हिट एंड रन (Hit and Run - Salman Khan Case - Essay in Hindi) [ Current Affairs ]

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प्रस्तावना: मार्टिंग लूथर ने कहा था-’किसी जगह न्याय से वंचित होना, हर जगह न्याय का हास होना है।’ वैसे तो न्यायपालिका से ऊपर कुछ नहीं होता। उसका फैसला सबसे बड़ा होता है और उसे स्वीकार करना पड़ता है। पर न्याय की अवधारणा हमेंशा से रही है कि न्याय होते हुए दिखना भी चाहिए। लेकिन कुछ फेसले ऐसे भी होते हैं, जिन पर मतैक्य की बजाय सवाल अधिक खड़े हो जाते है। सलमान खान की हाइकोर्ट द्वारा रिहाई भी ऐसा ही मामला है। 13 साल पहले मुंबई में फुटपाथ पर जो ’मौत की कार’ दौड़ी, उसने नुरुल्ला की जान ले ली और अब्दुल्ला समेत चार लोगों का जीवन ’अपंग’ कर दिया। मामला दायर हुआ। कठघरे में सलमान खान थे। उनके बॉडीगार्ड रविंद्र पाटिल मुख्य गवाह बने। मामला जब सेशन कोर्ट तक पहुंचा तो पाटिल भी दुनिया को अलविदा कह गए। सेशन कोर्ट ने सलमान को दोषी ठहराया था। पर अब हाईकोर्ट ने बरी कर दिया। सलमान को न्याय मिल गया पर क्या नुरुल्ला व अब्दुल्ला के साथ भी न्याय हुआ हैं? सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर गुनहगार कौन है?

कारण: - कई लोग इस फेसले से बिलकुल सहमत नहीं है पहले हाईकोर्ट ने कहा कि रविंद्र पाटिल की गवाही को नजरंदाज किया जा सकता है, क्योंकि आरोपी सलमान खान को उसे क्रॉस करने का अवसर नहीं मिल पाया । जब पाटिल की गवाही हुई थी तो सलमान खान के खिलाफ आई पीसी की धारा 304 (ए) लगाई गई थी। जब यह हादसा हुआ तब रविन्द्र पाटिल बॉडीगार्ड था और गाड़ी में सलमान के साथ यात्रा कर रहा था। जब मामले में पुलिस ने चार्जशीट दर्ज की थी तो पाटिल की गवाही मजस्ट्रेिट कोर्ट में हुई थी। आईपीसी की धारा 304 (ए) लगी थी। उस वक्त सलमान के वकील ने पाटिल को ’क्रॉस भी किया था। बाद में प्रॉसिक्यूशन ने सेक्शन बदलकर 304 भाग (2) लगाया। जबकि साक्ष्य वही थे।

गलत: - पहले पहल सलमान का ट्रायल धारा 304 (ए) के तहत मजिट्रेट कोर्ट में चलता था, बाद में सेशन कोर्ट में ट्रायल चलने लगा। सेंशन कोर्ट में जानें के बाद पाटिल की मौत हो गई।

  • पहली बात हाईकोर्ट ने कहा कि जब मामले का ट्रायल सेशन कोर्ट में शुरू हुआ था तो पाटिल के साथ सलमान के वकील को क्रॉस करने का अवसर नहीं मिल पाया। इसलिए हाईकोर्ट का मानना रहा कि सलमान के साथ प्राकृतिक न्याय नहीं हुआ है इस लिहाज से हाईकोर्ट की यह फाइडिंग गलत है। इंडियन एविडेंस एक्ट-33 के मुताबिक अगर किसी की गवाही सेम सेट ऑफ फैक्ट्‌स पर किसी एक कोर्ट में होती है तो दूसरे कोर्ट में भी वही एविडेंस माने जा सकते हैं।
  • दूसरी बात। कमाल खान, जो गाड़ी में चश्मदीद गवाह था। उसकी भी गवाही नहीं हुई। हाईकोर्ट ने कहा कि खान एक मैटेरियल विटनेस था। कमाल खान को अभियोग में एग्जामिन क्यों नहीं किया गया। यह बड़ी बात है। यह एक महत्वपूर्ण विटनेस था।

सीख: -बहरहाल, हाईकोर्ट की फाइंडिंग्स कोई फाइनल नहीं हैं। सुप्रीम कोर्ट में इसे चुनौती दी जानी चाहिए। कई बार ऐसे होता है कि जब निचली अदालत के फेसले को पलट दिए जाते हैं। अब आम जनमानस की बात करें तो यह सवाल उठना लाजिमी है कि अगर सलमान निर्दोष हैं तो फिर फुटपाथ पर जिसकी मौत हुई और जो लोग घायल हुए, उनका दोषी कौन है? इस मामले से सीखने वाली बात यह है कि ऐसे मामलों में पुलिस और प्रॉसिक्यूशन को बहुत चौकन्ना रहने की जरूरत होती है जब ऐसे संवेदनशील मामले में सेलिब्रिटी की रिहाई हो जाती है तो जनमानस में यह संदेश जाता है कि देश में गरीबों के लिए अलग और रसूखदारों के लिए अलग कानून है। सलमान खान का यह मामला एक उदाहरण स्थापित नहीं होना चाहिए। हर कोई ट्रायल अलग-अलग तथ्यों पर होता है। अगर प्रॉस्कियूशन की कमियां रही तो उसकी तह में जाना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट में जाकर इन खामियों को उजागर करना चाहिए। कई बार व्याख्या का भी सवाल रहता है। अलग-अलग जज की व्याख्या में अंतर होता है इसलिए सुपीम कोर्ट में यह फैसला बदल सकता हैं।

  • मामला: बॉम्बे हाईकोर्ट ने सलमान को 2002 के हिट एंड रन मामले में 13 साल के बाद बरी कर दिया। असल में 2002 में मुंबई में सलमान की तेज रफ्तार कार देर फुटपाथ पर चढ़ गई थी। अब्दुल शेख, मुस्लिम शेख, मुन्नु खान और मुहम्मद कलीम घायल हो गए थे। ये सब बेकरी के बाहर फुटपाथ पर सो रहे थे। मुंबई की एक निचली अदालत ने सलमान को पांच साल की सजा सुनाई थी। इस मसले पर निचली अदालत द्वारा सजा का फेसले दिए जाने के बाद मुंबई हाईकोर्ट से सलमान को कुछ महीने पहले जमानत मिल गई थी। हाई कोर्ट में इस मामले पर स्पीड ट्रायल में पांच-छह महीने में फैसला आ गया और कोर्ट ने अपने ताजा फेसले में कहा कि अभियोजन पक्ष सलमान पर कोई भी आरोप साबित नहीं कर पाया है। सलमान के हिट एंड रन मामले पर निचली अदालत के फेसले में ड्राइवर की गवाही और पेश किए गए अन्य सबूतों को देखने पर अभी बॉम्बे हाई कोर्ट के दिए गए फेसलों को देखकर किसी को एक नजर में संदेह तो पैदा हो सकता है। लेकिन आप देखिए कि निचली अदालत के फेसले को बॉम्बे हाईकोर्ट ने पूरी तरह पलट दिया है तो उसमें कुछ बात तो रही होगी। इतना ही नहीं हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि इस मामले में निचली अदालत में जांच गलत तरीके से की गई है। इस जांच में कुछ कमियां इस तरह से रहने दी गई जिससे आरोपियों का फायदा मिल सके। इस मामले में सुनवाई सही तरीके से नहीं हुई। यह न्याय दिलाने के तय सिद्धांतो पर नहीं है।

अपील: -यह ऐसा केस नहीं है जिसमें अभियोजन पक्ष ने पूरी कामयाबी के साथ सारे आरोप साबित कर दिए हों। निचली अदालत में फेसले के बाद हाईकोर्ट में या हाईकोर्ट के बाद सुप्रीमकोर्ट में अपील करने का प्रावधान भी इसलिए ही किया गया है क्योंकि कोई एक पक्ष तथ्यों और सबूतों के आधार पर दिए गए फेसलों से संतुष्ट न हों तों वे सुप्रीम कोर्ट पहुंच सकते हैं। अदालतें कभी भी लोगों की आम राय के आधार पर निर्णय नहीं लेती। कई बार मीडिया में भी अदालत के निर्णयों को लेकर आम लोंगों की तरह तथ्यों के आधार पर नहीं, धारणा के आधार पर बातचीत होती है। इस फेसले के खिलाफ अभियोजन पक्ष स्पेशल लीव पिटीशन दायर कर सकता है। इसमें हाईकोर्ट के फेसले के बाद भी बाकी बच रहे सवालों का मुद्दा उठाया जा सकता है। अभियोजन पक्ष सुप्रीम कोर्ट में भी अपील कर सकता है। अगर आरोप के अनुरूप पुख्ता सबूत नहीं तो आरोपी को बरी किया जाना चाहिए।

फैसला: - सुप्रीम कोर्ट का दो फैसला है। एक ड्रंकेन एंड ड्राइविंग पर है। इस मामले में हत्या करने की कोशिश के बारें में जो धाराएं लगती हैं, लगाई जानी चाहिए। इस मामलें में भारतीय दंड संहिता की धारा 304 (2) के तहत मामला दर्ज करके केसा चलना चाहिए था। सुप्रीम कोर्ट का एक और फैसला ड्रांइविंग एट हाई स्पीड पर है। धारा 304 (2) के तहत इस मामले में केस चलाना चाहिए।

सबक: - सलमान के फेसले का सबक- अगर आप फुटपाथ पर सो रहे हों तो भारतीय न्यायालयों से न्याय की उम्मीद का सपना देखने की हिमाकत न करें।

सागरिका घोष, टीवी पत्रकार

उपसंहार: - देश की अदालतों में बहुत सारे आपराधिक मामले पहले से ही लंबित हैं। उन लंबित मामलों की सुनवाई चंद महीनों या एक दो साल में क्यों नहीं पूरी की जाती है? गरीबों के मामले में सुनवाई में कोर्ट तेजी क्यों नहीं लाती है न्यायप्रणाली? इस मसले में जिनकी जान गई या जो घायल हुए उनके परिवारों के बारे में सोचिए। वे इतने लंबे समय से न्याय का इंतजार कर रहे थें, लेकिन उन्हें न्याय कहां मिला? दरअसल इस देश में न्याय केवल अमीरों के लिए ही बना है गरीबो के लिए नही।

- Published on: January 9, 2016