बोतल बंद आक्सीजन गैस (दिल्ली में) (Bottled Oxygen Gas in Delhi- Essay in Hindi) [ Current Affairs ]

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प्रस्तावना: - रोटी, कपड़ा और मकान के तो पैसे चुकाने ही पड़ते हैं लेकिन प्यास बुझाने के लिए प्याऊ लगाकर पुण्य कमाने वाले देश के लोगों को झटका तक लगा, जब बोतलबंद पानी खरीदने के बारे में उन्हें सोचना पड़ा। पानी की बिक्री के बाद अब मामला इससे भी आगे, बोतलबंद हवा के करोबार तक पहुंच गया है। देश की राजधानी दिल्ली में तो वायु प्रदूषण निर्धारित मानक से कहीं ज्यादा खतरनाक स्तर को छू रहा है। हालात ये हैं कि अब शुद्ध हवा में सांस लेना कठिन होता देख, बाजार में बोतलबंद ऑक्सीजन (गैस) बेचने की तैयारी हो रही है। बड़ा सवाल यह है कि आखिर यह नौबत क्यों आई? क्या वायु प्रदूषण से उपजे इस संकट से अब भी बचने की कोई गुंजाइश है? या फिर, बोतलबंद हवा का हौव्वा, वातावरण के प्रति हमारी लापरवाही का लाभ उठाने का कारोबारी प्रयास भर हैं?

दिल्ली: - में वायु प्रदूषण की स्तर खतरनाक सतर से भी ज्यादा हो गया है। जिस तरह के हालात वहां बने हैं उससे ऑक्सीजन कैन के कारोबारी भी बाजार तलाश रहे हैं। लेकिन, इसमें अचरज से ज्यादा चिंता होनी चाहिए कि आखिर क्यों ऐसे हालात बने हैं? जिस तरह से हमने पहले शुद्ध पानी की चिंता नहीं की तो बाद में बोतलबंद पानी बेचने वालों की बन आई उसी तरह से अब हवा बेचने वाली कंपनियों को दिल्ली के प्रदूषण में कमाई नज़र आ रही है। भले ही दिल्ली में ऐसी स्थिति नहीं होती दिख रही है कि वहां ऑक्सीजन कैन साथ लेकर चलने की नौबत आ जाए तो भी कारोबारी कंपनियां (जनसमूह) वहां बन रहे माहौल का फायदा उठाने तो आएगी ही। पानी और हवा दोनों का इस्तेमाल प्रत्येक नागरिक का संवैधानिक हक भी है चिंता की बात यह है कि जिम्मेदार लोगों ने श़ुद्ध पानी और शुद्ध हवा की चिंता कभी की ही नहीं वरना इस तरह की नौबत आती ही नहीं। एक तरफ दुनिया के देश बोतलबंद पानी की बिक्री पर प्रतिबंध लगा रहे हैं, वहीं हमारे देश में बोतलबंद पानी का कारोबार करने वाली कंपनियां समूचे देश में छा गई हैं। एक तरह से वे हमारे पानी को दोहन ही कर रहीं है। रोजमर्रा के इस्तेमाल के लिए लोगों को पानी खरीदना पड़ रहा हो यह स्थिति दुर्भाग्यपूर्ण ही कही जाएगी। इससे भी ज्यादा दुर्भाग्य की स्थिति तब बनने वाली है जब न केवल दिल्ली बल्कि देश के प्रमुख बड़े शहरों में शुद्ध हवा के नाम पर ऑक्सीजन बेचने वाले सक्रिय हो जाएंगे।

यह सही है कि दिल्ली में वायु प्रदूषण का स्तर काफी अधिक है और इसे नियंत्रित करने को लेकर प्रयास भी किए जाते रहे लेकिन ये नाकाफी रहे हैं। अब स्थिति यह आ गई है कि यहां पर ताजा हवा या ऑक्सीजन की बिक्री की शुरूआत होने जा रही है। यहीं पर हमें सोचने की आवश्यकता है कि क्या ऑक्सीजन के कैन उपलब्ध होना बेहतर उपाय होगा? सवाल यह नहीं है कि यह कैन कितने में मिलेगा और कितने लोग इसे खरीद पाएंगे? सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि ऐसी स्थिति आई ही क्यों? क्यों प्रदूषण का स्तर इतना अधिक बढ़ गया कि लोगों को इसमें बाजार देखने का मौका मिल गया। कमी कहीं न कहीं हमारी ही रही है। यदि हम इस कमी को स्वीकार करते हैं तो उपाय भी हमे ही खोजने होंगे।

चेतन: - कहने का आशय यह नहीं है कि देश में शुद्ध हवा का संकट है ही नहीं। जलवायु परिवर्तन के खतरों ने देश में ही नहीं दुनिया भर में शुद्ध हवा और शुद्ध और पानी दोनों का ही संकट खड़ा कर दिया है। ग्लोबल वॉर्मिंग के चलते हम देख रहे हैं कि न तो समय पर बरसात होती और न ही सर्दी व गर्मी। ये या तो होती ही नहीं या फिर बहुत ज्यादा भी हो जाती है। दिल्ली चूंकि देश की राजधानी है इसलिए वहां की चिंता सब करते हैं। हमने देखा कि वायु प्रदूषण के खतरों के चलते ही वहां से कई उद्योग धंधों को अन्यत्र ले जाया गया। अब वहां डीजल के कुछ वाहनों पर रोक लगाई गई है। लेकिन, समस्या का हल इससे हो जाएगा ऐसा संभव नहीं। दिल्ली की खराब हालत आज नहीं हुई हैं जो उपाय वहां आज किए जा रहे हैं, वे काफी पहले हो जाने चाहिए थे। केवल इतना ही काफी नहीं बल्कि प्रदूषण के दूसरे जितने भी माध्यम हैं उन पर भी ध्यान देना होगा।

विकास: - बड़ा संकट यह है कि हमने हरियाली को चौपट करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। हमें विकास की परिभाषा को नए तरीके से गढ़ना होगा। अभी तो विकास का मतलब सिर्फ जीडीपी में वृद्धि से लगाया जाता है। उद्योग-धंधे लगाने के नाम पर पयार्वरण को कितना नुकसान पहुंचा इसकी चिंता किसी को नहीं है। सरकारों को तो सिर्फ स्मार्ट सिटी (अच्छा शहर) व बुलेट ट्रेन (रेल) की चिंता है। भले ही हमारी भावी पीढ़ी तरह-तरह की बीमारियां लेकर पैदा हों इसकी किसी को परवाह नहीं। वायु प्रदूषण का खतरा केवल दिल्ली में ही हो ऐसा नहीं है। उद्योगों से उगलते धुंए से छोट-बड़े शहरों में हालात खराब होते जार हे हैं। छत्तीसगढ़ में रायपुर हो या उड़ीसा में सुंदरगढ़ सब जगह वायु प्रदूषण के खतरें में मंडरा रहे हैं। समय रहते चिंता नहीं की गई तो वातावरण में घुलता जहर लोगों के लिए संकट खड़ा कर देगा।

दूषित वायु: - अमरीकन एसोसिएशन फॉर एडवांसमेंट ऑफ साइंस के 1990 से 2013 के बीच 188 देशों में स्वास्थ्य और वायु प्रदूषण के अध्ययन में बताया गया कि दुनिया के सबसे ज्यादा आबादी वाले देश चीन और भारत में वायु सबसे ज्यादा दूषित है।

कारोबार: - कनाडा की कंपनी ने दिल्ली में कैन्ड बॉटल में हवा देने की तैयारी की है। इन कैन्ड बॉटल्स से एक बार सांस लेने की कीमत 12.50 पैसे चुकानी पड़ेगी। स्वच्छ हवा के बॉटल्ड कैन 3 लीटर और 8 लीटर के होंगे। इनकी कीमत 1450 से 2800 रुपए के बीच होगी।

संयुक्त राष्ट्र: -में जलवायु परिवर्तन के लिए बने अंतर सरकारी पैनल (आइपीसीसी) की रिपोर्ट के अनुसार जलवायु गड़बड़ी के कारण एशिया को बाढ़, गर्मी के कारण मृत्यु, सूखा, ओलावृष्टि तथा खाद्य की कमी का समाना करना पड़ सकता है।

चिंता: - वायु प्रदूषण जहां भी उच्च स्तर का होता है। वहां जीवन शैली से जुड़े रोगों वाले मरीजों को ज्यादा खतरा है। इसलिए लोगों को जागरूक करने के साथ सेहतमंद रहने के लिए उचित कदम उठाना बेहद आवश्यक है। बढ़ते प्रदूषण की कारण सबसे ज्यादा खतरा सांस से जुड़ा है। अस्थमा, जुकाम व एलर्जी जैसी बीमारियों से लोग इस कारण से आसानी से चपेट में आ सकते हैं। जो लोग पहले से ही इन बीमारियों से ग्रसित हैं उनको तो अत्यधिक प्रदूषित माहौल में ज्यादा समय नहीं रहना चाहिए। प्रदूषित हवा और फेफड़ों की बीमारी में सीधा संबंध है। अब तो शोध में यह बात भी सामने आई है कि प्रदूषण के कारण त्वचा की बीमारियां और यहां तक कि हृदय रोग का खतरा भी बढ़ रहा है।

विकल्प: - एक तथ्य यह भी है कि भीड़-भाड़ वाले शहरों में वायु प्रदूषण धुंआ उगलने वाले पेट्रोन-डीजल वाहनों की भरमार से ज्यादा बढ़ता है। ऐसे वाहनों से होने वाले प्रदूषण की रोकथाम के प्रयास जरूरी है। न केवल दिल्ली बल्कि जयपुर समेत राज्यों की कई राजधानियां भी वाहनों से फेलने वाले वायु प्रदूषण की चपेट में है। ऐसे में सीएनजी वाले वाहन और इलेक्ट्रिक वाहनों को विकल्प के रूप में काम में लिया जाना चाहिए। जब ई-रिक्शा संभव है तो ई-बस और ई-कार क्यों नहीं? वाहन तो दुनिया के दूसरे प्रमुख देशों में भी हैं लेकिन वहां आबादी घनत्व कम होने के कारण ज्यादा खतरा नहीं है। हमारे यहां आबादी का ज्यादा घनत्व वायु प्रदूषण की बड़ी समस्या पैदा करता है। दिल्ली की हवा में दूषित हवा जहर घोलने का काम कर रही हैं। लेकिन आक्सीजन कैन से कोई फायदा होने वाला नहीं है। यह तो आक्सीजन बेचने वाली कंपनियों की मार्केटिंग (जनसमूहों का बाजार) का नतीजा है। हमें उनको प्रोत्साहन देने से बचना चाहिए। वैसे भी वायू प्रदूषण में आक्सीजन की कमी नहीं बल्कि दूसरे कारक भी जिम्मेदार होते हैं। वातावरण को लोगों के रहने लायक बनाने के प्रयास ज्यादा जरूरी है। प्रदूषण वाले इलाकों में ज्यादा से ज्यादा पेड़ लगाकर इसका आसान समाधान निकाला जा सकता हैं।

स्तर: - शहर के लिए औसत प्रदूषण स्तर 60 माइकोग्राम प्रति क्यूबिक मीटर का मानक है लेकिन दिल्ली जैसे शहर में सर्दियों में प्रदूषण का स्तर मानक से चार से पांच गुना अधिक हो जाता है। गर्मियों में यह प्रदूषण स्तर कुछ कम होता है लेकिन मानक से दो-तीन गुना फिर भी अधिक ही रहता है। इतनी बुरी स्थिति के कारण ही लोगों को सांस लेने की तकलीफ होने लगती है। ऐसा नहीं है कि केवल दिल्ली की मानक स्तर से अधिक वायु-प्रदूषण से संघर्ष कर रहा हो, अन्य प्रमुख शहर मुंबई, कोलकत्ता, चेन्नई भी ऐसी ही परिस्थिति को झेल रहे हैं। यह हो सकता है कि यहां प्रदूषण का स्तर दिल्ली के मुकाबले कुछ कम हो। लेकिन मानक से अधिक तो है। देश के 50 फीसदी शहर वायु प्रदूषण के मानक स्तर से अधिक होने की समस्या को झेल रहे हें। अधिक वायु प्रदूषण ग्लोबल वॉर्मिंग का कारण बनता है। ग्लोबल वॉर्मिंग के कारण समय से पहले ही गर्मी और सर्दी पड़ने लगती है। बरसात भी समय पर नहीं होती है।

स्वास्थ्य व उपाय: - यह ठीक है प्रदूषण के कारण मानव के स्वास्थ्य पर पड़ने वाले दुष्प्रभावो को नियंत्रित किया जा सकता है लेकिन बात यह है कि स्वास्थ्य बिगड़ने ही क्यों दिया जाए? ऐसी स्थिति से पहले ही सख्ती से उपाय क्यों न किए जाएं। दिल्ली में कोशिशें तो काफी हुई। बसों और ऑटोरिक्शाओं को सीएनजी में परिवर्तन किया गया। प्रदूषण लाने वाले बहुत से उद्योगों को अन्यत्र स्थानांतरित किया गया। केवल व्यापार के उद्देश्य से आने वाले ट्रकों को ही दिल्ली में प्रवेश की अनुमति देने का प्रावधान किया गया, इससे ट्रकों की संख्या और इससे होने वाले प्रदूषण में खासी कमी आई। फिर कचरा प्रबंधन की शुरूआत हुई। दिल्ली में वृक्षारोपण के कार्यक्रम भी खूब चले। हरियाली में कोई कमी नजर नहीं आती बल्कि यह बेहतर भी है लेकिन ये सभी उपाय नाकाफी रहे। गाड़ियों की संख्या लगातार बढ़ती ही चली गई। डीजल की गाड़ियों भी चलती रही हैं। अब सम-विषम संख्या की गाड़ियों का फार्मूला भी लागू किया गया है। इससे प्रदूषण के स्तर को कम करने के मामले में काफी सहायता मिली है लेकिन अब भी यह नाकाफी है।

उपंसहार: - देश में प्रदूषण का मानक स्तर बनाए रखना बड़ी चुनौती है ऑक्सीजन के कैन स्थाई उपाय नहीं है। दवा खाने से बेहतर है कि बीमारी से ही बचने को लेकर सावधानी बरती जाए। ट्रैफिक के प्रदूषण के लिए इलेक्ट्रिक (विद्युत) वाहन उपाय है लेकिन खर्चीला है। जरूरत है बेहतर कचरा प्रबंधन की। हमें वातावरण का किफायत से इस्तेमाल करना तो सीखना ही होगा अन्यथा महंगे ऑक्सीजन कैन खरीदना मजबूरी होंगे।

- Published on: June 29, 2016