किशोर अपराध (Essay in Hindi on Nirbhay Case - Down the Lane) [ Current Affairs ]

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प्रस्तावना: -आज 16 दिसम्बर 2012 को निर्भया कांड को पूरे तीन साल हो गए हैं। 23 वर्षीय निर्भया के साथ घटी गैंगरेप की भयावह घटना ने पूरे देश को हिलाकर रख दिया था। जिसमें छ: ं अपराधियों में से एक नाबालिग भी शामिल था। जिसे तीन साल के लिए सुधार गृह में रखा गया व एक अपराधी ने खुदकुशी कर ली। शेष चार को मौत की सजा सुनाई गई। अभी यह मामला उच्चतम न्यायालय में लंबित है। निर्भया की मृत्यु को तीन साल हो चुके है और नाबालिग इसी दिसम्बर 2015 को रिहा होने वाला है। इसके एक दोषी किशोर की रिहाई हो सकती हैं, लेकिन उसकी सजा बढ़ाने की मांग भी उठ रही है।

सर्वे: - 2012 में इस घटना के बाद बलात्कार और स्त्री सुरक्षा पर बातचीत शुरू हुई। स्त्री संगठनों और एनजीओं ने 2002 से लेकर 2012 तक बलात्कार की घटनाओं में 142 फीसदी की बढ़ोतरी होने के आकड़े पेश किए और किशोर अपराध अधिनियम में बदलाव किए जाने और अपराधियों की उम्र करने की मांग की। इसी सर्वे में कुल अपराधियों में किशोर की हिस्सेदारी सिर्फ 1.2 फीसदी थी। इससे समाजशास्त्रियों ने पोर्न पर प्रतिबंध लगाने, अपराधियों के सामाजिक-आर्थिक परिवेश के अध्ययन कराने, सुधार गृह का माहौल ठीक करने की बात की। अफसोस इस दिशा में हम एक कदम भी आगे नहीं बढ़ सके।

मुख्य आरोपी: - निर्भया कांड के मुख्य आरोपी छ: लोग थे जिसमें मुकेश, भूरा, रामसिंह, विनय, पवन व अक्षय हैं। इसमें से निर्भया कांड के एक अपराधी मुकेश सिंह ने अपने कृत्य को पूरी तरह सही ठहराते हुए जेल में रहते हुए कहा कि ” अच्छी लड़कियां रात नौ बजे बाहर नहीं घूमतीं है उनका काम है घर सम्भालना। लड़का और लड़की बराबर नहीं होते। लड़कियां खुद ही बलात्कार के लिए जिम्मेदार होती हैं।

बाल सुधार गृह: - देश में किशोर अपराध कानून में निश्चत रूप से न्यूनतम आयु सीमा 16 होनी चाहिए। इसके पीछे समुचित तर्क भी हैं। हमारे देश की जलवायु ऊष्ण है हैं। इसके चलते शारीरिक विकास जल्दी होता है। साथ ही सामाजिक परिदृश्य भी बढ़ रहा है। बच्चों में फिल्मों और समाज के द्वारा अपराध की ग्रंथी पनप जाती है। अपराध को उम्र के साथ जोड़ना गलत है। अपराधी अपराधी ही होता है। यदि किसी किशोर ने जघन्य अपराध कारित किया है तो चाहे उसकी उम्र 18 साल से कम हो उस पर भारतीय दंड संहिता की धाराओं के तहत ही मुकदमा चलना चाहिए। अब हमें दूसरे पक्ष की ओर भी देखना होगा। यह पक्ष है सजा का। सजा का निर्धारण सामाजिक अवधारणा, अभिसमयों और विधि के अनुरूप होता हैं।

वर्तमान में किशोर अपराध कानून के तहत अधिकतम तीन वर्ष की सजा दी जा सकती है। दोष साबित होने पर किशोर सुधार गृह भेजा जाता है। बस दिक्कतें यहीं से शुरू होती है। किशोर सुधार गृह किसी जेल से कम नहीं होते हैं। यहां कि स्थिति देखकर कोई भी सहज रूप से अंदाज लगा सकता है कि यहां रहने के बाद किशोर अपराधी सुधर नहीं सकता है। वर्तमान में सभी राज्य सरकारें किशोर सुधार गृह संचालन जिम्मा गैर सरकारी संगठनों को सौंप देती है। ज्यादातर किशोर सुधार गृहों में अमानवीय हालात होते हैं। कमरों में पंखे नहीं होते है, शौचलयों में सफाई की व्यवस्था नहीं होती है। ऐसे सुधार विचार मात्र की ही कल्पना करना भी बेमानी होता है। किशोर कानून के तहत मित्रवत व्यवहार पहली शर्त होती है। लेकिन देखने में आता है कि किशोर सुधार गृहों से बाल अपराधियों के भागने की अक्सर घटनाएं सामने आती रहती हैं। कैदियों की तरह किशोरों को रखा जाएगा तो स्वाभाविक है वे भाग जाने की कोशिश करेंगे। सरकारों की ओर से इन गृहों में समुचित बजट भी नहीं दिया जाता है। ऐसे में किशोर अपराधियों में सुधार की अपेक्षा कैसे की जा सकती है।

किशोर अपराध कानून की पालना नहीं होने पर होने पर संबधित अधिकारियों को भी सजा दी जा सकती है, लेकिन बहुत कम ही मामलों में कभी सजा दी जाती है। सुधार के नाम पर किशोर अपराधियों को कोई व्यवसायिक कोर्स नहीं कराया जाता है। ऐसे में सजा पूरी करने के बाद किशोर अपराधी के पास अपराध की दुनियां में ही लौटने के सिवाय कोई चारा नहीं बचता है। अपराध की जघनता के आधार पर केस को जुवेनाइल बोर्ड की बजाय आईपीसी में चलाने का उपाय भी कारगर साबित नहीं हो सकता है। या तो हमें अपराध की न्यूतम आयु सीमा घटानी होगी अथवा वर्तमान व्यवस्था में ही काम करना होगा। सजा पूरी होने के बाद लीगल बॉन्ड भरने की अनिवार्यता भी व्यवहारिक साबित नहीं हो सकती है। ये अपराध कारित होने को किसी भी तरह से रोक नहीं सकता है। दरअसल, विदेशों के समान किशोर अपराधी पर सजा पूरी होने के बाद एकल मॉनीटर लगाने जैसे इलेक्ट्रॉनिक सर्विलांस उपायों को लागू किया जा सकता है।

जुवेनाइल (किशोर): - में दुनिया का अलग-अलग नजरिया हैं-

  • भारत में 18 साल से कम उम्र का अपराधी नांबालिग माना जाता है। सुनवाई जुवेनाइल जस्टिस (जेजे) बोर्ड में। सजा के नाम पर अधिकतम तीन साल बाल सुधार गृह में।
  • अमरीका के कई राज्यों में संगीन जुर्म पर 13 से 15 साल के किशोरों को गंभीर सजा दी जाती हैं, कुछ राज्यों में यह उम्र सीमा 10 साल है। उम्र कैद तक की सजा दी जाती है।
  • इंग्लैड में 18 से कम उम्र के किशारों को आम अपराधियों के समान सजा।
  • चीन में 14 से 18 की आयु सीमा है एवं फ्रांस में नाबालिग की उम्र 6 सालकी।
  • सऊदी अरब में उम्र रियायत नहीं।

बाल अधिनियम की जगह पर 1986 में पहली बार जुवेनाइल जस्टिस एक्ट बना। इस अधिनियम में 2000, 2006 और 2007 में भी सुधार हुए। इस अधिनियम से पहले किशोर, 16 की उम्र तक के लड़कों को माना गया था जबकि लड़कियों की उम्र 18 मानी गई थी। 2006 में दोनों की उम्र 18 कर दी गई। बाल विवाह पर रोक लगाने के कानून, मत देने का अधिकार आदि सभी जगहों पर दोनों की उम्र 18 थी।, इसलिए किशोर की उम्र दोनों के लिए 18 कर दी गई थी।

उम्र: - निर्भया कांड के बाद कुछ गैर-सरकारी संगठनों और स्त्री अधिकार संगठन के लोगों ने जुवेनाइल की उम्र 18 से कम करके 16 या 15 कर देने की मांग की। इस मांग के समर्थन में उन्होंने 2002 से लेकर 2012 तक के बलात्कार के आंकड़े दिए। आकंड़ों के हिसाब से देखें तो जुवेनाइल द्वारा किया गया अपराध कोई ज्यादा नहीं था। इस बारे में जे एस वर्मा समिति ने जुवेनाइल की उम्र 18 से कम करने से मना कर दी। इसका कारण यह था कि सुप्रीम कोर्ट के दिशानिर्देश पर ही 2006 में जुवेलाइल की उम्र 18 की गई थी। इसलिए कोई भी अपराधी कोर्ट में इस बात के लिए अपील कर सकता है कि वह अपराध के समय जुवेलाइल था इसलिए उस पर जुवेलाइल एक्ट के तहत मुकदमा चलाया जाए।

समाज: - में यौन आक्रामकता (सेक्सुअल एग्रेशन) की घटनाएं बढ़ रही हैं। इंटरनेशनल सेंटर फॉर रिसर्च आन वीमन व दो अन्य संस्थाओं द्वारा हाल ही एक सर्वे में शामिल 25 फीसदी पुरुषों ने यह माना कि उन्होंने किसी न किसी से यौनिक हिंसा को किसी समय में अंजाम दिया है। यौन हिंसा के मामले में रवांडा, मेक्सिको, क्रोशिया और चिली जैसे देशों से भी भारत आगे है। निश्चित ही ऐसे किसी सर्वे की समय सीमाएं होती हैं। उनके माध्यम से हम पूरे युवा वर्ग को यौन अपराधी या यौन बीमार मानसिकता के कटघरे में खड़ा नहीं कर सकते। इसके बावजूद अगर कोई सीमित अध्ययन किसी खास प्रकार की रूझान दिखाता है तो उसके कारणों को गंभीरता से विश्लेषण कर निदान के लिए नीतियां और कार्यभार निकाला जाना चाहिए। खास तौर से ऐसे समाज में जहां यौन हिंसा की घटनाएं व्यापक रूप से घट रही है तथा जिसमें शामिल आरोपियों में युवा तथा किशारों का अनुपात ज्यादा है। नेशनल क्राइम रेकार्ड ब्यूरों के मुताबिक भारत में रोज 90 महिलाएं बलात्कार का शिकार होती हैं। एक सर्वे बताता है कि 96 फीसदी महिलाएं खुद को यौन हिंसा के प्रति असुरक्षित महसूस करती हैं। हर समय डर के साये में रहना पूरी आधी आबादी की मानसिक स्थिति के लिए नुकसानदेह है।

सुरक्षा: - पुलिस व न्यायिक सख्ती से अपराध पर काबू करना काफी हद तक संभव हो सकता है और इसे तो सुनिश्चित किया ही जानाचाहिए। महिलाओं के लिए सुरक्षित माहौल बनाने के लिए जरूरी है कि यह एक राजनीतिक मुद्दा बने तथा पूरे शहर के नियोजन में भी जेंडर भेद के मसले का हल निकाला जाए। सिओल एक ऐसा शहर है जहां महिलाएं मित्रता की तरह रहती है यहां पर सुरक्षा-निगरानी का तंत्र विकसित किया गया है। ऐसे कार्यस्थलों को प्रमाण दिया जाता है जो महिला के सुरक्षा और सुविधा का बड़े कल्पनाशील ढंग से बेहतर उपाय करते है।

कारण: - समाज की मानसिकता की पड़ताल इसलिए जरूरी है क्योंकि यह मुद्दा गंभीर है कि जिसके साथ प्रत्यक्ष हिंसा को अंजाम नहीं दिया जाता है वह भी ऐसे वातावरण के कारण अप्रत्यक्ष हिंसा झेलता है। अगर घर में पिता हिंसा करता है तो बच्चा सोचता है कि ऐसा करना आम बात है। पिछले कई सालों से सामाजिक स्तर पर काम करने वाले कुछ संस्थाओं तथा व्यक्तियों ने भी इस बात को उजागर किया हैं।

मानसिक: - अपराध के दौरान अपराधी मानसिक रूप से मजबूत होता है। उस समय उसका विवेक काम नहीं करता है उस समय वो अपने काम को उपलब्धि तक पहुंचानें का होता हैं। सामूहिक ज्य़ादती, डकैती जैसी वारदातों में अपराधी टीम की तरह काम करते हैं। उनकी व्यक्तिगत परवरिश, तौर-तरीके या नैतिक शिक्षा सब बेकार हो जाती है। समूह में यदि कोई किशोर भी इसे उपराध मानकर दूर जाने की कोशिश भी करता है, तो साथ वाले उसे उकसाते हैं। इससे वह भी इसे एक चनौती कर तरह लेता हैं। ऐसे लोगों में कोई अपराधबोध नहीं होता है। अक्सर अपराधी कमजोर और सीधे लगने वालों को ही शिकार बनाता हैं।

उपसंहार: - भारत में अदालत का जुवेनाइल के प्रति रवैया उदारवादी रहा है। अदालत 18 से कम या उससे थोड़ी ऊपर के उम्र वालों को सजाएं देने में बहुत सख्ती नहीं बरतता है लेकिन अदालत का एक नजरिया यह भी रहा है कि अगर इन अपराधियों को सजा नहीं देगें तो चीजें कैसे नियंत्रण में आएंगी। हालांकि कानून सख्त होने के साथ-साथ अपराध में कमी आई हो ऐसा नहीं दिखता। पॉर्न पर रोक नहीं सकते। ऐसे अपराधियों का कभी सामाजिक-आर्थिक अध्ययन नहीं कराया गया, फिर बिना मर्ज जाने कैसे अपराधों पर नियंत्रण पाने की उम्मीद कर सकते है?

- Published on: January 11, 2016