2016 की अर्थव्यवस्था (Indian Economy in 2016 - Essay in Hindi) [ Current Affairs ]

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प्रस्तावना: - हमारी अर्थव्यवस्था चालू वित्तीय वर्ष की तीन तिमाही में जीडीपी लगभग सात फीसदी रही। यदि हम सिर्फ जीडीपी दर को आधार बनाकर बात करेे तो यह कहा जा रहा है कि यह दुनियां में सबसे अच्छा प्रदर्शन करेंगी। लेकिन सवाल यह है कि इसका फायदा किसको मिला हैं? क्या हमारे युवाओं के लिए रोजगार का सृजन हुआ है? क्या इससे घरेलू और अंतराष्ट्रीय निवेश हमारे यहां बढ़ा हैं? विश्व की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के संकट से जो शून्य उभरा, क्या उसे हम भर पाएं हैं? क्या इसके लिए हमारे श्रम कानून, पर्यावरण मंजूरी, भूमि अधिग्रहण के मसले पर जड़ता या बाध्यता जिम्मेदार हैं?

शून्य: - भारतीय अर्थव्यवस्था का प्रदर्शन वर्ष 2015 देखें तो कुछ मोटी बाते उभर कर सामने आती हैं। अगर हम भारतीय अर्थव्यवस्था को जीडीपी के लिहाज से देखें तो इसका प्रदर्शन बहुत अच्छा रहा है। यह वित्त वर्ष 2015 के तीन तिमाही में लगभग सात फीसदी के आसपास रही हैं। चीन में अर्थव्यवस्था में सुस्ती आने के बाद यह माना जा रहा है कि जीडीपी विकास दर के आधार पर विकासशील देशों की अर्थव्यवस्थाएं बेहतर प्रदर्शन करेंगी।

कारण: - अर्थव्यवस्था के बारे में अगर सिर्फ जीडीपी दर को आधार बनाकर बात करें तो यह कहा जा रहा है कि यह दुनियां में सबसे अच्छा प्रदर्शन करेगी। इसका फायदा किसको मिला है? हमारी घरेलू कंपनियों के पास नकदी है, पर वे निवेश नहीं कर रही हैं। एफडीआई को लेकर बहुत शोर होता रहा, लेकिन अंतराष्ट्रीय निवेश भी नहीं हुआ। इसकी कारण पर बात करना आवश्यक है। वित्त मंत्रालय के अन्तर्गत सीएसओ जीडीपी के आंकड़े जारी करता है। सीएसओ ने जीडीपी दर के आंकड़े तैयार करने में पहले के मुकाबले थोड़ा बदलाव लाया। पहले जीडीपी का आंकड़ा अलग-अलग सेक्टर के प्रदर्शन को आधार बनाकर तैयार करते थे। अब उसे बाजार के प्रदर्शन के आधार पर तैयार करके सीएसओ ने जारी करना शुरू कर दिया। इसके चलते जीडीपी दर में थोड़ा इजाफा के बावजूद हमारी अर्थव्यवस्था का लाभ आम लोगों को मिल नहीं पाया, इसकी वजह हमारी अर्थनीतियों की जड़ता है। मिसाल के तौर पर भूमि अधिग्रहण में बहुत दिक्कतें आ रही हैं। इस मसले पर कोई साफ राय नहीं बन पाई है। श्रम कानूनों में बदलाव लाए जाने थे, वे अब तक नहीं हो पाया है। सबसे बड़ा रोड़ा इसमें पर्यावरण मंत्रालय से मंजूरी मिलने में आ रही दिक्कतें हैं। पर्यावरण मंत्रालय की मंजूरी न मिलने से पोस्को परियोजना इतने लंबे से अटकी पड़ी हुई हैं। यह परियोजना 5000 करोड़ रुपये की है। इसके अलावा कोयला क्षेत्र, खनन क्षेत्र में कई परियोजनाएं अटकी पड़ी हैं। हमारी अर्थव्यवस्था की गति में बढ़ोतरी तो दर्ज की गई हैं, लेकिन उसका फायदा उठाने के लिए जो काम हमें करने चाहिए थे, नहीं किए। यही वजह है कि इसका फायदा हमारे युवाओं को नहीं मिल पाया।

निराशा: - वर्ष 2015 में वैश्विक अर्थव्यवस्था का दूसरा बड़ा ट्रैंड चीन की अर्थव्यवस्था में सुस्ती आना था। अमरीका की अर्थव्यवस्था में जस की तस 0.2 फीसदी की रफ्तार वाली ही रही। यूरोप में खासतौर पर पश्चिमी यूरोपीय देशों की अर्थव्यवस्था ऋणात्मक विकास दर को प्राप्त हो चुकी हैं। वे उससे उबर नहीं पा रही हैं। चीन और वैश्विक अर्थव्यवस्था के इस परिदृश्य के हिसाब से निर्यात आधारित अर्थव्यस्था ने भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए बेहतरीन माहौल प्रदान किया लेकिन हम उसका लाभ लेने से चूक गए।

बदलाव: - मोदी के प्रधानमंत्री बनने पर 2014 के बाद देश की अर्थव्यवस्था में तेजी से बदलाव की उम्मीद के कई कारण थे। भाजपा व मोदी ने चुनाव प्रचार अभियान में दो बातें बड़ी मजबूती से प्रचारित की। एक तो यह कि देश की मौजूदा सरकार की नीति क्रियान्वयन में ’महाभ्रष्टाचार’ हो रहा है। दूसरा देश में अभी जो प्रधानमंत्री हैं उनमें निर्णयशक्ति का अभाव है और सरकार का संचालन पर्दे के पीछे से कोई और कर रहा है। उस दौर में मंहगाई चरम पर थी और बेरोजगारी भी। अंतराष्ट्रीय बजार में रुपया भी कमजोर होता जा रहा था। विदेशी पूंजी का प्रवाह इस तरह से हो रहा था कि कौनसी असली है और नकली इसका आकलन नहीं हो पा रहा था। करीब दो साल बाद भी यही देखने में आ रहा है कि आर्थिक नीतियां जो 1990 से प्रचलन में हैं उनमें कोई बड़ा बदलाव नहीं हुआ हैं। इन सालों में विदेशी व्यापार के नाम पर यह माना गया कि हमारी आयात करने के साथ निर्यात करने की क्षमता भी कम हैं। योजना आयोग की जगह सिर्फ नीति आयोग बनाकर सिर्फ नाम बदलने का काम हुआ है। हिंदुस्तान में महंगाई का कारण न तो मौद्रिक नीति थी और न ही हमारी राजकोषीय नीतियां। असली कारण था मांग व आपूर्ति के ढांचे में अंसतुलन। देश की जनता को पेट्रोलियम पदार्थों की पिछले दो सालों में घटाई गई कीमतों का लाभ मिलता तो वस्तुओं की लागत व दाम दोनों घटते। मांग बढ़ने के साथ ही लोगों की जेब में पैसा भी आता। चिंता की बात यह है कि हमारे यहां शिक्षा व स्वास्थ्य सेवाएं काफी महंगी हो गई हैं। इन सेवाओं का निजी क्षेत्र में प्रसार इसका सबसे बढ़ा कारण है। जरूरत इस बात की है कि बूलेट ट्रेन व स्मार्ट सिटी के सपनों के बजाए गांवों के विकास व आम आदमी को लाभांवित किया जाए।

कारोबार: - इन दिनों देश के उद्योग कारोबार क्षेत्र से यह मांग उभरकर सामने आ रही है कि नए वर्ष 2016 में कारोबारी परिदृश्य को सुधारना देश की महत्वपूर्ण जरूरत है। चूंकि वर्ष 2015 में कारोबारी सुगमता के मद्देनजर भारत की वैश्विक रैकिंग में सुधार करने के विभिन्न प्रयासों के बावजूद भारत की कारोबारी रैकिंग बहुत पीछे है और कारोबारी परिदृश्य खराब ही बना हुआ है, इसलिए 2016 में कारोबार विकास से संबंधित आर्थिक सुधारों पर ध्यान दिया जाना आवश्यक हो गया है। वैश्विक रेटिंग एजेंसी फोर्ब्स ने कारोबार के लिहाज से वर्ष 2015 के लिए जारी 144 देशों की सूची में भारत को 97 वें स्थान पर रखा है। भारत कजाकिस्तान और घाना जैसे देशों से भी नीचे है। इसकी वजह देश में कारोबारी मुश्किले, आर्थिक सुधारों का धीमापन, मौद्रिक स्वतंत्रता और भ्रष्टाचार आदि पर भारत का खराब प्रदर्शन होना है। उल्लेखनीय है कि वैश्विक क्रेडिट रेटिंग एजेंसियां भारत की वित्तीय साख को स्थिर ही मान रही हैं। वैश्विक क्रेडिट रेटिंग एजेंसी फिच ने वर्ष 2015 में भारत के कारोबारी वित्तीय परिदृश्य को स्थिर बताते हुए देश की वित्तीय साख को बीबीबी-ऋणात्मक की श्रेणी में बरकरार रखा है। एजेंसी ने कहा कि भले भारत को विकास दर बढ़ी है पर जटिल व्यावसायिक वातावरण और ढांचागत कमजोरी की चुनौतियां अब भी मौजूद हैं। उद्योग संगठन एसोचैम ने ’ईज ऑफ डुइंग इंडेक्स’ 2015 में कहा कि देश में पिछले एक साल में भ्रष्टाचार, जमीन अधिग्रहण पर्यावरणीय मंजूरी मिलने, गैर पर्यावरणीय नियमों तथा कराधान नीति में सुधार नहीं होने से देशी और विदेशी निवेशकों के लिए कारोबार संबंधी मुश्किलें बनी हुई हैं।

निवेश: - इन दिनों देश की कारोबार मुश्किलों को रेखांकित करने वाली विभिन्न राष्ट्रीय एवं वैश्विक रिपोर्टों में कारोबार मुश्किलों के लिए तीन कारण बताए जा रहे हैं। एक, जरूरत से कम पूंजी निवेश, दो, वैश्विक नरमी का प्रारंभिक प्रभाव और तीन, आर्थिक सुधारों की धीमी गति। देश में सार्वजनिक और निजी निवेश में कमी देश में आर्थिक तरक्की को बाधित करने वाला प्रमुख कारण है। देश में पूंजी निवेश जरूरत से कम होने के कारण कारोबार उस रफ्तार से नहीं बढ़ पा रहा है, जितनी उसकी क्षमता है। जिसका परिणाम है कि निवेशक नए प्रोजेक्ट्‌स में निवेश करने से कतरा रहे हैं। रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया द्वारा प्रकाशित कारोबारी निवेश रिपोर्ट 2015 बता रही है कि देश में वर्ष 2010 - 11 में जो कारोबारी निवेश 3.8 लाख करोड़ रुपए था, वह गिरकर वर्ष 2014 - 15 में 1.93 लाख करोड़ रुपए पहुंच गए हैं। इतना ही नहीं चालू वित्त वर्ष में इसके और अधिक कम होने की आशंका है।

गति: -आर्थिक सुधारों की धीमी गति भी एक बड़ी चुनौती है। मोदी सरकार के द्वारा चालू बजट 2015 - 16 के तहत घोषित किए गए आर्थिक सुधारों की गति धीमी रही है। जहां घोषिक किए गए बड़े आर्थिक सुधारों को झटका लगा हैं, वहीं कुछ अन्य आर्थिक सुधारों में सरकार चाहते हुए भी कदम आगे नहीं बढ़ा पाई है। सरकार को जीएसटी को पारित कराने में सफलता नहीं मिली हे। यह समय की जरूरत है। सरकारी बैंकों की आर्थिक प्रशासनिक मुश्किलों को कम करने तथा पूंजी की कमी को दूर करने के लिए अगस्त 2015 में सरकार ने इंद्रधनुष योजना के अधीन सुधार के लिए जो कुछ पहल की हैं, वह अपर्याप्त ही दिखाई दे रही है।

बैंक: - भारत में बैंक खासतौर पर सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों की हालत अच्छी नहीं है। इसका विस्तृत ब्योरा हाल ही में भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा जारी ताजा वित्तीय स्थिरता रिपोर्ट में दिया है। इस रिपोर्ट के कुछ तथ्य हमें आगाह करते हैं। हालांकि बैंक अर्थव्यवस्था में सहायक भूमिका निभाते हैं, इसलिए खराब होती अर्थव्यवस्था के विपरीत प्रभाव बैंकिंग क्षेत्र की सेहत पर इसका असर पड़ना जरूरी हैं। रिपोर्ट के अनुसार खनन, लौह, इस्पात, कपड़ा और आधारभूत ढांचे जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों में काम कर रही कंपनियां सबसे बड़ी डिफॉल्टर हैं। जहां बैंकों में उनका योगदान 24.2 फीसदी हैं वहीं, 53 फसदी संपत्ति उनके यहां अटकी हुई है।

  • इसके लिए पहला कदम कर्ज वसूली न्यायधिकरणों (डीआरटी) को मजबूत बनाने और सारे राज्यों को कवर करने के लिए और अधिक न्यायधिकरणों की स्थापना करने का था।
  • दूसरा कदम असेट रिकंस्ट्रक्शन कंपनियों के गठन का था, जो डिस्कांउट पर बैंकों से फंसा हुआ ऋण खरीदकर उन्हें अपनी बैंलेस शीट की सफाई का मौका देती थीं।

इसके बाद छोटे कर्जदारों के लिए खासतौर पर कृषि क्षेत्र के कर्जदारों के लिए सेटलमेंट योजना भी लाए। इसके साथ कॉपरेट डेट रिस्ट्रक्चरिंग प्लान लाया गया ताकि कंपनियां घटती ब्याज दरों का फायदा उठा सकें। कॉपारेट बैलेंस शीट तब सुधरेगी जब असली अर्थव्यवस्था में वास्तविक सुधार होगा।

डिफाल्टरों में तीन श्रेणियां है-

  • पहला वे जिनमें उनकी कोई गलती या थोड़ी गलती के कारण डिफाल्टर बनने पर मजबूर किया गया।
  • दूसरा वे जिनमे उस प्रोजक्ट को आगे बढ़ाने संबंधी दिक्कतें आई।
  • तीसरा वे जिसके लिए उन्होंने ऋण ले रखा था एवं जो जान बूझकर डिफॉल्टर बने हुए थे।

असेट रिकंस्ट्रक्शन कंपनियों के को मजबूत करना चाहिए ताकि बैंक वसूली के लिए बहुत मुश्किल बन चके एनपीए से मुक्ति पाकर बैंलेस शीट सुधार सकें। यह सरकार और भारतीय रिजर्व बैंक का कर्तव्य है कि वे स्थिति को और खराब होने से रोंके। इस चरण में इंद्रधनुष कार्यक्रम की समीक्षा उपयोगी होगी।

आयात-निर्यात: - साल 2015 में निर्यात बढ़ाने के प्रयास कारगर सिद्ध नहीं हुए हैं। 2015 में निर्यात में 2014 की तुलना में 20 फीसदी कमी आई है और मंद होती वैश्विक अर्थव्यवस्था में निर्यात में सुधार कर पाना मुश्किल है। वाहन निर्माण, वस्त्र इंजीनियरिंग वस्तु, परिष्कृत हीरे और चमड़े की वस्तुएं आदि उद्योगों को भी मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है। इसका असर रोजगार पर भी दिखाई दे रहा है। इस्पात का सस्ता आयात घरेलू उत्पादकों के लिए खतरा पैदा कर रहा हैं। ऊर्जा के लिए आयात पर निर्भरता बढ़ रही है। चूंकि उद्योग संकटग्रस्त हैं और वे बैंक ऋण चुकाने में पीछे हट रहे हैं जिससे बैंकों के लिए वित्तीय संकट पैदा होने की नई आशंका बढ़ गई है। हालांकि देश में आर्थिक सुधार वैश्विक बाजार की अपस्फीति से भी प्रभावति हो रहे हैं।

सूचकांक तब और अब

Sensex - Now and Then

Sensex - Now and Then

2015

2016

सेंसेक्स

1 जनवरी 27, 507.54

1 जनवरी 26, 160.90

सेना

1 जनवरी 26, 699

1 जनवरी 24, 966

मुद्रास्फीति

5.19 फीसदी (जनवरी)

5.18 फीसदी (अनुमानित)

क्रूड ऑयल

56.52 अमरीकी डॉलर

38.56 अमरीकी डॉलर

विकास दर

7.3 फीसदी (2014 - 15)

7.3 (2015 - 16) (अनुमानित)

वैश्विक परिदृश्य को देखते हुए हमें सचेत रहने की जरूरत

उपसंहार: - साल 2015 में वैश्विक अर्थव्यवस्था महज 3.1 फीसदी की दर से बढ़ेगी। जो वर्ष 2014 से कम हैं। ऐसे में वर्ष 2016 में बढ़ती हुई वैश्विक मंदी की आहट के बीच भारत को पहले से ही रणनीतिक कदम उठाने की जरूरत है। चिंताग्रस्त बने हुए औद्योगिक परिदृश्य को सुधारने और निर्यात बढ़ाने के मद्देनजर वित्त मंत्री को नए बजट 2016 - 17 के जरिए प्रभावी उपाय करने होंगे। अर्थव्यवस्था की सेहत सुधारना और इसकी वृद्धि दर ऊंची उठाना यह सरकार का पहला काम हैं।

- Published on: March 25, 2016