बेल्जियम आंतकी हमला (Belgium Terrorist Attack - Essay in Hindi) [ Current Affairs ]

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प्रस्तावना: - नवंबर 2015 के पेरिस में आतंकी हमले के करीब चार महीने बाद अर्थात मार्च में बेल्जियम की राजधानी ब्रसेल्स पर दो आतंकी हमले हुए। इसमें करीब 35 लोगों की मौत हुई और दर्जनों घायल हुए। एक भारतीय सहित अनेक लापता भी हैं। सवाल यह है कि खुफिया जानकारियों के बावजूद यूरोपीय संघ की राजधानी कहा जाने वाला ब्रसेल्स ऐसे आतंकी हमलों के लिए तैयार क्यों नहीं था? सुरक्षा में चूक के लिए कौन से कारण जिम्मेदार रहे? क्या हैं बेल्जियम की अंदरूनी परिस्थितियां? बेल्जियम जैसे छोटे यूरोपीय देश आतंकी संगठन आईएसआईएस के निशाने पर क्यों है? प्रस्तुत प्रश्नों के उत्तर जानना बहुत आवश्यक है।

बचाव: - जब भी हम आतंकवाद से लड़ने की बात करते हैं तो ऐसा मानकर चला जाता है कि ऐसे मामले में ही बचाव ही सबसे बेहतर उपाय है। लेकिन ब्रसेल्स में हुआ हमला वहां के बचाव उपायों में चूक को दर्शाता है। इस घटना को वहां की यह खुफियां कार्यस्थान की विफलता कहा जा सकती है। इस हमले के तरीके को समझने से लगता है कि जो चंद बड़ी यूरोपीय शक्तियों को छोड़कर अन्य छोटे देश आतंकवाद के विरूद्ध लड़ाई के लिए तैयार नहीं है। बेल्जियम को भी ऐसे देश में शुमार किया जा सकता है।

कारण: - जहां तक बेल्जियम का प्रश्न है, वह देश छोटा जरूर है, लेकिन वह सही अर्थों में यूरोप की राजधानी है। बेल्जियम नाटो और यूरोपीय संघ का मुख्यालय है। इस तरह से दुनिया की सबसे ताकतवर फौज और सबसे मालदार देशों का आर्थिक संगठन है। यूरोप या बेल्जियम की तुलना भारत, पाकिस्तान या अफगानिस्तान से भी नहीं की जा सकती। यूं तो आतंकी संगठन आईएसआईएस यूरोप के बहुत से छोटे देश में शामिल हैं। जहां तक ब्रसेल्स में आतंकी हमले का सवाल है तो यह ध्यान रखना चाहिए कि यह शहर केवल बेल्जियम की राजधानी ही नहीं है बल्कि इसे यूरोपीय संध की राजधानी भी कहा जाता है। बेल्जियम की राजधानी ब्रसेल्स में हुए आतंकी हमले से सारी दुनिया में कंपकपी दौड़ गई है। लोग यह समझ नहीं पा रहे हैं कि यूरोप-जैसे सुशिक्षित, मालदार और सुरक्षित राष्ट्रों में ऐसे भयंकर आतंकी हमले क्यों होते रहते हैं?

हमलों के कई कारण हैं-

  • एक महत्वपूर्ण बात यह भी है कि अफगानिस्तान से लेकर इराक तक ऐसे मुस्लिम देश, जिनके खिलाफ अमरीका के नेतृत्व में युद्ध छेड़े गए, उसमें बेल्जियम समेत लगभग सभी यूरोपीय देश शामिल रहे हैं। मुस्लिम देशों में इन यूरोपीय देशों के विरुद्ध आक्रोश है। इन यूरोपीय देशों में रहने वाले अल्पसंख्यक मुस्लिमों में से अनेक उसी आक्रोश के कारण आईएस में शामिल हुए।
  • ऐसा समझा जाता है कि इन यूरोपीय देशों से करीब छह हजार मुस्लिम आईएस में शामिल हुए और इसमें से लगभग 10 प्रतिशत प्रशिक्षण हासिल करने के बाद वापस यूरोप लौट भी आए हैं। ऐसे में कहा जा सकता है कि आईएसआईएस की नाराजगी और उससे सीधे जुड़ाव रखने वाले इन छोटे यूरोपीय देशों के लिए बड़ी चुनौती हैं। जो इस तरह के आतंकवाद से लड़ने को तैयार नहीं है।
  • ये हमले यूरोप के मूल निवासी नहीं, अफ्रीकी देशों से आकर यूरोप में बसे लोग करते हैं। जिन देशों पर यूरोप ने दशकों तक राज किया, उनके नागरिक अब आकर यूरोप में बस गए हैं। अल्जीरिया, मोरक्को, मिस्र, मॉरिशस, सूडान, वियतनाम आदि उपनिवेशों के लोगों को अपने पूर्व स्वामी देशों की नागरिकता आसानी से मिल जाती है। यूरोपीय देशों में इनकी संख्या 10 से 15 प्रतिशत होती है। ये लोग अगर शिक्षित व संपन्न हों और अपने काम-धंधों में व्यस्त हों तो ये आतंकियों के चक्कर में क्यों फंसेगे?
  • यूरोप के गोरे लोगों के मुकाबले इनका जीवन-स्तर काफी गिरा हुआ है। ये लोग गंदी बस्तियों में रहते हैं। ज्यादातर लोग रोजगार की तलाश में मारे-मारे फिरते हैं। ये अपराधी गिरोहों में शामिल हो जाते हैं। आतंकी का झामा पहन लेने पर इनके अपराध का राजनीतिकरण हो जाता है।
  • अपराध करने पर उसे जबरर्दस्त प्रचार मिलता है और मारे जाने पर ’शहीद’ का दर्जा हासिल हो जाता है। पेरिस और ब्रसेल्स के आतंकियों और उनके षड्‌यंत्रकारियों की कहानी यही है।

आतंकी: - पेरिस हमलों के तार ब्रसेल्स उपनगर मोलनबीक से जुड़े हैं। वहीं के अपार्टमेंट में छिपकर काम करने वाले आतंकवादियों ने मार्च महीने में ब्रसेल्स में हमला करके पूरे यूरोप को चौंका दिया हैं। ब्रसेल्स हमले का मुख्य षड्‌यंत्रकर्ता अब्देलहामिद अबाउद 28 वर्ष का था। जिसने आत्मघाती विस्फोट की योजना बनाई थी। इसके अलावा दो आत्म-हत्यारे आतंकी-इब्राहिम और खालिद बकरोई, दोनों भाई मोलनबीक के अपार्टमेंट में रहते थे। इन सब आतंकीयों का आईएसआईएस से सीधा संबंध था। यह ब्रसेल्स के पास एक छोटा-सा शहर हैं, जिसकी 40 प्रतिशत आबादी मुस्लिम है। यहां जगह-जगह गंदी बस्तियों में अफ्रीकी लोग ठुंसे रहते हैं। यह अपराधों का अड्‌डा है। इसी जगह से पिछले हफ्ते पेरिस हमले के अपराधी सालेह अब्दुस्सलाम को पकड़ा गया था। सालेह का भाई पेरिस हमले के समय मारा गया था। पेरिस और ब्रसेल्स हमले के पहले ये चारों आतंकी हत्या जैसे कई संगीन अपराधों के मामलों में लंबी सजा काट चुके थे। अपनी जेल-यात्रा में इन्होंने जेहाद का पाठ पढ़ा और आतंक का नकाब अपने चेहरे पर चढ़ा लिया। इस्लाम के नाम पर जेहाद करने वालों को पैसे और हथियारों की कोई कमी नहीं रही है। यूरोप में रह रहे बेचारे अनपढ़ और गरीब मुस्लिमों के बच्चों को भर्ती किया जाने लगा। उन्हें सीरिया में चल रहे ’इस्लामी खिलाफत’ के अभियान से भी पैसा और प्रोत्साहन मिलने लगा था। बेल्जियम से सैकड़ों जेहादी सीरिया पहुंच गए। इनकी मदद सिर्फ सउदी अरब ही नहीं अमेरिका और यूरोपीय देश भी भी कर रहे हैं। आतंकी असद को हटाने में पिछले साल तक ये सभी देश जुटे हुए थे, लेकिन जबसे ’इस्लामी खिलाफत’ (आईएसआईएस) का उदय हुआ है, अमेरिका समेत यूरोपीय राष्ट्र पीछे हट गए और उन्होंने रूस के साथ मिलकर इस इस्लामी राज्य के खिलाफ सैन्य अभियान छेड़ दिया। गोरे राष्ट्रों ने जो यह पल्टी खाई, इसकी तीव्र प्रतिक्रिया हुई अब सीरिया के जेहादी अपने संरक्षकों पर ही वार कर रहे हैं। 14 आतंकियों ने ब्रसेल्स में रहकर इन हमलों में भूमिका निभाई। बकरोई भाइयों में से एक को तुर्की ने निर्वासित किया था। वह एक साल पहले यूरोप आने में कामयाब रहा था। उसे सीरिया स्थित आईएस के गढ़ में लड़ाकू बनने का शौक था।

सीरिया: - सीरिया में इस्लामी लड़ाके आजकल बुरी तरह मात खा रहे हैं। 20 से 32 साल की उम्र वाले करीब 22 आतंकवादी सीरियाई आईएसआईएस से न केवल जुड़े थे, बल्कि एक-दूसरे को अच्छी तरह जानते थे। इन्होनें सोशल मीडिया और रिश्तेदारों की मदद से पेरिस के बाद ब्रसेल्स हमले को अंजाम दिया है। उनमें से अधिकतर भाग-भागकर अपने घर आ रहे हैं। ये हताश और निराश नौजवान अब यूरोपीय राजधानियों को अपना निशाना बना रहे हें। जाहिर है कि यूरोपीय राष्ट्रों की गुप्तचरी और फौज इनका मुकाबला नहीं कर पा रही हे। इसका एक कारण तो यह है कि यूरोप में मानव अधिकार और स्वतंत्रता को जरूरत से अधिक महत्व मिला हुआ है। फ्रांसीसी क्रांति के मूल्य मान अभी भी शिरोधार्य है, इसलिए जैसी सख्ती अमेरिका, जापान या चीन अपने संदेहास्पद नागरिकों पर करता है, यूरोपीय राष्ट्र नहीं करते है। पेरिस और ब्रसेल्स हमले के अपराधी पुलिस की नज़र में पहले से ही थे, भूल गया कि यूरोपीय संघ के राष्ट्रों में आवागमन की जो आजादी है, उसका सबसे अधिक दुरुप्रयोग उसी के नागरिक कर रहे हैं उन्होंने नवंबर 2015 में पेरिस में विस्फोट किए और वे आकर बेल्जियम में छिप गए।

लक्ष्य: - इस्लामिक राज्य (आईएस) चाहता है कि समूचे अरब क्षेत्र में उसका दबदबा हो। सीरिया और इराक में तो उसका पर्याप्त दबदबा बन भी गया और पर्याप्त क्षेत्र पर उन्होंने कब्जा कर भी लिया। लेकिन, इसके बाद से वे अपनी सीमाएं बढ़ा नहीं पा रहे। खासतौर पर रूस के हस्तक्षेप के बाद से आईएस के लक्ष्य पर काफी हद तक रोक भी लगी। जब इस तरह का दबाव बनता है तो यह सवाल उठने लगता है कि आईएस में कुछ दमखम है भी की नहीं? आईएस के दमखम पर सवाल उठने का सीधा संबंध है, उनके लड़ाकों की भर्ती का। यदि यह जाहिर होने लगता है कि आईएस में दमखम नहीं है तो इस भर्ती का सिलसिला थम सकता है। इस परिस्थिति की झुंझलाहट तो आईएस में होना स्वाभाविक है और इसलिए वे उन देशों पर हमला करना चाहते हैं जो उनकी नजरों में कमजोर हैं। उसकी नजर में ये छोटे यूरोपीय देश इसलिए कमजोर हैं क्योंकि वहां लोकतंत्र है और वे अपने लोगों को उदारता के साथ बराबर का अधिकार देना चाहते हें। ये यूरोपीय देश आईएस की सोच के विपरीत आधुनिक सोच वाले और पंथ निरपेक्ष हैं। आईएस कट्‌टर मुस्लिम और रूढ़िवादी संगठन है। ऐसे में उसे ये छोटे देश अपना दबदबा दर्शाने के लिए सरल लक्ष्य नजर आते हैं। जांच अधिकारियों को शक है कि आईएस का उद्देश्य यूरोप की खुफिया प्रणाली और सुरक्षा निगरानी की जानकारी हासिल करना है।

खुफिया: - छोटे यूरोपीय देशों की पुलिस और खुफिया एजेंसियां अभी तक कमजोर हैं खास तौर पर बेल्जियम में जहां वे आतंकी हमलों के लिए तैयार नहीं है। उनकी आपस में संपर्क और सहयोग की भी समस्या है। खुफिया तंत्र कमजोर होना अलग बात है और इसका अन्य सुरक्षा तंत्र से संपर्क न हो पाना अलग है। पेरिस में जो हमला हुआ, उसमें हमलावर ब्रसेल्स से थे। ब्रसेल्स के पास में ही अप्रवासियों की बस्ती है हमलावर मोलनबीक के ही थे। उनमें से एक हमलावर सालेह अब्दुलसलाम पेरिस हमले के बाद भाग निकला था। चार महीने से उसकी यूरोप में गली-गली खोज हो रही थी। करीब सात दिन पहले शुक्रवार को वह मोलनबीक में ही पकड़ा गया। उसके पकड़े जाने पर बेल्जियम के विदेश मंत्री डेडियर रेंडर्स ने सार्वजनिक रूप से कहा कि सालेह अब्दुल सलाम को पकड़ लिया है जबकि अब्देलहामिद और अधिकतर साथी विस्फोट और पुलिस कार्यवाई में मारे जा चुके हैं। जो अन्य जगहों पर हमला करने की तैयारी में था। उन्होंने यह भी बताया कि मोलनबीक में हथियारों का बड़ा जखीरा भी पकड़ा गया। इसका अर्थ यही था कि जब वह पकड़ा गया तो बेल्जियम में पता था कि कुछ न कुछ होने वाला है। और चार दिन बाद ही ब्रसेल्स में कड़ी सुरक्षा वाले स्थान हवाई अड्‌डे पर बम फटने के एक घंटे के बाद शहर के मेलवीक मेट्रो स्टेशन पर एक और बम फटा। यह भी ध्यान देने वाली बात है कि दिसंबर 2015 में ही टर्की में बेल्जियम के रहने वाले एक आतंकी को पकड़ा गया था और बेल्जियम को बताया गया था, वहां आतंकी हमले की आशंका है। जिसको पकड़ा गया, वही ब्रसेल्स के तीन प्रमुख हमलावरों में से एक है। टर्की से कह दिया गया था, इस व्यक्ति पर निगरानी रखी जाए लेकिन, इस पर नजर नहीं रखी गई। ऐसे में इसे क्या खुफिया एजेंसी की चूक नहीं कहा जाएगा? यह भी बहुत ही अजीब बात है, बेल्जियम में इस हमले के पांच दिन बाद भी इस बात को लेकर असमंजस है कि हमलावर तीन थे या पांच? यही नहीं हमले में मारे गए लोगों के बारे में भी स्पष्टता नहीं है कि वे इकतीस, चौंतीस या पैंतीस है। ऐसे कई सबूत मिले हैं, जिनसे पता चला है कि बम बनाने और हमला करने के उनके तरीके समान थे। जांच दल ने इसे समूचे यूरोप की सुरक्षा में बड़ी चूक बताया है, क्यों कुछ अधिकारियों को इन आतंकवादियों की गतिविधयों के बारे में पहले से जानकारी थी।

बम: - आतंकवादियों के मोलनबीक स्थित ठिकाने से पुलिस ने भारी मात्रा में ऐसी सामग्री बरामद की है, जिनसे बम बनाए गए थे। आतंकवादियों के इन समूहों के बीच महत्वपूर्ण कड़ी यह है कि आतंकी नाजिम लाचारोई, जो कि ब्रसेल्स एयरपोर्ट का दूसरा आत्मघाती हमलावर था, उसने ही वो बम बनाए थे, जिनका प्रयोग पेरिस और ब्रसेल्स हमले के लिए किया गया था।

समूह: - पेरिस के बाद ब्रसेल्स हमले को जिन आतंकियों ने अजांम दिया, वे भी समूह में थे। उनका उद्देश्य पुलिस को परेशान करना था। एक समूह में दो व तीन आतंकी थे। पेरिस के मैदान पर हमले की योजना सालेह ने बनाई थी, जबकि रेस्तरां पर हमला करने वाला हामिद था। इन दोनों ने ही समय और स्थान का चयन किया था।

मीडिया: - हामिद सीरिया में आईएस का लीडर था। बिलाल हदफी ने इस समूह से जुड़े रहने के लिए सोशल मीडिया का प्रयोग किया है। चाकिब अकरूह भी अब्देलहामिद का दोस्त था, उसे भी मीडिया से सेल में जोड़ा गया था। वह भी सीरिया गया था। इस्माइल उमर भी हामिद के संपर्क में आया था। हसना आएतबोलासेन एकमात्र महिला थी, जो हामिद की कज़िन थी जबकि जावद ने पेरिस हमले के बाद हामिद को पेरिस में ही घर दिलाने में मदद की थी।

मंदी व फैसला: -सबसे बड़ा करण है कि यूरोप में 2007 से आर्थिक मंदी चल रही है। 2014 में बेल्जियम में पुलिस का आधुनिकीकरण कार्यक्रम रद्द कर दिया गया। हालांकि पेरिस हमले के बाद आधुनिकीकरण कार्यक्रम फिर से चालू करने की बात कही गई लेकिन चार महीने में कुछ नहीं हुआ। आधुनिकीकरण के फेसले वे इसलिए नहीं ले पाते क्योंकि वहां फ्रेेंच और डच बोलने वालों के बीच राजनीतिक दव्ंदव् भी चल रहा है। इसमें तय नहीं हो पाता कि क्या किया जाना चाहिए।

कमजोर कानून: -इसके साथ ही वहां के कानून के मुताबिक आज भी वहां पर रात के समय पुलिस जांच नहीं कर सकती है। आतंकी हमले को ध्यान में रखते हुए ऐसे कानून को तो बदला जाना चाहिए। चूंकि बजट नहीं था तो पुलिस के पास पर्याप्त उपकरण बहुत ही कम हैं। खुफिया निगरानी के मामले में आधुनिक तकनीक भी वहां इस्तेमाल नहीं होती। इतनी साधारण बात है कि वहां पर फोन टेपिंग (विवरण) कर पाने भी कठिन है। या तों इसे आर्थिक या प्रशासनिक कमजोरी कहा जाए या फिर आजादी की आदत कहें, लेकिन वे इस मामले में कमजोर हैं।

रक्षा: - क्या इन आतंकियों का मुकाबला सिर्फ जासूसी, पुलिस और फौज के दम पर किया जा सकता है? या फिर आतंक का जवाब आतंक से दिया जाए? ताकत के जोर पर अमेरिका ने अपने यहां आतंक का हुक्का-पानी बंद कर रखा है, लेकिन यूरोपीय देश या भारत-जैसे देशों और अमेरिका में काफी अतंर है। अमेरिका एक अलग-थलग देश हैं और वहा प्रवासियों में भी अशिक्षा और गरीबी कम है। इसके अलावा तकनीकी दुष्टि से भी वह बहुत सक्षम राष्ट्र है, इसलिए यूरोप को अपनी रक्षा के लिए कुछ अतिरिक्त प्रयत्न करने होंगे। जवाबी आतंकवाद भी कोई रास्ता नहीं हे। आतंक से निपटने के पारंपरिक रास्तों के साथ-साथ यूरोप को चाहिए कि वह सभी इस्लामी राष्ट्रों से अनुरोध करे कि वे आतंक का ’काफिराना हरकत’ घोषित करें। कुरान-’शरीफ के मुताबिक किसी एक बेकसूर व्यक्ति की हत्या पूरी इंसानियत की हत्या है। इस पवित्र कथन को हर मुस्लिम बच्चे के हृदय में अंकित कर दिया जाए ताकि सारी मस्जिदों में मुल्ला-मौलवी लोग आतंक और हिंसा के विरुद्ध रोज़ उपदेश दें सके।

जांच: - ब्रसेल्स हमले की जांच करने वाले दल का मानना है कि हमलावर आतंकवादी उसी इस्लामिक राज्य नेटवर्क से जुड़े हैं, जिसने पेरिस हमले को अंजाम दिया था। फ्रांस व बेल्जियम के शीर्ष सुरक्षा अधिकारियों वाले इस जांच दल ने अपनी रिपोर्ट में विस्तृत रूप से बताया है कि किस आतंकवादी के साथ किसका संबंध हैं, उनका क्या इतिहास रहा है, उनका आपस में क्या रिश्ता रहा हैं? और कैसे उन्होंने पेरिस हमले के ठीक 4 महीने बाद ब्रसेल्स हमले को अजांम दिया है।

लापता: -कुछ लोक अब भी लापता हैं, एक भारतीय भी उनमें है। फिलहाल मिली जानकारी के मुताबिक 60 लोग सघन चिकित्सा इकाई में है, उनकी कोई सूची जारी नहीं हुई। लापता लोगों की भी अब तक पूरी सूची तैयार नहीं हे। यह प्रशासनिक असफलता ही है।

नेतृत्व: - अब यह साफ हो गया है कि भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 30 मार्च को ब्रसेल्स जाएंगे। वे ट्‌वीट करके भी अपनी सहृदयता और सहानुभूति बेल्जियम के साथ दर्शा चुके है। मोदी ब्रसेल्स के एक्सपों केंद्रो में करीब 5000 लोगों को संबोधित करने वाले हैं। इस कार्यक्रम का शीर्षक ’स्ट्रॅनगर इंडिया’ रख गया है। इस कार्यक्रम के जरिए भारत के पास मौका है, बेल्जियम का यह बताने का भारत आतंक के विरुद्ध पूरे यूरोप के साथ खड़ा है। मोदी आतंक के विरुद्ध अपनी सोच दुनिया के सामने रख सकेगे। भारत को आतंक का शिकार देश होकर नहीं रहना है और वह आतंक के विरुद्ध लड़ाई का नेतृत्व करने का इच्छुक है। मोदी के सामने अवसर होगा इस दावे को पुख्ता करने का और यूरोप को बताने का कि भारत आतंक के विरुद्ध लड़ाई में उसके साथ है तो उसे भी इस लड़ाई में भारत का साथ देने को तैयार रहना चाहिए।

नमाज: - पेरिस और ब्रसेल्स के मुस्लिम आतंकियों को तो नमाज पढ़ना भी नहीं आता है। उनमें से कई नमाज के समय मिस्जद की छतों से शराब पीते हुए और मादक-द्रव्य फूंकते हुए पकड़े जाते हे। नकली इस्लाम के उन प्रेतों की दवा असली इस्लाम को ही करनी होगी।

उपसंहार: - आतंकवाद के खात्मे की जितनी जिम्मेदारी गैर-मुस्लिमों की है, उससे अधिक मुस्लिमों की है। पाकिस्तान और अफगानिस्तान में आतंक की आग सबसे अधिक भड़की हुई है। वहां ईसाई, यहूदी या हिंदू मारे जा रहे हैं मारनेवाले और मरनेवाले, दोनों ही मुस्लिम हे। यह ठीक है कि गैर मुस्लिम देशो में मुस्लिम बहुत कम मारे गए है, लेकिन आतंक का सबसे अधिक खामियाजा वहां के अल्पसंख्यक मुस्लिमों को ही भुगतना पड़ता हैं। उन्हें शक और बदनामी झेलनी पड़ती है। इसलिए किसी भी देश में आतंक न ही हो तो ही बेहतर हैं।

- Published on: April 8, 2016