आयरन लेडी(लौह महिला) इरोम शर्मिला की ’अगस्त क्रांति’(August Revolution of Iron Lady Irom Sarmila) [ Current Affairs ]

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प्रस्तावना:- मणिपुर की आयरन लेडी (लौह महिला) अपना 16 साल पुराना अनशन समाप्त कर रही है। भारत में उनके इस फेसले पर दो तरह के मत है। कुछ उनके इस फेसले से उत्साहित नजर आ रहे हैं तो दूसरा विचार रखने वाला पक्ष उनके इस फेसले से खुद को ठगा महसूस कर रहा है। लेकिन आंदोलनो का इतिहास अगर देखा जाए तो किसी भी लंबी लड़ाई में रणनीति बदलती रही है। चाहे उदाहरण रूस की बोल्शेविक क्रांति का लें या गांधी जी का चौरी चौरा की घटना के बाद असहयोग आंदोलन वापस लेने का फैसला का हो। क्या इरोम के इस फेसले को भी इसी आलोक में देखा जा सकता है क्या?

अनशन:- 16 साल लंबी अपनी भूख हड़ताल आज शर्मिला तोड़ देंगी। वे अफसपा कानून निरस्त करने की मांग को लेकर 16 साल से अनशन थी। इसके लिए उन्होंने प्रतीकात्मक रूप से 9 अगस्त यानी अगस्त क्रांति का दिन चुना हैं। मणिपुर की आयरन लेडी इरोम शर्मिला का जन्म 14 मार्च 1972 में हुआ हैं।

घटनाएं:- निम्न हैं-

  • 02 नवम्बर 2000 मणिपुर के मलोम में हुए नरसंहार की प्रत्यक्षदर्शी, इसमें 10 नागरिक मारे गए थे।
  • 05 नवम्बर 2000 सैन्य बल विशेषाधिकार अधिनियिम के खिलाफ भूख हड़ताल शुरू किया है।
  • 09 नवम्बर 2000 आत्महत्या करने के प्रयास का केस दर्ज हुआ।
  • 21 नवम्बर 2000 हिरासत में नाक से पहली बार भोजन दिया गया।
  • 11 अगस्त 2004 मणिपुर सीएम ने इफाल से अफसपा खत्म किया।
  • 2 अक्टुम्बर 2006 राजघाट पर छात्रों के साथ प्रदर्शन किया।
  • 10 दिसम्बर 2014 सरकार ने भूख हड़ताल को खुदकुशी का प्रयास वाला कानून खत्म किया।
  • 23 जनवरी 2015 इंफाल की अदालत ने आत्महत्या के प्रयास को खारिज किया।
  • 26 जुलाई 2016 भूख हड़ताल खत्म कर चुनाव लड़ने और शादी करने का एलान किया।

अवसर:-

  • अफसपा निरस्त करने की मांग को लेकर इरोम शर्मिला 2000 से ही अनशन पर हैं। गांधी के देश में एक अमानवीय कानून के खिलाफ शर्मिला का इतना लंबा अनशन जनांदोलनों के इतिहास के लिए एक थाति की तरह है। पर एक दिन अचानक वह अनशन खत्म कर वह राजनीति में आने की घोषणा करती है। इससे उनका कद घटेगा ही, बढ़ेगा नहीं।

चुनाव:-

  • माना कि 2017 में मणिपुर में होने वाला विधानसभा चुनाव वह जीत जाती हैं, तब भी मणिपुर की विधानसभा में बैठ कर इरोम क्या बदल पाएंगी, क्योंकि वह जिस मुद्दे के लिए संघर्ष कर रही हैं, वो तो केंन्द्र का मामला है। दूसरा, इरोम खुद स्वीकारती हैं कि उनको जनसमर्थन नहीं मिला। केंद्र ने सहयोग नहीं दिया।
  • वैसे यह बात सच है कि उपभोक्तावादी समाज में आज जनता घर में बैठ कर टीवी सीरियल और समाचार देखना पसंद करती हैं। वह सड़क पर उतरना नहीं चाहती। हालांकि इसके कुछ अपवाद भी हैं, जैसे अन्ना आंदोलन में हमने जनता को सड़कों पर उतरते देखा। इसी विशाल जनसमर्थन को भुना कर अरविंद केजरीवाल दिल्ली के मुख्यमंत्री बन गए और शर्मिला इतने गंभीर और सार्थक मुद्दे पर भी अपने साथ जनसमर्थन न होने की बात कहती हैं। इसी से पता चलता है कि उनमें कहीं न कहीं राजनीतिक चातुर्य की कमी है। उस पर से अनशन के 16 साल बाद उन्हें लगता है कि संसदीय राजनीति में उतरना चाहिए। उन्हें यह बात समझने में इतना समय क्यों लग गया कि इस मुद्दे का हल अनशन से होकर नहीं, संसदीय राजनीति से होकर जाता है? किसी की समझ से तो यह एक अपरिपक्व फैसला है। सच तो यह है कि विधायक के चुनाव में उतरने के अपने इस फेसले से उन्होंने खुद अपनी 16 वर्ष की साधना और संघर्ष को व्यर्थ कर दिया हैं। बल्कि लगता है कि उन्हें करना यह चाहिए था कि अनशन खत्म करने के बाद देश भ्रमण करने का निर्णय करती और मेधा पाटकर जैसी अपनी तरह की तमाम जनांदोलनों की साथियों से मिलती और उनके साथ समन्वय बना कर युवाओं और देश तमाम नागरिकों के बीच जाकर अलख जगाती। इससे उनकी और तमाम आंदोलनकर्मियों की एक बुलंद आवाज बनतीं और उनकी सम्मिलित क्षमता तथा ताकत केंद्र को चुनौती देने की बात बन सकती थीं।

दिल्ली:-

  • के समाजवादी चिंतक राममनोहर लोहिया कहा करते थे कि ’जिंदा कौमं पांच साल तक इंतजार नहीं करतीं।’ सच है जनता पांच साल तक इतजार नहीं करती, वह सड़क पर उतरती है, उतरेगी। संसद और सड़क के बीच गहरा रिश्ता है इरोम शर्मिला भी सड़क पर उतरीं। उनके लिए उत्तर-पूर्व में जहां हिंसक सशस्त्र अलगावादी आंदोलन होते थे, वहां शांतिपूर्ण आंदोलन करना बहुत बड़ी चनौती थी। वह इस पर पूरी तरह खरी उतरीं। वह लोकतांत्रिक तरीके से चुनी हुई सरकार के एक अलोकतांत्रिक कानून आर्म्ड फोर्सेज स्पेशल पावर एक्ट (खास शक्तिशाली, थल, जल या वायु सेना कानून) (अफसपा) पर लोगों का ध्यान खींचती रहीं, न केवल भारत का, बल्कि पूरे विश्व का। न्यायधीश जीवन रेड्डी आयोग ने इसे काला कानून बताया था। सुप्रीट न्यायालय ने भी इस पर तीखी टिप्पणी की हैं लोकतंत्र का मतलब केवल सरकार का बन जाना नहीं है। पांच साल में चुनाव होना ओर किसी एक दल का सरकार बना लेना तो कतई नहीं। लोकतंत्र का मतलब तो यह है कि आम लोगों की सरकार का निर्माण व नीति निर्माण में जनता की भागीदारी सुनिश्चित करना हैं।
  • जहां तक शर्मिला का राजनीति में आने का सवाल है तो इसे मैं उनकी हार नहीं मानता। किसी आंदोलन को जीत-हार के तराजू पर नहीं तौला जा सकता हैं। मुझे लगता है, उनका यह आंदोलन लोकतांत्रिक इतिहास में सुनहरे अक्षरों में लिखा जाएगा। उनका राजनीति में आना आंदोलन का समाप्त होना नहीं है, बल्कि स्वरूप बदलना है। यह जीवन बचाने की लड़ाई लड़ रही हैं, जान देने की नहीं।

परेशानी व खतरा:-

  • आयरन लेडी (लौह महिला) के नाम से चर्चित इरोम ने 16 साल पूराना अनशन तो तोड़ दिया है, मगर उनकी परेशानियां अभी कम नहीं हुई हैं। उनके पास कोई घर नहीं है, जहां जाकर वह रह सके। इस समय इरोम ने खुद को जवाहरलाल नेहरू इंस्टीट्‌यूट ऑफ मेडिकल साइंस (चिकित्सा-शास्त्र सें संबंध विज्ञान संस्था) की चार दीवारी में कैद कर रखा है। ये वही जगह है जहां इरोम ने पिछले 16 साल बिताए हैं। पुलिस की सुरक्षा में इरोम को एक चिकित्सक और एनजीओं (गैर सरकारी संस्था) की तरफ से चलने वाले शेल्टर (शरण/आश्रय) होम (घर) में भेजने का प्रयास किया गया, मगर स्थानीय लोगों ने उसे दूर भगा दिया। इरोम की जिंदगी खतरे में देखकर सिपाहियों ने उसे वापस सिटी (शहर) पुलिस के पास छोड़ दिया।

थौबल विधानसभा:-

  • 16 साल के एक प्रण का समाप्त करने के बाद इरोम ने दूसरा प्रण लेते हुए कहा है कि वे तभी शादी करेंगी, जब जनता उन्हें नकार देगी। जब शर्मिला को जमानत मिली तो अदालत में उनके बॉयफ्रेंड (पुरुष दोस्त) नजर नहीं आए। शर्मिला ने दोहराया है कि वह 2017 में उस थौबल विधानसभा सीट से स्वतंत्र प्रत्याशी के रूप में चुनाव लड़ेगी, जहां से मौजूदा सीएम ओकराम सिंह विधायक हैं।

राजनीति:-

  • अनशन खत्म करते समय आंसुओ से भरी इरोम ने कहा कि मैं क्रांति की प्रतीक हूं। मैं मणिपुर की मुख्यमंत्री बनना चाहती हूं, ताकि अपने मुद्दों को राजनीति के माध्यम से उठा सकूं। इरोम नेे कहा कि मुझे आजाद किया जाए। इससे पूर्व ’आयरन लेडी’ के नाम से मशहूर इरोम शर्मिला के अनशन तोड़ने के वादे के बाद अदालत से उन्हें जमानत मिल गई थी। राजनीति में आने के उनके फेसेले में कोई बदलाव नहीं आया है और उन्होंने उम्मीद जताई कि राज्य से अफसपा हटाने के उनके अभियान में ’नयी शुरूआत होगी।

समर्थन:-

  • 44 साल की शर्मिला खुद को अचानक से दोस्तों के दूरी बना लेने की स्थित में पा रही हैं तथा अपने समर्थकों से भी उनकों निराशाजनक जवाब मिल रहा है उनके इस फेसले का सिविल सोसायटी (मानव समाज विषयक) और आम लोगों में स्वागत नहीं हुआ हैं। तथा लोगों ने उनको एक तरह से अलग थलग छोड़ दिया हैं।

भारत की नागरिकता:-

  • इरोम के पास पैन कार्ड (मोटे कागज का टुकड़ा जिसमें नाम, पता आदि लिखा होता हैं), राशन कार्ड, आधार कार्ड, बैंक खाता, पहचान पत्र इन सबके अलावा मूल निवास भी नहीं है इसलिए इरोम को भारत की नागरिकता मिलने में परेशानी हो रही हैं।

उपसंहार:- जब भी कोई मुद्दा होता है तो जनता एक बार तो सब जानना चाहती है कि उस मुद्दे में कितना सच व कितना झूठ हैं यह पता लगाना बहुत ही कठिन काम होता हैं। अब आगे लौह महिला इरोम की कौनसी इच्छाएं पूरी होती हैं यह तो आने वाला समय ही बताएगा।

- Published on: September 7, 2016