ब्रिटेन की जनमत संग्रह के विषय में सात कहानी भाग-3(Britain Referendum Concerning the Seven-Story 3 in Hindi) [ Current Affairs ]

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प्रस्तावना: - कल से आप सोच रहे होंगे कि ब्रिटेन में ये क्या हो गया हैं? वहां चल रही लाखों कहानियों में से हम आपके के लिए लाए हैं सात कहानियां, वो भी ऐसी जिन्हें भारत पर लागू करते हुए आप सोच सकें कि यदि यहां हम पाकिस्तान, आरक्षण या फिर मंदिर मुद्दे पर जनमत संग्रह करते तो कैसा नतीजा आता हैं? आज के खबरो में हम आपके लिए दिल को छू लेने वाली छोटी-छोटी कहानियां लाये हैं वे भी ऐसी जिसमें लोग सोए तो ’यूनाइटेड’ (संयुक्त मिला हुआ) थे और जागे तो ’डिवाइडेड’ (विभाजन करना) हो चुके थे। हमेशा की तरह कहानियां दो पारों में है। किसी में आज की पीड़ा है तो किसी में भविष्य की चिंता है। किसी में आज की बर्बादी है तो किसी में कल के सपने है। कोई अनुभव की बात कर रहा है तो कोई आने वाली पीढ़ियों पर ध्यान लगा रहा है। तो आज यह कहानियां पढ़िये और जान लीजिए कि ये कहानियां उस देश की जो कल तक ग्रेट ब्रिटेन था। यूरोपीयन संघ से अलग होकर ब्रिटेन में कल क्या होगा किसी को नहीं पता?

1 कहानी: -

  • मैं ’चेक’ गणराज्य में कभी टीचर था। अब इंग्लैंड में लॉरी चलाता हूं। एक साल पहले कैमरन ने खुद को राजनीति में बनाए रखने के लिए लोगों से इस जनमत का वायदा किया था। अब कैमरन खुद ही फंस गए हैं, नाइजेल फराज जैसे अलगाववादी नेताओं को अपनी राजनीति चलाने का मौका मिल गया है। मैं हर दिन सांसद जो फॉक्स के बारे में सोच रहा हूं जिसने ब्रिटेन के यूरोपीय संघ के साथ रहने का अभियान चलाते हुए अपनी जान दे दी। ईयू से अलग होने का फैसला मुझ पर इतना असर नहीं डालता जितना औरों पर डालता हैं। सभी को कम से कम उनकी शहदत के बारे में तो सोचना चाहिए था। मैं अब यूरोप की मुद्रा पाउंड स्टरलिंग के बारे में सोच कर चिंतत हूं। नतीजों के बाद बड़ी जनसमूह ब्रिटेन छोड़ यूरोप की ओर जाएंगी। क्योंकि उन्हें ब्रिटेन में रहकर मुनाफे के बारे में सोचने में खासी दिक्कते आएंगी। लोगों की नौकरियों पर संकट आएगा।
  • कई लोगों को रोजगार के लिए दर-दर भटकना पड़ेगा। साथ ही अब स्कॉटलैंड में भी ब्रिटेन से अलग होने के सुर और मुखर होंगे। वहां के लोगों के लिए यूरोपीय संघ से ब्रिटेन का अलग होना एक उदाहरण साबित होगा। मैं आशा करता हू कि यूरोपीय संघ के नेता इस और विशेष कदम उठाएगी कि ब्रिटेन की राह पर अन्य देश नहीं चलें। क्योंकि मेरा मानना कि ब्रिटेन का यूरोपीय संघ से अलग होना अलगाव के बारे में सोच रहे अन्य देशों के लिए प्रेरित करेगा। चेक गणराज्य भी इसी राह पर चल सकता है। वैसे मैं ब्रिटेन के लोगों के फेसले का सम्मान करता हूं लेकिन मैं नहीं जानता हूं कि क्या ये भविष्य के लिए एक सही फैसला था। ये फैसला अप्रवासियों के लिए एक चेतावनी के रूप में सामने आया है। मैं इन सब से गुजर चुका हूं। मैंने इसे लेकर काफी कुछ सहा भी है। अब मैं चाहता हूं कि मेरे जैसे और लोगों को भय के वातारण में वहीं जीना पड़े। मैं मेहनत के बलबूते इस देश में अपना वजूद बनाए हुए हूं। फैसला चाहे जो कुछ भी रहे। लेकिन सभी पक्षों को एक-दूसरे की विचारधारा का सम्मान करना होगा जिससे ब्रिटेन आगे बढ़े।

मिखाइल टाइसर उम्र: 37 साल डर्बीशायर, इंग्लैंड

2 कहानी: -

  • मुझे महसूस हुआ कि मेरे अपने ही देश ने मुझे दगा दे दिया। जो बात मुझे सबसे ज्यादा परेशान कर रही है वह यह है कि यूरोपीय संघ को छोड़ने का फैसला उन लोगों ने कराया है, जिन्हें इसके दुष्परिणाम भोगने के लिए उतने लंबे समय तक जीवित नहीं रहना है, जितना कि हमें रहना है। जवानों ने संघ में बने रहने और बुजुर्गो ने छोड़ने के पक्ष में मत डाले। मैं महसूस कर रही हूं कि मुझे उस बुजुर्ग पीढ़ी ने निराश कर दिया है जो इस फेसले की नजाकत से अप्रभावित रहेगी।

ऐबी किरवाई

3 कहानी: -

  • मैं स्कॉटलैंड निवासी छात्र हूं। हालांकि मूल रूप से मैं लंदन से हूं लेकिन अब तक जीवन का ज्यादातर समय मैंने फ्रांस में गुजारा है। जब मैं छोटा था, तभी मेरे माता पिता फ्रांस में आ बसे। मैं खुद को ब्रिटिश, अंग्रेज की बजाय यूरोपीय मानता हूं। आने वाले दिनों में जर्मन नागरिकता हासिल करने के अपने इरादे को अधिक मजबूती से पूरा करने की कोशिश करूंगा। ताकि मेरी यूरोपीय नागरिकता बनी रहे। ब्रिटेन में आए नाजी शरणार्थियों का वंशज होने के नाते मुझे जर्मन नागरिकता लेने का अधिकार है। मुझे जानकर धक्का लगा कि मेरे दादा-दादी, जो स्वयं शरणार्थी थे, ने प्रवासियों के आगमन को कुचलने के लिए संघ से अलग होने के पक्ष में मत किया।

बेन बर्नहीम, उम्र: 20 साल, स्कॉटलैंड

4 कहानी: -

  • ब्रेग्जिट तो हमने जीत लिया लेकिन एक राष्ट्र खो दिया। मुझे विश्वास था कि प्रवासियों की समस्या इतनी गंभीर नहीं है। मुझे लगता हैं कि हम दो अलग-अलग तरह की लड़ाई लड़ रहे थे। पहला जो यूरोपीय संघ में बने रहना चाहते थे, वे समुदाय और एकता की बातें कर रहे थे। दूसरा ब्रेग्जिट का साथ देने वाले धन और मकानों की कीमतों की बाते करते हैं। इस दुनिया में आज पैसे की जीत हुई हैं। भय और लालच की जीत हुई है।
  • बेहद अजीब लगता है यह सोचकर जब हम कुछ हासिल करने लायक होंगे, तो हममें से जिन्होंने यूरोपीय संघ से बाहर निकलने के लिए मत दिया, उन्हें शायद बहुत ही कम हासिल हो पाए। हो सकता है कि बहुत से तों जीवित ही न रहे। हम हमारे बच्चों के लिए टुकड़ों में बंटी चीजें ही छोड़ कर जाएंगे। दुनिया में पशु क्रुरता, जल सकंट और ग्लोबिल वॉर्मिग बड़ी समस्याएं हैं। यह बात हम जानते हैं लेकिन अब हमारी सुनेगा कौन, क्योंकि हमने यूरोपीय संघ से अलग होने के फेसले ये यह जताया है कि हम केवल अपनी ही परवाह करते हैं। हमने दुनियों को संदेश दिया है कि संघ जैक का मतलब संघ नहीं, केवल जैक ही हैं।

बेवरली बेकर, उम्र: 30 साल लंदन

5 कहानी: -

  • मैंने ब्रिटेन के यूरोपीय संघ में बने रहने के पक्ष में अपना मत दिया। मेरा मानना है कि ब्रिटेन ने अपनी मजबूत अर्थव्यवस्था के बूते यूरोपीय संघ में रहते हुए महत्वपूर्ण भूमिका निभाई हैं। आज भी ब्रिटेन की ताकत को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है। मुझे ऐसा लगता था कि यूरोपीय संघ को छोड़ देने से ब्रिटेन को कई अनजानी चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा। इसलिए मेरी सोच यही रही कि ब्रिटेन को यूरोपीय संघ में बना रहना चाहिए। लेकिन अब चूंकि ब्रिटेन की जनता ने यूरोपीय संघ से बाहर होने का फैसला बहुमत से किया है। इस फेसले से ब्रिटेन के लिए एक नई शुरुआत भी होगी।
  • इसलिए पक्ष-विपक्ष की बातों पर विचार करने के बजाए हमें देश को खुशहाल और समृद्ध बनाने की दिशा में काम करना होगा। बाते भले ही तरह-तरह की जा रही हैं लेकिन मुझे पूरा विश्वास है कि ब्रिटेन हर किस्म की चुनौती को पार कर सकता है। ऐसे में किसी मोर्चे पर विफल होने की कोई गुंजाइश तो मुझे कतई नहीं लगती है। अब सभी को इस फेसले के अनुसार लोगों के सुनहरे भविष्य के लिए मिलकर प्रयास करने होंगे। मैं यह भी मानता हूं कि नागरिकों में निराशा का भाव मन में आया तो यह पीछे धकेलने वाला साबित होगा। क्योंकि यह माना जा रहा है कि युवा वर्ग ने यूरोपीय संघ में बने रहने के समर्थन में बड़ी संख्या में मत दिया है। युवाओं को सकारात्मक सोच के साथ आगे बढ़ना होगा।

मनीष मेहता, उम्र: 48 साल, लंदन

6 कहानी: -

  • जब इंग्लैंड निवासी जोंस को मोबाइल के द्वारा यूरोपीय संघ से अलग ब्रिटेन समाचार के बारे में पता पड़ा तो उन्हें बहुत दु: ख हुआ। दु: ख इस बात का था कि हमारा भविष्य बुढ़ी और दकियानुसी सोच का बंधक बन गया है। अब पुरानी पीढ़ी हम युवाओं के सुनहरे भविष्य पर पानी फिरते हुए दिखेगी। मैं बहुत दुखी हूं कि हमार देश नस्लवादी और पूर्वाग्रहों से ग्रसित लोगों के हाथों का खिलौना बना गया है। नेताओं ने भ्रामक और तथ्यहीन प्रचार करके लोगों को भरमा दिया है। नतीजाेें से उत्साहित नेता अब कह रहे हैं कि ये आम जनता और सभ्य लोगों की जीत हैं, लेकिन आज मैं खुले तौर पर कहती हूं कि हां, मैं असभ्य हूं।

ल्यूसिन्डा जोंस, उम्र: 20 साल वेस्ट ससेक्स, इंग्लैड

7 कहानी: -

  • मैं लंदन में बार टेंडर का काम करती हूं। मुझे परिणाम आने पर काफी झटका लगा है। मैंने ऐसे नतीजों के बारे में कल्पना भी नहीं की थी। लेकिन अब मैं दुखी हूं। इसके अलावा में और कुछ नहीं कह सकती हूं। मैंने नतीजाेे के बारे में सोचा था कि ब्रिटेन आज के समय के साथ कदम से कदम मिलाकर चलेगा। यूरोपीय संघ में ही बना रहेगा। मैं 99 फीसदी आश्वस्त थी कि ब्रिटेन यूरोपीय संघ से अलग नहीं होगा। नतीजे काफी अजीबोगरीब इसलिए भी हैं क्योंकि पिछली रात तक के सभी पोल ये दर्शा रहे थे कि यूरोपीय संघ में रहने के मुद्दे की जीत होगी और ब्रिटेन यूरोपीय संघ का साझेदार बना रहेगा। लेकिन अब जबकि नतीजे आ चुके हें तो मेरा मानना है कि अभी तो बुरे दिन आने बाकी हैं। ब्रिटेन की अर्थव्यवस्था पर विपरीत असर पड़ेगा। पाउंड नीचे गिर चुका है।
  • मेरे कुछ दोस्त जो अन्य यूरोपीय देशों से आए थे मैं उनके बारे में सोच कर घबरा रही हूं। वे पिछले 20 - 20 साल से यहांं रहा रहे हैं। उन्होंने अपनी जिंदगी के इतने साल यहां पर लगा दिए हैं। इनमें से कई लोगों का तो अपना कारोबार भी था। अब वे कहां जाएगे। मैं उन लोगों के लिए सच में काफी परेशान हूं। अब परिणाम के बाद ब्रिटेन में कैसा माहौल रहेगा। जिन लोगों ने यूरोपीय संघ के साथ रहने के लिए मतदान किया था वो अब किस प्रकार से अपना वजूद बनाए रखेंगे यह कहना मुश्किल हैं। ब्रिटेन के यूरोपीय संघ के अलग होने के पक्षघरों की जीत हुई है। वो लोग किस प्रकास से अपना नजरिया रखेंगे यह आगे देखना बाकी हैं।

लोरिडाना कॉबजारू, उम्र: 31 साल लंदन

आजाद: -

  • चर्चा है कि ब्रिटेन आजाद हो गया हैं। एक परंपरावादी, संकीर्णता के लिए जाना जाने वाला देश, अनेक देशों पर शासन करने वाला ब्रिटेन आज के समय के अनुसार बदलने को तैयार नहीं है। दूसरी ओर विकासवादी युवा वैश्वीकरण के साथ जीना चाहता है। युवावर्ग में 73 प्रतिशत यूरोपीयन संघ के साथ रहना चाहता है। इसके अलावा 18 वर्ष से कम आयु का युवा भी मतदान का अधिकार पाने को आतुर है। बुजुर्ग कहते हैं कि वैश्वीकरण में हमारी पहचान-संस्कृति-खो जाएगी। जिस तहर से बाहरी लोग ब्रिटेन में घुस गए और स्थानीय नौकिरयों में घुस गए, वह तो युवावर्ग के भविष्य पर बड़ा खतरा है। जैसे हमारे देश में करोड़ों बांग्लादेश घुस आए हैं। अपराधों की संख्या बढ़ गई है। बेरोजगारी का चार्ट आसमान छूने लगा है। हमारे यहां तो लगभग सभी पड़ौसी देशों के नागरिक अवैध रूप से रहते मिल जाएंगे। हर सरकार इसको अपनी उपलब्धि मानती आई है। अमरीका की राजनीति में इसका असर तुरंत हुआ है। रिपब्लिकन दल के राष्ट्रपति पद के संभावित उम्मीदवार डोनाल्ड ट्रम्प ने प्रतिक्रिया में जो कहा, वह चिन्तन करने लायक है। उन्होंने कहा ’यह महान रोमाचंक और ऐतिहासिक परिणाम है।’ ब्रिटेनवासियों ने ईयू को छोड़कर अपना देश वापिस ले लिया। इसी तरह हम भी अमरीका को वापस लेंगे। अर्थात सभी प्रकार की सरकारों को जनता की मर्जी से चलना होगा।

वैश्वीकरण: -

  • ब्रिटेन का अलग होना कोई साधारण घटना नहीं है। एक ओर इसके पड़ौसी देशों से व्यापार, उद्योग एवं अन्य आदान-प्रदान में अंतरराष्ट्रीय मर्यादाओं का पालन करना पड़ेगा, वहीं दूसरी ओर इसे विखंडन के लिए भी तैयार रहना पड़ेगा। स्कॉटलैंड जेसे देश जहां अधिकांश नागरिक यूरोपीय संघ में रहने के समर्थकहैं, ब्रिटेन से अलग भी हो सकते हैं। साथ रहने के पक्ष में तथा विपक्ष में बहुत अंतर नहीं है। साथ 48.1 प्रतिशत तथा अलग 51.9 प्रतिशत में 16 - 17 वर्ष के युवा शामिल नहीं हैं। वरना अलग हो ही नहीं पाते है। अगले 2 से 3 सालों में साथ रहने वालों का प्रतिशत बढ़ जाएगा तो वैश्वीकरण तो हावी रहेगा ही।
  • विश्व का भविष्य युवा वर्ग के हाथ में है। वह अभी वैश्वीकरण की चकाचौंध में है। उसकी जीवन शैली एक प्रवाह में बाहर रही है। वह विदेशी जीवन के अनुभवों, प्रयोगों एवं आधुनिकीकरण के बीच जीना चाहता है। उसे कभी-कभी भारतीय परंपराएं भी याद आती हैं, किन्तु कब तक? जिस देश में कपिल सिब्बल जैसे अवतारी पुरुष नीति निर्धारकों में बैठे हों। माननीया स्मृति ईरानी ने घोषणा की है। कि हमारे विश्वविद्यालयों का पाठयक्रम सात विदेशी विश्वविद्यालयों का समूह तय करेगा।

टकराव: -

  • बिटेन में भी यही द्धन्द्ध चलेगा। नई व पूरानी पीढ़ी के बीच जीवन शैली का टकराव बढ़ेगा। पुरानी पीढ़ी जीत नहीं पाएगी। घटती भी जाएगी। तब क्या संस्कृति विकास की भेंट चढ़ जानी चाहिए? पैसों की खनक में इसकी आवाज खो जानी चाहिए? देश कोई भी हो, शक्ति तो संस्कृति में रहती हैं। ब्रिटेन के उदाहरण ने एक बहुत महत्वपूर्ण पहलू उजागर किया है। युवा वर्ग का मतदान में भाग लेने का। मत कितना कीमती या अमूल्य है, यह बात प्रत्येक युवा के जहन में बैठ जानी चाहिए। वही देश का कर्णधार है।

संविधान व संस्कृति: -

  • हमारे लिए ब्रिटेन का उदाहरण महत्वपूर्ण है। इसमें सांस्कृतिक परिपक्वता तो है, किन्तु भविष्य मुश्किलों से भरा हुआ है। युवा वर्ग को होगी मुश्किलें। हमारे युवा वर्ग को भी जाग जाना चाहिए। हमारे यहां तो संस्कृति और संविधान दोनों की धज्जियां उड़ रहीं हैं। युवा मौन हैं क्यों? आपने पढ़ा होगा कि 40 लाख अवैध प्रवासियों के सवाल पर अमरीकी राष्ट्रपति ओबामा ने न्यायपालिका को धमकाने अथवा अपमानित करने का कोई प्रयास नहीं किया। हमारे यहा चयनित सरकारों को बर्खास्त करके हड़पने के जो प्रयास होते रहे हें, क्या वे संविधान सम्मत हैं।

गुलाब कोठारी

उपंसहार: -

  • हमारे पास समय कम है। युवा वर्ग को सारे भेद भुलाकर कमर कस लेना है। इस देश की संप्रभुता और अखंडता पर कोई खतरा न आए। हमें भी ब्रिटेन जैसा दिन न देखना पड़े। इसके लिए युवा वर्ग को गंभीर हो जाना चाहिए। हम समय के साथ भी रहें और मूल्यों की ताकत भी कम न होने पाए हमें ऐसा कुछ करना चाहिए। हम वैश्वीकरण के अलावा हमारी ज्ञान परंपरा या विरासत को केंद्र में रखकर दूसरों से आगे भी दिखाई पड़ें। ये विरासत अन्य किसी भी देश के पास नहीं हैं। इसको ठेस पहुंचाने वाली प्रत्येक नीति का युवा वर्ग पुरजोर विरोध करे। पहले देश फिर हम। वरना ब्रिटेन के युवा की तरह मुंह बांए खड़े रह जाएंगे। हमारे इरादे बहुमत के गुलाम को जाएंगे। आज भी हमने जिनको केंद्र या प्रदेशों में बहुमत दिया, वे हमको गुलाम ही मान रहे हैं। क्या बचेगा पीछे वालों के लिए जब उद्योगों को तो विदेशी खरीद लेंगे। किसान जहर उगलेगा, जमींने रहेंगी नहीं। न रोटी, पानी, और न हवा। इसलिए युवा को जागना ही पड़ेगा, नहीं तो देश हाथ से निकल जाएगा।

- Published on: July 6, 2016