प्रधानमंत्री बनने के बाद नरेंद्र मोदी जी का टीवी चैनल के माध्यम से पहला संवाद (First Talk of PM Modi after coming to Post through TV) [ Current Affairs ]

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प्रस्तावना:- प्रधानमंत्री बनने के बाद नरेंद्र मोदी ने एक समाचार प्रसारण के पूर्व साक्षात्कार दिया। देश का संचार माध्यम उनसे बतौर प्रधानमंत्री बातचीत की उम्मीद लगाए रहा, पर वे ’मन की बात’ के माध्यम एक तरफा संवाद करते रहे। अब उन्होंने पहली बार दो तरफा संवाद तो किया लेकिन देश के शेष मीडिया (संचार माध्यम) को छोड़ दिया। उनहोंने सुब्रमण्यम स्वामी को संकेतों में नसीहत दे दी, घरेलू राजनीति, विदेश नीति, आर्थिक सोच, नौकरशाही, देश भर में एक साथ चुनाव के मुद्दों पर वे खुलकर बोले भी थें, लेकिन बहुत से प्रश्न अब भी बाकी हैं। सुब्रमण्यम स्वामी के बयानों पर इतनी हल्की प्रतिक्रिया की जिसकी उम्मीद मोदी जी से नहीं थी। क्या इसके पीछे कोई विशेष रणनीति थी? ऐसे कौनसे सवाल है जो अब भी बाकी हैं?

भारत के प्रधानमंत्री:-

मोदी जी ने इतने लंबे समय बाद एक चैनल को चुना अपनी बात कहने के लिए। निस्संदेह यह उनका अधिकार है कि वे किस चैनल से बात करें अपनी बात लोगों तक पहुंचाए, सो उन्होंने किया। चूंकि भारतीय संचार माध्यम के सामने बोलने को लेकर उन्होंने शुरुआत कर दी है तो अब उम्मीद की जा सकती है कि वे जल्दी ही देश के अन्य समाचार पत्र-पत्रिकाओं और चैनलों के प्रतिनिधियों से भी बात करेंगे। बहुत सी बातें रह जाती हैं एक ही माध्यम से बात करने में, कुछ प्रतिप्रश्न ऐसे होते हैं, जिनके उत्तर छूट जाते हैं। बड़ी समाचार पत्र सम्मेलन में अनेक किस्म के सवाल होते हैं जिनसे बच पाना कठिन होता हैं।

समय:-

  • यह बात बहुत अधिक नहीं चौंकाती कि एक ही चैनल से उन्होंने क्यों बात की, बल्कि इस साक्षात्कार का जो समय चुना गया वह जरूर चौंकानें वाला और रोचक है। ऐसा लगता है कि यह सब प्रधानमंत्री की रणनीति का ही एक हिस्सा था। उन्होंने इस चैनल को डेढ़ घंटे का समय दिया और इस दौरान सभी प्रश्नों का बेहद सहज तरीके से मुस्कराते हुए उत्तर दिया। आमतौर पर प्रधानमंत्री से इतना समय नहीं मिला करता था।
  • उल्लेखनीय यह भी है कि इस साक्षात्कार के लिए समय तक दिया गया जबकि राज्यसभा सदस्य और भाजपा के वरिष्ठ नेता सुब्रमण्यम वित्तमंत्री अरुण जेटली और उनके काम करने वाले कार्यालयों पर बयानों से हमले पर हमले बोल रहे थे। क्या-क्या नहीं कहा उन्होंने। भाजपा में एक तरह से सन्नाटा छाया हुआ था और कोई भी स्वामी के बयानों पर टिप्पणी नहीं कर रहा था। सभी ने उनका निजी मत कहकर उनके बयानों से कन्नी काटी।

वित्त मंत्री अरूण जेटली:-

हमें यह भी समझना चाहिए कि वित्त मंत्री के बारे में कुछ कहने का अर्थ हैं कि पूरी सरकार जिसके मुख्याि खुद प्रधानमंत्री हैं, के बारे में कहना है। जेटली पर हमले तब अधिक हुए जब वे चीन गए हुए थे। उनके पहनावे तक पर बयाना दिए गए। वे प्रधानमंत्री से मिलने वाले थे लेकिन इस मुलाकात से एक दिन पहले ही प्रधानमंत्री ने यह साक्षात्कार दिया। इस साक्षात्कार में उन्होंने स्वामी को इशारों में चुप रहने को जरूर कहा। उन्होंने ऐसे बयानों को निजी प्रचार के लिए किया गया स्टंट कहा हैं, लेकिन ऐसा लगा कि प्रधानमंत्री ने स्वामी की बातों पर प्रतिक्रिया तो दी लेकिन बेहद हल्की। अब जेटली से मुलाकात मे वे औपचारिकता के लिए कह सकते हैं कि स्वामी को चुप करा दिया गया है। लेकिन प्रधानमंत्री के इस व्यवहार ने जेटली के कद में कमी कर दी हैं।

मोदी जी:-

हर प्रश्न का प्रधानमंत्री मोदी ने हंसते हुए उत्तर दिया और लगा कि वे पूरी तैयारी के साथ प्रश्नों का उत्तर दे रहे थे। उन्होंने बताया कि सरकार ने किस तरह से सारा ध्यान गरीब और गरीबी पर रखा है। ऐसा लगता है कि वे कांग्रेस की पुरानी नीति पर ही चल रहे हैं, विदेश नीति को लेकर भी उन्होंने सहजता के साथ जवाब दिए। उन्होंने इशारों में ही कांग्रेस को भी नसीहत दे डाली। उन्होंने बहुत ही सही बात भी कही कि जब आप सत्ता में नहीं होते हैं तो बहुत सी बातें आपको पता नहीं होती है। लेकिन, अब आप सत्ता के बाद विपक्ष में होते है तो आपको बहुत सी बाते पता होती हैं। ऐसे में जिम्मेदारी के साथ व्यवहार करना बहुत ही जरूरी हो जाता है।

विदेश नीति:-

उन्होंने विदेश नीति के बारे में भी स्पष्ट किया कि जब आप बहुमत में होते हैं तो आप अपनी बात को मजबूती से रख पाते हैं दुनिया बात को उसी तरह से स्वीकार भी करती है। उन्होंने नौकरशाही के संदर्भ में भी कहा कि अब उनके साथ ताल से ताल मिलकार चल रही हैं। जो साथ काम करने लायक नहीं थे, उनके स्थानांतरण भी किए गए हैं। और कुछ को हटा दिया गया है। उन्होंने देश भर में एक साथ चुनाव कराए जाने के मुद्दे पर पूरी गंभीरता से विचार करने की बात कही और कहा कि ऐसा करने में कालाधन बहुत इस्तेमाल होता हैं। इस संदर्भ में सकरातमक तरीके से सोचने की आवश्यकता हैं। हालांकि बहुत से ऐसे सामाजिक मुद्दे थे, जिन पर सवाल -जवाब किए जाने चाहिए थे पर वे अनुत्तरित रह गए। लेकिन उम्मीद कर सकते है कि जब वे व्यापक भारतीय मीडिया से रूबरू होंगे तो उनसे उन मुद्दों पर भी बात होगी।

साक्षात्कार के मुद्दे निम्न हैं-

  • कैराना मामला- पीएम मोदी ने कहा कि उत्तर प्रदेश में विकास के मुद्दे पर बात होनी चाहिए पर दल से सांसद, विधायक और दल अध्यक्ष कैराना में सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की कोशिश में लगे हुए हैं। बीजेपी सांसद हुकुम सिंह ने कुछ दिन पहले यहां से हिंदुओं के पलायन का मुद्दा उठाया था जो सही नहीं निकला।
  • उत्तराखंड राष्ट्रपति शासन- भारतीय जनता दल नेतृत्व वाली केंद्र सरकार पर राज्य सरकारों को अस्थिर करने के आरोप लगे। विशेषतौर पर उत्तराखंड और अरुणाचल प्रदेश में राष्ट्रपति शासन लगाकर सरकारें गिराने की कोशिश की गई। इन मामलों में सरकार की उसके फेसले को लेकर किरकरी बहुत हुई।
  • डिग्री विवाद- पिछले महीने मोदी की उपाधि को लेकर विवाद गहरा गया था। उनके अलावा मानव संसाधन विकास मंत्री स्मृति ईरानी के खिलाफ आरोप लगा कि उन्होंने चुनाव आयोग को वर्ष 2004 और 2014 के आम चुनावों में अपनी डिग्री के बारे में अलग-अलग हलफनामे दिए थे।
  • चेतन चौहान और गजेंद्र चौहान की नियुक्ति- हाल ही में राष्ट्रीय फैशन (देश की लोकप्रिय शैली /चलन) तकनीकी संस्थान (निपट) में क्रिकेटर से राजनेता बने चेतन चौहान की नियुक्ति पर सवाल उठे। इसके अलावा पूर्व में पुणे स्थित फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टिट्‌यूट ऑफ इंडिया (एफटीआईआई) के अध्यक्ष बने गजेंद्र चौहान के खिलाफ छात्रों ने लंबा आंदोलन चलाया था।
  • एस्सार उजागर- हाल ही में उजागर इस टेपकांड ने एक बार फिर से राजनीति और कॉरपोरेट (संगठन समूह) जगत की मिलीभगत के संकेत दिए हैं। इस टेपकांड में कई नेताओं, नौकरशाहों और बिचौलियों की बातचीत सामने आई है। पूर्ववर्ती एनडीए सरकार के कार्यकाल के कई मंत्री इस टेपकांड की चपेट में हैं।
  • ललित मोदी स्कैंडल-क्रिकेट के नए संस्करण इंडियन प्रीमियर लीग में वित्तीय गड़बड़ियों के आरोपी ललित मोदी को ब्रिटिश यात्रा दस्तावेज दिलाने में ’मदद’ करने के आरोप में विदेश मंत्री सुषमा स्वराज और राजस्थान मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे का नाम सामने आया था। इस मामले में दल की काफी आलोचना हुई थी।
  • व्यापम घोटाला- भाजपा शासित मध्यप्रदेश में उसके पिछले कार्यकाल में व्यापम घोटाला सामने आया था। इस घोटाले से जुड़े करीब 50 लोगों की मौत संदिगध परिस्थितियों में हुई हैं। शुरुआत में इसमें कई नेताओं के नाम उछले थे लेकिन हालिया जांच की सूची में किसी भी नेता का नाम इसमें शामिल नहीं है।
  • चीनी नेता का वीजा रद्द करना-इसी साल 2016 अप्रेल में चीन के असंतुष्ट नेता डोल्कुन ईसा का वीज रद्द करने के बाद भारत ने चीन की एक अन्य असंतुष्ट नेता लु जिंगुआ और कार्यकर्ता आर. वांग का वीजा भी रद्द कर दिया। माना गया है कि भारत इन असंतुष्ट नेताओं को वीजा देकर चीन से नाराजगी मोल नहीं चाहता था।

साक्षात्कार:-

मोदी जी ने एक चैनल को साक्षात्कार दिया और देश के सामने बहुत सी बातों पर अपना पक्ष रखा। लेकिन, एक ही चैनल से बातचीत में अकसर ऐसा होता है कि बहुत सी बातें अनकहीं रह जाती हैं। बहुत से प्रश्न जिनके जवाब जनता जानना चाहती है, छूट जाते हैं। इस साक्षात्कार में भी बहुत से प्रश्न छूट गए है।

भारत के जनमानस में जो तमाम मुद्दे अभी मौजूद हैं, जिनके जवाब जनता चाहती है, उन सब से जुड़े सवाल और जवाब इस साक्षात्कार में नहीं थे। मोदी जी ने कहा कि उन्होंने महंगाई कम की है। लेकिन जनता से पूंछे तो वह महंगाई से लगातार जूझ रही है। इसी तरह हिंदुत्व के मुद्दे पर जगह-जगह ध्रुवीकरण होता हैं। भाजपा के नेता भड़काने वाले बयान देते हैं। उस पर कोई चर्चा नहीं की गई हैंं स्वामी के बारे में भी अप्रत्यक्ष तौर पर उन्होंने जवाब दिया। उन्होंने सीधे नाम लेकर नहीं कहा कि स्वामी को, योगी आदित्यनाथ को या फिर अन्य बड़बोले नेताओं को बेवजह विवाद पैदा नहीं करना चाहिए। इस साक्षात्कार में ऐसा लगा कि सवालों के जवाब पहले बनाए जा चुके थे।

संचार माध्यम:-

आमतौर पर प्रधानमंत्री संचार माध्यम से दूरी बनाए रखते हैं। सोशल मीडिया पर यह टिप्पणियां चल रही हैं कि यह साक्षात्कार प्रायोजित था। हालांकि मोदी ने मुद्दों को सामने रखने का प्रयास किया। उन्होंने मीडिया से बात करने की खानापूर्ति जरूर की है। वैसे तो वे खुद ही देश से मन की बात करते ही हैं। पर जो जवाब उन्होंने दिए उनके सवाल साक्षात्कार से गायब थे। जो असली मुद्दे जनता के समक्ष आते हैं, उन पर जवाब दिए जाने थे। मोदी ने विदेश नीति एनएसजी, कर आदि पर बात की, वह सीधे आम आदमी से जुड़ा मुद्दा नहीं है। स्थानीय स्तर पर तो जनता आज भी भ्रष्टाचार और नौकरशाही की लेटलतीफी से जूझ रही है। केवल दिल्ली में हुए कुछ सुधारों से देश लाभांवित हो रहा है, ऐसा नहीं माना जा सकता है। पूर्व में रहे प्रधानमंत्री भी समाचार पत्र सम्मेलन करते थे और साक्षात्कार भी देते थे। वैसे ही मोदी को भी पूरे मीडिया से रूबरू होते रहना चाहिए, उन्होंने चुनाव के बाद से ही एक दूरी बनाए रखी हैं। जिन मुद्दों को उन्होंने नहीं छुआ, उम्मीद है कि वे आने वाले समय पर पल-पल की जानकारी देते रहते हैं पर कई मुद्दों पर चुप्पी साधे लेते हैं। हालांकि इस साक्षात्कार में जो भी सवाल पूछे गए उनके स्पष्ट जवाब दिए। पानी की समस्या पर उनकी मंख्यमंत्रियों से बातचीत का जिक्र उन्होंने किया। खेती और रोजगार के लिए हो रहे नवाचार उन्होंने बताए। मोटे तौर पर उन्होंने देखभाल के मुद्दे पर जोर दिया। वे जनता को बताना चाह रहे हैं कि वे इस पद के मुताबिक काम कर रहे हैं।

उपसंहार:- मोदी आमतौर पर मीडिया से दूरी बनाए रखने के लिए जाने जाते हैं। यह छवि उनकी गुजरात में मुख्यमंत्री काल से ही रही हैं। लोकसभा चुनाव प्रचार के दौरा उन्होंने मीडिया से बात की थी। अब दो साल बाद पहला साक्षात्कार उन्होंने दिया हैं। जिसमें पूछे गए सवालों के जवाब उन्होंने स्पष्ट दिए पर जनता से जुड़े कई खास मुद्दे के सवाल जवाब अभी होने बाकी हैं। अब आगे कब वे जनता के सवालों का जवाब स्पष्ट रूप से मीडिया के सामने देगें, यह सब आगे देखा जाएगा।

- Published on: August 17, 2016