तेल का खेल (Game of Oil - Essay in Hindi) [ Current Affairs ]

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प्रस्तावना: - केंद्र में मई 2014 में जब एनडीए की सरकार बनी तब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कच्चे तेल की कीमत लगभग 105 डॉलर प्रति बैरल थी। यह गिरते-गिरते अब 38 डॉलर प्रति बैरल के आसपास रह गई है, लेकिन देश की जनता को इस अवधि में सिर्फ 25 रुपए का फायदा हुआ है। केंद्र और राज्य सरकारों ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कच्चे तेल की कीमतों में आई कमी का फायदा जमकर उठाया। 2014 - 15 वित्तीय वर्ष में केंद्र सरकार ने 99, 184 करोड़ रुपए अकेले पेट्रोलियम सेक्टर में उत्पाद शुल्क से कमाए। इस साल पहली तिमाही में 33, 042 करोड़ रुपए उगाहे। इसके लिए केंद्र सरकार ने 6 बार उत्पाद शुल्क में बढ़ोतरी की। आखिर जनता को कब मिलेगी राहत। तेल के इस उतार-चढ़ाव के गणित को विश्लेषण और आंकड़ों के जरिए समझना होगा।

गिरावट: - आज पेट्रोल-डीजल की जो कीमत आम उपभोक्ता अदा करता है, उसमें सबसे ज्यादा हिस्सा केंद्र सरकार के करों का है। उसे उत्पाद शुल्क मिलता है। इस शुल्क में से 45 फीसदी विभिन्न योजनाओं के तहत राज्यों को चला जाता है। राज्य वैट और सेस के जरिए और कर वसुलते हैं। अब इस कर पद्धति को तर्कसंगत बनाने की जरूरत है। केंद्र सरकार हो या राज्य सरकार, उनके लिए पेट्रोलियम क्षेत्र कर राजस्व का सबसे बड़ा जरिया है। इसलिए इस कर संग्रहण को कोई भी सरकार तर्कसंगत नहीं बनाना चाहती। इसलिए राज्य सरकारें कह रही हैं कि पेट्रोलियम को जीएसटी के तहत न लाया जाए। ये वहीं सरकारें हैं, जिन्हें जनता चुनती है। सरकार कर कम करने की बजाय बढ़ाती जा रही हैं। आम आदमी को ज्यादा राहत नहीं मिली है। राज्य सरकारों ने केंद्र सरकार के मुकाबले तो कर ज्यादा बढ़ाए हैं।

पेट्रोल (रुपए प्रति लीटर)

Comparative Price of 2014 and 2015

Comparative Price of 2014 and 2015

वित्त वर्ष 2014 - 15 वित्त वर्ष 2015 - 16

जून

71.57

अप्रेल

60.00

जुलाई

73.06

मई

63.16

अगस्त

72.51

जून

66.93

सितंबर

72.51

जुलाई

66.62

अक्टूंबर

67.86

अगस्त

66.47

नवंबर

64.24

सितंबर

64.47

दिसंबर

63.33

अक्टूंबर

61.20

जनवरी

61.33

नवंबर

61.06

फरवरी

56.49

दिसंबर

60.48

मार्च

60.49

केंद्र सरकार ने वित्तीय वर्ष 2014 - 15 में 99, 184 करोड़ रु. अकेले पेट्रोलियम सेक्टर में उत्पाद शुल्क से कमाए। इस साल पहली तिमाही में। 33, 042 करोड़ रुपए उगाहे।

डीजल (रुपए प्रति लीटर)

Comparative Price of 2015 and 2016

Comparative Price of 2015 and 2016

वित्त वर्ष 2014 - 15 वित्त वर्ष 2015 - 16

जून

57.28

अप्रेल

48.50

जुलाई

57.84

मई

49.57

अगस्त

44.95

जून

50.93

सितंबर

44.95

जुलाई

50.22

अक्टूंबर

55.60

अगस्त

46.12

नवंबर

53.35

सितंबर

44.45

दिसंबर

52.51

अक्टूंबर

45.90

जनवरी

48.28

नवंबर

45.93

फरवरी

46.01

दिसंबर

46.09

मार्च

49.71

अमेरीका में 2040 में 18.42 मिलियन बैरल रोज खपत होगी। भारत में कुल खपत का 89 प्रतिशत तेल आयात पर निर्भर होगा।

आय: - जब तेल की कीमतें बहुत बढ़ती हैं या घटती हैं तो उसे ऑयल शॉक कहा जाता है। आज सरकारें खुश हैं कि तेल की कीमते कम होने से उन्हें ज्यादा कर मिल रहा है पर यह मध्यावधि या दीर्घावधि में खतरे का संकेत है। तेल की कीमतें लगातार कम रहने से वैश्विक अर्थव्यवस्था मंदी पड़ जाती है। बहुत सस्ता तेल भी भारतीय अर्थव्यवस्था को झटका दे सकता है।

अभी तेल में जो कर सरकारें एकत्र कर रही हैं, उससे प्राइस स्टेबलाइजेशन फंड बनाया जाना चाहिए। यह पैसा सरकारों को अपनी जेब में नहीं भरना चाहिए। ताकि जब दो साल बाद तेल की कीमते फिर ऊपर जाएंगी तब सरकार इसी पैसों से आम उपभोक्ता को राहत दे सकेंगी। अगर सरकारों ने इस अवसर को आय समझ लिया हैं तो फिर यह उन्हें झटका देगा। अगर कीमतें बहुत अधिक बढ़ जाती है तो सरकारों के खजाने से पैसा निकलता है। पर जब कीमतें बहुत कम हो जाती है तो इन्हीं सरकारों को फायदा होता है। यह सच है कि केंद्र सरकार के खजाने में पैसा बढ़ा है। राज्यों को भी पैसा कमानें का अवसर मिला है।

ऐसे तय होते हैं दाम (प्रति लीटर रुपए में)

Price of Oil - Sept 2015

Price of Oil - Sept 2015

जयपुर में कीमत (सितंबर 2015)

वस्तु

डीजल

पेट्रोल

कच्चा तेल

20

20

रिफायनरी मार्जिन ट्रांसपोर्ट लैंडिग टू डीलर

6.60

9.22

कमीशन पेट्रोल पंप

1.42

2.25

एक्साइज ड्‌यूटी

10.26

17.46

वैट

8.10

14.1

सेस

1.25

1.25

जयपुर में कीमत

46.63

64.28

तरीका: - दुनिया की अर्थव्यस्था तेल की इर्द-गिर्द घूमती है। तमाम सरकारों की आय का एक बड़ा हिस्सा पेट्रोलियम उत्पाद होता हैं। मौजूदा तेल दामों में कमी को देखने के दो नजरिये है। जब कीमते बहुत अधिक है तो, सरकार उसे नियमित या रेगूलेट करे या कम है तो भी उसे रेगुलेट करे। हमारे देश में जो व्यवस्था लागू है वह औपनिवेशिक काल से ही है। ब्रिटेन में भी तेल की कीमतें ऊंची रहती हैं जैसे भारत में रहती हैं। पर महत्वपूर्ण बात यह है कि अगर तेल की कीमतें रेगूलेट नहीं की जाए तो कीमतें बढ़ती और कम हो जाती हैं। अगर सरकार द्वारा क्रूड के दाम कम होते ही पेट्रोल-डीजल के दाम उसी अनुपात में कम कर दिए जाए तो, अगर तेल दोबारा 100 डॉलर बैरल पर पहुंच जाएगा तो, सरकार को फिर से सब्सिडी देनी पड़ेगी। सरकार को तेल की कीमते इस हिसाब से रखनी होती है कि अर्थव्यवस्था पर भी ज्यादा फर्क नहीं पड़े। क्योंकि दो साल बाद तेल की कीमतें वापस ऊपर जाने लगेंगी तो सरकार के लिए संभालना मुश्किल होगा। सरकार के पास तो दो तरीके होते है।

  • एक तो पॉपुलिस्ट-अगर तेल की कीमतें गिरी तो तुरंत दाम कम कर दिए जाएं।
  • दूसरा तरीका यह होता है कि यदि बहुत ज्यादा कीमतें हो जाएं तो भी उपभोक्ता को झटका न लगे और बहुत नीचे आ जाए तो अर्थव्यवस्था को भी झटका न लगे। यह एक जिम्मेदार सरकार का काम होता है। पूर्ववती सरकारें भी यही नीति अपनाती थीं। मौजूदा सरकार भी यही कर रही है।

क्रूड: -अब सवाल यह उठता है कि तेल की कीमतों को सरकार की जिम्मेदारी से मुक्त कर दिया जाए? अगर हां तो तेल सस्ता हो तो सरकार पूरा फायदा उपभोक्ताओं को दे और मंहगा हो तो भी उपभोक्ता झेलें। पर भारतीय अर्थव्यस्था इतनी परिपक्व नहीं हुई है। यह नीति अभी नहीं अपनाई जा सकती। क्योंकि भारत अभी अमेरिका नहीं हुआ है। भारत में 70 फीसदी लोग ऊर्जा की गरीबी रेखा के नीचे रहते हैं। भारत में अब 80 फीसदी तेल आयात करते हैं। ऐसे में कहना सरकार की कोई भूमिका न रहे और तेल पूरी तरह नियंत्रण मुक्त रहे तो भारत ऐसी स्थिति में अभी नहीं आया है। तेल के दामों में मौजूदा कमी कृत्रिम तौर पर पैदा की गई है।

रेखाएं: - विश्व में तेल की कीमतों को तीन रेखाएं होती हैं-

  • पहली अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों की।
  • दूसरी अंतरराष्ट्रीय बाजार में पेट्रोल कीमतें क्या है।
  • तीसरी डीजल के दामों की होती है।

दुनिया के कई बाजारों में इनका मॉडरेशन सरकारें करती हैं। इसी वजह से दुनिया के बाजार में कच्चे तेल के दामों का ग्राफ देखें तो वह लगातार नीचे जा रहा है। यह सुर्खियों में बना हुआ है। पर पेट्रोल की कीमतें अंतरराष्ट्रीय बाजार में क्या है, उसका ग्राफ देखें तो भारत और विदेशों की कीमतें में बहुत फर्क नहीं है। बड़े तेल आयातकों में कीमतें लगभग वहीं है। तो क्या नीति यह रहे कि सरकार को इन दामों से कोई लेना-देना नहीं होना चाहिए। भारत कच्चा तेल आयात करता है पर डीजल भी आयात करता है। कभी-कभी पेट्रोल भी आयात करना पड़ता है। जब यूपीए सरकार ने पेट्रोल नियंत्रण मुक्त किया था, उस वक्त यह नीति बनी थी के अंतरराष्ट्रीय बाजार में पेट्रोल की कीमतों के हिसाब से ही भारत में दरें तय की जाएंगी। कच्चे तेल की कीमतों से कोई लेना-देना नहीं है।

उपसंहार: -उपरोक्त बातों को गोर करने पर यही तथ्य सामने आया है कि तेल के दाम ऐसे होने चाहिए कि जिससे जनता को राहत मिल सके। केवल सरकार या अन्य लोग तेल के कार्य को खेल न समझे क्योंकि हमारी देश की आधे से ज्यादा अर्थव्यवस्था ही तेल से जुड़ी हुई हैं। इसलिए तेल की सही कीमत होना आवश्यक हैं।

- Published on: January 22, 2016