आर्थिक चुनौती (Economic Upheavals - Essay in Hindi) [ Current Affairs ]

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प्रस्तावना: - बातों ही बातों में निकल गए पौने दो साल लेकिन अब केंद्र सरकार के लिए कुछ करके दिखाने का समय है। नए वित्त वर्ष के लिए अगले महीने के अंत में जब नया बजट पेश किया जाएगा तो उस पर सातवें वेतन आयोग की सिफारिशों की छाया होगी। बढ़ते हुए खर्च के मद्देनजर जरूरी है कि सरकार की आमदनी भी बढ़े। लेकिन, सरकार ऐसा करेगी कैसे? सरकार के सामने चुनौती है कि वह वायदे के मुताबिक आर्थिक विकास को गति कैसे दें। वे रोजगार कैसे सृजित करे? वे विनिर्माण और अधारभूत सुविधाओं के क्षेत्र में निवेश को बढ़ावा देने के लिए क्या योजनाएं लाएंगे?

बजट: - बीते साल अपना बजट पेश करते हुए वित्तमंत्री ने कहा था कि 2015 - 16 में राजकोषीय घाटा जीडीपी का 3.9 प्रतिशत रहेगा लेकिन आगे आने वाले सालों में उसे और घटाया जाएगा और 2016 - 17 में इसे 3.5 प्रतिशत तक लाया जाएगा। गौरतलब है कि देश में महंगाई पर काबू पाने के लिए यह जरूरी माना जाता है कि राजकोषीय घाटे को सीमित रखा जाए। ध्यान रखना होगा कि फिस्कल रेसपॉन्सिलिटी एंड बजट मैनेजमेंट एक्ट (एफआरबीएम) के तहत सरकार को राजकोषीय घाटे को 2.5 प्रतिशत तक लाना था लेकिन दुनियाभर में आई आर्थिक मंदी के मद्देनजर इस लक्ष्य को टाल दिया गया था।

वेतन आयोग: - पिछले साल बजट पेश करते हुए वित्तमंत्री ने सातवें वेतन आयोग की अपेक्षित सिफारिशों के मद्देनजर बजट में भी प्रावधान किया था। लेकिन, अब आने वाले साल में भी सातवें वेतन आयोग की सिफारिशों की छाया बजट पर जरूर दिखाई देगी। यहां यह बात उल्लेखनीय है कि सरकार के कुल बजट का खासा बड़ा हिस्सा वेतन और पेंशन में ही चला जाता है और वेतन और पेंशन (खासतौर पर एक रैंक एक पेंशन के नियम होने के बाद) में कम से कम 20 से 25 प्रतिशत की वृद्धि अपेक्षित है। इस परिस्थिति में यह बात तो जाहिर ही है, सरकारी खर्च भी उसी अनुपात में बढ़ने वाला है। खर्च बढ़ाने के लिए जरूरी होता है कि आमदनी भी बढ़े।

कर: - यूं तो हर साल सरकार की करों से आमदनी बढ़ती ही है। लेकिन इस बार सरकार की चिंता यह है कि आने वाले वर्ष में यह वृद्धि उम्मीद के मुकाबले कम ही रहेगी। इसका कारण यह माना जा रहा है कि भले ही वास्तविक सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में ठीक-ठाक वृद्धि की जाए लेकिन मौद्रिक जीडीपी में वृद्धि पहले के मुकाबले कम ही रहने वाली है। यह किसी गलत कारण से नहीं हो रहा है। सच्चाई यह है कि थोक मुद्रास्फीति घट कर पिछले 11 महीनों में शून्य प्रतिशत या उससे कम रही है। ऐसे में वस्तु बाजार में मंदी का असर कर आय पर पड़ने वाला है।

मुद्रास्फीति: - हालांकि सरकारी हलकों में अब भी यह भ्रम बना हुआ है कि देश में मुद्रास्फीति है या नहीं है। मुख्य आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रमण्यम्‌ ने पिछले साल यह कहा था कि मुद्रास्फीति नापने का एक तरीका यानी ’जीडीपी मंदी है, इसके अनुसार देश में मुद्रास्फीति नहीं है बल्कि मंदी की स्थिति है। अब वित्त मंत्रालय के हवाले से भी इस आशय के संकेत आ रहे हैं कि वस्तु बाजार में मंदी के चलते सरकारी राजस्व प्रभावित हो सकता है।

संभावना: - यह सही है कि वस्तु बाजार में मंदी के चलते सरकार का राजस्व खासतौर पर उत्पाद एवं सीमा शुल्क प्रभावित हो सकता है। लेकिन, इसके साथ ही साथ सरकार को पेट्रोल पदार्थों से उत्पाद शुल्क में खासी वृद्धि मिलने की संभावना हैं गौरतलब है कि वर्ष 2015 - 16 में कच्चे तेल की अंतराष्ट्रीय कीमत में भारी गिरावट दर्ज हुई और तेल की कीमतें पिछले सालों की तुलना में एक तिहाई रह गई है इस दौरान तेल की कीमतों में कमी का लाभ जनता को नही दिया गया और सरकार ने मौके का लाभ उठाते हुए उत्पाद शुल्क में भारी वृद्धि कर दी। इसका असर यह हुआ कि 2014 - 15 में जहां पेट्रोलियम उत्पाद शुल्क से केंन्द्र सरकार को मात्र 78, 545 करोड़ रुपए ही प्राप्त हुए थे, वर्ष 2015 - 16 में यह बढ़कर लगभग 1.5 लाख करोड़ रुपए प्राप्त होने वाले हैं।

जीडीपी के प्रतिशत के रूप में जहां 2014’15 में केंन्द्र सरकार को पेट्रोलियम पदार्थों के उत्पाद शुल्क से जीडीपी के 0.8 प्रतिशत ही प्राप्त हुए थे, वहीं इसके मुकाबले 2015 - 16 में यह राशि जीडीपी के 1.4 प्रतिशत तक पहुंचने वाली है। यही नहीं एक महत्वपूर्ण बात यह भी है कि राज्य सरकारों को वैट के रूप में पहले से कम प्राप्ति होने वाली है। पेट्रोलियम पदार्थों की कीमतें घटने के कारण अब केंद्र सरकार और तेल कंपनियों को पहले से कहीं कम सब्सिडी का भार सहना पड़ेगा। एक तरफ राजस्व आय में वृद्धि, दूसरी ओर सब्सिडी बिल में कमी केंद्र सरकार को राहत देने वाले हैं। अब जरूरत इस बात की है कि राजस्व में इस राहत का लाभ सरकार देश में अन्य प्रकार के पूंजीगत खर्च बढ़ाने में लगाए।

लक्ष्य: - पिछले कुछ समय से देश आर्थिक धीमेपन की गिरफ्त में रहा है। जीडीपी विकास में कमी का यदि अंदाज लें तो देखते हैं कि विनिर्माण, आधारभूत सुविधाओं, और कृषि सभी ़क्षेत्रों में निवेश कम हुआ है। देश में विनिर्माण बढ़ाने के लिए सरकार ’मेक इन इंडिया’ का नारा दे रही है लेकिन सरकार विनिर्माण में निवेश को बढ़ावा देने के लिए करों में छूट और खुद विनिर्माण को बढ़ावा नहीं देती तो ग्रोथ में खास वृद्धि की अपेक्षा नहीं की जा सकती। सरकार खुद ही सारा आधारभूत सुविधाएं तैयार नहीं कर सकती लेकिन सरकार की भागीदारी के बिना भी यह संभव नहीं है। हवाईअड्डा हो, जलपोत हों, मेट्रों हों या कोई अन्य आधारभूत सुविधाएं, सरकार की भागीदारी के बिना आगे नहीं बढ़ पाते। ऐसे में बजट 2016 - 17 पर निगाहें हैं कि किस प्रकार से वित्तमंत्री देश में पूंजीगत खर्च बढ़ांएगे और अगले साल 10 प्रतिशत विकास लक्ष्य प्राप्त किया जा सकेगा।

आकार: - वित्तमंत्री, देश में आर्थिक विकास को अपने वायदे के मद्देनजर दबाव में हैं कि कैसे भी हो सरकार द्वारा पूंजीगत व्यय बढ़ना ही चाहिए। पिछले कुछ समय घरेलू निवेश में कमी आई है जिसका एक बड़ा कारण सरकार द्वारा पूंजीगत व्यय में कमी है। ऐसे में सरकार को सार्वजनिक निवेश बढ़ाना चाहिए जैसे सड़क रेलवें आदि क्षेत्रों में निवेश बढ़ाने की कोशिश में है लेकिन सार्वजनिक निवेश बिना यह आगे नहीं बढ़ सकता है। ऐसा सरकार भी मानती है। पिछले सालों वित्त आयोग की सिफारिशों, खासतौर पर केंद्रीय करों में राज्यों का हिस्सा बढ़ जाने के कारण 2015 - 16 का केंद्र सरकार का बजट उससे पिछले साल की तुलना में कम रह गया था। ऐसा पिछले सालों में कभी नहीं हुआ था। इसके लिए कुल बजट आकार में कम से कम 10 से 15 प्रतिशत वृद्धि करनी होगी। यानी पिछले साल के बजट आकार 17.8 लाख करोड़ को लगभग 20 लाख करोड़ तक ले जाना होगा।

सुधार: - मौजुदा आर्थिक परिदृश्य में सबसे अहम जरूरत है कि बजट में आर्थिक सुधारों जोर दिया जाए। मोदी सरकार अपने कार्यकाल के पहले डेढ़ साल में सियासी प्रतिबद्धताओं के कारण आर्थिक सुधारों के मोंर्चे पर आगे नहीं बढ़ सकी है। अगर हमें डबल डिजिट ग्रोथ हासिल करनी है तो सरकार को दूसरे पीढ़ी के सरंचानात्मक सुधारों (मसलन वित्त क्षेत्र में पूंजी प्रवाह की अड़चने, घाटे वाले पीएसयू का विनिवेश, इंफ्रास्ट्रक्चर सेक्टर को पुनर्जीवन, सब्सिडी बिल पर सरकारी खर्च में सुधार करके नकदी हस्तांतरण लागू करना और राजकोषीय सुदृढ़ीकरण को निरंतर रखना) को लागू करना और आगामी बजट में इस बाबत स्पष्ट संकेत देना होगा। दोहरे अंको की विशाल कामकाजी आबादी के लिए रोजगार पैदा करने के साथ ही मंहगाई पर लगाम कसना मुमकिन नहीं है। विकास और नौकरी दो ऐसे पैमाने थे जिन पर देश ने मोदी के वादों पर विश्वास किया। पहले दो बजटों में पुरानी सरकार की लकीर ही पीटी गई लिहाजा अब समय आ गया है कि सरकार आर्थिक सुधारों वाला सपना बजट पेश करके अपने वादे पूरे करें।

अर्थव्यवस्था की कई चुनौतियों में से तीन क्षेत्रों पर तत्काल ध्यान देने की जरूरत है। यह तीन क्षेत्र है व्यापार, वित्त और ऊर्जा । आज अमरीका और यूरोप के परिपक्व होते बाजारों में निर्यात की बहुत गुंजाइश नहीं रह गई हैं। अफ्रीका, दक्षिण-पूर्व एशिया और लातिनी अमरीका बाजारों में कारोबार के लिए भारत को चीन, दक्षिण कोरिया और जापान से जूझना होगा। तेल की कीमतों में गिरावट और सोने की घरेलू मांग में आई नरमी के कारण फिलहाल आयात के मोर्चे पर राहत है लेकिन निर्यात को बजट से बूस्टर की जरूरत है। यह बात सब जानते हैं कि देश के आर्थिक विकास को गति देने के लिए वित्त की सख्त जरूरत हैं क्योंकि घरेलू वित्त संसाधन पर्याप्त नहीं है। पूंजी प्रवाह का विनियमन आज भी हमें दशकों पुराने अप्रासंगिक कानूनों से कर रहे हैं। बजट में इस तरफ ध्यान देने की जरूरत है। जलवायु परिवर्तन के कारण अब स्वच्छ ऊर्जा का उपयोग मजबूरी में तब्दील हो चूका हैं। भविष्य में वहीं देश टिकाऊ और संपोषणीय आर्थिक विकास कर पाएगा जिसकी अथव्यवस्था स्वच्छ ऊर्जा संसाधनों के दम पर आगे बढ़ रही होगी। उम्मीद है, बजट में स्वच्छ ऊर्जा क्षेत्र में निवेश को प्रोत्साहित करने के लिए सरकार कुछ ओर मजबूत बढ़े कदम उठाएगी।

विकास: - चीन की सुस्ती और वैश्विक अर्थव्यवस्था पर उसके प्रभाव की मार से वैश्विक शैयर बाजार लगातार गिरावट का शिकार हो रहे है। कच्चे तेल की कीमतों में जबरदस्त गिरावट व वैश्विकों बाजारों पर दबाव और बढ़ा दिया है। लेकिन कच्चे तेल की कीमतों में भारी गिरावट भारतीय अर्थव्यस्था के लिए जीवनदायिनी बन गई है। एक ओर कच्चे तेल की कीमत में प्रति एक डॉलर गिरावट की बदौलत आयात बिल में 6, 500 करोड़ रुपए की कमी आती है। वहीं दूसरी और पेट्रोल-डीजल सस्ता होने से महंगाई घटने के अलावा सब्सिडी का बोझा भी 900 करोड़ रुपए कम हो जाता है। हाल ही में विश्व बैंक ने उभरते देशों के बाजारों में मंदी की स्थिति विषय पर प्रकाशित रिपोर्ट में कहा है कि पिछले पांच वर्षों से उभरते देशों के बाजारों की वृद्धि पर अंतराष्ट्रीय व्यापार में नरमी धीमें पूंजी प्रवाह जिस मूल्यों में नरमी और अन्य बाहरी चुनौतियों का प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है। इससे इन देशों के साथ-साथ विकसित देशों में भी मंदी का जोखिम गहरा गया है। रिपोर्ट में यह भी कहा है कि यद्यपि भारत पर अब तक वैश्विक मंदी की आंशका से बचे रहने के लिए अर्थव्यवस्था में औद्योगिक उत्पादन, निर्यात, निवेश और मांग बढ़ाने जैसे कदम उठाना होंगे।

संकेत: - ग्लोबल बैंक-स्टैंडर्ड चार्टर्ड और दिग्गज विदेशी बैक आरबीएस ने भी 12 जनवरी को प्रस्तुत अपनी रिपोर्ट में कहा है कि दुनियाभर में मंदी का संकट गहरा रहा है। आरबीएस के मुताबिक कच्चा तेल 16 डॉलर प्रति बैरल तक आ सकता है। कहा गया है कि बजार में 2008 के लीमैन संकट से पहले जैसे संकेत दिख रहे है। आरबीएस की सलाह है कि अच्छी गुणवत्ता के बॉन्ड्‌स की छोड़ सब कुछ बेच दें। फिलहाल रिटर्न की बजाय पूंजी बचाने की चिंता करें। उल्लेखनीय है कि कच्चे तेल की कीमत जनवरी के दूसरे सप्ताह में 32 डॉलर प्रति बैरल के आसपास रह गई। यह 12 साल के सबसे निचले स्तर के करीब है। इसमें आगे और गिरावट की आशंका जताई है। 2016 की शुरुआत से कच्चे तेल की कीमतों में करीब 16 फीसदी गिरावट आ चुकी है। चूंकि कच्चा तेल वैश्विक अर्थव्यवस्था की गतिशीलता के लिए जरूरी घटक माना जाता है, इसलिए इसकी कीमतों में लगातार गिरावट से जाहिर होता है कि दुनियाभर में मांग घटती जा रही है। वैश्विक मांग घटना वैश्विक मंदी शरुआती लक्षण होता है। इससे वैश्विक बाजारों में घबराहट बढ़ गई है। स्थिति यह है कि वर्तमान दौर में न केवल उभरते हुए देश वरन्‌ अधिकांश विकसित देश भी मांग में कमी, उत्पादन में स्थिरता और बढ़ती बेरोजगारी के बीच विकास दर की चुनौतियों का सामना करते हुए दिखाई दे रहे हैं।

मांग: - अधिकांश विकसित देशों में अब वह संस्थागत मजबूती नहीं बची है, जो दो-तीन दशक पहले उनके जीवन स्तर को थामें हुए थी। यदि विकसित देशों की विकास संभावनाएं घटेगी तो उसका असर भारत पर भी पड़ेगा। निसंदेह देश के आर्थिक परिदृश्य पर मंदी की आशंका को बढ़ाने वाली दो चुनौतियां स्पष्ट दिखाई दे रही हैं। एक ओर औद्योगिक उत्पादन और निर्यात घट रहे हैं तो दूसरी ओर निवेश और मांग में भी भारी कमी दिखाई दे रही है। आर्थिक विशेषज्ञों का मानना है कि अर्थव्यवस्था में उपभोग स्तर बढ़ाने और मांग बढ़ाने के लिए कुछ विशेष उपायों से निकट भविष्य में गति मिल सकती है। कम ब्याज दर का दौर शुरू होना चाहिए, जिससे उपभोक्ता वस्तुओं और रियल एस्टेट जैसे क्षेत्रों में निवेश बढ़ेगा। यह भी जरूरी है कि सरकार के द्वारा आम आदमी की क्रय शक्ति बढ़ाने के लिए देशभर में अनिवार्य रूप से न्यूनतम मजदूरी बढ़ाई जानी चाहिए। ताकि लोगों की जेब में पैसे पहुंच सकें।

उपंसहार: - सरकार को घरेलू मांग के निर्माण के लिए उद्योग-कारोबार को प्रोत्साहन देना होगा। वहीं अर्थव्यवस्था में सुधार के लिए सरकारी निवेश में वृद्धि करनी होगी। देश में लोगों को रोजगार देकर उनकी क्रय शक्ति बढ़ाने के लिए बड़े पैमाने पर सड़क, आवास, बंदरगाह, विद्युत निर्माण आदि क्षेत्रों की कार्यरत योजनाओं को शीघ्र पूरा करने का अभियान शुरू करना होगा। हम आशा करें कि सरकार वर्ष 2016 में औद्योगिक उत्पादन, निर्यात, निवेश और मांग बढ़ाने के लिए उपयुक्त कदम आगे बढ़ाएगी।

- Published on: February 15, 2016