शख्सियत (Celebrities - Essay in Hindi) [ Current Affairs ]

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प्रस्तावना: -दुनिया के 25 सबसे बड़े ये वे जिद्दी लोग हैं जिनमें कुछ कर गुजरने का जूनन था। वह अपनी सोच को साबित करने के लिए जिद् पर अड़े थे। वह ज़िद उनके नफे-नुकसान के लिए नहीं बल्कि दुनिया में बदलाव के लिए थी। जिनकी कारण हमारे देश में बहुत कुछ बदलाव आया है और देश प्रगति की ओर अग्रसर हुआ हैं। ऐसी ही बदलाव की चाहत रखने वाले देश-दुनिया के इन 25 शख्सियतों की सोच, उनके आविष्कार, कोशिशें और सीख को हमने यहां संजोया है।

शख्सियत: -शख्सियतों के नाम निम्न हैं-

1 जीवन परिचय-

नाम: स्टीव जॉब्स, एपल के सह - संस्थापक।

जन्म: 24 फरवरी 1955।

निधन: 5 अक्टूबर 2011

शुरुआत: 17 की उम्र में पहला जॉब, 21 साल की उम्र में एपल शुरु।

टर्नओवर: 15794.21 अरब रुपए

मार्केट कैपिटल: 50130 अरब रुपए (मई, 2015)

नेट प्रॉफिट: 3608 अरब रुपए (2014 - 15)

उपलब्धि: उनके नाम प्राइमरी इर्न्वेटर या का इर्न्वेटर के रूप में 346 इनोवेशन के पेटेंट हैं।

ज़िंद: इन्होंने ज़िंद की थी कि यह अपना कम्प्यूटर बनाएंगे। ऐसी तकनीक लोगों को देंगे, जो समय की बचत करे और कम पैसे में अधिक सुविधा दे।

जिस कंपनी ने बर्खास्त किया उसे ही बनाया मोस्ट वैल्यूएबल । जॉब्स ने अपने सहयोगी वोजनियाक के साथ 1976 में आईटी कंपनी एपल की स्थापना की थी। आगे जाकर परिस्थितियां ऐसी बनीं कि एक दिन वे इसी कंपनी से निकाल दिए गए। इसके पीछे एपल के तत्कालीन सीईओ जॉन स्कुली थे, जिन्हें स्टीव ही कंपनी में लाए थे। उनके एपल से जाने के बाद बाजार में कंपनी की साख गिर गई। एपल की बाजार में भागीदारी 16 से 4 फीसदी पर आ गई। उधर, स्टीव नई कंपनी नेवस्ट बना चुके थे। जब एपल का बाजार गिरने लगा तो मैनेजमेंट ने फिर स्टीव की कमी महसूस की। वे कंपनी में वापस आए और एपल को दुनिया की सबसे महत्वपूर्ण कंपनी बना दिया। आज कंपनी के पास अमेंरिकी सरकार से भी अधिक कैश (करीब 203 अरब डॉलर) है। 2014 में बताया गया था कि उनके ऑफिस में उनके नाम की नेमप्लेट आज भी लगी है। उन्होंने अपना वेतन सिर्फ एक डॉलर रखा था। जॉब्स ने जब आईपॉड के बारे में डेमों दिया था तो कहा था कि ’ आप 75 डॉलर में सीडी प्लेयर खरीदते हैं, जिसमें 15 गाने आते हैं। यानी पांच डॉलर का एक गाना। मैं हार्ड ड्राइव ’ज्यूक बॉक्स प्लेयर’ से रूबरू कराता हूं, जो 100 गाने तीस डॉलर में देगा। एक हजार गाने आपकी पॉकेट में होंगे।’

दुनियां में मरना कोई नहीं चाहता हैं। यहां तक कि वे भी नहीं जो स्वर्ग जाने की चाहत रखते हैं।”

2 जीवन परिचय-

नाम: बिल गेट्‌स माइक्रोसाफ्ट के संस्थापक

जन्म: 28 अक्टूबर 1955

शुरुआत: 1975 में माइक्रोसॉफ्ट

टर्नओवर: 6000 अरब रुपए

मार्केट कैपिटल: 267 खरब रु.

नेट प्रॉफिट: 1500 अरब रुपए

उपलब्धि: 18 साल में बेसिक भाषा डेवलप कर ली थी। 30 वर्ष की उम्र में अरबपति बन गए थे। 1985 में विंडोज ऑपरेटिंग सिस्टम लांच किया। 2014 में मोबाइल कंपनी नोकिया का अधिग्रहण किया।

  • ज़िंदइनकी ज़िद थी कि ऐसे प्रोगाम बनाना है जो फ्रिज जैसे बड़े कम्प्यूटर को आदमी की टेबल पर ला सके। आज कम्प्यूटर हर आदमी की पहुंच में हैं।

सॉफ्टवेयर कंपनी माइक्रोसॉफ्ट की शुरुआत करने वाले बिल गेट्‌स ने भी बेशुमार दौलत का सपना देखा था और उसे साकार भी किया। यूं तो उनके पिता करोड़पति थे, लेकिन बिल की इच्छा और आगे बढ़ने की थी। महज 31 साल की उम्र में गेट्‌स दुनिया के सबसे कम उम्र के अरबपति बन गए थे। यह दौलत उन्होंने सिर्फ अपने लिए नहीं कमाई। वे इस दौलत को भलाई में भी खर्च करते रहे हैं। 28 अक्टूबर 1955 में जन्में बिल गेट्‌स ने 1968 में पहली बार कम्प्यूटर पर काम किया। तब उनकी उम्र सिर्फ 13 साल थी। इस छोटी सी उम्र से ही वे कम्प्यूटर प्रोग्रामिंग और सॉफ्टवेयर विकास करने लगे थे। प्रोग्रामिंग को लेकर उनकी दीवानगी इस कदर थी कि काम करते समय रात और दिन का पता ही नहीं चलता था। अपनी जिद और उत्साह के दम पर उन्होंने 13 साल की उम्र में कम्प्यूटर पर प्रोगाम बनना शुरु कर दिया था और 18 साल की उम्र में कम्प्यूटर की बेसिक भाषा विकास कर ली थी। गेट्‌स ने अपने एक टीचर से कहा था कि मैं 30 वर्ष कि उम्र में करोड़पति बनकर दिखाऊंगा और लगभग इतनी ही उम्र में वह अरबपति बन गए। 1973 में उन्होनं हार्वर्ड विश्वविद्यालय में पढ़ाई शुरु कर दो साल बाद छोड़ दी। उनका पढ़ाई से ज्यादा प्रोगामिंग में मन लगता था। उनके इस निर्णय पर उनके माता-पिता ने एतराज जताया। गेट्‌स की ज़िद के आगे माता-पिता की नहीं चल सकी। 1975 में दोस्त पॉल ऐलन के साथ मिलकर गेट्‌स ने माइक्रोसाफ्ट की शुरुआत की। 2007 में बिल गेट्‌स को हार्वर्ड विश्वविद्यालय ने बिना पढ़ाई करे भी डिग्री प्रदान की। माइक्रोसॉफ्ट की 100 से भी अधिक देशों में फैली शाखाओं में 1 लाख से भी अधिक लोग काम करते हैं। दुनिया के सबसे अमीर आदमी बनने के बाद बिल गेट्‌स ने अपनी 95 प्रतिशत संपत्ति दान कर दी। बिल एंड मिलिंडा गेट्‌स फाउंडेशन स्वास्थ्य के क्षेत्र में काम कर रहा है। वे अफ्रीका के गरीब देशों से लेकर हमारे बिहार के गांवों में जाकर फांउडेशन के कामों का समय-समय पर जायजा भी लेते हैं। दान कर खुद देखने जाते हैं कि दान का उपयोग कैसे हो रहा हैं। वेल्थ एक्स की रिपोर्ट के अनुसार गेट्‌स फांउडेशन के पास करीब 2800 करोड़ रुपए की संपत्ति है। इतने अमीर होने के बाद भी उनकी जीवनशैली काफी साधारण है। वे खुद पर कम पैसे खर्च करने पर विश्वास रखते हैं मात्र 10 डॉलर (650 रुपए) की घड़ी पहनते हैं।

आने वाली संदी का नेतृत्व वहीं करेंगे जो दूसरों को समद्ध करने की क्षमता रखते हैं।”

3 जीवन परिचय-

नाम: धीरूभाई अंबानी, रिलायंस समूह के संस्थापक

जन्म: 28 दिसंबर 1932

निधन: 06 जुलाई 2002

शुरुआत: 26 की उम्र में रिलायंस कमर्शियल खोली।

टर्नओवर: (38 खरब मुकेश अंबानी), (10 खरब -अनिल अंबानी, 2012 में)

मार्केट कैप: 31 खरब और 130 अरब (2012 में)

नेट प्रॉफिट: प्रति समूह 2 खरब से ज्यादा (2012 में)

उपलब्धि: फिक्की ने मैन ऑफ द सेंचूरी और एशिया वीक मैगजीन ने एशिया के 50 सबसे शक्तिशाली लोगों में शामिल किया।

ज़िंद: -ज़िद की थी अपने देश में अपनों के बीच रहकर बिना किसी के नौकर बने पैसा कमांएगे। मध्यम वर्ग को उनकी जरूरत की चीज उनके बजट में देंगे।

जब वे 17 साल के थे, तब अदन (यमन) में एक कंपनी में 300 रुपए वेतन पर क्लर्क थे। इसके बाद कई पार्ट टाइम जॉब किए। पेट्रोल पम्प पर अटेंडट की नौकरी करते हुए उन्होंने इसका मालिक बनने की बजाय दुनिया की सबसे बड़ी तेल रिफाइनरी कंपनी बनाने का सपना देखा। वे तीन बातें समझ गए थे। धीरूभाई अपने देश लौट आए और मुंबई में छोटे से फ्लैट में रहने लगे। उन्होंने 15 हजार रुपए से रिलायंस कमर्शियल कॉर्पोरेशन नाम से कंपनी खोली और खाड़ी देशों को मसाला व फेब्रिक्स निर्यात करने लगे। धंधा चल पड़ा पैसे की भूख और बढ़ी। व्यापारियों में पहचान बनी। इसके बाद 1966 में अहमदाबाद से 30 किमी दूर 4 मशीनों वाली टेक्सटाइल मिल लगाई। पूंजी बड़ी होने के साथ धीरूभाई का सपना भी बड़ा हुआ। उनकी कंपनी 1978 में बंबई और अहमदाबाद स्टॉक एक्सचेंज में लिस्टेड हुई। अंाबानी के साथ 58 हजार मध्यमवर्गीय परिवारों का नसीब भी जुड़ गया। जब 1986 में उन्होंने शेयर होल्डर्स की मीटिंग की तो मुंबई में ऐसा हॉल नहीं हुआ था, जिसमें सभी आ सकें। अंतत: खुले में मीटिंग करनी पड़ी।

यदि आप अपने सपने पूरे नहीं करते तो कोई दूसरा आपको हायर कर आपकी मदद से अपने सपने पूरे करेगा।”

4 जीवन परिचय-

नाम: मलाला युसूफजई, नोबेल विजेता

जन्म: 12 जुलाई 1997

शुरुआत: 2009 में बीबीसी में ब्लॉग लिखना शुरु किया।

हमला: 9 अक्टूबर 2012 को तालिबान आतंकियों ने मलाला पर गोलियां दागी।

उपलब्धि: तालिबान की धमकी से डरे बिना स्कूल जाती रहीं। 2014 में शांति का नोबेल पुरस्कार मिला। 12 जुलाई 2013 को मलाला ने सयुंक्त राष्ट्र में संबोधन दिया। 12 जुलाई को मलाला दिवस घोषित किया गया।

ज़िंद: - ज़िद थी कि स्कूल जाना बंद नहीं करुंगी। अपने जैसी हर लड़की को शिक्षा मिले इसके लिए काम करुंगी। घर-घर जाकर लड़कियों को स्कूल जाने के लिए प्रेरित करती थी।

सबसे कम उम्र की नोबेल शांति पुरस्कार विजेता 17 वर्षीय मलाला युसूफजई की अब तक की ज़िंदगी संघर्ष की एक दास्तान रही है। पाकिस्तान की स्वात घाटी में लड़कियां कम ही स्कूल जाती थीं। जब मालाला स्कूल जाती और उसे रास्ते में कोई लड़की मिलती तो वे उसे भी स्कूल चलने के लिए जागरूक करती। बात वर्ष 2009 की है। तालिबान ने लड़कियों के स्कूल जाने पर प्रतिबंध लगा दिया। धमकी का इतना बुरा प्रभाव हुआ कि स्कूलों में जो गिनी-चुनी लड़कियां दिखती थीं वे भी नदारद हो गई घरवालों के मना करने और तालिबानी धमकी के बाद भी मलाला स्कूल जाती रही। जब मौका मिलता वह लड़कियों को शिक्षा के लिए प्रेरित करती। 2009 में उसने बीबीसी में ’डायरी आफॅ ए पाकिस्तानी स्कूल गर्ल’ के नाम से ब्लॉग लिखना शुरू किया। छद्य नाम से लिखा जा रहा ब्लॉग विश्व स्तर पर चर्चा में तब आया जब 2010 के अंत तक स्वात घाटी पाकिस्तान सरकार का नियंत्रण हो गया। वर्ष 2011 में हॉलैंड के एक संगठन ने मलाला को शांति पुरस्कार के लिए नामांकित किया। मलाला के अभियान के बाद स्वात घाटी में स्कूल जाने वाली लड़कियों की संख्या बढ़ने लगी।

हम डरे हुए हो सकते हैं, लेकिन हमारा डर, हमारे साहस से ज्यादा मजबुत नहीं हो सकता।”

5 जीवन परिचय-

नाम: मार्क जकरबर्ग, को-फाउंडर फेसबुक

जन्म: 14 मई, 1984

शुरुआत: 20 वर्ष की उम्र में फेसबुक की स्थापना की।

टर्नओवर: 810 अरब रुपए (2014 - 15)

मार्केट कैपिटल: 195 खरब रुपए

नेट प्रॉफिट: 191 अरब रुपए

उपलब्धि: वर्ष 2010 में टाइम मैंगजीन ने उन्हें पर्सन ऑफ व ईयर चुना था। उनकी कंपनी इंस्टाग्राम और वॉट्‌सएप जैसी कंपनियों का अधिग्रहण कर चुकी है। एफबी से 1.55 अरब सक्रिय यूजर्स जुड़े हैं।

ज़िंद: - इनकी जिद थी कि एक ऐसी वेबसाइट तैयार करना है जो दुनियाभर के लोगों को जोड़े और इंटरनेट का इस्तेमाल का अनुभव बदल दे।

जब स्कूल में बच्चे कम्प्यूटर खेल खेलते थे तो मार्क गेम्स बनाने में जुटे रहते थे। क्योंकि उन्हें कम्प्यूटर का बहुत शौक था। इसी शौक को देखते हुए उनके पिता ने मार्क के लिए कम्प्यूटर की विशेष ट्‌यूशन भी लगवाई। उनकी रूचि का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि 12 वर्ष की उम्र में मार्क ने अपने पिता के ऑफिस के लिए मैसेजिंग प्रोग्राम तैयार कर दिया था। कॉलेज में भी उनका यह कम्प्यूटर प्रेम जारी रहा। यहां मार्क ने ठाना कि इपने इस प्रेम के जरिए कुछ ऐसा करना चाहिए कि जो दुनिया में बदलाव ला सके। हार्वर्ड विश्वविद्यालय में पढ़ते हुए ही उन्हें इसके लिए योजना मिल गई। जब उन्होंने कॉलेज स्टूडेंट को जोड़ते हुए एक वेबसाइड बनाई। मार्क को लगा कि इसी विचार पर ऐसी वेबसाइड बनाई जा सकती है, जिसमें पूरी दुनिया के लोग एक दूसरे से जुड़ सके। यहीं विचार आगे चलकर फेसबुक में बदल गया। लेकिन संघर्ष अभी बाकी था। आर्थिक मजबुरियों के आगे मार्क ने हार नहीं मानी। पैसों की कमी थी सो परिवार से 85000 डॉलर उधार लिए और वेबसाइड चलाते रहे। फिर पीटर थील ने एफबी में 5 लाख डॉलर का निवेश किया, जिसके बाद मार्क की साइट चल पड़ी। कुछ साथी छात्रों ने उनके ऊपर धोखा धड़ी के आरोप भी लगाए, लेकिन तमाम बाधाओं के बावजूद वे चलते रहे और 2004 में शुरू हुई फेसबुक ने सोशल मीडिया और इंटरनेट के इस्तेमाल की तस्वीर बदल दी। 20 वर्ष की उम्र में उनकी यह छोटी सी शुरूआत विश्वव्यापी क्रांति लाई। अब इस पर इतने यूजर्स हैं कि एफबी को देश होता तो इसकी जनसंख्या दुनिया में सबसे ज्यादा होती। फेसबुक के लिए मार्क ने कई ऑफर को मना कर दिया। और वे किसी भी गैरजरूरी काम में समय नहीं गवाते थें।

सवाल यह नहीं है कि आप लोगों के बारे में क्या जानना चाहते हैं, सवाल यह है कि लोग अपने बारे में क्या बताना चाहते हैं।”

6 जीवन परिचय-

नाम: स्टीफन हॉकिंग, खगोलशास्त्री

जन्म: 8 जनवरी 1842

शुरुआत: ऑक्सफोर्ड में पढ़ते हुए महत्वपूर्ण शोध किए। 1979 में कैम्ब्रिज के ल्यूकेसिअन प्रोफेसर ऑफ मैथमेटिक्स के पद पर नियुक्त हुए।

उपलब्धि: ब्लैक होल व बिग थ्योरी को उन्होंने नए सिरे से समझा और नए सिद्धांत प्रतिपादित किए। स्टीफन 12 मानद उपाधियों से नवाजें जा चके हैं।

ज़िंद: - उनकी ज़िंद थी कि 93 फीसदी शरीर खराब होने के बावजूद अपनी बीमारी को मात देकर अंतरिक्ष और विज्ञान से जुड़े रहस्यों को जानेंगे, जो उन्हें जिज्ञासु बनाते हैं। दुनिया को समय के इतिहास और रहस्य से वाकिफ कराएंगे।

खगोलशास्त्री गैलिलियों की मौत के ठीक 300 साल बाद जन्मे स्टीफन हॉकिंग को 21 साल की उम्र में पता चल गया था कि उन्हें मोटर न्यूरोन नामक लाइलाज बीमारी है, जो उन्हें शारीरिक रूप से पूरी तरह अक्षम बना देगी। वे दो-तीन साल ही जिएंगे। यह जानकर स्टीफन ने कहा कि उनके काम और उनकी बीमारी के बीच कोई रिश्ता नहीं बनता है। वे अपना काम अब दोगुनी गति से कर सकेंगे, क्योंकि उनके पास दूसरों के मुकाबले कम समय है वे एक मशीन के जरिए 15 शब्द प्रति मिनिट बोलते हैं। वे अपनी बीमारी से पहले ऑक्सफोर्ड की रोईंग टीम का हिस्सा हुआ करते थे। स्टीफन ने कैम्ब्रिज में बह्यांड विज्ञान में शोध शुरू किया। उस समय इस क्षेत्र में काम करने वाले पहले व्यक्ति थे। उन्होंने अंतरिक्ष और समय से जुड़ी आईस्टीन की थ्योरी में नए तथ्य जोड़े। साथ ही एक नई खोज की कि ब्लैक होल पूरी तरह ब्लैक नहीं है। उनकी किताब ’ अ ब्रीफ हिस्ट्री ऑफ टाइम’ बेस्ट सेलर है। वे अन्य किताबों के भी लेखक और सह-लेखक हैं।

मुझे मरने से बिल्कुल डर नहीं लगता, लेकिन मुझे मरने की कोई जल्दी नहीं है। ऐसा बहुत कुछ है, जो मैं मृत्यु से पहले करना चाहता हूं।”

7 जीवन परिचय-

नाम: वर्गीज कुरियन, अमूल के संस्थापक

जन्म: 26 नवंबर 1921

निधन: 09 सितंबर 2012

शुरुआत: 1949 में गुजरात कीआएंद डेयरी में काम करना शुरु किया।

उपलब्धि: भात को दूध का सबसे बड़ा उत्पादक देश बनाया। 1965 में राष्ट्रीय दुग्ध विकास बोर्ड का अध्यक्ष बनाया गया। 1986 में भारत सरकार ने कृषि रत्न सम्मान से नवाजा। 1999 में पद्य विभूषण मिला।

ज़िंद: - इन्होंने ज़िद की थी कि भैंस के दूध से दूध पाउडर बनाएंगे और भारत को दुनिया के सर्वाधिक दुग्ध उत्पादक देशों में शामिल कराएंगे।

कुरिचन 13 मई 1940 को गुतराज के आणंद आ आए। केरल के ईसाई समुदाय का होने के कारण कोई उन्हें अपना घर देने को तैयार नहीं था। यहां आणद डेयरी में नौकरी करने के साथ ही कुरियन के मन में भारत को दूध के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाने का सपना भी था। ऐसे समय में त्रिभुवन नारायण पटेल ने अपने गैराज में उनके रहने की व्यवस्था की। दूध को सुरक्षित रखने के लिए कुरियन ने 11 महीने की मेहनत के बाद जो मिल्क प्रोसेसिंग प्लांट तैयार किया वह उस समय तक देश का सबसे आधुनिक प्लांट था। कुरियन की प्रोसिंसग आधुनिक मार्केटिंग ने किसानों की किस्मत ही बदल दी। उन्होंने ’ऑपेरशन फ्लड’ की शुरुआत की और 72 हजार किसानों से दूध इकट्‌ठा करना रूुरू कर दिया। ऐसे में 60 के दशक में जहां देश में दुग्ध उत्पादन 2 करोड़ टन था, 2011 तक यह 12.2 करोड़ टन तक पहुंच गया। उनके प्रयासों से आज गुजरात मिल्क मार्केटिंग फेडरेशन से 11 हजार गांव और 20 लाख किसान जुड़े हुए हैं उनका बनाया अमूल ब्रैंड दुनिया के 50 देशों में करोबार कर रहा है।

खुद के प्रति ईमानदरी सबसे बड़ा गुण है। अगर आप में यह गुण है तो दूसरों के प्रति ईमानदार रहना आसान होगा।”

8 जीवन परिचय-

नाम: जेके रोलिंग

जन्म: 31 जुलाई 1965

शुरुआत: पहली किताब 1997 में प्रकाशित हुई।

संपत्ति: 67 अरब रुपए

ब्रैंड: किताबे और फिल्में आने के बाद हैरी पॉटर अब 1015 अरब डॉलर का ब्रैंड है।

उपलब्धि: रोलिंग ब्रिटेन की सबसे ज्यादा कमाई करने वाली जीवित लेखिका हैं।

ज़िंद: - उन्होंने यह ज़िद की थी कि परिस्थितियों से थक-हारकर लिखने के अपने शौक को दम तोड़ने नहीं दूंगी। इसलिए मां को खोने, पति से बिछड़ने और बेटी की परवरिश के बीच भी लिखती रहीं।

फोर्ब्स पत्रिका ने पुस्तकें लिखकर अरबपति बनने वाला दुनिया का पहला शख्स जेके रोलिंग को बताया है। मगर रोलिंग के लिए यह सफर आसान कतई नहीं रहा। उन्होंने हेरी पॉटर की जादूई दुनिया को लोगों के सामने पेश करने के बीच बदहाली भी देखी है। रोलिंग ने जब यह नॉवेल लिखना शुरू किया तो पहले साल बीमारी से पीड़ित मां को खो दिया। फिर आमदनी का जरिया न होने के कारण दूसरे साल अंग्रेजी पढ़ाने पुर्तगाल चली गईं। तीसरे साल थोड़ा संभली तो वहीं टीवी जर्नलिस्ट जॉर्ज अरैंटीज से विवाह किया, मगर इस रिश्ते में भी दरारें आ गई। चौथे साल एक वर्ष की बेटी के साथ स्कॉटलैंड आईं और किताब पूरी की। मगर संघर्ष अभी भी खत्म नहीं हुआ था। जब वे इसे लेकर प्रकाशक के पास पहुंची तो उसने इसे छापने से इनकार कर दिया। ऐसा एक बार नहीं 12 बार हुआ था। फिर भी रोलिंग ने किताब छपवाने की ज़िद नहीं छोड़ी। आखिर 13 वीं बार में उन्हें सफलता मिली।

अगर आप में जज्बा बाकी है तो दुनिया में भी कोई काम मुश्किल नहीं। बस आपको संघर्ष करना होगा।”

9 जीवन परिचय-

नाम: टिम बर्नर्स ली, w. w. w के आविष्कारक

जन्म: 8 जून 1955

शुरुआत: 1976 में बतौर इंजीनियर टेलीकम्यूनिकेशन कंपनी पेल्सी से जुड़े।

वर्तमान कार्य: 2009 में तत्कालीन ब्रिटिश प्रधानमंत्री गॉर्डन ब्राउन द्वारा उन्हें सरकार की ओर से वेब पर डाटा ज्यादा स्पष्ट और सुलभ बनाने के लिए नियुक्त किया गया ह।

उपलब्धि: 2004 में उन्हें इंग्लैंड के सबसे बड़े सम्मान ’नाइटहुड’ से नवाजा गया।

ज़िंद: - उन्होंने ज़िद की थी कि अपनी जरूरत का साधन या तकनीक न मिली तो खुद तैयार कर लेंगे। इसलिए कॉलेज में रहते हूए अपने लिए कम्प्यूटर बना लिया। फिर नौकरी करते हुए वर्ल्ड वाइड वेब।

जिस वर्ल्ड वाइड वेब तकनीक के सहारे सैकड़ों कंपनियां लाखों का कारोबार कर रही हैं, उसका आविष्कार टिम ने सर्न में रहते हुए किया था। यह सर्न की बौद्धिक संपदा थी। हालांकि 1993 में सर्न ने तकनीक के अधिकार उन्हें दे दिए। फिर भी टिम ने इसे पेटेंट नहीं करवाया, इसलिए कि लोग इसका इस्तेमाल नि: शुल्क कर सकें। इस तरह टिम ने अपनी तकनीक दुनिया को समर्पित कर एक पन्ने पर पूरा इंटरनेट समेट दिया। 1984 में जब टिम दूसरी बार स्विट्‌जर लैंड स्थित सर्न से जुड़े थे तब यहां दुनिया की विभिन्न यूनिवर्सिटीज के हजारोंं वैज्ञानिक थे। ये अपने साथ उस दौर के अलग-अलग कम्प्यूटर लाए थे। इन पर विभिन्न फॉरमेट्‌स में सूचना रखी जाती थीं। टिम का मुख्य काम था कि सुचनाएं एक कम्प्यूटर से दूसरे पर भेंजे। उन्हें ऐसे तरीके का विचार आया जिससे लगे कि सुचनाएं एक पेज पर ही हैं। इसी का हल सोचते-सोचते 1991 में उन्होंने ’वर्ल्ड वाइड वेब’ का आविष्कार कर दिया।

विचारों में बदलाव बेहद जरूरी है तभी हम नई चुनौतियों का सामना करने में सक्षम हो पाएंगे”

10 जीवन परिचय-

नाम: मार्टिन कूपर

जन्म: 26 दिसंबर 1928

शुरुआत: 1970 के दशक में मोटोरोला के कम्प्यूनिकेशन सिस्टम के हेड बने।

सम्मान: 2013 में मार्कोनी सम्मान से नवाजे गए।

उपलब्धि: स्पेक्ट्रल इफिशिएंसी लॉ दिया। इसे कूपर लॉ भी कहा जाता है। भौतिकी विज्ञान के क्षेत्र में इसे महत्वपूर्ण माना जाता है। रेडियो कम्यूनिकेशन में अहम भूमिका निभाई। यूएस फीडरल कम्यूनिकेशन कमीशन के मुख्य सलाहकार बने।

ज़िंद: - इन्होंने यह ज़िद की थी कि दुनिया को ऐसा फोन देंगे, जिससे कोई भी दुनिया के किसी भी कोने में खड़े होकर बात कर सके। मोबाइल बनाने की ज़िद।

जब 1973 में अमेरिकी इनोवेटर मार्टिन कूपर पे पहला सेल फोन बनाया, तब न टीवी सर्किट था और न ही एलसीडी। लेकिन वर्षो से सब ’कार फोन’ के लिए कोशिश कर रहे थे। ’एटी एंड टी’ कंपनी ने ऐसा फोन बना लिया, लेकिन मार्टिन को ये योजना पसंद नहीं आया। उन्होंने सोचा कि 100 वर्षों से लोग बात करने के लिए अपने घरों और कार्यालय में डेस्क से चिपके हैं। तारों में बंधे हैं और अब कारों से चिपके रहेंगे। अब समय पर्सनल कम्यूनिकेशन का है। पोर्टबल मोबाइल हैंडसेट का। मार्टिन ने मोटोरोला कंपनी के साथ मिलकर सेल फोन पर काम शुरू किया। तीन महीने तक वे दिन-रात इस तकनीक को ईजाद करने में भिड़े रहे। अप्रैल 1973 में उन्होंने पहले सेल फोन का डेमो दिया। जब उन्होंने अपनी प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान अपने मोबाइल से एक महिला पत्रकार की बात उसकी ऑस्ट्रेलिया में रहने वाली मां से कराई, उसे यकीन नहीं हुआ कि वो सेल फोन से बात कर रही हैं। उसकी आंखों में आसूं थे।

आप आउट ऑफ द बॉक्स सोचना चाहते हैं तो पहला काम ये करें कि कोई बॉक्स ही न बनाएं।”

11 जीवन परिचय-

नाम: चेतना सिन्हा, मण देशी बैंक की संस्थापक

जन्म: 21 मार्च 1959

शुरुआत: 9 अगस्त, 1997 को मण देशी महिला सहकारी बैंक की स्थापना की।

उपलब्धि: भारत का पहला महिलाओं का ग्रामीण सहकारी बैंक शुरू किया। हार्वर्ड और येल यूनिवर्सिटी ने सम्मानित किया।

ज़िंद: - इन्होंने ज़िंद की थी कि गांव की महिलाओं को स्वावलंबी बनाकर आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाना है।

मुंबई में पली-बढ़ीं चेतना ने म्हसवड गांव जाकर जाना कि यहां महिलाएं अभावों में रह रही हैं। शहरी जीवन छोड़कर वे उसी गांव में रहने लगीं और गांव के ही विजय से शादी कर ली, जो एक किसान थे। वर्ष 1995 में एक महिला से उन्हें पता चला कि कोई भी बैंक उसका बचत खाता नहीं खोलना चाहता क्योंकि वह सिर्फ 5 - 10 रुपए ही जमा कर सकेगी। यहीं से चेतना को ऐसे बैंक का विचार लेकर वे रिजर्व बैंक के पास गई, लेकिन बैंक ने अनपढ़ महिलाओं को बैंक का डायरेक्टर बनाने से इंकार कर प्रस्ताव ठुकरा दिया। चेतना दु: खी हुई, लेकिन गांव की महिलाओं का उत्साह देख उन्हें पढ़ाना शुरू किया। कुछ समय बाद दोबारा आरबीआई गई और इस बार वे भारत का पहला महिला सहकारी बैंक शुरू करने में सफल हुई। अब उनके बैंक से करीब दो लाख महिलाएं जुड़ी हैं, जो इसके जरिए लोन पाकर आत्मनिर्भर बन रही हैं।

अगर आप असफल होते हैं तो लोगों को हतोत्साहित न करने दें। बल्कि अपनी सफलता की दिशा में इसे एक कदम मानें।”

12 जीवन परिचय-

नाम: जुलेखा दाऊद, यूएई में पहली भारतीय महिला डॉक्टर

जन्म: 1940

शुरुआत: 24 साल की उम्र में मेडिकल एजुकेशन की प्रैक्टिस शुरू की।

उपलब्धि: यूएई की टॉप गायनेकॉलोजिस्ट का अवॉर्ड, फोर्ब्स की यूएई में टॉप 100 इंडियन लीडर्स की लिस्ट में शामिल।

ज़िंद: - इन्होंने ज़िद की थी कि गांवों में जाकर गरीब और वंचितों को स्वास्थ्य सेवाएं देंगी। उन्हें जागरूक करेंगी।

नागपुर में जन्मी जुलेखा दाऊद को यूनाइटेड अरब अमीरात (यूएई) में पहली भारतीय महिला डॉक्टर होने का गौरव प्राप्त है। वे 1964 में भारत छोड़कर यूएई चली गई थीं। वहां उन्होंने अपनी मेडिकल की पढ़ाई करने से पहले ही चिकनपॉक्स, सर्पदंश आदि के इलाज करने शुरू कर दिए थे। उनके पति इकबाल दाऊद भी दुबई में कुवैत मिशन हॉस्पिटल में डॉक्टर थे, जहां जुलेखा की पहली पोस्टिंग हुई थी।

जुलेखा ने गांवों में पैदल जाकर उन घरों में डिलीवरी कराई, जिनमें न बिजली थी, न साफ पानी। वे घर-घर जाकर करीब 15 हजार डिलीवरी करा चुकी हैं। गांवों में साफ पानी, स्वास्थ्य केंद्र जैसी सुविधाएं उपलब्ध कराईं। 1992 में शारजाह में 30 बेड वाला पहला जुलेखा चिकित्सालय खोला और हजारों जरूरतमंदों का मुक्त इलाज किया। इसके अलावा दुबई सहित चार अन्य स्वास्थ्य केंद्र भी खोले। जुलेखा इन चिकित्सालय के जरिए हर साल साढ़े पांच लाख लोगों का इलाज कर रही हैं।

मेरे पिता कभी स्कूल नहीं गए, मां पांचवी तक पढ़ी हैं। इसके बावजूद उन्होंने मुझे डॉक्टर बनाने का सपना देखा। अपने लिए नहीं, दूसरों के लिए।”

13 जीवन परिचय-

नाम: बराक ओबामा, अमेरिका के राष्ट्रपति

जन्म: 4 अगस्त 1961

शुरुआत: 1988 में हॉर्वर्ड लॉ रिव्यू के पहले अश्वेत एडिटर बने। 1992 में वोटर रजिस्ट्रेशन कैंपेन चलाया। 1996 में अमेरिकी राजनीति में प्रवेश।

उपलब्धि: शांति के लिए नोबेल पुरस्कार से नवाजे गए। हर अमेरिकी को बराबर का हक दिलाने पर बल दिया। स्टूडेंट लॉन प्रोग्राम, इम्पलॉयमेंट और अमेरिकी कर नियम में सुधार लाए।

ज़िंद: - उन्होंने ज़िद की थी कि अमेरिकी अश्वेत और वंचितों को उनके सामाजिक और कानूनी अधिकार दिलाकर रहेंगे। उनके लिए हर हाल में लड़ेंगे।

ओबामा ने सामान्य परिवार से व्हाइट हाउस तक का सफर तय किया है। माता-पिता का तलाक, फिर दुर्घटना में पिता की मौत और फिर अभावों का दंश झेला। खर्च चलाने के लिए आइसक्रीम दुकान पर काम किया। शिक्षा पूरी करने के बाद अश्वेतों के लिए लड़ना शुरू किया। फिर 1989 में उन्होंने लॉ फर्म जॉइन कर ली, ताकि वंचितों को न्याय दिला सकें। 1992 के चुनाव में उन्होंने वोटर रजिस्ट्रेशन कैंपेन में भाग लेकर लोगों को संवैधानिक अधिकारों के प्रति जागरूक किया। उनकी लोकप्रियता देख डेमोक्रेटिक पार्टी ने 1996 में उन्हें इलिनॉय स्टेट सीनेटर का चुनाव लड़ने का मौका दिया। बोस्टन में 2004 में आयोजित डेमोक्रेटिक राष्ट्रीय सम्मेलन में ओबामा को भी आमंत्रित किया गया था। इस सम्मेलन में अपने ऐतिहासिक भाषण से वे - हीरों’ बन गए। इसने उन्हें अमेरिकी राजनीति में स्थापित कर दिया। राष्ट्रीय अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर अपनी स्पष्ट राय व लोकप्रियता के चलते कुछ ही सालों में उन्हें अमेरिकी राष्ट्रपति पद का दावेदार माना जाने लगा। वे जीते और सदियों का इतिहास बदल दिया। वंचितों को सिखाया बड़े सपने देखना।

किसी दूसरें के या दूसरें समय के भरोसे बैठने से बदलाव नहीं आएगा। हम जो बदलाव चाहते हैं, उसके लिए खुद बदलना पड़ेगा।”

14 जीवन परिचय-

नाम: क्रिस्टुदास, समाजसेवक

जन्म: 1937

निधन: 28 जुलाई 2011

शुरुआत: नवंबर 1981 में नेपाल की सीमा से सटे रक्सौल में अस्पताल की शुरुआत की।

उपलब्धि: उनके 30 साल के प्रयासों की बदौलत ही बिहार में 50 साल से ज्यादा उम्र का कोई कुष्ठ रोगी नहीं है। देश के अन्य राज्य व नेपाल के मरीजों को भी मुख्यधारा में ले आए।

ज़िंद: - इन्होंने ज़िद की थी कि कुष्ठ रोग का नामोनिशान मिटाना है…… यही ठानकर बिहार के रक्सौल गए थे। वहां 30 साल में 60 हजार रोगियों को नई जिंदगी दी।

कुष्ठ रोगियों का इलाज करते करते खुद इस बीमारी का शिकार हो गए। तब मदर टेरेसा ने कोलकात्ता स्थित आश्रम में रखा, लेकिन ठीक होते ही फिर दूसरों के रोग दूर करने निकल पड़े। ये जज्बा था क्रिस्टुदास का, जिन्हें लोग क्रिस्टुबाबा नाम से भी जानते हैं। पहले वे टीटागढ़ (कोलकात्ता) स्थित मदर टेेरेसा लेप्रोसी सेंटर के डायरेक्टर थे। वे हमेशा कहते थे कि मैं मरीजों के यहां आने का इंतजार नहीं करना चाहता, यह बीमारी मिटाने मुझे खुद मरीजों तक जाना होगा। इसी इरादे से वे बिहार के रक्सौल के निकट सुदंरपुर चल दिए। मगर परिस्थतियां उनके पक्ष में नहीं थीं। ना उनके पास संसाधन थे, ना मरीजों का विश्वास। कुछ समय बाद मुजफ्फरपुर के एक दोस्त ने 2 हजार रुपयों की मदद की और दास ने मिट्‌टी की झोपड़ी में छोटे से फूल के नाम से अस्पताल शुरू कर दिया। आज झोपड़ी की जगह बड़ा अस्पताल है, जहां क्रिस्टुबाबा ने 60 हजार से ज्यादा लोगों को कुष्ठ से मुक्तकर मुख्यधारा में आने का हौसला दिया हैं।

किसी को तो कुष्ठ रोगियों का इलाज और उनकी देखभाल करनी ही थी, तो क्यों न यह काम मैं ही करूं।”

15 जीवन परिचय-

नाम: माइकन जैक्सन, पॉप स्टार

जन्म: 29 अगस्त 1958

निधन: 25 जून 2009

शुरुआत: पांच साल की उम्र में पेशेवर बैंड में शामिल हुए।

संपत्ति: निधन तक संपत्ति 4 हजार करोड़ रु. थी। मरने के बाद भी उनके नाम पर हुई 13 हजार करोड़ की कमाई।

उपलब्धि: दुनिया छोड़ी तब तक 13 ग्रैमी, 26 अमेरिकन म्यूजिक अवॉड्‌र्स और 23 गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड अपने नाम कर चुके थे।

ज़िंद: - जिद़ थी कि पिता के संघर्ष की कीमत चुकानी है। इसलिए ड्रमर बनकर शुरुआत करने वाले पांच साल के माइकल 14 की उम्र में बिलबोर्ड पर छा गए।

इंडियाना के जोसेफ जैक्सन ने बच्चों की परवरिश के लिए संगीत छोड़ क्रैन चला शुरू किया। मगर ये संकल्प भी लिया कि बच्चे संगीत में ही नाम कमाएंगे। ’किंग ऑफ पॉप’ माइकल जैक्सन उन्हीं के 10 बच्चों में से एक थे। 60 के दशक की शुरुआत में ही जोसेफ अपने बड़े बेटों को म्यूजिक परफॉर्मर बना चुके थे। 1963 में पांच साल के माइकल ड्रमर के तौर पर ’जैक्सन’ ग्रुप में शामिल हो गए। वे भी पिता के संघर्ष को समझने लगे और इसकी कीमत चुकाने की ठान चुके थे, इसलिए मशहूर परफॉमर्स ग्लेडी नाइट्‌स व जेम्स ब्राउन के साथ लॉस एंजिलिस चले गए। यहीं 13 साल की उम्र में माइकल ने अपना पहला सोलो एलबम जारी कर दिया। हालांकि उन्हें हर देश, हर तबके के बीच हीरो बनाया 11 साल बाद आए ’थ्रिलर’ ने। यह 122 हफ्ते रिकॉर्ड चार्ट ’बिलबोर्ड-200’ में शामिल रहा। अश्वेत होकर भी स्टार बनने वाले माइकल ने अब रंग-रूप बदलने के लिए प्लास्टिक सर्जरी और ब्लिचिंग का सहारा लेना शुरू कर दिया था। 21 साल की उम्र में चेहरे की पहली सर्जरी करवाई थी। फिर जैसे-जैसे वे ऊंचाइयां छूते चले गए, नाक व होंठो का स्वरूप और त्वचा का रंग भी बदलता चला गया।

दुनिया की सबसे बड़ी शिक्षा मास्टर को तब देखने से मिलती है, जब वह खुद उस काम को कर रहा हो।”

16 जीवन परिचय-

नाम: लैरी पेज और सर्गेई बिन, गूगल के संस्थापक

जन्म: लैरी पेज का 26.3. 1973, सर्गेई बिन का 21.8. 1973

शुरुआत: 25 वर्ष की उम्र में दोनों ने मिलकर गूगल सर्च इंजन बनाया था।

टर्नओवर: 4290 रब रुपए (2014 - 15)

मार्केट कैपिटल: 310 खरब रुपए

नेट प्रॉफिट: 938 अरब

उपलब्धि: गूगल वर्ष 2010 के बाद से हर हफ्ते एक से ज्यादा कंपनी खरीद रही है। वह अब तक 180 से ज्यादा कंपनियां अधिग्रहित कर चुकी है।

ज़िंद: - इन दोनों ने ज़िंद की थी कि दुनियां को गूगल जैसा बेमिसाल सर्च इंजन देना है, जो लोगों की जिंदगी को आसान बनाने का जरिया बने।

जब लैरी 12 साल के थे तभी ठान लिया था कि एक कंपनी की स्थापना करेंगे। पढ़ाई के दौरान उनकी मुलाकात सर्गेई ब्रिन से हुई। स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी में पीएचडी करते हुए ही दोनों ने एक सर्च इंजन बनाया। सर्च इंजन पहले भी मौजूद थे, लेकिन गूगल के पीछे दोनों की सोच थी कि क्यो न ऐसा सर्च इंजन बने, जिसमें पहले पेज पर ही काम के नतीजे मिल जाएं। शुरुआत की अपने एक दोस्त के गैरेज में दो कम्प्यूटरों के साथ। उन्होंने सर्च इंजन बना तो लिया लेकिन इसके कारण पढ़ाई प्रभावित हो रही थी। पूंजी की समस्या थी ही। वे अपने इस क्रांतिकारी विचार को बेकार नहीं जाने देना चाहते थे। इसलिए उन्होंने इसे बेचना चाहा, पर खरीददार नहीं मिला। आखिरकार दोनों ने खुद ही गूगल की स्थापना की। इसमें उन्हें माइक्रोसिस्टम्स के सह-संस्थापक एंडी बेक्टोलशीन ने एक लाख डॉलर देकर मदद की और 4 सिंबर 1998 को ’गूगल इंक’ शुरू हो सकी। उनकी यह कंपनी दुनिया की सबसे उपयोगी कंपनी साबित हुई। दोनों मिलकर अब भी अपनी सीक्रेट लैब में लोगों की ज़िंदगी आसान करने वाले नए आविष्कार करने के प्रयासों में लगे हैं। पेज ने स्टैनफोर्ड के एक टीचर से कहा था कि वे पूरा इंटरनेट डाउनलोड करना चाहते हैं। तब टीचर ने उन्हें पागल समझा था, लेकिन आज उनका यह सपना काफी हद तक सच नजर आता है।

आपको किसी सपने को पूरा करने के लिए 100 लोगों की कंपनी की जरूरत नहीं होती है।” लैरी पेज

17 जीवन परिचय-

नाम: ब्रूस ली, मार्शल आर्टिस्ट

जन्म: 27 नवंबर 1940

निधन: 20 जुलाई 1973

शुरुआत: 1967 में पहली हॉलीवुड फिल्म की

उपलब्धि: मार्शल आर्टिस्ट, इंस्ट्रक्टर, एक्टर, डायरेक्टर, स्क्रीन राइटर व प्रोड्‌यूसा के रूप में पहचान पाई।

ज़िंद: - फिल्म स्टार नहीं, मार्शआर्टिस्ट के रूप में पहचान पानी है। चाइल्ड आर्टिस्ट के तौर 20 फिमें करने वाले ली ने इसी ज़िंद में मार्शलआट्‌र्स चुना और इसे दुनिया के आखिरी आदमी तक पहुंचा दिया।

ओपेरा स्टार होई च्वेन के चौथे बेटे बूस ली के लिए स्टार बनना चुनौती नहीं था। मगर ली में प्रसिद्धि पाने से ज्यादा ज़िद जीतने की थी। उन लड़ाइयों में वे राह चलते लड़ा करते थे। 3 माह की उम्र से फिल्मों में नजर आने वाले ली ने मार्शलआट्‌र्स की राह चुनी। 12 साल की उम्र में तो वे पारंपरिक चीनी परिधान पहन सड़कों पर घूमते थे, ताकि लोग उन्हें शांत स्वभाव का समझकर छेड़े या ताने कसें। ली को इसी मौके की तलाश रहती और वे ताने कसने वालों को लड़ने की चुनौती दे देते। मगर राह चलते लड़ने की उनकी आदत के कारण पुलिस घर तक पहुंचने लगी। तब पिता ने उन्हें अमेरिका भेजने का फैसला कर लिया। 19 साल की उम्र में सिएटल में कूंग-फू सीखने लगे। 1964 में वे लांग बीच इंटरनेशनल कराते चैत्पियनशिप में उतरे। यहां ’टू फिंगर पुश अप्स’ तथा ’वन इंच पंच’ कला का प्रदर्शन दिखाकर उन्होंने हॉलीवुड डायरेक्टर्स की नजरों में भी जगह बना ली। इस तरह 32 वर्ष की उम्र में दुनिया छोड़कर भी वे मार्शलआट्‌र्स को दुनियाभर के आखिरी इंसान तक पहुंचा गए।

मैं उससे नहीं डरता जिसने 1000 तरह की किक्स सीखी हों, लेकिन उससे सतर्क रहता हूं, जिसने एक किक की हजार बार प्रैक्टिस की हो।”

18 जीवन परिचय-

नाम: उसैन बोल्ट, दुनिया के सबसे तेज इंसान

जन्म: 21 अगस्त 1986

शुरुआत: 2002 में वर्ल्ड जुनियर चैम्पियनशिप जीतकर 16 साल के बोल्ट विश्वपटल पर आए।

संपत्ति: वर्तमान में उनकी कुल संपत्ति 200 करोड़ रु. के करीब है।

उपलब्धि: ऑलिपिक्स 2008 में उन्होंने 100 मी. दौड़ 9.69 सेकंड तथा 200 मी. दौड़ 19.30 सेकंड में पूरी कर वर्ल्ड रिकॉर्ड बनाया अब तक कुल 8 कीर्तिमान बनाए।

ज़िंद: - इन्होंने ज़िद की थी कि मानवीय क्षमताओं को भी पीछे छोड़ देना है। इसलिए ट्रैक पर दूसरों के ही नहीं अपने ही कीर्तिमान तोड़े।

एथलेटिक्स के प्रति बोल्ट 15 साल की उम्र तक गंभीर नहीं थे। कैरेबियाई देशों की एक प्रतियोगिता के फाइनल के समय तो वे गायब ही हो गए। तब पुलिस ने उन्हें एक वैन के पीछे से तलाशा और हिरासत में ले लिया। खैर विवाद थम गया और बोल्ट को प्रतियोगिता में शामिल होने दिया। जमैका के इस धावक ने यहां 200 और 400 मीटर स्पर्धा में रिकॉर्ड बना डाला। अब वे न सिर्फ गंभीर हैं, बल्कि मानवीय क्षमताओं को लांघ चुके हैं। 45.7 किलामीटर प्रति घंटे की रफ्तार से दौड़ने वाले बोल्ट धरती के सबसे तेज इंसान हैं। हालांकि बड़े तो वे क्रिकेटर की पिच बोल्ट की गति कोच को हैरान कर देती है। कोच ने बोल्ट को समझाया और वे पिच छोड़ स्कूली प्रतियोगिताओं के ट्रेक पर दौड़ने लगे। 18 साल की उम्र में उन्होंने ओलिंपिक स्क्वॉड में जगह बना ली।

दौड़ को शुरुआत करने वाले मुझसे बेहतर दुनिया में और भी हैं, लेकिन में अंत को बेहतर बनाने में विश्वास रखता हूं।”

19 जीवन परिचय-

नाम: रतन टाटा, टाटा समूह के पूर्व चेयरमैन

जन्म: 28 दिसंबर 1937

शुरुआत: वर्ष 1962 में वे टाटा समूह से जुड़े।

टर्नओवर: 7000 अरब रुपए

मार्केट कैप: 8710 अरब रुपए

नेट प्रॉफिट: 435 अरब रुपए

उपलब्धि: 1998 में पहली पूर्णत: भारतीय कार बनाई। 2008 में जगुआर व लैंड रोवर को खरीदा। रिटायर होने के बाद करीब 20 स्टार्टअप्स में निवेश कर चुके हैं।

ज़िंद: - इन्होंने ज़िद की थी कि टाटा समूह को अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाएगें, चाहे अपने से बड़ी कंपनियों का अधिग्रहण क्यों न करना पड़े।

बात 1999 की है। रतन टाटा अपने कार कारोबार को अमेरिकी कंपनी फोर्ड को बेचने गए। इस पर फोर्ड के अधिकारियों का कहना था कि वे इस कार डिवीजन को खरीदकर टाटा समूह पर अहसान ही करेंगे। लेकिन वक्त नौ साल में ही बदल गया। टाटा समूह ने 2008 में फोर्ड के प्रमुख ब्रांड जगुआर व लैंड रोवर (जेएलआर) को खरीद लिया। रतन 1962 में टाटा समूह से जुड़े और 1991 में चेयरमैन बने। उन्होंने अपने कार्यकाल में कंपनी में बेकार योजना को पुरस्कृत करना शुरू किया। उनका कहना था कि बेकार योजना कुछ अच्छा करने के लिए प्रेरित करता है। 1961 में अमेरिका से ग्रेजुएशन पूरा करने के बाद रतन वहीं रहकर कॅरिअर बनाना चाहते थे। लेकिन अपनी दादी की सलाह पर उन्होंने पारिवारिक बिजनेस संभाला। आज समूह की कंपनियां 100 देशों में काम कर रही हैं। रतन के नेतृत्व में टाटा समूह ने नई ऊंचाइयों को छुआ। आज समूह करीब 6 लाख लोगों की रोजगार प्रदान कर रहा है।

व्यापार का अर्थ सिर्फ मुनाफा कमाना नहीं बल्कि सामाजिक जिम्मेदारी को भी समझना है। व्यापार में सामाजिक मूल्यों का समावेश भी होना चाहिए।”

20 जीवन परिचय-

नाम: एपीजे अब्दुल कलाम, पूर्व राष्ट्रपति

जन्म: 15 अक्टूबर 1931

निधन: 27 जुलाई 2015

शुरुआत: वर्ष 1960 में डीआरडीओ से बतौर वैज्ञानिक जुड़े।

उपलब्धि: वे भारत के मिसाइल प्रोग्राम से जुड़े, परमाणु परीक्षण में भी सहयोग किया और अंतत: भारत के 11वें राष्ट्रपति बने। उन्हें भारत रत्न से भी सम्मानित किया गया।

ज़िंद: - इनकी ज़िद थी कि सादगी का साथ किसी भी कीमत पर नहीं छोड़गे। और देश के लिए कुछ ऐसा करेंगे जो युवाओं को प्रेरित करें। इन्हीं खूबियों ने उन्हें आम आदमी का राष्ट्रपति बनाया।

कलाम भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान केंद्र से उस दौर में जुड़े थे जब साइकिल पर ले जाए जाते थे। वे उन शुरुआती वैज्ञानिकों में थे, जिन्होंने भारतीय स्पेस प्रोग्राम को ऊंचाइयों देने में अहम योगदान दिया। बचनप भले ही अभावों में बिता, लेकिन उनकी जिद अभावों से मुक्त थी। इसके अलावा उन्हें ज्ञान पाने की ज़िद थी। जिसे उन्होने पूरा किया। बैलिस्टिक मिसाइल के विकास ने उन्हें मिसाइल मैन का नाम दिया। इसके अलावा पोखरण परमाणु परीक्षण में योगदान दिया ऐसी कई उपब्धियों के बाद भी उन्होंने ने सादगी का साथ नहीं छोड़ा। उनकी सादगी रूपी छवि के कारण ही उन्हें आम आदमी का राष्ट्रपति माना गया।

हमारे लिए मुसीबते भी बहुत ज्यादा महत्पूर्ण हाती हैं, क्योंकि इन्हीं के कारण हम सफलता का असली आनंद ले सकते हैं।”

21 जीवन परिचय-

नाम: वॉरेन बफे, हैथवे के सीईओ

जन्म: 30 अगस्त 1930

शुरुआत: 11 साल की उम्र में अपना पहला शेयर खरीद लिया था।

टर्नओवर: 13183 अरब रु. (2014 - 2015)

मार्केट कैप: 12063 अरब रु.

नेट प्रॉफिट: 10.15 अरब रुपए

उपलब्धि: शेयर बाजार की दुनिया के सबसे बड़े और सफल निवेशकों में बफे भी एक हैं। वे दुनिया के दूसरे सबसे अमीर शख्स हैं। 2007 में तो टाइम मैग्जीन ने उन्हें विश्व के 100 सबसे अधिक प्रभावशाली व्यक्तियों की सूची में भी शामिल किया था।

ज़िंद: - इनकी ज़िद थी कि जोखिम लेते हुए ही सफल होना है और एक सफल निवेशक के रूप में दुनियाभर में पहचान बनानी हैं।

जिस उम्र में बच्चे खेलने-कूदने और मनोरंजन की बातें करते थे, उस उम्र में वॉरेज बफे शेयर बाजार के गुर सीख रहे थे। इतना ही नहीं शेयर खरीदकर टीनएज में ही वे अपने शिक्षकों से भी ज्यादा कमाई करने लगे थे। यह सब पैसों कमाने के लिए नहीं था, सिर्फ एक जूनन था। शायद इसलिए उन्हें पैसों से कभी मोह नहीं रहा हैं। वे कहते हैं, ’महंगा निजी विमान रखना मुझे पसंद है और यह मेरी जरूरत भी है, लेकिन आधा दर्जन से ज्यादा घर तो किसी बोझ के समान हैं। असल मे बहुत ज्यादा संपत्ति का मालिक होना, इन संपत्तियों पर स्वामित्व खोने के समान है। वैस भी कुछ भौतिक वस्तुओं ने मेंरे जीवन को खुश रहने लायक बना दिया है, ढेर सारी वस्तुएं ऐसा नहीं कर सकती। वे अपनी दौलत से दुनिया में बदलाव लाना चाहते हैं। इसलिए दुनिया के दूसरे सबसे अमीर शख्स वॉरेन बफे अपने जीवनकाल में 99 फीसदी तक दौलत दान देने की शपथ ले चुके हैं। उनकी वर्तमान संपत्ति करीब 4 हजार अरब रुपए है। 85 वर्षीय बफे कहते हैं, इस शपथ से न मेरी जीवनशैली पर कोई असर पड़ेगा, न ही मेरे बच्चों की परवरिश में। मैं तय कर चुका हूं कि मेरे लिए क्या और कितना जरूरी है। वहीं मेरे बच्चों को उनके निजी उपयोग के लिए पहले ही पर्याप्त मिल चुका है। भविष्य में उन्हें और भी मिलेगा, इतना की वे आरामदायक जीवन जी सकें। बर्कशायर हैथवे के सीईओ के तौर पर उनका वेतन सिर्फ 1 लाख डॉलर ही है।

हमें वह सब करना चाहिए जो हम कर सकते है, लेकिन हमें उन चीजों के लिए पछताना नहीं चाहिए जो हमारे वश में नहीं हैं।”

22 जीवन परिचय-

नाम: सचिन तेंदुलकर, क्रिकेटर

जन्म: 24 अप्रैल 1973

शुरुआत: 1989 में पाकिस्तान के खिलाफ

टेस्ट कॅरिअर: 200 मैच, 15921 रन, 51 शतक, 248 सर्वश्रेष्ठ पारी

वनडे कॅरिअर: 463 मैच, 18426 रन, 49 शतक, 200 सर्वश्रेष्ठ पारी

उपलब्धि: टेस्ट और वनडे क्रिकेट में सर्वाधिक रन बनाने का रिकॉर्ड इनके नाम दर्ज है। अपने क्रिकेट कॅरिअर में इन्होंने 100 शतक बनाए हैं। विश्वकप के मुकाबलों में भी सबसे ज्यादा रन बनाए हैं। 2012 में राज्यसभा का सदस्य मनोनीत किया गया। 2014 में भारत रत्न से नवाजा।

ज़िंद: - इनकी ज़िद थी कि क्रिकेट में नाम कमाना है। गेंदबाज बनने का सपना देखा था, लेकिन पेस फाउंडेशन के कोच डेनिस लिली ने कहा, बैटिंग पर ध्यान लगाओं बस फिर पीछे मुड़कर नहीं देखा।

18 दिसंबर 1989 को गुजरांवाला, पाकिस्तान में सचिन तेंदुलकर ने अपने एकदिवसीय कॅरिअर की शुरुआत की थी। अपने प्रदार्पण मैच में सचिन ने वसीम अकरम, वकार यूनुस जैसे तेज गेंदबाजों का डटकर सामना किया। वकार की एक बाउंसर तेंदुलकर को लगी और उनकी नाक से खून बहने लगा, लेकिन वे घबराए नहीं। उन्होंने प्राथमिक चिकित्सा लेने के बाद पारी जारी रखी। इसके बाद अगले दो दशकों तक सचिन ने दुनिया में हर तरह के मैदानों पर दिग्गज गेंदबाजों को खूब सबक सिखाया। उन्होंने कभी भी पीछे मुड़कर नहीं देखा। उनकी लाजवाब पारियों के बल्ले के बल पर वे क्रिकेट के भगवान कहे जाने लगे। क्रिकेट के प्रति उनकी ज़िद और जुनून का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि वे बचपन में अपने क्रिकिट गियर्स (पैड, ग्लव्स आदि) के साथ ही सोते थे।

व्यक्ति को सफलता प्राप्त करने के लिए बहुत ही केंद्रित होना चाहिए। उसको अपना ध्यान इधर-उधर की चीजों में नहीं भटकाना चाहिए।”

23 जीवन परिचय-

नाम: जैक मा, अलीबाबा के संस्थापक

जन्म: 10 सितंबर, 1964

शुरुआत: 31 वर्ष की उम्र में पहली कंपनी बनाई। 1999 में अलीबाबा की स्थापना की।

टर्नओवर: 726 अरब रुपए (2014 - 15)

मार्केट कैप: 111 खरब रुपए

नेट प्रॉफिट: 243 अरब रुपए

उपलब्धि: वे फोर्ब्स मैगजीन के कवर पर आने वाले चीन के पहले आंत्रप्रेन्चोर हैं। 2009 में उन्हें टाइम मैंगजीन के 100 प्रभावशाली लोगों की सूची में स्थान मिला।

ज़िंद: - इनकी ज़िंद थी कि चीन में इंटरनेट से व्यापार शुरू करेंगे। अपनी ज़िंद को पूरा करने के लिए वेबसाइट चायना यलो पेजेस बनाई जो असफल हो गई, लेकिन इसके बाद उन्होंने हार नहीं मानी और ई-कॉमर्स कंपनी अलीबाबा शुरू की।

जैक मा 13 साल की उम्र में अपने शहर में आने वाले पर्यटकों से अंग्रेजी सीखते थे। चीन में ऐसा काम ही लोग करते हैं। इसी शौक के कारण वे पहले अंग्रेजी शिक्षक बने और फिर एक ट्रांसलेशन कंपनी शुरू की। फिर एक बार वे अमेरिका गए और वहां इंटरनेट देखा। इसमें उन्होंने बीयर सर्च किया तो कोई भी चीनी बीयर नहीं दिखी। उन्हें इंटरनेट पर चीन और उसकी कंपनियों के बारे में भी ज्यादा जानकारी नहीं दिखी। इसी से प्रेरित हो उन्होंने चाइना यलो पेजेस नाम से इंटरनेट कंपनी बनाई जो चीनी कंपनियों के लिए वेबसाइट बनाती थी। लेकिन यह ज्यादा समय तक नहीं चल पाई। हताश जैक फिर नौकरी करने लगे। वे बढ़ते इंटरनेट से कुछ नया करने की ज़िद नहीं छोड़ना चाहते थे। इसलिए कुछ दिनों के बाद नौकरी छोड़ 35 वर्ष की उम्र में ई-कॉमर्स कंपनी अलीबाबा की शुरुआत की। 50 लाख रुपए से शुरू हुई कंपनी का सालाना टर्नओवर 76 हजार करोड़ हो चुका है। जैक मा कंपनी को आम लोगों से जोड़ना चाहते हैं उनकी मंशा कंपनी के नाम में भी झलकती है। जैक सैन फ्रांसिस्को के एक कॉफी हाउस में बैठे थे। उन्होंने अचानक ही वहां की वेट्रेस से पूछा कि वो अलीबाबा और 40 चोर कहानी का उल्लेख कर दिया। इसके बाद उन्होंने रास्ते चलते 30 लोगों से यही सवाल किया जो अलग-अलग देशों से थे। सभी अलीबाबा को पहचान गए। तभी जैक ने तय किया कि कंपनी का नाम अलीबाबा ही होगा, क्योंकि इसे पूरी दुनिया जानती है।

इससे फर्क नहीं पड़ता कि वर्तमान कितना कठिन है, आपके पास हमेशा वो सपना होना चाहिए जो पहले दिन देखा था।”

24 जीवन परिचय-

नाम: डॉ. शरद कुमार दीक्षित, प्लास्टिक सर्जन

जन्म: 13 दिसंबर 1930

निधन: 14 नवंबर 2011

शुरुआत: पहले भारतीय सेना से बतौर डॉक्टर जुड़े और फिर अमेरिका चले गए। वर्ष 1968 में गरीब तबके को मुफ्त प्लास्टिक सर्जरी मुहैया करवाने के लिए ’द इंडिया प्रोजेक्ट’ की शुरुआत की।

उपलब्धि: अपने ’द इंडिया प्रोजेक्ट’ के तहत ढाई नाख से ज्यादा लोगों की मुफ्त प्लास्टिक सर्जरी की। उन्हें वर्ष 2000 में द वीक मैंगजीन ने मैन ऑफ द ईयर की उपाधि दी। उन्हें आठ बार नोबेल शांति पुरुस्कार के लिए नामांकित किया गया।

ज़िंद: - उनकी ज़िद थी कि अपनी तमाम शारीरिक अक्षमताओं के बावजूद प्लास्टिक और कॉस्मेटिक सर्जरी के जरिए उन हजारो-लाखों चेहरों की मुस्कान और खूबसूरती लौटाना है, जिन्हें कुदरत ने कुछ दाग दिए थे। इसके लिए वे कैंसर हार्टअटैक और लकवा जैसी बीमारियों से जूझते रहे। परिवार ने भी उनका साथ छोड़ दिया, लेकिन वे नहीं रुकें। उन्होंने पूरा जीवन और जमापूंजी जरूरतमंदों के मुफ्त इलाज के लिए समर्पित कर दी।

दो हार्ट अटैक्स ने दिल की 80 फीसदी मांसपेशियों को खराब कर दिया, बिना व्हील चेयर के एक कदम भी नहीं चल सकते थे, कैंसर की वजह से बोलने में तकलीफ होती थी, शरीर का दायां हिस्सा लकवाग्रस्त था, लेकिन रोजना अभावग्रस्त बच्चों के 35 से 40 ऑपरेशन करते थे। प्लास्टिक सर्जन डॉ. शरद कुमार संकल्प था कि वे उन तमाम बच्चों को सामान्य बनाएंगे, जो नियति के लिए दागों का दुख झेल रहे थे। उन्होंने भारत में एक अभियान के अंतर्गत करीब 2 लाख 66 हजार प्लास्टिक सर्जरी करवाई। खास बात यह कि उन्होंने 65 हजार सर्जरी खुद अपने हाथ से कीं, वह भी व्हीलचेयर पर बैठे-बैठे। लोगों के चेहरें खूबसूरत बनाने का उनका जुनून था कि वे 10 से 15 मिनिट में सर्जरी निपटा दिया करते थे। इलाज मुफ्त में हो सके इसके लिए वे 6 महीने अमेरिका में रहकर पैसे कमाते थे और फिर भारत आकर सर्जरी मेंं अपना कमाया हुआ पैस खर्च कर देते थे। इसके लिए दुनियाभर से उन्हें सम्मान मिला। फिर भी उन्होंने सादगी का दामन नहीं छोड़ा क्योंकि उनका वह सब पैसा जरूरतमंदो पर लगाना चाहते थे। वर्ष 1978 में वे एक सड़क हादसे का शिकार हो गए, जिसकी वजह से शरीर का दायां भाग लकवाग्रस्त हो गया। इसलिए उन्होंने बांए हाथ से ऑपरेशन करना सीखा। इतनी विपदाओं के बीच परिवार वालों ने भी साथ छोड़ दिया। इन तमाम कठिनाइयों के बाद भी उन्होंने अपना मिशन नहीं छोड़ा।

ईश्वर तो हजारो लिए 24 घंटे काम करते हैं, तो फिर हम क्यों दूसरों के लिए ऐसा नहीं कर सकते? ”

25 जीवन परिचय-

नाम: जेफ बेज़ॉज, अमेजन के संस्थापक

जन्म: 12 जनवरी, 1964

शुरुआत: 30 वर्ष की उम्र में अच्छी खासी सैलरी वाली नौकरी छोड़कर अमेजन कंपनी की शुरुआत की।

टर्नओवर: 5784 अरब रु. (2014 - 15)

मार्केट कैप: 180 खरब रुपए

नेट प्रॉफिट: 15 अरब रुपए (2014)

उपलब्धि: वर्ष 1999 में उन्हें टाइम मैंगजीन ने ’ पर्सन ऑफ द ईयर’ चुना। फोर्ब्स मैगजीन के अनुसार वे दुनिया के चौथे सबसे अमीर व्यक्ति हैं।

ज़िंद: - उनकी ज़िद थी कि एक ऐसी कंपनी बनाना है जो दुनियाभर में ई-कॉमर्स की तस्वीर बदल दे। इससे एक नया ऑनलाइन बाजार खड़ा हो जाए।

जेफ ने जब ऑनलाइन किताबें बेचनी शुरू कीं, तो ऑफिस में एक घंटी लगवाई। जब भी किताब बिकती, घंटी बजाई जाती। एक ही हफ्ते में बिक्री इतनी बढ़ी कि घंटी बजाना बंद करना पड़ा। जेफ को इतनी सफलता की उम्मीद नहीं थी। इससे पहले उन्होंने रेस्त्रां में काम किया, गर्लफ्रेंड के साथ समर कैंप चलाया और कई स्टार्टअप्स का हिस्सा बने। लेकिन इनमें कोई भी काम ऐसा नहीं था, जिसमें दुनिया बदलने का मुद्दा हो। फिर 1994 में उन्हे ंपता चला कि इंटरनेट 2300 फीसदी की गति से बढ़ रहा है। इस ग्रोथ का फायदा उठाने के लिए जेफ ने 20 उत्पादों की सूची बनाई, जिन्हें ऑनलाइन बेच सकें और अंत में तय किया कि वे किताबें बेचेगे। ऐसे अमेंजन शुरू हुई। उनकी सफलता से दुनिया ने जाना कि कम्प्यूटर के सामने बैठ कर भी खरीददारी हो सकती है। उनकी कंपनी अब कमाई के लिए नए कीर्तिमान रच रही है। अमेंजन की सफलता ने ही ई-कॉमर्स से जुड़ी कई कंपनियों को जन्म दिया। इतने के बाद भी जेफ की बदलाव की ज़िद नहीं गई। उन्होंने कई कंपनियों में निवेश किया, कई नए प्रोडक्ट लाए व प्रोडक्ट डिलेवरी में कीर्तिमान स्थापित किए। उन्होंने अपने दादा की सीख पर भी अमल किया जो कहते थे, , ’ दयालु होना होशियार होने से ज्यादा मुश्किल है।’ जेफ ने 2010 में 2.5 मिलियन डॉलर समलैंगिकों के अधिकारों के समर्थन में दान किए और ऐसी घड़ी के निर्माण में 42 मिलियन डॉलर देकर सहयोग किया जो 10 हजार साल तक चलेगी।

आलोचानाओं से डरेंगे तो जीवन में कभी कुछ नया नहीं कर पाएंगे।”

उपसंहार: - इसी तरह दुनिया के हर इंसान को ऐसी अच्छी ज़िंद करके दुनियां के बारे में सोचना चाहिए जिससे पूरे विश्व का अधिक से अधिक विकास हो सके एवं अपने व दूसरों के सपने को पूरा कर सके। इसलिए हर व्यक्ति के मन ऐसी ही अच्छी ही ंजंद कायम होनी चाहिए।

- Published on: March 25, 2016