सकता हे। जैसे, रैंकिंग संस्थानों को आकंड़ों के लिए विश्वविद्यालयों या शोध पर निर्भर नहीं रहना पड़ता क्योंकि वे वेबसाइट और अन्य स्त्रोतों से यह जानकारी हासिल कर सकते हैं। हालांकि अन्य प्रकार के विश्वसनीय संस्थान संकाय शिक्षकों की संख्या या संकायवार छात्रों की संख्या लिंगानुपात तथा अन्य मापदंड की जानकारी स्वयं उपलब्ध करवा सकते हैं।
  • तीसरी बात यह है कि आकंड़ो की संख्या और गुणवत्ता की सीमाओं के बावजूद इनकी सत्यता को प्रमाणित करना सामान्य परिस्थितियों में अधिक महत्वपूर्ण है। उपलब्ध जानकारियों की वैधता प्रमाणित करने के संदर्भ में सरकार पत्र- पत्रिकाओं से बेहतर स्थिति में है क्योंकि इसके पास ज्यादा संसाधन है और ऐसा करने का अधिकार भी है। दूसरी ओर पत्र- पत्रिकाओं के पास न तो इतने संसाधन हैं और नही इन पर जोर देने का अधिकार है। साथ ही उनका मुनाफा भी इससे जुड़ा है और वे इन -गैर लाभकारी’ विभिन्न प्रकार की निजी संस्थाओं के विज्ञापन भी बड़ी उदारता से छापते हैं, जाहिर है इनके हित आपस में जुड़े हैं इसलिए इनकी रैंकिंग पर विश्वसनीयता सवालों के घेरे में हैं।

साख व शोध का पैमाना: - अलग-अलग संस्थाएं शैक्षिक संस्थानों की रैंकिंग तय करने के लिए लगभग समान मैट्रिक्स लेकिन अलग-अलग तरीके अपनाती हैं जैसे कुछ शौध को काफी महत्व देती हैं तो कुछ साख को। वे अपने रैंकिंग को मिली समीक्षा के आधार पर उसे सुधारने के लिए लगभग हर साल रैंकिंग निर्धारित का अपना तरीका बदलते हैं। भारतीय रैंकिंग की एक समस्या विभिन्न प्रकार के शैक्षणिक संस्थानों को एक ही श्रेणी में जगह दी जाएगी जबकि कई संस्थान एक से अधिक श्रेणी में फिट बैठते हैं इसलिए ’एक संस्थान, एक श्रेणी’ का सूत्र रैंकिंग पर सवालिया निशान है। उदाहरण के लिए हमारे आईआईटी संस्थान विश्व रैंकिंग में विश्वविद्यालयों का श्रेणी में रखे जाते हैं, लेकिन भारत में इन्हें इंजीनियरिंग संस्थानों की गिनती में ही रखा जाता है, जो वास्तव में निचली पायदान पर होने चाहिए थे। ’एक संस्थान, एक श्रेणी’ नियम का एक नुकसान यह भी है कि कुछ संस्थानों को अपेक्षाकृत निचली श्रेणी में जगह मिलती है। उदाहरण के लिए इंडियन इंस्टीटयूट ऑफ फॉरेन ट्रेड (आईआईएफटी) को जबरदस्ती विश्वविद्यालय, श्रेणी में स्थान दिया गया जबकि व्यावहारिक रूप से यह उस श्रेणाी में नहीं है। विभिन्न संस्थानों के लिए विभिन्न, रैंकिंग पैमाने भी समुचित नहीं है। जैसे उन विश्वविद्यालयों को शोध नतीजों और प्रभाव का पैमान 40 प्रतिशत रखा गया है जो कि शिक्षण व शोध संस्थान माने जाते हैं लेकिन समान इंजीनियरिंग संस्थानों को मात्र 30 प्रतिशत ही दिया गया है। जैसे कि आईआईटी संस्थान।

विचार: -आज के जमाने में चलते हुए हर अभिभावकों को अपने बच्चे के शिक्षा से संबंधित भविष्य को सोचते हुए ही आगे बढ़ना चाहिए एवं शिक्षा के बारे मेे रैंकिंग को लेकर सही रास्ता चुनना चाहिए जिससे आगे भविष्य में बच्चे की पढ़ाई में कोई नुकसान न हो। आज हर जगह हम देखने में पाएंगे की शिक्षा ही नहीं हर क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा इस प्रकार हो रही है कि कोई किसी के हित के बारे में सोचता ही नहीं हैं। इसलिए इसके लिए हमेें शुरू से ही शिक्षा के क्षेत्र में हर कदम में सावधानी रखनी चाहिए। जिससे पढ़ाई में बच्चे का भविष्य उज्जवल हो सके।

अभिभावकों को अपने बच्चें का महाविद्यालय में प्रवेश दिलाने के लिए ऐसे महाविद्यालय का चयन करना चाहिए जिसमें रैंकिंग ही नहीं बच्चे की गुणवत्ता को भी देखा जाना चाहिए। आज कोई-कोई बच्चा तो सभी में होसियार होता है पर रैंकिंग के आधार ही उसे किसी महाविद्यालय में प्रवेश मिलता हैं।

उपसंहार: - रैंकिंग (अंको का स्थान) भले ही सरकारी हो या समाचार पत्र-पत्रिकाओं की, आंकड़ो और प्रक्रिया के आधार पर इनमें कहीं न कहीं समझौता किया जाने लगता है। आगे भविष्य के बारे में विचार करते हुए बेहतर यही होगा कि छात्रों और अभिभावकों को इन रैंकिंग के आधार पर फैसला लेने में सावधानी बरतनी चाहिए।

- Published on: June 13, 2016