दूरसंचार घोटाला (Essay in Hindi - Telecom Scam - Role of Media & Opinion) [ Current Affairs ]

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प्रस्तावना: - दूरसंचार के एक मंत्री दयानिधि 2004 से 2007 तक मंत्री रहे। मंत्री पद जाने के बाद 323 टेलीफोन लाइनें निजी इस्तेमाल के लिए लगवा लीं। उन्होंने चेन्नई टेलीफोंस के सीजीएम के नाम से गोपनीय नंबर लिए। नंबरों की पहचान गुप्त रखने की सुविधा हासिल की, जो कि केवल राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री व केंद्र सरकार स्तर पर मिलती हैं पर राष्ट्रीय सुरक्षा को बेफकूफ बताते हुए मारन और बीएसएनएल के अधिकारियों की मिलीभगत से यह सब हुआ। मारन को फंसने से बचाने के लिए बीएसएनएल के एजीएम ने कहा 300 लाइनों को दबा दो और वे दबा दी गईं। आखिर कैसे रची गई घोटाले की पूरी कहानी।

मीडिया: - रिपोट्‌र्स के अनुसार सीबीआई दयानिधि मारन से दूरसंचार घोटाले के बारें में कड़ाई से पूछताछ कर रही है। सुप्रीम कोर्ट का कहना है कि दयानिधि मारन ने अपने व्यक्तिगत कारण से सीबीआई को हिरासत में पूछताछ करने के बारे में मना कर दिया है। हिरासत में पूछताछ से बचने के लिए मारन ने जो दलील दी है, वह हैं

  • पहला उन्होंने केवल एक लाइन का इस्तेमाल किया। न तो 323 का और न ही 764 का।
  • दूसरा, उनके पूर्ववती अधिकारियों के पास भी समान सुविधाएं थी और तीन सौ लाइनों का दावा झूठा है।
  • तीसरा, सीबाआई सालो बाद जागी और हिरासत में पूछताछ संबंधी याचिका पर देरी कर दी।
  • चौथा, विभाग के कोष में सीबीआई के अनुसार, मात्र 1.78 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ है, मारन इसका भुगतान कर इसे समायोजित करने को राजी है। उक्त चारों दलीलें सफेद झूठ हैं।

बीएसएनएल के मुताबिक मारन झूठ बोल रहे हैं। अगर सीबीआई, कोर्ट के समक्ष केवल एक दस्तावेज, सिर्फ एक, दिनांक 2007 के बीएसएनएल के नोट्‌स पेश कर देती तो अब तक मारन सीबीआई हिरासत में होते। इस दस्तावेज के मूल में मारन को दो खास नंबरों के प्रति विशेष लगाव जाहिर किया गया है, ये नंबर है 24371515 और 24371616- मंत्री पर छिनने के बाद धोखाधड़ी की 323 लाइनों में से ये दो नबंर मारन को विशेष रूप से प्रिय थे। मई 2007 में मंत्री पद से इस्तीफा देने के बाद उन्होंने इन दो नंबरों का लगातार इस्तेमाल किया।

खुलासा: - किस तरह से बीएसएनएल की फाइल धोखाधड़ी की 300 लाइन का खुलासा करती है, स्वीकार करती है और बताती है कि इसे कैसे दबाया गया था। बीएसएनएल के नोट्‌स के अनुसार, 28 मई 2007 को तत्कालीन संचार एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री (ए राजा) के अतिरिक्त निजी सचिव का एक फैक्स मिला था, जिसमें कहा गया था कि पूर्व मंत्री मारन के लिए चालू उक्त दो नंबर सांसद कोटे में परिवर्तित कर दिए जाएं। यह पत्र फाइल में दर्ज है। इसके अनुसार, जन शिकायत प्रकोष्ठ (पीजी सेल) के महाप्रबंधक (संचालन) ने इन दो नंबरों को परिवर्तित करने के निर्देश दिए थे। परन्तु प्रकोष्ठ को पता चला कि ऐसे कोई नंबर रिकॉर्ड में है ही नहीं! फाइल के मुताबिक इन नंबरों के बारे में न तो पीजी सेल और न ही कम्प्यूटर सेल में कोई जानकारी उपलब्ध है।

मारन के इन खास नंबरों का पता लगाने के लिए किसी ने अतिउत्साह में मामला ईडब्लूएसडी सेल से सम्पर्क किया। ईडब्लूएसडी सेल से आशय है- इलेक्ट्रॉनिक वर्ल्ड स्विच डिजिटल- यह इंटीग्रेटेड सर्विस डिजिटल नेटवर्क प्राइमरी रेट एक्सेस के अर्न्तगत चालू टेलीफोन नंबरों का विस्तृत विवरण देता है। आम आदमी की भाषा में यह एक बहुपयोगी दूरसंचार प्रणाली है, जिसमें साधारण नंबरों के लिए कोई स्थान नहीं है। यह एक विशेष टेलीफोनिक प्रणाली है जो वॉइस कॉल के साथ-साथ इंटरनेट डेटा और टीवी कार्यक्रमों की भी सुविधा प्रदान करती है।

दूरसंचार मंत्रालय को लिखें सीबीआई के पहले पत्र (दिनांक 10 सितम्बर 2007), जिसमें धोखाधड़ी का खुलासा किया गया था में बताया गया है कि नंबर 24371500 से 24371799 के बीच कुल 300 आईएसडीएन पीआरए लाइनें थीं। इस प्रकार का टेलीफोनिक सिस्टम घर या व्यक्तिगत उपयोग के लिए नहीं होता। यह बड़े कॉर्पोरेट्‌स में काम आता है, जहां बड़े पैमाने पर संचार की जरूरत होती है। बाहरी लाइनों पर सम्पर्क के लिए यह निजी पीबीएक्स (प्राइवेट ब्रांच एक्सचेंज) द्वारा संचालित किया जाता है। तकनीकी रूप से इसे पब्लिक स्विच टेलीफोन नेटवर्क (पीएसटीएन) के नाम से जाना जाता है। सामान्य टेलीफोन लाइन को टालते हुए पीआरए उपभोक्ता बीएसएनएल की ईएसडब्लूडी लाइन पर पकड़ा जाता है। इस तरह से मारन भी ईएसडब्लूडी सेल में पकड़े गए। सीबीआई के पत्र में ऐसी 23 और लाइनों का जिक्र किया गया है। इस प्रकार ये गुप्त लाइनें कुल 323 हैं। बीएसएनएल के फाइल नोट्‌स से सीबीआई के इस पत्र के बिन्दुओं की पुष्टि होती है। बीएसएनएल के नोट के मुताबिक मारन ने जिन नंबरों की मांग की थी, वे तीन सौ एक्सटेंशन के साथ जुड़े मुख्य नंबर 24371500 के सहायक नंबर हैं। सीबीआई ने तीन माह बाद ठीक यही कहा था। नोट्‌स में यह भी खुलासा हुआ है कि इन लाइनों का इंस्टॉलेशन चेन्नई टेलीफोन के मुख्य महाप्रबंधक के नाम पर किया गया है, लेकिन मारन के घर में! इस तथ्य से साफ है कि यह मारन की गोपनीय टेलीफोन लाइनें थी।

गुप्त पहचान: - सीबीआई ने मंत्रालय को यह भी बताया है कि ये तीन सौ लाइनें निरंतर चालू रहीं, जो अपने आप में एक निजी टेलीफोन एक्सचेंज बन गया और इसकी जानकारी बीएसएनएल के अधिकृत स्टाफ को ही थी। इसलिए पीजी सेल को 2007 में इस तलाश की जरूरत महसूस हुई। बीएसएनएल ने इन 300 लाइनों के बारे में एक और तथ्य उजागर किया है, जिसका जिक्र सीबीआई के पत्र में नहीं है। इन लाइनों पर कॉलर आई डी गुप्त रखने यानी कॉलर की पहचान प्रतिबंधित वाली सुविधा (सीएलआईआर-कॉलर लाइन आइडेंटिफिकेशन रेस्ट्रिक्शन) भी उपलब्ध थी। इसका मतलब इन नंबरों से फोन करने पर सामने से फोन रिसीव करने वाले को यह पता नहीं लग सकता था कि कॉल किस नंबर से आया है और गुप्त पहचान वाला यह कॉलर कौन है?

नियमानुसार यह गुप्त पहचान वाली सुविधा केवल राष्ट्रपति प्रधानमंत्री और केंद्र सरकार के कर्मचारियों को ही उपलब्ध है। केंद्रीय गुप्तचर विभाग के अधिकारी और शीर्ष स्तरीय सरकारी अधिकारियों को ही इस प्रकार की सुविधा उपलब्ध है, परन्तु चेन्नई टेलीफोन्स के सीजीएम इस श्रेणी में नहीं आते। यह सुविधा प्राप्त करने के लिए उन्हें कड़ी प्रक्रिया से गुजरना होता है इसके लिए उन्हें अपना पता और पहचान पत्र सहित आवेदन करना होता यह पहचान संबंधी साक्ष्य पुलिस महानिदेशक, तमिलनाडू या पुलिस गुप्चर विभाग के इंस्पेक्टर जनरल द्वारा अभिप्रमाणित होना चाहिए था, जिसे दूरसंचार विभाग का दूरसंचार प्रवर्तन संसाधन निगरानी प्रकोष्ठ (टर्म सेल) द्वारा अनुमोदित किया जाता। इस प्रकोष्ठ को पूर्व में सतर्कता दूरसंचार निगरानी प्रकोष्ठ (वीटीएम) के नाम से जाना जाता था। यह सारी व्यवस्था राष्ट्रीय सुरक्षा के लिहाज से की हुई है ताकि निगरानी रहित टेलीफोन लाइनें न बिछ सकें। चेन्नई टेलीफोन्स के सीजीएम अपने नाम पर अपना पहचान पत्र प्रस्तुत करके गोपनीय टेलीफोन लाइन डलवा सकते थे न कि मारन के घर पर। यह राष्ट्रीय सुरक्षा को लेकर सन टीवी मामले का उल्लेख करना प्रासंगिक होगा।

एजीएम: -बीएसएनएल के एजीएम कहते हैं- 300 लाइनों को दबा दो। अब यह है- बीएसएनएल नोट्‌स का सबसे धमाकेदार हिस्सा, जिसके हिसाब से मारन और बीएसएनएल में उनके साथी जेल में होने चाहिए थे। एजीएम (जन शिकायत) फाइल में लिखते हैं - मारन की उनके प्रिय नंबरो 300 एक्सटेंशन वाले आईएसडीएन पीआरए 24371500 के (24371515/1616) की दरख्वास्त को मानते हुए उन्हें दबाना पड़ेगा और 24371515 और 24371616 को सामन्य नंबरों में परिवर्तित करते हुए एसटीडी सुविधा के साथ सांसद कोटे में देना होगा। और ऐसा ही किया गया। बीएसएनएल के अधिकारियों ने उक्त गोपनीय 300 लाइनों के दस्तावेज नष्ट कर दिए और मामले को दबा दिया। एक नंबर 24371515 मारन को आवंटित कर दिया, जैसा वे चाहते थे। बीएसएनएल ने अपने नोट्‌स में मारन के घर में और भी टेलीफोन लाइनें देना स्वीकार किया है। इन नोट्‌स के अनुसार, आईएसडी और सीएलआईआर सुविधा से लैस सात आईएसडीएन बीआरए (बेसिक रेट एक्सेस) नंबर तथा सामान्य नंबर ये सभी सीजीएम के नाम पर हैं और मारन के घर में चल रहे हैं। नोट्‌स के मुताबिक संलग्नक बी और सी में 323 नंबरों का विस्तृत विवरण दिया गया है। क्षमता के लिहाज से बीआरए नंबर, पीआरए नंबर से कमतर हैं, यद्यपि ये पीआरए का ही काम करते हैं। इन नंबरों के लिए भी बीएसएनएल ने नोट में कहा है- डीजीएम (पीजी) के अनुरोध पर विभाग द्वारा कार्रवाई की जानी है। बीएसएनएल के नोट्‌स में और भी फर्जी लाइनों का जिक्र है। ये सभी फैन्सी लाइनें हैं (28119696, 28119697, 281122222, 28122400, 281822424, 28122444, 28122525, 28122555, 281222727 और 28122828) । ये सभी गोपालपुरम ऑफिस में लगी हैं। परन्तु यह ऑफिस नहीं, मारन का घर है, जहां से वे पॉश इलाके बोट क्लब में शिफ्ट हो गए। पर ये लाइनें मई 2007 तक बंद हुई पाई गईं। बीएसएनएल का एक और धमाकेदार तथ्य यह है कि एजीएम (पीजी) ने मारन के चाहे गए दो नंबर डीजीएम (ओपी) के अनुमोदन से जारी करने के निर्देश दिए। इसके लिए घर पर लगी 300 लाइनों का दबाना आवश्यक था। साथ ही यह भी निर्देश थे कि बोट क्लब स्थित घर में लगी सात बीआरए लाइन व दो सामान्य लाइनों का क्या करना है। डीजीएम (ओपी) इसकी मंजूरी दे देते हैं। 23 - 6-2007 के अपने नोट में कहा कि मारन के घर लगे उक्त नंबर प्रत्यक्ष दूरसंचार तंत्र (डीईएल) की लाइनें नहीं हैं मतलब वे रिकॉर्ड में उल्लिखित नहीं हैं। वे यह मानते हैं कि जब तक आईएसडीएन पीआरए बंद नहीं कर दी जातीं, ये सीधी लाइन के तौर पर नहीं जोड़े जा सकते। मतलब कि इन तीन सौ पीआरए लाइनों को दबाना होगा। उन्होंने यह भी निर्देश दिए हैं कि संग्लनक सी में दर्शाए गए बोट क्लब में चालू नंबरों की सूची (बीआरए नंबर व सामान्य नंबर) को नियमित करने की जरूरत है। इसका मतलब क्या है ये तो वे ही बता सकते हैं। वे यह भी कहते हैं बीएसएनएल के एनओपी (लाइजन ऑफिसर फोन्स) ने मारन द्वारा मांगी गई दो में से सिर्फ एक ही लाइन (24371515) को निजी श्रेणी से बदल कर सांसद कोटा (फ्लैग डी) में करने की स्वीकृति दी है। इससे मारन के एक और झूठ का पर्दाफाश होता है कि मूल नंबर सर्विस नंबर था। फाइल के मुताबिक ये निजी नंबर थे और वास्तव में इन्हें सरकारी नंबरों में तब्दील किया जा रहा था।

अंतत: 29 जून 2007 को डीजीएम (ऑपरेशन) बीएसएनएल के निर्णयनुसार आईएसडीएन पीआरए सुविधा के साथ मात्र एक लाइन 24371515 ही संसदीय श्रेणी में दी गई। मारन के पास इसके अतिरिक्त आईएसडीएन पीआरए सुविधा वाली 299 लाइने और थीं, जो दबा दी गइंर् सीबीआई, मारन को बीएसएनएल की ये फाइले पढ़ने को कहे और स्पष्ट करें कि आखिर यह सारा माजरा क्या है?

नजर: - जब एक समाचार पत्र ने घोटाला उजागर किया था तो 2 जून 2011 को दयानिधि मारन ने कहा था मेरे पास केवल एक बीएसएनएल लाइन है 24371500 इसके अलावा मेरे घर पर मेरे नाम पर और कनेक्शन नहीं है। एक अग्रेंजी समाचार-पत्र की 323 लाइनों वाली खबर झूठी है, वे बीएसएनएल से सारी बातें पता लगा लें समाचार पत्र के पास बीएसएनएल की यही फाइल है जिसमें कहा गया है कि 300 में से एक नंबर मारन को देने के लिए 300 लाइनों को दबाना पड़ेगा।

दयानिधि मारन के मामले में सीबीआई के पहले पत्र (दिनांक 10 सितंबर 2007), जिसमें धोखाधड़ी का खुलासा किया गया था। इस पत्र में बताया गया है कि फोन नंबर 24371500 से लेकर 24371799 के बीच कुल 300 आईएसडीएन पीआरए लाइनें थी। इस प्रकार का टेलीफोनिक सिस्टम घर या व्यक्तिगत उपयोग के लिए नहीं होता। यह बड़े कॉर्पोरेट्‌स कंपनियों के संचार के काम आता है। ये 300 लाइनें निरंतर चालू रहीं, जो अपने आप में एक निजी टेलीफोन एक्सचेंज बन गया और उसकी जानकारी बीएसएनएल के अधिकृत स्टाफ को ही थी। इसलिए पीजी सेल को 2007 में इस तलाश की जरूरत महसूस हुई।

उपसंहार: - सीजीएम के नाम पर कनेक्शन होना और लाइनों का मारन के घर में मिलना गोपनीयता को उजागर करती है। इस तरह हर घोटाले को उपरी पहुंच की वजह से दबा दिया जाता है ताकि इन घोटालों का आम जनता को बिलकुल पता न पड़ सके।

- Published on: January 11, 2016