कांग्रेस (Congress Government Wins in Uttarakhand - Essay in Hindi) [ Current Affairs ]

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प्रस्तावना: - पहले अरुणाचल प्रदेश फिर अब उत्तराखंड में कांग्रेस की सरकार धराशाई होने के बाद कांग्रेस की कलह सतह पर नजर आने लगी है। लगता है एक सौ इकतीस साल (131 वर्ष) पुरानी कांग्रेस इस समय अपने सबसे नाजुक दौर से गुजर रही है। लोकसभा चुनाव में करारी हार के बाद महाराष्ट्र, हरियाणा, दिल्ली सरीखे गढ़ों में लगी सेंध के पार्टी सदमें में लगती है एवं अब तक उबर नहीं पा रही हे। संसद में हंगामें और विरोध की खानापूर्ति को छोड़ दिया जाए तो संगठन के स्तर पर पार्टी अपनी प्रभावी भूमिका नहीं छोड़ पा रही है, जिसके लिए कांग्रेस दशकों से जानी जाती थी।

नेतृत्व: - कांग्रेस नेतृत्व चाहता तो उत्तराखंड का संकट समय रहते सुलझाया जा सकता था। पर इस संकट ने कांग्रेस में संगठन के स्तर पर खामियां पूरी तरह उजागर कर दी हैं। कांग्रेस में जो एक सक्षम नेतृत्व होना चाहिए, उसका संकट अरसे से चल रहा है। लोकसभा चुनाव में हार के बाद पिछले साल बातचीत चलती रही कि राहुल की आखिरकार ताजपोशी कर दी जानी चाहिए। पर उसे टाल दिया गया। नेतृत्व फिर मौन हो गया। फिर ओर राजनीतिक बदलाव होना चाहिए था, वह कहीं दिख नहीं रहा है। अब उत्तरांखड ने मौका दिया है कि पार्टी में जो दो मत है, उसे मिटाए। संगठन में प्रतिनिधि परेशानी में रहते हैं कि वे सोनिया की शरण में जाएं या राहुल के साथ रहें। कुछ लोगों को एक जगह समर्थन मिलता है तो दूसरी जगह उनका विरोध होता है। आपसी साजिशें चलती रहती हैं।

मतभेद: - कांग्रेस में संगठिक मामलाेें में तो पारदर्शिता की सख्त जरूरत है। वहां दाहिना हाथ क्या रहा है, वह बांये हाथ को मालूम ही नहीं लग रहा है। मौजूदा राजनीतिक संकट कांग्रेस के लिए आंखे खोल देने वाला मामला है। देश में कांग्रेस में तकरीबन 150 कांग्रेसी ऐसे हैं, जिन्हें सोनिया गांधी के नेतृत्व में पार्टी में कोई न कोई अच्छा पद हासिल होता रहा है। अब इन लोगों को भय सताता है कि राहुल गांधी के आने से उनकी पद और गरिमा गिर जाएगी। इसलिए वे नेतृव के स्तर पर यथास्थिति बनाए रखना चाहते हैं। दिल्ली में सोनिया के करीबियों की एक ’कोटरी’ है जो कांग्रेस को चलाते रहे हैं। वे नहीं चाहते हैं कि राहुल स्वतंत्र रूप से पार्टी बनाएं और नेतृत्व करें।

जब भी किसी पार्टी में नेता बदलता है तो पुराने नेता के वफादार, सलाहकार चौकड़ी में भारी फेरबदल होता है। कई लोगों पर गाज गिरती है। नेतृत्व में बदलाव आता है। जब प. नेहरू से इंदिरा गांधी को सत्ता मिली तो नेहरू के जमाने के कांग्रेसी हाशिए पर चले गए। यही हाल संजय गांधी और राजीव गांधी का रहा है। हालांकि उनके बीच तो बहुत कम अतंर था लेकिन उनके करीबियों का भी यही हाल हुआ।

विभाजन: - लोकसभा चुनावों में करारी हार के बाद यह संदेश दिया गया था कि कांग्रेस में सांगठनिक बदलाव आएगा, सक्षम और नेतृत्व की दिशा में बढ़ा जाएगा पर अभी तक कोई बदलाव नहीं आया है। राज्यों में भी हार पर हार होती रही है। यानी ढाक के तीन पात ही रहे है अर्थात कांग्रेस का हाल वैसा ही रहा है। आजकल राज्यों में भी पार्टी में विभाजन दिख रहा है। राजस्थान, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ में देख लें, अलग-अलग दो दल बन गए है। ऐसा लग रहा है कि कांग्रेस अपना घर जलाकर ही दिवाली मनाने में लगी है। इसकी गंभीरता नेतृत्व में नहीं दिख रही है।

कमजोर: - सबसे बड़ी कमजोरी पार्टी में यह है कि कथित वफादार नेता आगे आकर विरोधी स्वर में खुली आलोचना भी नहीं कर रहे हैं। दबे-छिपे जरूर कहते हैं कि पार्टी में हालात ठीक नही चल रहे हैं। जिला अध्यक्ष, मेयर से लेकर राज्य में मुख्यमंत्री मात का खेल चलता रहता है। हो सकता है कि सोनिया गांधी की यह राजनीति भी हो कि बंटे रहने से पार्टी में कभी बगावत नहीं होगी पर अभी तो यह नुकसानदेह ही साबित हो रहा है।

संकट: - 1977 में कांग्रेस बुरी तरह परास्त हुई थी और एक बड़ा कांग्रेसी दल इंदिरा गांधी को छोड़कर चला गया था। इसलिए इंदिरा गांधी का पार्टी का पुनर्गठन आसान रहा है। 1980 में वे फिर से लौट आई। उनकी ’सुप्रीमेसी’ पार्टी रही। जब राजीव गांधी ने कमान संभाली तो पार्टी उन्हीं के नेतृत्व में थी। फिर सोनिया गांधी का नेतृत्व शुरू हुआ। राहुल का जब कद बढ़ तो यह मांग उठने लगी कि अब कमान राहुल को सौंप दी जाए। वे उपाध्यक्ष बनाए गए। फिर यह लगा कि थोड़े समय के संक्रमण काल के बाद राहुल को ही नेतृत्व दे दिया जाएगा। पर राहुल के करीबियों और सोनिया की ’कोटरी’ में रस्साकशी बढ़ती चली गई। इसके चलते अभी तक नेतृत्व स्पष्ट नहीे हो पाया और अब पार्टी में नेतृत्व के संक्रमण काल से अधिक नेतृत्व का संकट अधिक बड़ा गया है।

चुनौती: -निम्न हैं-

  • भंवर में फंसी पार्टी- लोकसभा चुनाव के बाद से कांग्रेस महाराष्ट्र, हरियाणा, झारखंड और जम्मू-कश्मीर में सत्ता गंवा चुकी है। अरुणाचल और उत्तराखंड की आपसी कलह ने इन राज्यों से भी विदाई करा दी। असम और केरल में होने जा रहे विधानसभा चुनाव में सरकार को बचाने की चुनौती सामने है। ताजा सर्वे के अनुसार इन दोनों राज्यों में भी कांग्रेस की नैया भंवर में फंसी है।
  • गिरता ग्राफ (चार्ट) - 1952 के पहले लोकसभा चुनाव के बाद से 2014 के चुनाव में कांग्रेस का प्रदर्शन सबसे कमजोर रहा हे। कांग्रेस की सींटे दो अंको तक सिमट गई और वोट प्रतिशत 20 फीसदी से नीचे आ गिरा। 2014 में कांग्रेस को 44 सीटें और 19.39 फीसदी वोट से संतोष करना पड़ा। 1984 के लोकसभा चुनाव का एक दौर वह भी था जब पार्टी को 415 सींटे मिली थी।
  • जनाधार विहीन नेता- विश्लेषकों का मानना है कि पार्टी पर ऐसे नेताओं का कब्जा है जो जनता से पूरी तरह कटे हुए हैं। सोनिया और राहुल को छोड़ें दे तो कांग्रेस कार्यसमिति में अधिकांश चेहरे राज्यसभा के हैं। मनमोहन सिंह, जर्नादन दव्वेदी, अहमद पटेल, गुलाम नबी आजाद, अंबिका सोनी, दिग्विजय सिंह अहम फेसले तो लेते हैं पर मतों पर पकड़ नहीं हैं।
  • पुरानी कार्यशैली हावी- कार्यस्तर पर कांग्रेस की पुरानी मानसिकता भी नहीं बदली है। आज भी यहां दूरदराज से कार्यकर्ता या प्रतिनिधि सोनिया या राहुल से मिलने आते हैं तो उन्हें समय ही नहीं मिलता है कई दिनों तक वे भटकते रहते हैं। दिल्ली में सोनिया बनाम राहुल गुटबाजी जमकर हो रही हे। अपने-अपने हितों का ही आगे बढ़ाया जा रहा है।

आश्वस्त: - सामान्यतया कांग्रेस में जब भी नेतृत्व बदला तो कांग्रेसजन में उस बदलाव के प्रति हमेंशा उत्साह दिखा। सोनिया गांधी के प्रधानमंत्री पर ठुकरा देने के बाद कांग्रेसजन राहुल गांधी के प्रति उत्साहित था। पर राहुल कार्यकर्ताओं की उम्मीदों पर खरे नहीं उतरे। उन्होंने खुद को कांग्रेसी चलने के विपरीत गैर परंपरागत राजनेता बनाया पर विफल रहे। उनके उलट संजय गांधी, राजीव गांधी कार्यकर्ताओं से जुड़े रहते थे लेकिन राहुल कार्यकर्ताओं से खुद कटे रहते हैं। अब हाल यह हैं कि कांग्रेसजन उनके प्रति आज तक आश्वस्त नहीं हो पाए हैं। खास बात यह भी रही कि राहुल जब उभरे तो पार्टी सत्ता में रही। उन्हें पहली बार विपक्ष का अहसास हो रहा है।

गंभीर: - 2004 में जब सोनिया गांधी ने स्वेच्छा से प्रधानमंत्री पद पर अस्वीकार कर दिया। तभी यह स्पष्ट हो गया था कि आगामी चुनावों में राहुल अगला चेहरा होगे पर वे पहले तो नेतृत्व की जिम्मेदारी से बचते रहे। चूंकि अब भारत में आम चुनाव अमरीका की तरह दो उम्मीदवारों के बीच होने लगा है। 2014 में मोदी के सामने राहुल कहीं नहीं ठहरे। अब 2019 में पार्टी के समक्ष फिर सवाल होगा कि मोदी के सामने कौन होगा? यह तो स्पष्ट है कि सोनिया तो होगी नहीं। यानी राहुल ही अगला चेहरा होंगे पर उनकी क्षमताओं से पार्टी वाकिफ है। फिर क्या रास्ता होगा? राजीव गांधी भी 37 साल के प्रधानमंत्री बने तो उन्होंने खुद को कमजोर नहीं साबित होने दिया। पर राहुल तो खुद को गंभीर राजनेता ही नहीं बना पाए।

राजनीति: - राहुल गांधी नई पीढ़ी को आगे लाने की बात करते हैं, ऐसे में कांग्रेस के बुर्जुग नेताओं में असुरक्षा का भाव जरूर है। लेकिन कांग्रेस की हालत ऐसी है कि उसके पास सोनिया या राहुल के अलावा अन्य कोई नेता नहीं है। ऐसा नेता जिस पर अधिकतर पार्टी नेता एकमत हों और जो पार्टी की नैया पार लगा सके। ऐसे में राहुल गांधी ही पार्टी की जरूरत हैं। जहां तक उनकी क्षमता का सवाल है तो विधानसभा चुनावों में पार्टी का प्रदर्शन इसका जवाब दे ही देता है। दूसरी बात यह कि राजनीतिक कोई आधा समय काम तो हैं नहीं कि कोई कुछ महीने अलग हो जाए और फिर नेतृत्व संभाले। इसके लिए सभी में विश्वास जगाने और एकजुट करने की क्षमता होना जरूरी हैं।

चुनाव: - मई 2014 में हुए लोकसभा चुनाव के बाद से ही कांग्रेस की हालत खराब होना शुरू हुई और इसका असर बहुत से राज्यों के विधानसभा चुनाव में देखने को मिला। इन विधानसभा चुनावों में उसने न केवल अपनी सत्ता गंवाई बल्कि कहीं-कहीं तो वह तीसरे नंबर पर भी चली गई सवाल यह है कि जिन राज्यों में कांग्रेस ने सत्ता गंवाई और वह काफी पिछड़ गई क्या उनमें उसका कामकाज वाकई बहुत खराब रहा? हकीकत में ऐसा नहीं था। ऐसा लोकसभा चुनाव में बुरी तरह हार के असर से ऐसा हुआ।

असर: - लोकसभा चुनाव के बाद उम्मीद थी कि कांग्रेस मजबूत विपक्ष की भूमिका निभाएगी लेकिन शुरुआती महीनों की बात तो छोड़िए वह साल नहीं ढेढ़-पौने दो साल बाद भी इस मामले में असहाय नजर आई। वह हार के सदमें से बाहर ही नहीं आ सकी। संसद में ऐसे कई मुद्दे थे, जिन पर उम्मीद थी कि कांग्रेस मजबूती के सरकार के विरोध में खड़ी होगी लेकिन ऐसा नहीं हो सका। ऐसा लगता है कि पार्टी अंदरूनी तौर पर इतना अधिक टूट चुकी है कि उसकी ओर से सुधार के प्रयास ही नहीं हो पा रहे है। यह सही है कि केंद्र में मनमोहन सिंह की सरकार के दस सालों के कामकाज को लेकर आमजन में बहुत नाराजगी थी और इसका परिणाम हमने लोकप्रिय चुनाव में देखा भी लेकिन दिल्ली की शीला दीक्षित की सरकार ने इतना खराब काम नहीं किया था, जिसका खामियाजा उसे विधानसभा चुनाव में भुगतना पड़ा।

राज्यों में हार: - दिल्ली की सरकार और केंद्र सरकार एक ही स्थान से संचालित होती है इसलिए लोकसभा चुनाव का दिल्ली के विधानसभा चुनाव पर असर तो दिखना ही था। लेकिन, दिल्ली से जो राज्य अधिक दूरी पर थे और जिन राज्यों में कांग्रेस थी, वहां उसका प्रदर्शन अपेक्षाकृत बेहतर रहा। केरल और कर्नाटक में उसने बेहतर प्रदर्शन किया। अब सवाल यह कि हरियाणा, जम्मू-कश्मीर, झारखंड और महारष्ट्र में उसे क्या हुआ? वास्तव में वहां कांग्रेस की हार का सबसे बड़ा कारण लोकसभा चुनाव में बड़ी हार का सदमा ही है। इस बात को समझिए कि जब किसी पार्टी की साख गिरती है तो उन मतदाताओं पर बड़ा असर पड़ता है जो साख के आधार पर मत देते हैं हालांकि ऐसे मतदाताओं की संख्या दो से पांच फीसदी ही होती है लेकिन जब यह लगने लगता है कि पार्टी तो हारेगी ही । वह अगले दस साल में भी जीत नहीं सकती तो ये मतदाता अन्य दलों की ओर खिसकने लगते हैं। ऐसी परिस्थिति का कुछ प्रभाव नियमित पार्टी मतदाताओं पर भी पड़ता हे। जब नियमित पार्टी मतदाताओं का असर दिखाई देने लगता है तो पार्टी के छोटे नेताओं को भी लगता है अब पार्टी में दमखम नहीं रह गया। फिर वे पार्टी से बाहर निकलने लगते हें। आम मतदाताओं के बीच कांग्रेस के प्रति नाराजगी लोकसभा चुनाव से पहले ही दिखने लगती थी। तो याद होगा कि बहुत से नेताओं ने चुनाव लड़ने से मना कर दिया था। जब किसी पार्टी के जीतने की संभावना होती है तो उसमें शामिल होने के लिए अन्य दलों के नेता अपनी-अपनी पार्टी छोड़ने शुरू कर देते हैं। लोकसभा चुनाव से पहले कांग्रेस के नेताओं के साथ ऐसा ही देखने को मिला। शायद ही कोई उस समय कांग्रेस में शामिल हो रहा था।

भरोसा: - कांग्रेस में अंदरूनी कलह की बात फिलहाल तो नहीं है। कभी-कभी ऐसा होता है कि राज्य में सत्तारूढ़ पार्टी के विधायक सोचने लगें कि भविष्य में वे पार्टी में रहते हुए चुनाव नहीं जीत सकती तो वे पार्टी बदलने या छोड़ने लगते हैं।

अरुणाचल और उत्तराखंड की कांग्रेस में निराशा है। इसलिए विधायक खिसकने लगे हैं। आरोप-प्रत्यरोपों का दौर है जिसे अंदरूनी कलह का नाम दिया जा रहा हैं असम, पं. बंगाल में चुनाव होने हैं पर वहां भी कांग्रेसी कार्यकर्ताओं और नेताओं में उत्साह नहीं है। जब नेताओं में ही जीत का भरोसा न हो वहां पार्टी कैसे चुनाव जीत सकती है?

उपसंहार: - पूरे विवरण से यह तो स्पष्ट है कि कांग्रेस के अदंर सब नेताओं के अपने-अपने मतभेद है। पर अगर कांग्रेस को एक मजबूत पार्टी फिर से बनानी है तो उसमें सबसे पहले एक दूसरे के ऊपर भरोसा होना बहुत आवश्यक है अर्थात एकमत होना बहुत जरूरी है। तभी वह मतभेदों से निकलकर जनता के विकास के बारे मे विचार कर पायेगी। अब कांग्रेस पार्टी का आगे क्या होता है? यह तो आने वाला समय ही बताएगा।

- Published on: April 19, 2016