अर्थव्यवस्था (जीडीपी विस्तार)(Economy (GDP Expansion -Essay in Hindi )) [ Current Affairs ]

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प्रस्तावना: - यह जानकार हमें बहुत खुशी होती हैं कि भारतीय अर्थव्यवस्था लगातार तरक्की की ओर बढ़ रही हैं। 2015 - 16 में यह बढ़त 7.6 फीसदी की रफ्तार से बढ़ी और मार्च तिमाही में यह दर 7.9 फीसदी रही। पर यह खुशी कुछ ही पलों में तब टूट जाती हैं जब हम विश्व बैंक की निम्न मध्यम आय की सूची में पाकिस्तान, घाना जैसे मुल्कों के साथ खुद को देखते हैं। देश में करोड़ों बेरोजगारों को देखते हैं, घटते निर्यात और एनपीए में डूबे बैंको को देखते हैं। खस्ताहाल खेती और आत्महत्या करते किसानों को हम देखतें हैं। क्या हमने इस विरोधाभासी तरक्की का सपना संजोया था? नहीं। भारत को निश्चित ही तरक्की चाहिए पर इसके लिए खुशहाल खेती हो, नौकरियां हों और अच्छी आया हो। तभी ही भारत जैसे देश को निश्चित तौर पर खुशी मिल पाएगी।

सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी): -

  • का सरल भाषा में मतलब है कि किसी भी देश में एक साल में होने वाले कुल उत्पादन में कितनी वृद्धि हुई। जैसे औद्योगिक सामग्रियों, कृषि उत्पादन और सेवाओं आदि में हुई वृद्धि। पर जीडीपी वृद्धि को लेकर भारत में कुछ वर्षों से विवाद चल रहा है। सीएसओ (केंद्रीय सांख्यिकी कार्यालय) ने जीडीपी आंकने का तरीका बदल दिया। भारतीय रिजर्व बैंक के राजपाल रघुराम राजन, प्रधानमंत्री के आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रमण्यन ने सीएसओ के आंकड़ों पर सवाल भी उठाया। मौजूदा आंकड़ों के हिसाब से पिछले वित्तीय वर्ष भारत की जीडीपी 7.6 फीसदी दर से बढ़ी। इस साल मार्च तिमाही में यह 7.9 फीसदी रही। प्रधानमंत्री मोदी विदेश में कह रहे हैं कि भारत सबसे तेज गति से बढ़ रहा है। हमने चीन को भी पीछे छोड़ दिया है। पर इस कहानी के पीछे की हकीकत कुछ ओर हैं। जीडीपी वृद्धि दर के लिहाज से भारत ने दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था चीन पर बढ़त बनाए रखी है।
  • आगे आरबीआई राजपाल रघुराम राजन का भी कहना है कि तेज विकास दर पर हमें ज्यादा उत्साहित नहीं होना चाहिए। जीडीपी के आधार पर भारत दुनिया के सबसे गरीब देशों में से एक है। उसकी छवि ऐसे देश की है। जिसने अब तक अपनी क्षमता से कम प्रदर्शन किया है। जहां तक चीन से तुलना का प्रश्न है यह ध्यान रहे कि चीन की अर्थव्यवस्था का आकार 1960 के दशक में भारत से कम था। आज उसकी अर्थव्यवस्था भारत से 5 गुना अधिक है। औसत चीनी व्यक्ति औसत भारतीय से चार गुना ज्यादा धनवान है। भारतीय अर्थव्यवस्था में सुधार के लिए देश को 20 साल तक तेजी से बढ़ना होगा, तब जाकर आम आदमी के जीवन स्तर में सुधार आएगा। मोदी सरकार ने पिछले दो वर्षों में जो कदम उठाएं हैं, उनसे आर्थिक बदलाव करीब आते हुए जरूर दिख रहे हैं। पिछले दो वर्षों में राजकोषीय सुदृढ़ीकरण की राह पर सरकार की प्रतिबद्धता दिखाई दी हैं। लेकिन संयोगवश इसमें तेल और जिंसों की घटी हुई कीमतों का काफी योगदान है। अभी असली परीक्षा बाकी है।

आंकड़े: -

  • अगर हम इन आंकड़ों की तह में जाएं तो सीएसओ (केंद्रीय सांख्यिकी कार्यालय) ने इस बार बताया कि जीडीपी विस्तार कीमत में करीब 50 फीसदी आंकड़े पुराने समायोजन के कारण बढ़े। यानी हमारा उत्पादन आंकड़ों में बताई गई दर से नहीं बढ़ा। हमारी आंकड़ों की विसंगति के कारण जीडीपी विस्तार मार्च तिमाही में 7.9 फीसदी आंकी गई। इसका मतलब है कि सचमुच जीडीपी में उतनी तरक्की नहीं हुई। इसकी हकीकत जानने के लिए आईआईपी (इंडिया इंडस्ट्रियल प्रोड्‌क्शन) भारत के उद्योग उत्पादन में देखें। आईआईपी सूचकांक या तो तरक्की नहीं हो रही है या वह बहुत धीमी गति, दो-ढाई फीसदी से बढ़ रहा है। वहीं लगातार दो साल से सूखे के कारण कृषि क्षेत्र में उत्पादन नहीं बढ़ा। पर जीडीपी में वृद्धि हुई। आंकड़ों की इस बाजीगिरी पर विभिन्न अर्थशास्त्रियों ने सवाल उठाए हैं।
  • अब विश्व बैंक की नई सूची में भारत निम्न मध्यम वर्ग में आ गया है। इसलिए सरकार जो चमकती हुई तस्वीर दिखा रही है, उसके पीछे बहुत अंधेरा है। एक और बात, जो पहले घटित नहीं हुई। मुद्रास्फीति को मापने के लिए दो सूचकांक हैं। थोक मूल्य सूचकांक (डब्ल्यूपीआई) और दूसरा (सीपीआई) इसमें आश्चर्य की बात है कि पिछले 15 महीनों से थोक मूल्य सूचकांक लगातार गिरकर नकारात्मक हो चला है। पर सीपीआई बढ़ रहा है। यानी खाद्यान्न के दाम बढ़ रहे हैं। उपभोक्ता को अधिक दाम चुकाने पड़ रहे हैं। ऐसा इतिहास में नहीं हुआ है कि थोक मूल्य सूचकांक तो गिर रहा हो और सीपीआई बढ़ रहा हो। सरकार के ही दो आंकड़े खुद विरोधाभास खड़ा करते हैं। सरकार जो विकास के दावे कर रही है, उसमें सच्चाई नहीं है।

भारत उदय: -

  • इस तरक्की के पीछे बहुत विरोधाभास हैं। सरकार खुद मान रही है कि नौकरियां नहीं बढ़ी है। वाणिज्य मंत्रालय कह रहा है कि 16 महीनों से हमारा निर्यात कम हुआ है। निवेश के मोर्चे पर देखिए, सरकार का आंकड़ा कह रहा है कि निजी क्षेत्र से नया निवेश नहीं आ रहा है। वहीं बैकों का एनपीए बढ़ा है, वे घाटे में चल रहे हैं। विजय माल्या जैसे कई कर्जदार भागे हुए हैं। फिर भी भारत उदय की कहानी फिर दोहराई जा रही है। वाजपेयी सरकार जैसी ही गलती मोदी कर रहे हैं। उन्हें सत्ता में आए दो साल हो गए हैं। वे आर्थिक तरक्की, खुशहाली के किस्से सुना रहे हैं। पर हकीकत उलट है। निजी जनसमूहों के परिणाम ठीक नहीं हैं। युवा वर्ग में नौकरी न मिलने से हताशा का माहौल है। किसान की आत्महत्याएं जारी हैं।

वर्गीकरण: - निम्न हैं-

Table shows The World Bank’s new classification

Table shows The World Bank’s new classification

विश्व बैंक का नया वर्गीकरण

उच्च -आय -ओईसीडी आय अर्थव्यवस्था

अमरीका

उच्च-आय- गैर-ओईसीडी आय अर्थव्यवस्था

रूस और सिंगापुर

उच्च-मध्य -आय अर्थव्यवस्था

ब्राजील, दक्षिण अफ्रीका और चीन

निम्न-मध्य- आय अर्थव्यवस्था

भारत, पाकिस्तान और श्रीलंका

निम्न- आय अर्थव्यवस्था

अफगानिस्तान, बांग्लादेश और नेपाल

विश्व बैंक: -

  • लगभग 2 साल पहले विश्व बैंक ने एक विवरण में यह कहा था कि वर्ष 2011 में ही भारत आर्थिक शक्ति के आधार पर अमरीका और चीन के बाद दुनिया का तीसरा सबसे बढ़ा मुल्क बन गया है। इस उपलब्धि की बड़ी वजह यह थी कि क्रय शक्ति समता के आधार पर भारत की जीडीपी 2011 में लगभग 7 खरब डॉलर पहुंच गई थी। यह जीडीपी जापान से भी ज्यादा थी। आज के आंकड़े देखें तो अमरीकी कार्यकर्ताओं सी. आई. ए. के आंकड़ों के अनुसार भारत की जीडीपी 2015 में 8 खरब डॉलर से ज्यादा पहुंच गई हैं।
  • नए वर्गीकरण में विश्व बैंक ने विकासशील देशों जैसे शब्दों को बाहर कर दिया है। विश्व बैंक ने जो नया वर्गीकरण किया है उसके मुताबिक भारत को अब निम्न मध्यम आय वर्गीय देश के रूप में दर्शाया गया है। यह वर्गीकरण आश्चर्यजनक लगता है। गौरतबल है कि विश्व बैंक ने देशों के वर्गीकरण का जो तरीका बदला है उसमें अब भारत को विकासशील देशों की श्रेणी की बजाय निम्न मध्यम आयवर्ग वाली श्रेणी में डाल दिया है। कारण भी यह बताया गया है कि विकासशील देशों का एक ही वर्ग होने के कारण अति निर्धन, अपेक्षाकृत निर्धन और अमीर मुल्कों मे ंपुराने वर्गीकरण से कोई भेद ही नजर नहीं आता था।

आधार: -

  • संयुक्त राष्ट्र 159 देशों को विकासशील देश मानता हैं। जिसमें भारत और चीन भी शामिल हैं। वहीं जापान, ऑस्ट्रलिया, न्यूजीलैंड, यूरोप और उत्तरी अमरीका के सभी देशों को विकसित देश माना जाता है।
  • विश्व बैंक ने नई श्रेणी तैयार करते समय प्रति व्यक्ति आय के अलावा और भी कई कारकों का ध्यान रखा है। इनमें कारोबार शुरू करने के लिए जरूरी दिन, मातृ मुत्यु दर, जीडीपी के मुकाबले शेयर बाजार, पूंजीकरण, सरकार की तरफ से जमा किए गए कर, बिजली उत्पादन आदि को आधार बना कर नए आंकड़े दीए है।
  • विश्व बैंक सामान्य कार्यो में विकासशील देश या विश्व शब्दों को नहीं बदलेगा लेकिन विशेषज्ञतायुक्त आंकड़ों में देशों के लिए अधिक सटीक समूह का उपयोग किया जाएगा। अर्थात साधारण संचार सामग्रियों में भारत विकासशील देश रहेगा तथा विशेषज्ञतायुक्त आंकड़ों में इसे निम्न मध्य आय अर्थव्यवस्था कहा जाएगा।

उभरती अर्थव्यवस्था: -

  • भारत ब्रिक्स देशों से सबसे कम प्रति व्यक्ति जीडीपी वाला देश है। इस तथ्य से इनकार नहीं किया जा सकता। लेकिन भारत की आणविक अंतरिक्ष और अन्य दूसरे क्षेत्रों में प्रगति की रफ्तार और ऊंची विकास दर के कारण दुनिया का नजरिया भारत के प्रति अलग ही है। बार-बार कहा जाता है कि चीन को पछाड़ कर भारत दुनिया का सबसे तेजी से बढ़ने वाला देश बन गया है। दुनिया भर में भारत को उभरती हुई अर्थव्यवस्था के रूप में पेश किया जाता है। जरूरी है कि विश्व बैंक जैसी संस्थाएं वस्तु स्थिति को स्थान में रखते हुए ही देशों का वर्गीकरण करें। ऐसा नहीं किया गया तो इस वर्गीकरण का कोई मतलब नहीं रहेगा। यह जरूरी भी है कि 129 करोड़ की आबादी वाले भारत जैसे बड़े देश को अपेक्षाकृत छोटे देशों के मुकाबले अलग रखा जाए। विश्व बैंक की ओर से भारत को कम विकसित मुल्कों के साथ रखने से तो उसका वर्गीकरण ही संदेह के घेरे में आ जाएगा।

विकासशील: -

  • विश्व बैंक ने भारत के लिए ’विकासशील देश’ शब्द का उपयोग करना बंद कर दिया है। विश्व बैंक ने अपनी विशेष विवरण में भारत को ’निम्न-मध्य-आय’ अर्थव्यवस्था की श्रेणी में रखा हैं। यह कहा जा रहा हैं कि विश्व बैंक ने अपनी ’विश्व विकास संकेतक’ विवरण में निम्न और मध्य आय देशों को ’विकासशील देश’ समूह में रखना बंद कर दिया है। विश्लेषण के मकसद से भारत को निम्न-मध्य आय अर्थव्यवस्था श्रेणी में रखा जाता रहेगा।

परिभाषा: -

  • विश्व बैंक ने विकासशील देश शब्द का उपयोग बंद करने का फैसला इसलिए किया है क्योंकि इस शब्द की कोई स्पष्ट सर्वमान्य परिभाषा नहीं है। यही कारण है कि मलेशिया और मालवी दोनों को विकासशील देश माना जाता है। 2014 में मलेशिया का सकल घरेलू उत्पाद 338.1 अरब डॉलर था, जबकि मालावी का 4.258 अरब डॉलर था। अब मलेशिया को उच्च मध्य आय अर्थव्यवस्था और मालवी को निम्न आय अर्थव्यवस्था कहा जा रहा है।

विकास: -

  • पिछले दिनों वित्तीय सेवा जनसमूहों एंबिट संपत्ति के द्वारा कॉरपोरेट (संयुक्त समूह) परिणामों और स्वतंत्र इकोनॉमिक्स (अर्थशास्त्रियों) के इंडिकेटर्स (संकेतक) के आधार पर प्रस्तुत वित्तीय विवरण मई 2016 में कहा गया है कि वित्त वर्ष 2014 - 15 के मध्य से भारतीय अर्थव्यवस्था की गति धीमी बनी हुई है। एंबिट का कहना है कि उसने रियल इकोनॉमी (वास्तविक अर्थशास्त्री) की सेहत को समझने के लिए वैकल्पिक उपाय विकसित किए हैं।
  • भारतीय अर्थव्यवस्था के 14 में से 9 संकेतक की रफ्तार 2015 - 16 से कम हुई है। खासतौर से मोटर वाहनों की बिक्री, कैपिटल गुड्‌स (अच्छा मूलधन) का आयात, बिजली की मांग और हवाईअड्डों पर कार्गो की हैडलिंग (आयात-निर्यात) के संकेतक सुस्ती का बढ़ता हुआ परिदृश्य बता रहे हैं। ऐसे में एंबिट का कहना है कि केंद्रीय सांख्यिकी कार्यालय (सीएसओ) के मुताबिक विकास दर बढ़ने का आकलंन सही नहीं दिखाई दे रहा है। कहा जा रहा है कि इस समय भारत की वित्तीय स्थिति वैश्विक दृष्टिकोण से संतोषप्रद नहीं है। भारत को विभिन्न वैश्विक कार्यकर्ताओं ने उच्च जोखिम की संभावना के साथ निवेश श्रेणी की न्यूनतम श्रेणी प्रदान की है। भारत की यह रेटिंग बीएए है। जिसका अर्थ है देश की अर्थव्यवस्था में अपेक्षाकृत अधिक जोखिम।

आर्थिक चुनौतियां: -

  • देश के समक्ष पिछले दो वर्षों में सूखे सहित कई आर्थिक चुनौतियों भी रही है। यह स्वीकार करना ही होगा कि विकास का मौजूदा रोडमैप लोगाेें को खुशियों देने में बहुत पीछे है। विकास का यह रोडमैप सामाजिक असुरक्षा और लोगों के जीवन की पीड़ा नहीं मिटा पा रहा है। बड़ी आबादी को स्वास्थ्य एवं शिक्षा की सुविधाएं नहीं मिल पा रही हैं। आर्थिक विकास ने करोड़ों भारतीयों में बेहतर जिंदगी की महत्वाकांक्षा जगा दी है, लेकिन सामाजिक सुरक्षा नहीं मिलने से निराशाएं बढ़ती जा रही हैं। अब मोदी सरकार के 5 वर्ष के कार्यकाल में तीसरे साल को सही मायनों में निर्णायक बनाया जाना होगा। देश में रोजगार बढ़ाने और आम आदमी की खुशहाली के लिए कारगर कदम उठाने होंगे। आर्थिक एवं श्रम सुधारों की गति तेज करनी होगी। खासकर कृषि व ग्रामीण क्षेत्र से जुड़े कानून लागू करने पर जोर होना देना चाहिए। वित्तीय जनसमूहों, बैंकों, बीमा और एनबीएफसी के लिए समग्र संहिता होनी चाहिए। सार्वजनिक इकाई विवाद निपटारा विधेयक पर काम आगे बढ़ाना चाहिए। जीएसटी पारित करने की रणनीति बनाई जानी चाहिए। निर्यात बढ़ाने, उद्योग-कारोबार को प्रोत्साहन और बैंको के एनपीए एवं महंगाई नियंत्रण की नई व्यूह रचना बनाई जानी चाहिए।

उपसंहार: -

  • प्रस्तुत सभी प्रकार के चुनौती भरे काम में विकास होने से ही भारत की आर्थिक स्थिति में सुधार आएगा और आम आदमी को राहत मिलेगी तभी भारत दूसरों देशों के साथ उच्च श्रेणी में पहुंच पाएगा।

- Published on: July 6, 2016