दिल्ली में आप सरकार के संसदीय सचिवों को लाभ (Benefits of Govt. Parliamentary Secretaries in Delhi) [ Current Affairs - Policies & Governance ]

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प्रस्तावना:- पिछले वर्ष आम आदमी दल की दिल्ली सरकार ने अपने 21 विधायकों को संसदीय सचिव बना दिया। यह पद लाभ का समझा जाता है। इस आधार पर विधायकों की विधानसभा सदस्यता रद्द होनी चाहिए। इस आशय की शिकायत जब राष्ट्रपति से की गई तो आनन-फानन में इन 21 विधायकों को लाभ के पद से बाहर रखने और भूतलक्षी प्रभाव से लागू कर सकने संबंधित बिल लाया गया, जिस पर राष्ट्रपति ने हस्ताक्षर नहीं किए। आप और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल का तर्क है, भाजपा शासित राज्यों सहित विभिन्न राज्यों में भी तो संसदीय सचिव रहे हैं तो उसके संसदीय सचिवों की नियुक्ति गलत क्यों हैं? जब उन्हें वेतन और परिलब्धियां नहीं मिलते तो वे लाभ के पद पर कैसे माने जा सकते हैं? क्या आम आदमी दल से इस मामले में चूक हुई हैं? कितने सही हैं उनके तर्क यह आगे जानना होगा।

मामला:-

जून 2016 के महीने में राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने दिल्ली सरकार के संसदीय सचिव विधेयक को मंजूरी देने से मना कर दिया। इसमें संसदीय सचिव के पद को लाभ के पद के दायरे से बाहर रखने का प्रावधान था। अब इस मामले का फैसला चुनाव आयोग को करना हैं।

संविधान अनुच्छेद:-

102 (1) (ए) और आर्टिकल (लेख/सामग्री) 191 (1) (ए) में स्पष्ट उल्लेख है कि संसद या फिर विधानसभा का कोई भी सदस्य अगर लाभ के किसी भी पद पर होता है तो इस आधार पर इन सदनों से उसकी सदस्यता जा सकती हैं। यह लाभ का पद केंद्र और राज्य सरकार का हो सकता हैं।

जरूरत:-

संसदीय सचिवों की नियुक्ति के जरिये मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने आप दल के विधायकों को उपकृत किया लेकिन लाभ के पद पर नियुक्त के आधार पर विधायकों की विधानसभा सदस्या खतरे में पड़ती दिखाई दी तो आनन-फानन में बिल बनाया गया। यहीं पर प्रश्न है कि संसदीय सचिवों कोई लाभ नहीं मिलता तो आप दल की दिल्ली सरकार को कानून बनाने की जरूरत क्यों पड़ी?

भूतलक्षी:-

कोई भी कानून लागू होता है तो वह भूतलक्षी प्रभाव से कतई प्रभावी नहीं होता। नया कानून या कानून में संशोधन सदैव आगे के समय के लिए होता है। आप दल बहुमत में हैं तो विधानसभा से कोई भी विधेयक पास करा सकते हैं। संसदीय सचिव केवल दिल्ली में ही हो ऐसा नहीं है। दूसरे कई देशों में भी ऐसी नियुक्तियां की गई हैं। लेकिन किसी को लाभ के दायरे से बाहर रखने का यह मामला अलग है। इसलिए पेचीदगियां भी बढ़ गई हैं। आम तौर पर सत्ता में जो भी राजनीतिक दल होता है वह अपने विधायकों को अलग-अलग समीकरणों को देखते हुए ऐसे पदों पर बैठाते रहते हैं ये किसी समिति, आयोग में मनोनयन भी हो सकता हैं। लेकिन लाभ के पद की जो व्याख्या संविधान में की गई हैं उसका उल्लंघन नहीं होना चाहिए।

अधिकार क्षेत्र में दखल:-

एक बात और है, विधायिका और कार्यपालिका में अधिकार और दायित्वों की जो व्याख्या की गई है। वही लोकतंत्र के इन दोनों पायों को अलग करती हैं। अब यदि विधायिका से जुड़े लोग भी वह सब काम करने लगे जो कार्यपालिका से जुड़े लोगों को करना है तो फिर तो यह एक दूसरे के अधिकार क्षेत्र में सीधा दखल ही होगा। दिल्ली में संसदीय सचिवों की नियुक्ति को लेकर पारित किए गए बिल को राष्ट्रपति ने जिस तरह से लौटाया है वह अब दूसरे राज्यों के लिए भी सबक बन सकता हैं।

खतरा:-

संवैधानिक व्यवस्थाओं के अनुसार केंद्रीय मंत्रालय के पास कोई बिल राष्ट्रपति से लौटकर आता हैं, तो केबिनेट इस पर पुन:विचार के लिए राष्ट्रपति के पास भेज सकती है और राष्ट्रपति को उसे मंजूर करना होता है। लेकिन दिल्ली सरकार के इस मामले में ऐसा नहीं है। अभी तो निर्वाचित आयोग को संसदीय सचिव नियुक्त किए गए विधायकों की सदस्यता के बारे में फैसला करना है। ऐसा लगता नहीं कि निर्वाचन आयोग कोई राहत दे पाएगा। निर्वाचन आयोग का फैसला अनुकूल नहीं रहा तब जाकर आप सरकार के पास अदालत में जाने का रास्ता जरूर है। इतना तो कहना ही होगा कि जितना बहुमत केजरीवाल सरकार के पास है उसमें संसदीय सचिव बने विधायकों की सदस्यता रद्द भी हो जाए तो फिलहाल सरकार को कोई खतरा नहीं है।

दायरा:-

आम आदमी दल के 21 विधायकों को दिल्ली में संसदीय सचिव बनाए जाने को लेकर इतना हंगामा नहीं है वहां सियासत तो इस बात को लेकर गरमाई हुई है कि संवैधानिक प्रावधानों को धता बताते हुए विधायकों को लाभ का पद दिया गया है। सरकार पहले कानून बना कर संसदीय सचिवों को नियुक्ति देती हैं तो इतना बवाल उठने को कोई कारण नहीं था। उसने पहले अपने विधायकों को संसदीय सचिव के पदों से नवाजा और बाद में उनकों लाभ के पद की परिधि से दूर रखने के लिए कानून बनाने की कवायद की। यह कवायद कानून और संविधान दाेेनों के मुताबिक गलत हैं। यही कारण था कि राष्ट्रपति ने दिल्ली सरकार के इस ’सरक्षण बिल’ को मंजूरी नहीं दी।

संविधान/कानून:-

यह बात सच है कि राजनीतिक दल हर बात को अपने नजरिये से सोचती हैं और उसी के अनुरूप अपने फायदे के लिए काम करती हैं। भारी बहुमत के बूते आप किसी बिल को सदन से पास तो करा सकते हैं पर ये कभी नहीं भूलना चाहिए कि देश में कानून और संविधान ही सर्वोपरि है। इससे पहले भी कुछ राज्यों जैसे गोवा, पश्चिम बंगाल आदि ने पहले संसदीय सचिव नियुक्त किए और ऐसे राज्यों के खिलाफ जब न्यायालय में मामले गए तो संसदीय सचिव बनाने के प्रस्ताव खारिज कर दिए गए। जबकि कुछ राज्यों ने पहले कानून बनाए, फिर संसदीय सचिव नियुक्त किए तो ऐसे कदमों को मान्यता भी दी गई। यह तो सत्य है कि बिना कानून बनाए कोई पद सृजित या पदस्थापना नहीं कर सकते हैं। कानूनी ढांचे में ये पद सृजित किए जाए तो एतराज नहीं होना चाहिए। सत्तारूढ़ राजनीतिक दलों के लिए अपने जनप्रतिनिधियों को उपकृत करने का यह उदाहरण कोई नया नहीं है। इस बात को समझना होगा कि संविधान हमें कई मर्यादाओं में रहने को कहता है। इन मर्यादाओं का उल्लंघन किया गया तो इस तरह के विवादों का उठना तो स्वाभाविक ही हैं। अब नजर चुनाव आयोग के फेसले पर है कि वह संसदीय सदस्यता पर क्या फैसला करता हैं?

सुभाष कश्यप, संविधान विशेषज्ञ

संसदीय सचिव:-

Table showing the Parliamentary Secretary the following states

The Parliamentary Secretary the following states

प्रस्तुत राज्यों में संसदीय सचिव निम्न हैं-

राज्य

संख्या

पंजाब

विधानसभा सदस्य संसदीय सचिव

117

19

हरियाणा

विधानसभा सदस्य संसदीय सचिव

90

4

छत्तीसगढ़

विधानसभा सदस्य संसदीय सचिव

90

11

राजस्थान

विधानसभा सदस्य संसदीय सचिव

200

5

गुजरात, हिमाचल, मिजोरम, मेघालय व नांगालैंड आदि में भी संसदीय सचिव हैं

याचिका:-

आम आदमी दल ने 13 मार्च 2015 को अपने 21 विधायकों को संसदीय सचिव बना दिया था। बाद में राष्ट्रपति और चुनाव आयोग को शिकायत में कहा गया। यह ’लाभ का पद’ है। इसलिए आप विधायकों की सदस्यता रद्द की जानी चाहिए। मई 2015 में चुनाव आयोग में एक जनहित याचिका भी पेश की गई थीं।

तर्क:-

आप का तर्क है कि राजस्थान, गुजरात व पंजाब आदि राज्यों में संसदीय सचिवों के पद रहे हैं। दिल्ली में 1997 में भाजपा की सरकार थी और तत्कालीन मुख्यमंत्री साहिब सिंह वर्मा ने भी नंद किशोर गर्ग को संसदीय सचिव नियुक्त किया था। यदि संसदीय सचिव का पद तब गलत नहीं था तो इसे अब भी गलत नहीं कहा सकता है इसके अलावा संसदीय सचिवों को कोई वेतन और परिलब्धियों का लाभ नहीं दिया जा रहा। जब उन्हें सुविधाएं ही नहीं हैं तो वे लाभ के पद पर नहीं माने जा सकते हैं। वहीं विरोधी दलों का तर्क हैं कि वेतन या परिलबिधयां न दी जा रही हों, कार उनकी निजी भी हो लेकिन उनके लिए कमरा, फोन और पेट्रोल का खर्च भी तो लाभ ही हैं।

भारतीय संविधान:-

में केंद्र शासित प्रदेश दिल्ली के लिए 1991 में 69वां संविधान संशोधन विधेयक लाया गया। यह विधेयक फरवरी 1992 में लागू हुआ। इस संशोधन विधेयक के माध्यम से दिल्ली का नाम नेशनल केपिटल टेरिटरी ऑफ देहली किया गया। संविधान के अनुच्छेद 239 ए ए (4) में यह जोड़ा गया कि दिल्ली केंद्र शासित प्रदेश में मुख्यमंत्री सहित मंत्रिमंडल के कुल सदस्यों की संख्या विधानसभा के कुल सदस्यों की 10 फीसदी होगी। इसका अर्थ यह है कि दिल्ली विधानसभा में 70 सदस्य हैं तो मंत्रिमंडल में सात सदस्य ही हो सकते हैं। इसी तरह संविधान के अनुच्छेद 191 में लाभ के पद पर रहने पर विधायकों को अयोग्य ठहराने का जिक्र है और अनुच्छेद 192 में कहा गया है कि उन्हें अयोग्य कराने के लिए फैसला राज्यपाल करेंगे लेकिन इसके लिए पहले चुनाव आयोग से अनुमति लेनी होगी।

विरोध प्रक्रिया:-

दिल्ली में मुख्यमंत्री ने 21 विधायकों को संसदीय सचिव के पद पर नियुक्त कर दिया। इस बात का विरोध हो ही रहा था कि ये विधायक लाभ के पद पर कैसे बने रह सकते हैं? प्रशांत पटेल नाम के व्यक्ति ने विधायकों को लाभ के पद पर बने रहने के आधार पर अयोग्य ठहराने से संबंधित पत्र राष्ट्रपति को लिखा। राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी ने चुनाव आयोग को पत्र लिखकर इस मामले की पूरी जांच करने को कहा। चुनाव आयोग ने इस मामले में दिल्ली सरकार को कारण बताओ नोटिस जारी किया और दिल्ली सरकार ने इस मामले में चुनाव आयोग को अपनी ओर से जवाब भी भेज दिया है। इस बीच आनन-फानन में दिल्ली में सत्तारूढ़ आम आदमी दल की सरकार ने 21 संसदीय सचिव के पद पर आसीन विधायकों को लाभ के पद के दायरे से बाहर रखने के संबंध में भूतलक्षी प्रभाव से लागू करने वाला बिल बनाया और उसे राष्ट्रपति के पास हस्ताक्षर के लिए भेज दिया गया। लेकिन, राष्ट्रपति ने इस पर हस्ताक्षर करने से मना कर दिया।

दिल्ली:-

दिल्ली में आप सरकार दव्ारा संसदीय सचिवों की नियुक्ति का मामला अब ऐसे दौर में पहुंच गया हैं जिस पर राजनीति में रुचि रखने वालों की निगाह रहेगी। संसदीय सचिवों को लाभ के दायरे से बाहर रखने संबंधित विधेयक को राष्ट्रपति की मंजूरी नहीं मिलना बताता है कि अब मामला काफी आगे बढ़ गया हैं। हां, यदि इसे राष्ट्रपति की मंजूरी मिल गई होती तो शायद इन संसदीय सचिवों को कानूनी तौर पर मान्यता मिल भी जाती। लेकिन अब तो इनकी सदस्यता पर खतरा रहेगा। जो बड़ा सवाल यह है कि आप दल की सरकार इस बात को जानती थी कि संसदीय सचिवों की नियुक्ति का यह मामला लाभ के पद को लेकर विवाद में आ सकता है तो उसने ये नियुक्तियां की ही क्यों? और यदि नियुक्तियां हो भी गई थी तो उसके बाद में इस तरह का विधेयक लाने की जरूरत क्यों पड़ी? कारण कुछ भी बताए जा रहे हों लेकिन दिल्ली सरकार को यह पता चल गया था कि उससे कानूनी लापरवाही हो गई है और इस लापरवाही को ठीक करने के लिए ही उसने यह कवायद की है। अब मामला चुनाव आयोग के पास हैं। दिल्ली सरकार के इन सदस्यता बरकरार रखने या रद्द करने के बारे में अपना क्या फैसला देगी? इस फेसले के बाद ही सब स्पष्ट हो पाएगा।

उपसंहार:- दिल्ली सरकार ने 21 संसदीय सचिवों को लाभ के दायरे लाए जाने के आरोपों का प्रभावी ढंग से जवाब दिया था। खुद मुख्यमंत्री केजरीवाल ने इन सचिवों के काम और प्रतिबद्धता की प्रशंसा की है। तमाम संवैधानिक जानकार भी इस बात को मान चुके हैं कि इन संसदीय सचिवों की नियुक्ति में किसी भी प्रकार से नियम-कानूनों का उल्लघंन नहीं किया गया हैं। इनमें किसी भी प्रकार से अयोग्यता और हितों के टकराव का मामला नहीं हैं।

- Published on: August 17, 2016