उत्तराखंड के जंगलों में आग (Fire in Uttarakhand Forest Essay in Hindi) [ Current Affairs ]

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प्रस्तावना: - उत्तराखंड के जंगलों में लगी आग अन्य राज्यों के जंगलों तक पहुंच रही है। इस पर काबू पाने के प्रयास तो काफी किए जा रहे थे पर फिलहाल उस समय तक सफलता नहीं मिली थी। छिटपुट आग तो हर साल लगती है और तीव्रता के लिहाज से देंखें, हर चार-पांच साल में ऐसी भयंकर आग लगती ही रहती है। लेकिन इस बार की आग समय से कुछ पहले लगी और इसकी व्यापकता भी काफी अधिक है।

पहाड़ी राज्य: - पहाड़ी राज्य उत्तराखंड की आग हिमाचल प्रदेश और जम्मू कश्मीर तक पहुंच गई है। दो महीने से अधिक समय से यह आग फैल रही है। सूखे पत्तों में लगी आग से ओजोन परत पर असर पड़ रहा है। मौसम विशेषज्ञों के मुताबिक चार से पांच महानगर एक साल में पर्यावरण को जितना नुकसान पहुंचाते हैं, उतना दो घंटे की आग से ही हो रहा हैं। झुलस रहे तीन राज्य उत्तराखंड, हिमाचल और जम्मू-कश्मीर के जंगल। अब तक 2269 हेक्टेयर वन क्षेत्र तबाह हो गये है।

दावा: -

  • एनडीआरएफ का दावा-70 फीसदी आग पर काबू पा लिया गया है…. कितनी बड़ी आग, 2, 650 हेक्टयर में फैली है यह आग। यानी 265 लाख वर्ग मीटर या 26.5 वर्ग किलोमीटर उत्तराखंड के 17, हिमाचल के 4 और जम्मू का राजौरी जिला भी आग की चपेट में है।
  • दिक्कते- आग से धुआं छाया हुआ है। हेलीकॉप्टर नहीं पहुंच पा रहे हैं। या पहुंचने पर पंखे की हवा से आग और भड़क रही है।
  • बचाव- 9, 000 से ज्यादा जवान तैनात किए गए हैं। स्थानीय लोग भी मदद कर रहे हैं। वायुसेना, एनडीआरफ और स्थानीय प्रशासन आग बुझाने की कोशिश कर रहा हैं।
  • तस्कर- टिंबर माफिया लकड़ी की तस्करी के लिए जानबूझकर आग लगा रहे हैं। चार लोगों को गिरफ्तार किया गया है।
  • नुकसान- विशेषज्ञों के मुताबिक अरबो रुपए का यह नुकसान है। यह पक्षियों के प्रजनन का सीजन है। बड़ी संख्या में इनके अंडे खाक हो गए। यहां कई दुर्लभ वन्य प्रजातियां के खत्म होने का भी खतरा है। 2, 552 हेक्टेयर से ज्यादा जंगल खाके हो चुके हैं। 1, 218 जगह अलग-अलग मामले सामने आए है। पौड़ी गढ़वाल, अल्मोड़ा और चमोली के तीन जिलों में 13 इलाके सबसे ज्यादा प्रभावित होते हैं

The worst fire in Past 25 years

The worst fire in Past 25 years

पिछले 25 साल में सबसे भीषण आग

1995

1999

2008

2010

करीब 375, 000 हेक्टेयर इलाके (उत्तराखंड) में फैली थी।

करीब 80, 000 हेक्टेयर क्षेत्र में (गंगा और यमुना के किनारे पर)

करीब 10, 000 हेक्टेयर में आग लगी महाराष्ट्र के मेलघाट में

करीब 19, 000 हेक्टेयर क्षेत्र में आग लगी (हिमाचल में)

देश में आग के मामले इस साल सबसे ज्यादा

2013 में

2014 में

2015 में

2016 में

18, 451

19, 054 मामले

15, 937 मामले

21, 000 से ज्यादा मामले अब तक

मानवीय असावधानी: - जंगल में कैस लगी आग, इसका पता लगाना कठिन है क्योंकि जंगल में आग लगने के कई कारण हो सकते हैं-

  • एक तो खेत में लगी मामूली आग, कई बार हवा से जंगल तक चली जाती है।
  • कई बार शिकारी भी वन में आग लगा देते हैं।
  • वनोपज की तस्करी की आशंका से भी इनकार नहीं किया जा सकता है।
  • कई बार ऐसा भी होता है जलती हुई तीली ही जंगल की आरे फेंक दी और इससे दहकी आग बेकाबू हो गई।

कुल मिलकार 99.99 फीसदी मानवीय असावधानी से ही आग लगती है। उत्तराखंड के मामले में भी मानवीय असावधानी ही आग का कारण बनी होगी इस मामले में सतर्कता बरतने की आवश्यकता है।

अन्य कारण: - जंगलों में सबसे पहले जीमन पर गिरे पत्तों में आग लगती है। इस बार सर्दियों में बारिश नहीं होने से उत्तराखंड के जंगलों की जमीनों में नमी नहीं बची थी। मार्च-अप्रेल में तापमान अधिक होने से पत्ते अधिक गिरे।

चीड़ जैसे पेड़ों की प्रजातियां मध्य हिमालय में होती हैं। इन्हें निचले इलाकों में नहीं होना चाहिए क्योंकि हवा चलने के साथ ये तेजी से आग पकड़ते हैं। बड़ी संख्या में निचले इलाकों में इन्हें रोपित किया गया है।

प्रयास: - एक समय था था जब तेज गर्मी में आग की आशंका के मद्देनजर वन अधिकारी पहले से योजनाएं तैयार कर लिया करते थे। ये योजनाएं नवंबर-दिसंबर में ही तैयार हो जाती थीं। वन अधिकारी ऐसे होते थे, उन्हें जंगल के अधिकतर वृक्षों की जानकारियां होती थीं। वे वनों के आसपास के गांवों के लोगों और वन विभाग के कर्मचारियों के साथ योजनाएं तैयार करते थे और अप्रिय परिस्थिति से निपटने की योजना को अमल में लाते थे। लेकिन, अब आपदा प्रबंधन को लेकर ठोस योजनाएं तैयार नहीं की जाती है। केवल आग से ही नहीं बल्कि अतिवृष्ट से भी बचने की योजनाएं बनाई जाती थीं। महिलाएं अपने गांवों में दो-तीन घंटे अतिरिक्त काम करके पत्थर की दीवार बनाकर अतिवृष्टि से बचाव कर लिया करती थी। अब ग्रामीणों का जंगल से वैसा जुड़ाव नहीं रह गया है। जैसा कि पहले हुआ करता था। लोगों को लगता है कि जंगल उनके नहीं सरकार के हैं। और इसमें आग लगे। कुछ भी नुकसान हो, उससे निपटने की जिम्मेदारी भी सरकार की है। वे आगे बढ़कर वन को बचाने के काम में सहायता के लिए नहीं आते।

राहत कार्य: -पहली बार एमआई -17 हेलीकॉप्टर की सहायता से पानी का छिड़काव कर, आग बुझाने की कोशिश की गई। इस हेलीकॉप्टर में एक बार में 3000 लीटर पानी वहन करने की क्षमता है। आग बुझाने के लिए वायुसेना, थलसेना और राष्ट्रीय आपदा राहत बल की सहायता।

लोकसभा: - उत्तराखंड के जंगलों में लगी आग की जानकारी मिलने के साथ ही जो भी त्वरित कार्रवाई हो सकती है, स्थानीय प्रशासन ने की है। केंद्रीय स्तर पर गृह मंत्रालय और वन पर्यावरण मंत्रालय द्वारा जो भी त्वरित कार्रवाई हो सकती है, उसे हम लोगों ने किया है। इस समय स्थिति पूरी तरह काबू में हैं। इसके बारे में जानकारी प्राप्त होने के बाद यहां से तुरंत ही एनडीआरफ की तीन समूह उत्तराखंड के लिए भेजी गई हैं। एयरफोर्स (वायुसेना) के तीन एमआई-17 हेलिकॉप्टरों द्वारा आग बुझाने का प्रयास किया जा रहा है।

गांव: -आग पर काबू पाने के मामले में आपदा प्रबंधन के इंतजाम बेहतर तरीके से करने होंगे। सभी किस्म की आपदाओ के मामले में वन विभाग निकटवर्ती गांव के लोगों को जोड़े। गांव के लोगों को जोड़ने का अर्थ केवल वन सरंक्षण और सवर्द्धन से ही नहीं है। इसके उपयोग से भी है। जब वन क्षेत्र के नजदीकी गांव के लोगों को लगता है कि वन हैं लेकिन उसके किसी काम के नहीं है। वनोपज का वे उचित मात्रा में इस्तेमाल नहीं सकते है। अन्य लोग वन विभाग से मिलकर वनोपज का न केवल उपयोग बल्कि आवश्यकता से अधिक दोहन करते हैं, उन पर किसी किस्म की रोक-टोक नहीं होती है। ऐसे में वनों के नजदीकी गांवों में रहने वाले लोग वनों से दूर भागने लगते हैं। केवल जंगलों के संवर्धन और संरक्षण ही नहीं बल्कि उनके उपयोग में, ग्रामीणों की भागीदारी हो। खासतौर पर महिलाओं को इस मामले में जागरूक किया जाए तो वे वनों को बचाने के मामले में पारंपरिक रूप से आगे आएंगी। पारंपरित व्यवस्था को पुनर्जीवित करना बेहद जरूरी है। उनके जुड़ने से गांवों के परिवारों को जुड़ाव वनों से हो सकेगा। इसके अलावा वनों के सुरक्षाकर्मी जैसे निचले तबके कर्मचारियों को भी प्रोत्साहन मिलना चाहिए। उन्हें समय-समय पर पदोन्नति मिले। उनकी संख्या में बढ़ोतरी करके, उनके वन क्षेत्र का दायरा कम किया जाए आपदा से निपटने में कारगर साबित होंगे। चूंकि पहाड़ी इलाके में अलग-अलग ऊंचाइयों पर आग लगी है इसलिए इसे रोकने के लिए इस तक पहुंचना बहुत टेढ़ी खीर साबित होता है।

ग्रामीण जागरूक: - जंगलों में आग अकसर लगती रहती है और इस पर समय रहते काबू भी पा लिया जाता है। लेकिन, उत्तराखंड के जंगलों में लगी आग ने जिस तरह से विकराल रूप धारण किया है, वह एक चिंता का विषय है। इसके लिए वनों के आसपास रहने वाले ग्रामीणों को जागरूक और सावधान करने की आवश्यकता है। आखिरकार, इस तरह की आग से न केवल उनका बल्कि देश की वनसंपदा का भारी नुकसान होता है। आमतौर पर वनों के आसपास रहने वाले ग्रामीण जंगलों में आग लगाते हैं। इसका बहुत ही सरल सा कारण होता है, पालतु पशुओं के लिए हरे चारे की व्यवस्था करना। जैसे-जैसे गर्मी बढ़ती है, ग्रामीणों के पास उनके पालतु पशुओं के लिए हरे चारा समाप्त होने लगता है। वनों में गर्मी में पेड़-पौधे और घास काफी कड़ी हो जाती है। जिसे पशुओं को उसे खाने में काफी परेशानी आती है। ऐसे में वन को आग देने से कड़े हो चुके पेड़-पौधे और घास जल जाते है और उनके स्थान पर नई कोंपलें आने लगती हैं। पालतू जानवर इन हरी और नई कोंपलों का सरलता से खा लेते हैं। इसके लिए गांव के लोग वनों को जला देते हैं। हालांकि इस तरह की आग पर काबू पा लिया जाता है लेकिन परेशानी तब होती है जबकि हवा चलती और आग बेकाबू होकर फेलने लगती है। इस बार भी ऐसा ही हुआ है।

भविष्य में ऐसा न हो इसके लिए ग्रामीणों को जागरूक करने की आवश्यकता है। उन्हें सिखाना पड़ेगा कि सूखे की शुरुआत हो, इससे पहले ही हरे चारे की व्यवस्था कर लें। इसके अलावा असमय रहते वनों की साफ-सफाई भी करवा ली जाए। आमतौर पर फरवरी-मार्च में जब पेड़ों की पत्तियां झड़ने लगती हैं तो उन्हें इकट्‌ठा करके, सीमित क्षेत्र में सावधानी पूर्वक जला दिया जाए। यदि यह कचरे समय से नहीं जलाये जाते है तो भी तेज गर्मी और सूखे के सीजन में इनके आग पकड़ने की आशंका बढ़ जाती है।

उपसंहार: - उत्तराखंड की व्यापक आग बुझाने लिए पहली बार हेलिकॉप्टर की सहायता से पानी की बौछार फेंकर काबू करने की कोशिश की जा रही है। यह तरीका कामयाब हो भी जाएगा। लेकिन भविष्य के लिए हमें निगरानी और सावधानी बरतने की आवश्यकता है। यह जागरूकता के बिना नहीं हो सकता है।

- Published on: June 29, 2016