विदेश नीति में चीनी आतंकी डोल्कन ईसा एवं अन्य देश व वार्ता (Essay in Hindi - Foreign Policy) [ Current Affairs ]

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प्रस्तावना: - चीन की ओर से घोषित आतंकी और इंटरपोल के रेड कॉर्नर (अंदर से दुश्मन का घेराव) नोटिस के जरिये वांछित उइगर समुदाय के नेता डोल्कन ईसा को भारत का वीजा दिया गया। ऐसा करके भारत सरकार की ओर से यह जताया गया कि हम मसूद अजहर को आतंकी घोषित करने के मामले में चीन के असहयोग का बदला ले रहे हैं । लेकिन, जब चीन ने नाराजगी दिखाई तो ईसा का वीजा रद्द कर दिया गया। क्या दुनिया के सामने आगे बढ़कर फिर से अपने कदम खींच लेने को ही विदेश नीति कह रहे हैं? पड़ोसियों से सख्ती से निपटने की हमारी नीति यह लचीलापन क्यों और कैसे आ गया?

डोल्कन: - म्यूनिख में रह रहे विश्व उइगर कांग्रेस (डब्ल्यूयूसी) के नेता डोल्कन ईसा को वर्ष 1990 में जर्मनी ने शरण दी थी। ईसा पर चीन के शिंजियांग प्रांत में आतंकवादी घटनाओं में शामिल होने और लोगों की हत्या की साजिश रचने का आरोप है।

उइगर: - चीन के शिंजियांग प्रांत में एक करोड़ उइगर मुस्लिम रहते हैं। तुर्की मूल के उइगर मुसलमान उदार सूफी चिंतन से प्रभावित हैं। वे पूर्वी तुर्कीस्तान इस्लामिक मूवमेंट (गतिविधि) चला रहे हैं, जिसका मकसद चीन से अलग होना है। 1949 में ईस्ट तुर्किस्तान (अब शिंजियांग) अलग राष्ट्र के तौर पर कुछ समय के लिए पहचान मिली थी, लेकिन उसी साल यह चीन का हिस्सा बन गया।

मकसद: - डोल्कन ईसा धर्मशाला (हिमाचल प्रदेश) में 28 अप्रेल से 1 मई के बीच अमरीका के ’सिटिजन पावर फॉर चाइना’ (ताकतवर शहर चाइना) की ओर से आयोजित एक कांफ्रेंस (सम्मेलन) में शामिल होने भारत आना चाह रहे थे। इस कार्यक्रम के दौरान डोल्कन दलाई लामा से भी मुलाकात करने वाले थे। डोल्कन का नाम वर्ष 1997 से इंटरपोल की सूची में हैं।

कारण: - जर्मनी में मौजूद भारतीय एंबेसी (स्थगित रहने) से डोल्कन को वीजा जारी कर दिया था। पहले भारत के कदम को पठानकोट हमले के मास्टरमाइंड (अतिशय बुद्धिमत्ता वाला व्यक्ति जो महत्वपूर्ण कार्य की योजना बनाता हैं) मसूद अजहर को यूएन के जरिए आतंकी करार देने की भारत की कोशिशों में चीन के अइंगे का जवाब माना गया था। चीन के ऐतराज के बाद माना जा रहा है कि भारत ने वीजा रद्द इसलिए किया क्योंकि ईसा के खिलाफ रेड कार्नर नोटिस जारी है।

चीन ने आधिकारिक बयान में कहा था कि ईसा आतंकी है और उनके खिलाफ इंटरपोल ने रेड कार्नर नोटिस (लिखित आदेश) जारी कर रखा है। इसलिए भारत सहित विश्व के सभी देशों की जिम्मेदारी है कि उसे पकड़ा जाए।

डोल्कन ने कहा: -

वीजा मिलने पर- रेड कार्नर नोटिस के बावजूद मैं कई लोकतांत्रिक देशों की यात्रा कर चुका हूं। मुझे वीजा मिलने से चीन सरकार नाखुश है। भारत सरकार को मेरी सुरक्षा और स्वतंत्र आवागमन की गारंटी (भरोसा) देना चाहिए।

वीजा रद्द होने पर- मुझे ई-टूरिस्ट (विदेशी यात्री) वीजा जारी किया गया था। भारतीय मीडिया में इसे काफी कवरेज (समाचार-पत्रादि में) दिया गया था। वीजा रद्द किए जाने से मैं दु: खी हूं। मसूद अजहर प्रकरण को मेरे वीजा रद्द करने से जाड़ने को खारिज करता हूं।

विदेश नीति: - पाकिस्तान को लेकर भारत की विदेश नीति अस्पष्ट रही है। कभी हम एक कदम आगे बढ़ाते हैं तो कभी दो कदम पीछे खींच लेते हैं। लेकिन, अब इस तरह की स्थिति चीन को लेकर भी होने लगे तो इसे ठीक नहीं कहा जा सकता है। यदि भारत अपने निकटतम पड़ोसी देशों को लेकर अस्पष्ट नीति रखता है तो फिर दुनिया भर में भारत की विदेश नीति को लेकर संकेत अच्छे नहीं जाते हैं। ऐसा लगता है कि अन्य देशों के साथ हमारे संबंध कैसे होने चाहिए, इसे लेकर सरकार के पास कोई परिपक्व सोच ही नहीं हैं।

आप सब ने देखा होगा कि मोदी जी सत्ता में आने के पहले ही अपने प्रचार अभियान में पूर्ववर्ती यूपीए सरकार की विदेश नीति की खूब आलोचना करते रहे हैं। मोदी के भाषणों से यह लगा भी था कि वे सत्ता में आए तो हमारी विदेश नीति को नए आयाम प्रदान करेंगे। जनता ने भी काफी उम्मीदें बांध रखी थीं। लेकिन ऐसा लगता है कि विदेश नीति के मोर्चे पर मोदी व्यक्ति केंद्रित संपर्क बढ़ाने में तो कामयाब रहे लेकिन दूसरे देशों से हमारे संबंधों को लेकर स्पष्ट नीति कायम नहीं कर पा रहे हे। जबकि जनभावना यही थी कि चीन और अमरीका जैसी महाशक्तियों के सामने विदेश नीति के मामले में हमारा ठोस व्यवहार रहेगा।

दबाव: - चीन ने मसूद अजहर को आतंकी घोषित करने को लेकर भारत के नाराज होने की परवाह नहीं की। उसने पाकिस्तान के साथ दोस्ती को महत्व दिया। इसका भारत ने बुरा माना। हाल ही में जब भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल जब चीन गए थे, तब इस तरह की खबर आई कि चीन में वांछित आतंकी विश्व उइगर कांग्रेस के नेता डोल्कन ईसा को भारत वीजा देने जा रहा है। इस खबर को यह कह कर प्रचारित किया गया कि भारत ने मसूद अहजर को लेकर चीन के व्यवहार का जवाब दिया है। यह तो स्पष्ट नहीं है कि भारत ने तब तक ईसा को वीजा दे दिया था या नहीं लेकिन इस आशय की खबर जरूर है कि ईसा ने भारतीय दूतावास में पूछा था कि भारत में उसे क्या सुरक्षा दी जाएगी। इसका अर्थ यह है कि ईसा को पता था कि उसे भारत वीजा देने जा रहा है। हालांकि चीन कभी भी सार्वजनिक रूप से और तत्काल अपनी प्रतिक्रिया नहीं देता है लेकिन भारत के सुरक्षा सलाहकार जब चीन में मौजूद थे, तो उनसे इस बारे में चर्चा तो जरूर हुई होगी। इसके बाद बहुत ही सोच-समझकर यह फैसला लिया गया। फिर जब चीन की ओर से इस मामले पर खुलकर नाराजगी जाहिर की गई तो बेहद लचीलापन दिखाते हुए भारत ने ईसा को वीजा देने का फैसला वापस ले लिया। जाहिर है कि हम चीन के दबाव में आ गए।

भारत: - हमारे प्रधानमंत्री ने 22 महीनों में जिस तरह से 36 देशों की यात्रा की, उसे देखकर यही लगता है कि हमारी विदेश नीति में भारी बदलाव आ रहा है। फिर, जिस तरह से ईसा को वीजा देने की बात कही गई, उससे तो यही लगा कि भारत चीन के साथ जैसे को तैसा की नीति पर बात करना चाहता है। यहां महत्वपूर्ण बात यह भी है कि धर्मशाला में आयोजित होने वाले सम्मेलन का आयोजक अमरीका का एनजीओ (गैर सरकारी संस्था) है। यानी, इस मामले में भारत को अमरीका ही नहीं अन्य देशों का समर्थन भी हासिल होता है।

चीन: - इसलिए चीन पहले से ही इस सम्मेलन को संदेह की निगाह से देख रहा था। फिर सम्मेलन का विषय भी चीन में लोकतंत्र पर बातचीत को लेकर केंद्रित था। ऐसे में चीन की नाराजगी बनेगी, यह भी निश्चित ही था। दूसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि चीन उइगर नेता ईसा को आतंकी मानता है और उसके खिलाफ इंटरपोल का रेड कॉर्नर (अंदर के दुश्मन का घिराव) नोटिस जारी किया जा चुका है। इसके बावजूद ईसा को भारत की ओर से वीजा दिया जाने का अर्थ चीन से सीधा मोर्चा खोलना होता। उल्लेखनीय यह भी है कि चीन तिब्बतियों को लेकर उतना संवदेनशील नहीं रहा जितना उइगर को लेकर रहा है। जिस शिंजियांग प्रांत से उइगर समुदाय के लोग ताल्लुक रखते हैं, वहां चीन को आतंक की समस्या से जूझना पड़ता है। जब दलाईनामा को भारत ने शरण दी थी, तब भी यह मुद्दा 1962 में चीन से युद्ध का कारण बना था और अब उइगर नेता को ताल ठोककर वीजा देने की बात कहने का अर्थ यही था कि सारी परिस्थितियों को सोच-समझकर ही भारत की ओर से यह फैसला लिया गया है। वास्तव में चीन के प्रति भारत की बदली हुई यह नीति अपने आप में यू टर्न (उसी दिशा में वापिस घूमा लेना) की तरह थी क्योंकि तिब्बतियों के मामले में चीन को भारत यह कहकर संतुष्ट करता रहा है कि उन्हें भारतीय भूमि का राजनीतिक उपयोग नहीं करने देंगे।

वीजा: - भारत ने चीन से आतंकी करार दिए उइगर नेता ईसा को दिया धर्मशाला आने का वीजा रद्द कर दिया। क्यों रद्दद कर दिया, यह किसी को भी नहीं पता। यहां तक कि विदेश मंत्रालय के उस प्रवक्ता को भी नहीं पता जिसने यह जानकारी दी और न हीं भारत की सरकार को पता था। अब सवाल यह उठता है कि हमने क्यों वो 20 साल से चीन की नाराजगी झेलते हुए जर्मनी में निर्वासति जीवन जी रहे डोल्कन ईसा को वीजा दिया और फिर क्यों रद्द कर दिया? जब भारत ने उसे धर्मशाला में आयोजित ’चीन के लोकतांत्रिक बदलावों’ पर सम्मेलन में आने का वीजा दिया तब व अचानक वीजा रद्द करना यह बात किसी के गले नहीं उतरती हैं।

भारत सरकार को नहीं पता की अगर यह वीजा कायम रहता तो भारत अंतरराष्ट्रीय जगत में किन-किन मुश्किलों का सामना करना पड़ता। उसे यह भी नहीं पता कि किन-किन देशों ने इस मुद्दे पर चीन का साथ दिया होगा? भारत को इतना पता है कि चीन आज भी अपने रूख में कायम हैं। वह आज भी मसूद को आतंकी नहीं मानती हैं। जिसको छुड़ाने के लिए कोई डेढ़ दशक पहले एक भारतीय विमान को कंधार ले जाया गया था। एवं जिसने 2008 के मुंबई हमलों का षडयंत्र रचा और लगभग 175 बेगुनाहों की जान ले ली। यह सब बाते चीन मानने को तैयार ही नहीं है।

कमजोरी: - उम्मीद थी भारत चीन के प्रति तीखे तेवरों से साथ आगे बढ़ेगा लेकिन ऐसा हुआ नही। ऐसा भी नहीं है कि उइगर नेताओं को दुनिया के अन्य देश बुलाते नहीं रहे हों। उइगर समुदाय से बहुत से लोग अमेरिका में रहते हें। ऐसा ही नेता है रूबिया कदीर। चीन जून-जुलाई 2009 में हुए दंगों के लिए रुबिया को दोषी मानता हे। इसी रूबिया को जापान ने सितंबर 2009 में आमंत्रित किया था। उसने चीन की नाराजगी की परवाह नहीं की थी। उसी समय रूबिया की ओर से भारत आने का आग्रह किया था, तब यूपीए सरकार ने उन्हें भारत आने से रोक दिया था। भारत की नीति उइगर नेताओं को लेकर स्पष्ट थी। लेकिन, अब जब चीन ने मसूद अजहर के मामले पर भारत का साथ नहीं दिया तो भारत ने उइगर नेता ईसा को भारत आने का वीजा दिया और अब जल्दबाजी में वह वीजा रद्द भी कर दिया। वह भी तब जबकि चीन ने इस मामले पर अपनी नाराजगी जाहिर की। जरूरत इस बात की थी कि सोच-समझकर लिये गए वीजा देने का फैसला वापस लेना, कहीं न कहीं विदेश नीति को लेकर हमारे दृष्टिकोण की कमजोरी की ओर संकेत करता हैं।

मजबूरियां: - अब भारत की क्या मजबूरी हो सकती है जो वह चीन के आगे झुकने की, समर्पण करने को तैयार हो गया है। एक आतंकी के सामने लोकतंत्र के लिए लड़ रहे एक योद्धा का वीजा रद्द करने की क्या मजबूरी हो गई थी! बेशक भारत सरकार इस मामले में चुप रह सकती हैं, अपने कदम को रणनीतिक बता सकती है लेकिन किसी भी भारतीय के यह तर्क गले नहीं उतरने वाला कि भारत ने ऐसा किया क्यो? सबको तो यही लगता है भारत ने चीन के आगे समर्पण कर दिया है।

स्वरूप: -निश्चित रूप से विदेश नीति और कूटनीति बहुत गहरे विषय है। विशेष रूप से तब जब पाला चीन जैसे देश से हो तो हमेशा ’मुह में राम बगल में छुरी’ की नीति पर चलता हो। हमें नहीं भूलना चाहिए कि हिन्दी चीनी भाई-भाई के नारों के बीच ही 1962 का चीनी हमला हुआ था। इसलिए विदेश सचिव, सुरक्षा सलाहकार और राष्ट्रपति तक चीन जाएं लेकिन उसके असली स्वरूप को ध्यान रखें। कहीं भारत को फिर धोखा न खाना पड़ें।

नाएला कादरी: - भारत ने पाकिस्तान की बलूच नेशनलिस्ट लीडर (राष्ट्रीय सूची में नेता) नाएला कादरी को भी वीजा दिया था। कनाडा में मौजूद भारतीय दूतावास की ओर से कादरी को वीजा दिए जाने पर पाकिस्तान ने भी एतराज जताया है। कादरी पाकिस्तान विरोधी है और बलूचिस्तान में रह रहे लोगों के साथ हो रही नाइंसाफी के खिलाफ आवाज उठाती रही है। कादरी कानाडा में रहती हैं। हाल ही पाकिस्तान ने भारतीय नौसेना में काम कर चुके कुलभूषण जाधव को गिरफ्तार कर उसे रॉ (अप्रशिक्षित या अनुभवहीन) का जासूस बताया तो नाएला ने इसका विरोध किया था। कादरी कहती रही है कि पाकिस्तान की आईएसआई भारत में आतंक को बढ़ावा दे रही है।

खेल: - चीन की ओर से घोषित आतंकी डोल्कन ईसा को भारत ने पहले वीजा दिया और अब खबर है कि उसे रद्द कर दिया। ऐसा समझा जा रहा है डोल्कन के खिलाफ इंटरपोल का नोटिस जारी हो चुका था। पर यह बात समझ से परे है कि बिना इतनी जानकारी के यह वीजा क्यों और कैसे दिया गया? इसके लिए निम्न बातें समझनी हैं-

  • हमें पहली बात तो यह समझनी चाहिए कि जब किसी व्यक्ति को वीजा दिया जाता है तो उसके बारे में पूरी जानकारी या छानबीन कर लेनी चाहिए। बिना पर्याप्त जानकारी के वीजा जारी नहीं किया जाता है। भारत की ओर से पहली गलती तो यही है कि जब इंटरपोल का रेड कार्नर नोटिस डोल्कन के खिलाफ जारी हो चुका था, तब क्या इसे लेकर पहले छानबीन नहीं की गई? यदि जानते बुझते हुए भी यह वीजा जारी किया गया तो भारत की ओर से यह पहली गलती हुई हैं।
  • यहां विशेष बात यह है कि जब ईसा को वीजा देने की बात कहीं गई तो मीडिया में यह बात उछंलकर आई कि भारत ने मसूद अजहर को आतंकी घोषित करने में चीन की ओर से लगाई गई अड़ंगेबाजी का करारा जवाब दिया है। वैसे तो इस तरह का प्रचार नहीं किया जाना चाहिए था। यदि इस तरह का प्रचार हो भी गया तो फिर वापस कदम नहीं खींचने चाहिए थे। एक बार वीजा जारी करने जैसा कड़ा कदम उठा लिया तो उसे रद्द करना भारत की दूसरी गलती कहा जाएगा।

दव्पक्षीय संबंध: - ऐसा लगता है कि हमने विदेश नीति को बच्चों का खेल जैसा बना दिया है। वीजा देने और रद्द करने के मामले को देखकर लगता है कि भारत की ओर से कहीं न कहीं दव्पक्षीय संबंधों को लेकर चूक हो गई है। हालांकि यह बात जरूर है कि चीन ने भी मसूद अजहर को आतंकी घोषित करने के मामले में भारत का साथ नहीं देकर ठीक नहीं किया था लेकिन इसलिए भारत की ओर से ईसा को वीजा दिये जाने का फैसला लिया जाना भी ठीक नहीं कहा जा सकता। हालांकि दीर्घकाल में इस तरह की बातों का दव्पक्षीय संबंधों पर विशेष असर नहीं पड़ता है।

नटवर सिंह, भारत के पूर्व विदेश मंत्री

पड़ताल: - विश्व उइगर कांग्रेस के नेता डोल्कन ईसा को पहले वीजा दिया फिर रद्द कर दिया इससे हमारी विदेश नीति का खोखलापन सामने आया है। जब ईसा को वीजा दिया गया तो उस समय मीडिया के माध्यम से इस बात को जोर-शोर से पेश किया गया कि भारत ने चीन को करारा जवाब दिया है। इसे मसूद अजहर को आतंकी करार देने के मामले में यूएन में चीन की भूमिका को लेकर एक तरह से ईंट का जवाब पत्थर से देने का रूप दिया गया। यह बात भी सही है चीन ने वीजा देने के बाद ही एतराज जता दिया था कि इंटरपोल का रेड कार्नर नोटिस प्राप्त व्यक्ति को वीजा देना गलत है। यह एक सामान्य प्रक्रिया है कि किसी को भी वीजा जारी करने के पहले उसके बारे में पड़ताल की जाती है।

गलत: -ऐसा तो नहीं है कि रेड कार्नर नोटिस सरकार को पता नहीं होगा। इंटरपोल के रेड कार्नर नोटिस प्राप्त व्यक्ति को वीजा देना ही तकनीकी रूप से गलत था। अब डोल्कन का वीजा रद्द कर भले ही भारत गलती सुधार ली हो लेकिन अंतरराष्ट्रीय समुदाय में इसका संदेश अच्छा नहीं गया है। सीधे तौर पर इसे चीन के दबाव के आगे झुकना माना गया है। मूल बात यह है कि विदेश नीति के नाम पर मोदी विदेशी राष्ट्रध्यक्षों से व्यक्तिगत संबंध बनाने में तो आगे रहे हैं लेकिन विदेश नीति व्यक्तिगत संबंधों से अलग है। इसमें ठोस बातों के आदान-प्रदान के साथ एक दूसरे के हित-अहित की चिंता भी करनी होती है।

नाराज: - पाकिस्तान समर्थित आतंकवादी मसूद को वैश्विक आतंकवादी घोषित करने के संयुक्त राष्ट्र के कदम को चीन ने रोक दिया, जिससे भारत नाराज हो गया, जो उसे होना ही था। किंतु विभिन्न राष्ट्रों के लिए राजनीतिक या कूटनीतिक कारणों से ज्ञात आतंकियों का समर्थन देना बहुत मामूली बात होती जा रही है। भारत ने चीन से अपनी अप्रसन्नता और विरोध को काफी मुखरता के साथ व्यक्त कर दिया था।

कूटनीति: -पाकिस्तान के सारे प्रमुख सहयोगियोंं अमेरिका, चीन, संयुक्त अरब अमीरात और सऊदी अरब को लुभाने के आक्रामक प्रयास भी किए गए है। यह बहुत ही ठोस, नई कूटनीति हैं। पाकिस्तान उच्चायुक्त हुर्रियत नेताओं से बैठक को लेकर विदेश सचिव स्तरीय वार्ता को रद्द कर देना। कई अन्य मौकों पर यह जानकारी लीक करके किया जा है जैसा कि मसूद के मामले में ये खबरें कि चीन रवैया के जवाब में वैश्विक स्तर पर पहचाने जाने वाले उइगर असंतुष्ट नेता को वह वीजा जारी कर रही है। इसे भारत की ओर से चीन के लिए पहली बार दिखाई गई तगड़ी प्रतिक्रिया माना जा रहा था। हालांकि सच तो यह है कि कूटनीति भुजाएं फड़काकर नहीं, दिमाग से चलाई जाती है। खासतौर पर तब जब आपकी भुजाएं उस विरोधी की तुलना में कमजोर हों, जिसकी दुखती रग पर आप हाथ रखना चाहते हैं। इस समय रणनीतिक, राजनीतिक या आर्थिक रूप से भारत इस स्थिति में नहीं है कि वह चीन से कोई झगड़ा मोल ले। बेशक चीन यदि दुस्साहस दिखाता है तो भारत अपनी सीमाओ की रक्षा करने के अलावा भी बहुत कुछ करने की क्षमता रखता है।

कदम: - मजूद के मामले में पर पहली प्रतिक्रिया में ईसा को वीजा देना और वह भी तिब्बत की निर्वासित सरकार के आर्शीवाद से हो रहे सम्मेलन में भाग लेने के लिए बहुत ही भड़का कदम था। हुर्रियत मामले में पाकिस्तान के साथ बातचीत के बहिष्कार की तरह यह कदम भी टिकने वाला नहीं था। दोनों कदम वापस लेने पड़े वो भी बहुत जल्दी।

सच: - सच तो यह है कि परंपरावादी, कष्टसाध्य, यथार्थवादी और धैर्यपूर्वक अपनाई जाने वाली कूटनीति में भरोसा रखने के कारण दोनों मामलों में यू-टर्न लेने का स्वागत करते हैं। प्रत्येक मामले में आखिर में समझदारी की जीत हुईं।

चीन में विरोध प्रदर्शन करने वालों को सरकार गिरफ्तार कर लेती है या रेड कार्नर नोटिस जारी कर देती है। यहां अपने देश में विरोधियों को अपनी मर्जी से घूमने-फिरने और बोलने की आजादी होती है।

अरविंद वीरमानी, नीति विशेषज्ञ

भारत और पाकिस्तान: -लंबे विवाद और अटकलों के बीच भारत और पाकिस्तान के विदेश सचिव ऐजाज अहमद चौधरी’हार्ट ऑफ एशिया-इस्तांबुल प्रोसेस’ सम्मेलन में भाग लेने नई दिल्ली में विदेश सचिव एस. जयशंकर के साथ अलग से दव्पक्षीय बैठक में करीब 90 मिनिट के दौरान बातचीत हुई। पाकिस्तान ने कश्मीर मसले को मुख्य मुद्दा मानते हुए उसका समाधान तलाशने पर जोर दिया। वहीं भारत ने दो टूक शब्दों में कहा कि पाकिस्तान आतंकवाद के मुद्दे पर ठोस कदम उठाए, नहीं तो दव्पक्षीय संबंधों को आगे बढ़ाना कठिन होगा। इस वार्ता में अजीब बात यह रही कि वार्ता खत्म होने से पहले ही पाकिस्तान की ओर इसका पूरा ब्योरा जारी कर दिया कि पाकिस्तान कश्मीर मसले का हल संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव के तहत चाहत है। उच्चायोग की यह हरकत राजनीतिक रूप से उचित नहीं थीं। यानी इसका मतलब यह हुआ कि पाकिस्तान पहले से ही तय करके आए थे कि कश्मीर मुद्दे को फिर हवा देंगे। फिर ऐसी वार्ता से क्या हासिल होगा? जब तक हम सख्त नहीं होंगे तब तक पाकिस्तान यूं ही अपनी मनमानी करता रहेगा। करारा जवाब ही शायद उनके कदम रोक सके।

भारतीय विदेशी सचिव ने इस वार्ता में कहा कि पाकिस्तान की धरती से आतंकी संगठनों को भारत पर हमले की इजाजत नहीं दी जानी चाहिए। इसके अलाव बैठक में मछुआरों, कैदियों, तीर्थयात्रियों और आम जनता से जुड़े मानवीय मसलों पर भी बात हुई। दोनों देशों के वार्ता के प्रमुख मुद्दे निम्नलिखित हैं।

भारत के मुद्दे- निम्न हैं-

  • पठानकोट, मुंबई हमलों की जांच में प्रगति लाई जाए। भारतीय जांच दल को पाक जाने की इजाजत दी जाए।
  • जैश-ए मुहम्मद के सरगना मसूद अजहर का नाम संयुक्त राष्ट्र प्रतिबंध सूची में शामिल करवाने और उसे गिरफ्तार करने में पाक मदद करे।
  • भारतीय नौसेना के पूर्व अधिकारी कुलभुषण जाधव का अपहरण कर उसे पाक ले जाया गया है। जासूसी का आरेप गलत है, भारत के महावाणिज्य दूत को उस तक पहुंचने दिया जाये।

पाकिस्तान मुद्दे- निम्न हैं-

  • जम्मू-कश्मीर के मुद्दे का हल सुरक्षा परिषद के प्रस्तावों और कश्मीरी लोगों की इच्छा के अनुरूप किया जाए।
  • भारतीय नौसेना के पूर्व अधिकारी कुलभुषण जाधव के माध्यम से भारत ने बलूचिस्तान और करांची में विध्वंसक गतिविधयां चलाई हैं।
  • समझौता एक्सप्रेस विस्फोट के आरोपियों की रिहाई पर पाकिस्तान को कड़ी आपत्ति है। कई कोशिशों के बावजूद भारत ने नहीं बताया कि 42 पाकिस्तानियों की मौत कैसे हुई।

पाकिस्तान का बयान- ’पाकिस्तान के प्रधानमंत्री चाहते हैं कि पड़ोसी देशों से बेहतर रिश्ते कायम हों इसलिए भारत से भी शांतिपूर्ण और बेहतर संबंध चाहते हैं।’

वार्ता: - भारत-पाक विदेश सचिव यहां दिल्ली अप्रेल 2016 में वार्ता कर रहे थे। मुश्किल से 10 मिनट भी नहीं हुए होगें कि उसके बारे में इस्लामाबाद से संदेश जारी होने शुरू हो गए। ये बयान-बाण ऐसे किसी व्यक्ति की ओर से आ रहे थे जो उस बातचीत में तो क्या भारत मेे ही मौजूद नहीं था। ऐसे में पाकिस्तान ने वार्ता शुरू होने के पहले ही साफ कर दिया कि भले ही प्रधानमंत्री नवाज शरीफ के दूत के रूप में उनके विदेश सचिव एजाजा यहां वार्ता के लिए आए हैं, लेकिन उनके देश में ऐसी कोई ताकत है जो नहीं चाहती है कि वार्ता सफल हो। इतना ही नहीं, पाक विदेश सचिव ने भी लगभग लिखी हुई स्क्रिप्ट (हाथ की लिखावट) ही पढ़ी। उन्होंने भी वही मसले उठाए जो कोई इस्लामाबाद से संदेश के रूप में मीडिया को जारी कर रहा था। हालांकि इस दौरान पाक विदेश सचिव लगातार प्रयास करते रहे कि भारतीय विदेश सचिव अपनी इस्लामाबाद यात्रा को लेकर कोई संदेश या आश्वासन दें। जिससे दोनों देशों के बीच विदेश सचिव स्तरीय वार्ता शुरू करने को लेकर वह औपचारिक रूप से दुनिया को कुछ बता पाएं। दूसरा, उन्हें भेजकर पाक ने यह संदेश भी दे दिया कि भारत में उनके उच्चायुक्त बासित के बयान ’बातचीत स्थगित हो गई’ उससे पाकिस्तान सहमत नहीं है। रोचक यह है कि बातचीत में पाक उच्चायुक्त बासित भी थे। तकरीबन डेढ़ घुटे की बैठक के बाद वार्ता को संतोषजनक और आगे भी जारी रखने की बात कही है।

उपसंहार: - हाल ही में मोदी जी ने चीन, पाकिस्तान, अमरीका के राष्ट्रध्यक्षों से मुलाकात की तो ऐसा लगा जैसे हमारी विदेश नीति में यूपीए, सरकार के मुकाबले बदलाव आने वाला है। लेकिन पीएम की लाहौर यात्रा के बाद पठानकोट हमले ने व ईसा का वीजा रद्द करने के मामले ने ऐसे प्रयासों पर पानी फेर दिया और चीन लगातार हमारी सीमाओं पर दबाव बढ़ाने में लगा है एवं अमरीका की ओर से पाक पर भारत में आतंकी गतिविधियां रोकने की दिशा में कोई दबाव बनता नहीं दिख रहा और भारत व पाकिस्तान दोनों देशों की वार्ता भी तकरीबन थोड़ी बहुत सफल ही रही हैं। ऐसे में जरूरत ठोस परिणाम लाने वाली विदेश नीति की है।

- Published on: May 11, 2016