पांच उच्च समाचार भाग-1 (Five Main - News Part - 1 in Hindi) [ Current Affairs ]

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प्रस्तावना: -यहां देश की सबसे बड़ी उच्च पांच समाचार हैं जो अभी वर्ष 2016 में घटित हुए हैं। पेश हैं सचिन तेंदुलकर और लता मंगेशकर पर विवादित हंसी वीडियो, अफ्रीकी छात्रों पर हमला, क्रिकेट कोच की तलाश, नए नौसेना प्रमुख और विधायिका से जुड़ी पांच टिप्पणियां हैं।

1 लता-सचिन का वीडियो (दृश्य चित्र करना): -

  • अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर क्या उद्दण्डता की सीमा तक जा पहुंची उच्छृंखलता को सहन किया जाना चाहिए? क्या लोकतंत्र में हंसने के मानव अधिकार के नाम पर किसी की भी हंसी उड़ाने की छूट हो सकती है? पिछले दिनों सामाजिक मीडिया पर एक कलाकार तन्मय भट्ट ने स्वर साम्राज्ञी लता मंगेशकर और क्रिकेटर सचिन तेंदुलकर को लेकर जो विवादास्पद वीडियो अपलोड किया उससे इस तरह के सवाल ज्यादा खड़े हो गए हैं। वीडियो में इन दोनों हस्तियों के हवाले से भद्दी भाषा का इम्तेमाल किया गया है। सही मायने में इसमें हास्य नहीं बल्कि फूहड़ता का पुट ज्यादा है। सचिन तेंदुलकर और लता मंगेशकर के साथ किये गये इस मजाक से उनके प्रशसंक सिर्फ इसलिये आहत नहीं हैं कि दोनों भारत रत्न से सम्मानित हैं। बल्कि इसलिए भी आहत हैं क्योंकि दोनों ने अपने अपने क्षेत्र में उपलब्धियों के साथ मर्यादित सार्वजनिक जीवन जिया है।
  • हां, यह वीडियों व्यंग्य के नाम पर यदि सचिन और लता मंगेशकर के से जुड़ी किसी विसंगति पर रचनात्मक प्रहार करता हो उसे एक व्यंग्यकार की अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर स्वीकार किया जा सकता था। पहले भी हास्य कलाकार हस्तियों का मजाक करते रहे हैं। यह वीडियों भाषा की शुचिता रखने की हमारी परंपरा से भी खिलवाड़ करता है। इस तरह के कृत्य की देश भर में हो रही आलोचना जायज ही है। किसी को अमर्यादित बर्ताव की अनुमति भला क्यों दी जा सकती हैं? वेदों में कहा गया है कि वह हंसी जो किसी की सहजता को आहत करने वाला हो वह हंसी का तामसी रूप हैं। कुछ लोग इसलिए भी विवादों में रहना चाहते हैं क्योंकि विवादों से पनपी बदनामी में भी वे अपने नाम के प्रचार की संभावनाओं को यश अर्जन से कम नहीं मानते है। वरना इस सारे मामले से विवाद में आये तन्मय भट्ट को मुंबई में हुए उस विवादस्पद कार्यक्रम के पहले कितने लोग जानते थे, जिस कार्यक्रम में मंच पर खुल कर ऐसे मजाक उड़ाया हों।

अतुल कनक, स्वतंत्र टिप्पणीकार

2 भारतीय क्रिकेट टीम (दल): -

  • हमें जब भी भारतीय क्रिकेट दल के लिए कोच (खिलाड़ियों को प्रशिक्षण देने वाला व्यक्ति) बनाने या चुनने की बारी आती है तो क्रिकेट बिरादरी और प्रशंसक दो गुटों में बंट जाते हैं। एक वह, जो कहता है कि भारतीय टीम को क्रिकेट की जरूरत ही नहीं है। दूसरा वह है, जो मानता है कि क्रिकेट दल के लिए अलग से कोच होना चाहिए। अभी जब भारतीय दल के लिए कोच चुनने की बात चल रही है तो फिर यह चर्चा गरमा रही है। पहले की तरह ही कई भारतीय खिलाड़ी और विदेशी खिलाड़ियों के नाम सामने आ रहे हैं। भारतीयों में राहुल द्रविड़, रवि शास्त्री, संजय बागड़ और बाहरी खिलाड़ियों में माइकल हसी, डेनियल विटोरी, स्टुअर्ट लॉ के नाम चल रहे हैं। वैसे देखा जाए तो अब भारतीय क्रिकेट टीम के लिए कोच की जरूरत न के बराबर रह गई है।
  • एक दौर था, जब हमें वाकई एक क्रिकेट कोच की जरूरत थी। एक-डेढ़ दशक पहले वाली भारतीय क्रिकेट टीम को देखें और आज महेंन्द्र सिंह धोनी और विराट कोहली के नेतृत्व वाली क्रिकेट दल को देखें तो बहुत अंतर आ गया है। पहले हमारी क्रिकेट अंतरराष्ट्रीय खिताब से काफी पीछे चल रही थी। चाहे आधुनिकता के मामले में हो या खिलाड़ियों के प्रदर्शन के मामले में। वर्ष 2000 में जब जॉन राइट कोच बने तो वे भारतीय क्रिकेट टीम को आधुनिक प्रशिक्षिण की ओर लेकर गए। तकनीकी रूप से हम मजबूत हो गए। खिलाड़ियों का प्रदर्शन सुधरा। ऑस्ट्रलिया, साउथ अफ्रीका जैसी दलों को टक्कर देने लगे थे। मौजूदा क्रिकेट दल को देखें तो हमारे खिलाड़ी न केवल अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रथम हैं बल्कि तकनीकी रूप से काफी सक्षम हैं। महेंन्द्र सिंह धोनी जैसे कप्तान और फिनिशर, विराट कोहली जैसे शिखर के बल्लेबाज को भला कोच की क्या जरूरत पड़ेगी? यहीं इस बहस को बल मिलता है कि इतने दिग्गज और सीनियर (उच्च) खिलाड़ियों को भी कोच की जरूरत होती हैं? शेन वॉन जैसे क्रिकेटर सीनियर क्रिकेटर्स के लिए कोच के खिलाफ रहे हैं। उनका मानना हैं कि ये खिलाड़ी खुद ही अपने आप में सक्षम होते हैं।
  • वैसे भी भारतीय क्रिकेट टीम से रवि शास्त्री निदेशक के तौर पर जुड़े हुए थे। वे हर तरह से कोच की भूमिका भी अदा कर रहे थे। संजय बांगड़ दल के साथ बतौर सहायक कोच जुड़े हुए थे। आजकल अंतरराष्ट्रीय स्तर पर शॉर्ट (छोटा) टर्म कोच का भी चलन बढ़ गया है। पहले की तरह लंबे समय के लिए कोच नहीं रखे जा रहे हैं। ज्यादा ध्यान फिटनेस (अच्छा स्वास्थ्य) और शारीरिक प्रशिक्षण पर ही है। इन दिनों कोच की भूमिका टीम के साथ आने-जाने से ज्यादा नहीं रह गई है। हां, कप्तान (नेता) के लिए किसी खिलाड़ी को ड्रॉप (गिरना/अलग) करने या शामिल करने में कोच उसके लिए सहायक रहता हैं।

विमल कुमार, टीवी खेल पत्रकार

3 नए नौसेना प्रमुख: -

  • भारतीय नौसेना के नए प्रमुख सुनील लांबा अब समंदर के रास्ते देश की हिफाजत की जिम्मेदारी संभालेंगे। कार्यभार संभालते समय लांबा ने देश की नौसेना को दुनिया की बेहतरीन नौसेनाओं में शुमार बताया। उन्होंने कहा, इसकी कमान संभालना मेरे लिए सम्मान और सौभाग्य की बात हैं। उन्होंने नौसेना के बेड़े को और आधुनिक बनाने की बात भी कही। लांबा का परिवार मूलत: हरियाणा के पलवत जिले के अमरपुर गांव का रहने वाला है। 17 जुलाई 1957 को जन्मे लांबा की प्रारंभिक शिक्षा अजमेर के मेयो महाविद्यालय में हुई। उनके पिता सेना की शिक्षा कोर में कंमाडर थे। और अजमेर में भी पदस्थापित रहे। भाई अनिल लांबा भी नेवी से लेफ्टीनेंट के पद से सेवानिवृत हुए हैं। नेशलन डिफेंस एकडमी में दाखिला मिलने के बाद एक जनवरी 1978 को लांबा को भारतीय नौसेना में बतौर आफिसर कमीशन मिला। वे भारतीय नेवी की एग्जीिक्यूटिव श्ााखा में नेवीगेशन और डायरेक्शन स्पेशलिस्ट (नाव संचालन व दिशा विशेषज्ञ) के रूप में कमीशंड हुए है। लांबा का नौसेना प्रमुख का कार्यकाल 31 मई 2019 तक होगा। लांबा ने महाविद्यालय ऑफ डिफेंस मैनेजमेंट, (रक्षा व्यवस्था) सिकदंराबाद में संकाय सदस्य के रूप में सेवाएं दी है। तीन दशक से अधिक के जीवननिवृति में उन्होंने जंगी जहाज आईएनएस सिंधुदुर्ग और फ्रिगेट आईएनएस दुनागिरि पर नेविगेटिंग अधिकारी के तौर पर सेवाएं दी। वे अग्रिम पंक्ति के चार जंगी जहाजों, आईएनएस काकीनाडा, आईएनएस हिमगिरि, आईएनएस रणविजय और आईएनस मुंबई की कमान संभाल चुके हैं। पश्चिमी बेड़े के फ्लीट (मछली का मोटा टुकड़ा बिना कांटे व हड्‌डी वाला) ऑपरेशन (संचालन पद्धति) अधिकारी और दक्षिणी एवं पूर्वी नौसेना कमान के चीफ ऑफ स्टाफ (कर्मचारीगण के मुख्य) भी रहे हैं। उन्हें परम विशिष्ट सेवा पदक और अति विशिष्ट सेवा पदक से भी सम्मानित किया जा चुका हैं।

4 नस्लीय हमले: -

  • हमारे देश में यह कड़वी सच्चाई है कि यहां संदियों से ’ब्राह्यणवाद’ का चलन रहा है। गोरेपन के लिए हमारी आसक्ति हमेशा रही है। जब भी हम कोई ’मैट्रिमोनियल’ विज्ञापन देखते हैं तो उसमें हम गोरा लड़का या लड़की की चाहत रखते हैं। अफ्रीकियों के साथ भारत में ही भेदभाव और उन पर हमले नहीं होते हैं। अमरीका और यूरोप में तो भयानक हमले होते रहे हैं। इनकी प्रकृति नस्लीय तो है। खुद हमारे देश के भीतर ही उत्तर पूर्व से आने वाले छात्र-छात्राओं के साथ होने वाले भेदभाव और नस्लीय टिप्पणियां जगजाहिर हैं। उन पर हमले होते हैं। उन्हें चाइनीज कहकर पुकारा जाता है। यह भेदभाव सभी वर्गों में होता है। दिल्ली में अफ्रीकियों को नाइजीरियन कहकर भला-बुरा कहा जाता है। भारत में नाइजीरियन का एक समूह है जो ड्रग (दवा) कॉर्टेल ें शामिल है पर अफ्रीकियों को निशाना बनाना गलत है। गोवर के मुख्यमंत्री ने कहा नाइजीरियन से गोवा के नागरिक परेशान हैं। उनकी जीवनशैली से गोवा वालों को दिक्कत हो रही है। पहले वहां के पर्यटन मंत्री नाइजीरियाई लोगों को स्वदेश भेजने की बात कह चुके हैं। पर गोवा में इजरायली लोग भी ड्रग कॉर्टेल में शामिल रहते हैं, उन पर न तो हमले होते और न ही उन्हें बाहर करने की बात होती।
  • नस्लीय भेदभाव के लिए किसी एक सरकार को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता है। नस्लीयता हमारे देश में विद्यमान है, इससे इनकार नहीं किया जा सकता है। हम उनको कमतर समझते हैं क्योंकि वे काले हैं। उनकी बनावट गोरे लोगों से अलग दिखती है। हम शक्ल से देखकर उन्हें अपराधी समझते हैं। यह सोच नहीं बदली है। हम दुनियाभर में टीवी विज्ञापन देख लें, बड़े-बड़े अभिनेता गोरेपन की क्रीम का विज्ञापन करते हैं। गोरेपन का बड़ा कारोबार दुनियाभर में फैला हुआ है। अमरीका-यूरोप में श्वेतों को अच्छा माना जाता है, यही हाल भारत में है। यहां गोरा होना गर्व से देखा जाता है। यह समस्या सदियों से भारतीय समाज में पनपी हुई हैं। समाज में आसपास गोरे लोग रहने चाहिए। जो काले हैं वे पिछड़े कहलाते हैं। दलितों को ही हमारे समाज में पिछड़ा और कमतर माना जाता है। उन पर हमले होते हैं।
  • हम जब अमरीकी, ऑस्ट्रेलियाई या यूरोप के किसी व्यक्ति से मिलते हैं तो नजरिया अलग होता है ओर उनसे मिलकर अच्छा महसूस करते हैं। जबकि किसी अफ्रीकी से खुले दिल से नहीं मिलते हैं। उनसे दूरी रखते हैं। दिल्ली में उन पर जो हादसे हो रहे हैं, वे नस्लीय हैं। हमारे बड़े शहरों में ऐसे कई इलाके हैं, जहां अश्वेत लोग भयभीत रहते हैं। जरा-सा उनका संगीत तेज हो जाए तो उन्हें धमकियां मिलती हैं। हमें हरेक नाइजीरियाई या अफ्रीकन को अपराधी समझने की प्रवृति छोड़नी होगी।

प्रो. कमल मित्र चिनॉय, जेएनयू, नई दिल्ली

5 राज्यसभा का फैसला: -

  • संसद के उच्च सदन राज्यसभा ने फैसला लिया है कि यदि उसके वर्तमान सदस्य का सत्रावसन के दौरान निधन हो जाता है तो सदन की कार्यवाही पूरे दिन के लिए स्थगित नहीं की जाएगी। सत्र के दौरान वर्तमान सदस्य का निधन हो जाता है तो पुरानी व्यवस्था के मुताबिक सदन की कार्यवाही पूरे दिन के लिए स्थगित की जाएगी। राज्यसभा की ओर से उठाया गया यह कदम निस्संदेह बहुत सोच-समझकर उठाया गया, यह कदम अच्छा है।
  • यूं तो ऐसा कदम काफी पहले ही उठा लिया जाना चाहिए था लेकिन कहा जा सकता है कि देर से आये पर आए तो सही। सत्रावसान के दौरान सदन के सदस्य के निधन के बाद, राज्यसभा सत्र की शुरुआत के साथ ही स्थगन किसी भी मायने में अच्छा नहीं का जा सकता। सदस्य को श्रद्धांजलि देने के और भी कई तरीके हो सकते हे। उनके प्रति शोक व्यक्त करके, कार्यवाही का जारी रखी जा सकती है या फिर विशेष बैठक बुलाकर शौक व्यक्त किया जा सकता है। दूसरी ओर यह बात ध्यान दने योग्य है कि यदि वर्तमान सदस्य का निधन सत्र के दौरान ही होता है तो ऐसे में इस बात की संभावना बहुत अधिक होती है कि उस सदस्य के अंतिम संस्कार में बहुत से अन्य सदस्य शामिल हो। ऐसे में तो जरूरी लगता है कि अंतिम संस्कार वाले दिन राज्यसभा स्थगित की जानी चाहिए। पिछले कुछ वर्षो के अनुभव भी कामकाज के मामले में बहुत अच्छे नहीं रहे है। संसद के उच्च सदन से तो विशेष मानदंड स्थापित करने की आवश्यकता महसूस की जाती रही है लेकिन वहां भी सदस्यों की अनुपस्थिति देखने को मिलती रही है। ऐसे में कहा जा सकता है कि उच्च सदन में भी काम तो बहुत ही कम हो रहा था।
  • सीमित होते कामकाज की परिस्थिति को देखते हुए राज्यसभा से इस तहर से फेसले की ही उम्मीद थी। यह संसद के उच्च सदन का ऐसा अनुकरणीय कदम है, जिसे राज्यों की विधानसभाओं को भी उठाना चाहिए। हालांकि लंबे समय से चल रही परिपाटी को बदलना इतना आसान नहीं है। लेकिन शोकाभिव्यक्ति के बाद सदन की कार्यवाही जारी रखी जाए तो लंबित काम निपटने में सहूलियत होगी। हम इस बात को अच्छी तरह जानते हैं कि कई बार राज्यों की विधानसभा व विधानपरिषदों में सामान्य अवधि के दौरान ही कई बार ऐसी ही स्थिति देखने को मिलती है कि कोरम ही पूरा नहीं हो पाता। राज्यों में विधानसभाओं में भी राज्यसभा के इस फेसले से सीख लेते हुए सत्रावसान के दौरान सदस्य के निधन के बाद पूरे दिन के लिए सदन को स्थगित करने की परिपाटी से बचने वाला कदम उठाना चाहिए।

सुभाष कश्यप, संविधान विशेषज्ञ

उपसंहार: -

  • आज हम देश की हाल ही (वर्ष 2016) में घ्टित पांच प्रमुख समाचारों को आपके समाने लेकर आए जिसमें अलग-अलग बाते एवं अलग-अलग विचार हमारे सामने आए हैं। ऐसी ओर खबरे हम आगे भी लाते रहेगें। जिसके बारे में जानना हम सब के लिए आवश्यक हैं।

- Published on: July 6, 2016