इसरो के उपग्रह (ISRO Satellite - Essay in Hindi) [ Current Affairs - Science & Technology ]

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प्रस्तावना:- आज एक बार फिर इंडियन स्पेस रिसर्च ऑर्गेनाइजेशन (इसरो) (भारतीय अंतरिक्ष खोज संस्था) के वैज्ञानिकों ने अंतरिक्ष का सीना चीर कर दिखा दिया कि दुनिया को सर्वाधिक कम दाम में उत्कृष्टतम प्रोद्यौगिकी भारत ही दे सकता है। आज का दिन इतिहास के पन्नों मेंं दर्ज होगा क्योंकि 2008 में हमने एक साथ 10 सेटेलाइट छोड़े थे पर इस बार मात्र 26 मिनट के अंतराल में हमने 20 सेटेलाइट अंतरिक्ष में छोड़े। यद्यपि इन सेटेलाइटों में से 17 विदेशी थे और तीन भारतीय। ऐसे में यह सवाल लाजिमी हैं कि भारतीय सेटेलाइट आम व्यक्ति के लिए किस प्रकार उपयोगी होंगे? अमरीका, कनाडा और जर्मनी जैसे तकनीकी रूप से सक्षम और विकसित देश अपने सेटेलाइट अंतरिक्ष में भेजने के लिए हमारे देश को क्यों चुनते हैं? क्या इसरो को इससे कमाई होती हैं।

उपग्रह:-

भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) अपने एक और प्रमाण मिशन की तरफ बढ़ रहा है। अंतरिक्ष में भारत के सफर में एक नया अध्याय जोड़ने वाले अंतरिक्ष यान पीएसएलवी-सी34 के प्रक्षेपण के लिए 48 घंटे की उल्टी गिनती को शुरू हो गई है। 22 जून को 9.26 मिनट पर श्रीहरिकोटा स्थित सीतश धवन अंतरिक्ष केंद्र से एकल मिशन में प्रमाण 20 उपग्रहों के प्रक्षेपण के लिए पोलर सैटेलाइट लॉन्च व्हीकल पीएसएलवी-सी34 का इस्तेमाल किया गया। इनमें भारत का पृथ्वी की निगरानी करने वाला अंतरिक्ष यान कार्टोसैट-2 शामिल है। गूगल की जनसमूह टेराबेला का अर्थ इमेजिंग उपग्रह (स्काईसैट जेन-2) भी है।

ध्रुवीय प्रक्षेपण:-

ध्रुवीय प्रक्षेपण यान पीएसएलवी सी-34 से 20 उपग्रहों का प्रक्षेपण सटीक रहा। इस अभियान में सिर्फ तीन उपग्रह ही भारतीय थे, बाकी विदेशी। यह अरबों डॉलर के वैश्विक अंतरिक्षीय कारोबार में इसरो की बढ़ती धाक का परिचायक है। मगर इसरों इससे संतुष्ट नहीं है। हमारी कोशिश है कि जो 17 उपग्रह विदेशों से आए उनकी खरीद विदेशी जनसमूहों भारत से ही करें। यानी, विदेशी ग्राहकों के लिए उपग्रह तैयार करने से लेकर उनके प्रक्षेपण तक क्षमता इसरों को विकसित करनी होगी। देश में उपग्रहों की बढ़ती जरूरतों को पूरा करने के साथ ही विदेशी ग्राहकों के लिए उपग्रहों का निर्माण और प्रक्षेपण एक बड़ी चुनौती है। मगर इसी में भविष्य भी हैं। क्योंकि इससे बड़े पैमाने पर देश के अंदर रोजगार सृजित होगा। हम अभी तक देश की सॉफ्टवेयर इंजीनियरिंग का विकास देखते आए हैं। मगर अब हार्डकोर (दृढ़ विश्वासी) इंजीनियरिंग के विकास को पंख लग रहे हैं।

लक्ष्य:-

देश में उच्च प्रतिभा संपन्न युवाओं की कमी नहीं है। अगर मांग को पूरी करने की क्षमता विकसित कर पाए तो प्रतिभावान छात्रों का पलायन रुकेगा। उन्हें अपने ही देश में अच्छा रोजगार मिलेगा। एयरोस्पेस के क्षेत्र में उच्च प्रतिभाशाली युवाओं के अनुसंधान का लाभ अन्य उद्योगों को भी मिलेगा। इससे देश के आर्थिक विकास को गति मिलेगी। अगले चार से पांच वर्षों के दौरान संचार, अर्थ ऑब्जर्वेशन (प्रेक्षण), मौसम पूर्वानुमान, नौसंचालन तथा वैज्ञानिक आदि मिशनों के लिए 70 उपग्रहों की आवश्यकता होगी। इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए इसरो उपग्रह केंद्र के सामने हर महीने एक उपग्रह तैयार रखने की बहुत बड़ी चुनौती है।

सहयोग:-

पिछले 6 माह के इसरों के कार्यक्रमों पर नजर डालें तो इस सीमित समय में हमने 5 मिशनों को अंजाम दिया है। इसके लिए इसरो के वैज्ञानिकों को काफी ज्यादा काम करना पड़ रहा है। यही सिलसिला जारी रहा तो इसका असर अनुसंधान कार्यों पर पड़ेगा। इसलिए इसरों की कोशिश हैं कि निजी उद्योगों को इसमें शामिल किया जाए। काफी हद तक इसकी शुरुआत हो चुकी है। मगर अब इसे बड़ा आकार देने की आवश्यकता है। अभी तक निजी उद्योग उप-प्रणालियों का उत्पादन करते रहे हैं मगर इसे बढ़ाकर दो से तीन गुणा करना होगा। इसके साथ ही नए उद्योगों को भी इसमें जोड़ने की आवश्यकता है। फिलहाल निजी क्षेत्र केवल प्रणालियों का उत्पादन कर रहे हैं और इंटीग्रेट (एकीकृत) करने की जिम्मेदारी इसरों की है। मगर आने वाले दिनों में प्रणालियों के निर्माण से लेकर उनके इंटीग्रेशन (एकीकृत समन्वित)तक की जिम्मेदारी निजी क्षेत्र की होगी। इसरों 100 निजी और सार्वजनिक क्षेत्र की जनसमूहों को मिलाकर एक ऐसा कंसोर्टिम बनाना चाहता है जो उपग्रहों के निर्माण से लेकर प्रक्षेपण तक की जिम्मेदारी संभाल सके, तब इसरों का ध्यान अनुसंधान पर अधिक होगा। अगर यह नमूना सफल होता है तो इसका उपयोग अन्य विकासशील देशों के लिए भी हो सकता है। जो देश अपनी तरक्की के लिए अंतरिक्ष तकनीक का उपयोग करना चाहते है,ं उन्हें हम उपग्रहों के निर्माण से लेकर प्रक्षेपण तक की सेवाएं दे पाएंगे। इसमें 5 से 6 साल लग सकते हैं। किफायती प्रक्षेपण के लिहाज से विश्व में पहली से ही हमारी धाक कायम है।

भरोसा:-

यह बेहद खुशी का मौका है कि आज हम इस अंतरिक्ष के इतिहास में एक साथ 20 सेटेलाइट लांच (शुरू) कर पाए हैं। पहला भारतीय सेटेलाइट उपग्रह आर्यभट्ट 19 अप्रेल 1975 को अंतरिक्ष में भेजा गया था। इंडियन स्पेस रिसर्च ऑर्गेनाइजेशन (इसरों) दव्ारा तैयार इस सेटेलाइट को सोवियत संघ की सहायता से लांच किया गया था। यह गर्व का विषय हैं कि तब से लेकर अब तक इसरों ने काफी प्रगति की हैं। 26 मिनट में 20 सेटेलाइट लांच करके हमने दुनिया को दिखा दिया है कि प्रोद्योगिकी के मामले में भारत अब किस मुकाम पर पहुंच गया है। इस लांच की सबसे बड़ी खासियत यह है कि जो भी तकनीक हमने इस्तेमाल की है, वह सिर्फ और सिर्फ हमारी है अर्थात भारत देश की हैं। हमारी विकसित की हुई तकनीक के सहारे ही इन 20 सेटेलाइटों में से 17 विदेशी सेटलाइट हैं। इनमें अमरीका के 13, कनाडा, जर्मनी और इंडोशिया के एक-एक और एक गूगल का है। अमरीका कनाडा और जर्मनी जैसे विकसित देशों के सेटेलाइटों की लांचिंग भारतीय धरती से इसरों के माध्यम से किये जाने का अर्थ है कि वे भी हमारी तकनीक क्षमता पर भरोसा करते हैं। दुनिया जब हमारी तकनीक और जानकारी को सलाम करती हैं तो हमें गौरव का अनुभव होता ही हैं। इसरो पूर्व में भी अन्य देशों के लिए लांचिंग (आरंभ) करता रहा है। यह बहुत अधिक संभव है कि हमारी धरती से विदेशी सेटेलाइटों की लांचिंग उन्हें सस्ती पड़ती हो और इसलिए वे इसके लिए हमारी धरती का उपयोग करते हैं। हो सकता है कि इस तरह लांचिंग का भारत को मौद्रिक लाभ भी होता हो।

सीमा:-

भारत ने जीपीएस को लेकर विदेशी निर्भरता पहले ही खत्म कर दी हैं। ऐसा होना अच्छी बात है। इस मिशन में भारत ने भी अपने तीन सेटेलाइट छोड़ें हैं। इसमें एक सेटेलाइट के माध्यम भारत अंतरिक्ष से दुनिया को देखने की क्षमता हासिल कर लेगा। ग्लोबल वॉर्मिंग के इस दौर में बेहतर चित्रों के माध्यम से धरती के तापमान की जानकारी तो मिलेगी ही साथ में आपदाओं का पूर्वानुमान लगा पाने में मदद मिलेगी। सेटेलाइटों के माध्यम से सीमा पर बेहतर चौकसी करने में सहायता मिल सकती है। एक बार तो यह लग सकता है कि ये सारी उपब्धियां सीधे तौर पर आम आदमी को प्रभावित नहीं करती है। लेकिन परोक्ष रूप से आम आदमी के जीवन को बेहतर बनाने में ये सभी बेहद उपयोगी साबित होगी।

                                                                                                  प्रो. यश पाल, निदेशक, इसरो उपग्रह केंद्र बैंगलूरू

विकसित देश:-

भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन में 42 साल के अपने कार्यकाल में अद्भुत दल के साथ मैंने हर क्षण उपब्धियों के साथ जीया है। मंगलयान के उपलब्धियों से भरे सफर के बाद यह भारत की बड़ी उपलब्धि होकर आया है। एक बार फिर यह साबित हो गया है कि हिन्दुस्तान विकसित देश है। हम अंतरिक्ष विज्ञान, संचार तकनीक, परमाणु ऊर्जा और चिकित्सा के मामले में वाकई विश्व के विकसित देशों को न केवल टक्कर दे रहे हैं बल्कि कई क्षेत्रों में उनसे आगे भी हैं। पीएसएलवी श्रेणी के दुनिया के सबसे विश्वसनीय लांचिंग यान की सफल उड़ान से एक साथ कई रास्ते खुल गए हैं। जल्द ही हम जीएसएलवी मार्क 2 और जीएसएलवी मार्क 3 को भी छोड़ेगें। तब हम चार टन भार तक का सेटेलाइट लांच कर सकेंगे। इसके पूरा होते ही रॉकेट क्षेत्र में चीन के बराबर हो जाएंगे।

कम लागत:-

इसरो की 20 सेटेलााइट शुरू करने की योजना बड़ी महत्वपूर्ण थी, क्योंकि हम एक बार में इतने सेटेलाइट शुरू कर रहे थे कि एक बार में इतनी बड़ी छलांग लगाना मुश्किल होता है। रूस ही ऐसा देश है जिसने 37 सेटेलाइट एक बार में लॉन्च (शुरू) किए थे। इसरो के लिए यह बड़ी कामयाबी है क्योंकि इस आरंभ में कार्टो-सैट हमारा मुख्य यात्री था, जो अर्थ इमेजिंग में लाभकारी होगा। इसके साथ 17 छोटे कॉमर्शियल (वाणिज्य संबंधी) सेटेलाइट (उपग्रह) थे। अकेले अमरीका के ही 13 सेटेलाइट थे। इतने सेटेलाइट को एक साथ छोड़ना आसान काम नहीं था। हिन्दुस्तान अब कॉमर्शियल लॉन्च के लिए भरोसेमंद साझादार बन गया है। वैसे हमारा स्पेस कार्यक्रम भारत की घरेलू जरूरतों के लिए है। पर जब ज्यादा क्षमता होती है तो बाहरी सेटेलाइट को लॉन्च कर सकते हैं। इसरों ने 20 देशों के 113 सेटेलाइट छोड़े हैं, जिससे 100 मिलियन डॉलर की कमाई हुई है।

संचार उपग्रह:-

हमारे स्पेस कार्यक्रम का ध्यान आम आदमी के फायदे पर हैं। किसान को कैसे मौसम की सटीक भविष्यवाणी दें, मछुआरों को कहां ज्यादा मछलियां मिलेंगी। कहां जमीन में सटीक जगह पानी मिलेगा आदि की जानकारी सेटेलाइट से ही मिल सकती है। यानी आम आदमी के लिए कें लिए केंद्रित कार्यक्रम है। मौजूदा केंद्र सरकार सेटेलाइट को गवर्नेंस के लिए काफी उपयोग कर रही है। हाल ही में उत्तराखंड के जंगलों में आग लगी तो उसकी सही स्थिति हमें सेटेलाइट तस्वीरों से ही पता लगा हैं। जो कार्टो-सैट सेटेलाइट हमने लॉन्च किया है, वह सब मीटर के रेजोल्यूशन पर तस्वीरें खींच सकता है। इससे हमारी काबिलियत ऐसी हो जाएगी कि पाकिस्तान के प्रधानमंत्री के घर में कितनी गाड़ियां खड़ी हैं, यह हम पता लगा सकते हैं। हम देख सकते हैं कि पड़ासी देशों के पास कितने लड़ाकू विमान हैं, कितने टैंक हैं। यह बहुत उपयोगी है। इसका उपयोग सामरिक उद्देश्य के साथ-साथ स्मार्ट सिटी की योजना में भी होगा। इसरो की लॉन्च की लागत पश्चिमी देशों के मुकाबले लगभग आधी रहती है। अमरीका जैसे देश में निजी जनसमूहों सेटेलाइट लॉन्च करती हैं। इसलिए वहां जनसमूह लॉन्च कीमत काफी ज्यादा रखती हैं।

आज देश के पास अपना संचार उपग्रह है। किसी भी देश के सर्वांगीण विकास में संचार उपग्रह रीढ़ की हड्डी साबित होते हैं। प्रशिक्षण कार्यों से लेकर आपदा प्रबंधन में उपग्रहों की सेवाएं अनिवार्य हो गई हैं। मौसमी उपग्रह प्राकृतिक आपदा की सूचना काफी पूर्व दे देते हैं, जिससे जान-माल की क्षति रोकी जा रही हैं। प्राकृतिक संसाधनों का उचित प्रबंधन उपग्रहों के सहयोग से हो रहा है। मछुआरो को पता है कब और कहां मछली पकड़ने जाना है। प्राकृतिक आपदाओं से निपटने में उपग्रह निर्णायक भूमिका निभा रहे हैं। जंगल में आग लगे या कहीं बाढ़ आए तो उसमें भी उपग्रहों की भूमिका होती हैं। मगर उपग्रहों की सेवाएं सबसे अधिक कारगर पूर्व के क्षेत्र में हो रही है। केंद्र सरकार की योजनाएं जरूरतमंदो तक पहुंच पा रही या नहीं इसकी निगरानी दिल्ली में बैठकर की जा सकती है। पंचायतों के साथ संपर्क बढ़ा है। वहीं नेविगेशन (जहाजी विद्या) उपग्रहों से देश की सेना की मारक क्षमता बढ़ी है। हम विदेशो का पैसा अपने देश में लाना चाहते हैं। हम अपनी जरूरतों के अनुसार उपग्रह निर्माण कर रहे हैं। इसके लिए हम अपने ही पैसे का उपयोग करते हैं और इसके लिए हमारे लोगों को ही रोजगार मिल रहा है। इससे प्रतिभाओं का पलायन भी रुकेगा।

पीएसएलवी:-

100 प्रतिशत विदेशी सैटेलाइटों की सफल लॉन्चिंग पीएसएलवी रॉकेटो दव्ारा हुई हैं। 20 देशों के 57 सैटेलाइटों की लॉन्चिंग 1999 से अब तक हुआ हैं। 60 प्रतिशत फीस विदेशी अंतरिक्ष कार्यकताओं की तुलना में हैं। ईएडीएस एस्ट्रियम, इंटलसेट, अवंती ग्रुप, वर्ल्डस्पेस, इंमरसेट, और यूरोप व ऐशिया के कई स्पेस इंस्टीट्‌यूशन इसरो के ग्राहक हैं।

इसरो सरकारी जनसमूह है, वहां मुनाफे की ज्यादा चिंता नहीं है। भारत में श्रम लागत कम है। सामान का ’इनपुट कॉस्ट’ (अंदर की कीमत) काफी कम रहता है। यह सब लॉन्च की लागत को कम कर देता है। पीएसएलवी रॉकेट का इसरों काफी उपयोग कर रहा है। इसे ’वर्कहॉर्स रॉकेट’ बोला जाता है। इसके 36 मिशन में से 35 सफल रहे हैं। यह बहुत ही भरोसेमंद रॉकेट है। इसलिए इसे बाहरी देश भी अपना रहे हैं।

                                                                                                              पल्लव बागला, विज्ञान मामलों के पत्रकार

कमाएं:- वर्ष 2016-17 में इसरो का लक्ष्य पीएसएलवी से 25 विदेशी उपग्रह भेजने का है। इसरो की कॉमिर्शयल इकाई एंट्रिक्स ने वर्ष 2015-16 में सैटेलाइट लॉन्च कर 775 करोड़ रुपए की कमाई की है। यह 2014-15 से 16 फीसदी ज्यादा है। पीएसएलवी दुनिया का सबसे सस्ता लॉन्च व्हीकल है।

उपलब्धियां:- इसरो की उपलब्धियां निम्न हैं-

  • 1975 पहले भारतीय उपग्रह आर्यभट्ट का प्रक्षेपण हुआ।
  • 1984 में भारत और सोवियत संघ दव्ारा संयुक्त अंतरिक्ष अभियान, राकेश शर्मा पहले भारतीय अंतरिक्ष यात्री बने।
  • 1992 में पूरी तरह स्वदेशी तकनीक से बने उपग्रह इनसेट-2 का सफल प्रक्षेपण हुआ।
  • 1999 पहली बार भारत से विदेशी उपग्रहों का प्रक्षेपण हुआ।
  • 2008 चन्द्रयान का सफलतापूर्वक प्रक्षेपण हुआ।
  • 2013 मंगलयान का सफलतापूर्वक प्रक्षेपण हुआ।
  •  नासा ने 2013 में 29उपग्रह भेजें थे।
  • 2015 खगोलीय शोध को समर्पित भारत की पहली वेधशाला एस्ट्रोसैट का सफल प्रक्षेपण किया।

वजन:-

उपग्रह कुल वजन 1,288 किलोग्राम हैं। 727.5 किलोगाम का काटोसैट-2 भी हैं, 02 उपग्रह भारतीय विधि/ शिक्षण संस्थानों के हैं। 1.5 किलोग्राम वजनी सत्यभामा सैट ग्रीन हाउस (हरा घर) की जानकारी देगा। 01 किलोग्राम वजनी स्वायन हैम रेडियो कम्यूनिटी के लिए संदेश भेजेगा। 505 किमी की ऊंचाई वाले सूर्य के साथ समचालित (सिंक्रोनस) कक्षा में स्थापित किया जाएगा।

करोड़:-

ग्लोबल सैटेलाइट बाजार 13 लाख करोड़ रु. का है, इसमें अमेरिकी हिस्सा 41 प्रतिशत हैं जबकि भारत का हिस्सा 4 प्रतिशत है। भारत में विदेशी सैटेलाइट की लांचिंग इसरो की जनसमूह एंट्रिक्स के माध्यम से होती है। भारत अब तक 57 विदेशी उपग्रह भेजकर करीब 1,000 करोड़ रुपए कमा चुका है। 2014-15 में एंट्रिक्स का नेट प्रॉफिट (फायदा) 1860 करोड़ रुपए था। जो 2010-11 की तुलना में 700 करोड़ रु. ज्यादा हैं।

86 प्रतिशत सक्सेस रेट (सफलता कीमत), 19 अप्रेल, 1975 के बाद से इसरों ने अब तक 113 रॉकेट प्रक्षेपित किए। 97 प्रक्षेपण सफल हुए। करीब 16 ही विफल रहे हैं।

बजट:-

अमेरिकी कार्यकता नासा के एक साल के आधे बजट के बराबर इसरो का 41 साल का बजट है। इसरों से 8 साल पहले शुरु हुई पाक स्पेस कार्यकर्ता सुपार्को हैं, यह दो सैटेलाइट ही लॉन्च कर पाई, वो भी विदेशी सहयोग से।

हौसला:-

इसरों के वैज्ञानिकों ने एक साथ 20 उपग्रहों का सफल प्रक्षेपण करके दुनिया को यह जता दिया है कि 21वीं सदी हमारी है। 47 साल पहले बने इसरों ने डॉ. विक्रम साराभाई जैसे महान वैज्ञानिकों के उस सपने को लंबी छलांग दी है, जो उन्होंने कभी एक गरीब और विकासशील देश के लिए संकोच के साथ देखा था। पंडित जवाहरलाल लाल नेहरू देश की वैज्ञानिक संस्थानों को आधुनिक भारत का मंदिर कहते थे और निश्चित तौर पर इसरों 21वीं सदी के भारत के लिए वही है। तमाम कठिनाइयों और विफलताओं के बाद सफलता के आसमान को छूते हुए इसरों भले अभी रूस के उस प्रमाण से पीछे है, जिसके तहत रूस ने 2014 में एक साथ 37 उपग्रह लांच किए थे, लेकिन उसने 8 साल पहले गर्व के साथ बनाए गए अपने ही प्रमाण को पुराना करते हुए यह जता दिया है कि वह मंजिल भी दूर नहीं है। यह अब तक का सबसे बड़ा मिशन था और इसके लिए अपने अंतरिक्ष वैज्ञानिकों को बधाई देने वाले प्रधानमंत्री मोदी जी भी बधाई के पात्र है, क्योंकि उनमें देश की तरक्की का वैसा ही जज्बा है जैसा आजादी की पीढ़ी वाले नेताओं में था। 20 उपग्रहो में से 13 अमेरिका के थे, तीन हमारे और चार अन्य देशों के हैं। इंडोनेशिया के एक-एक उपग्रह वाले इस अभियान में भारत के दो विश्वविद्यालयों के सिर्फ दो छात्र के उपग्रह हैं। इससे दुनिया देख रही है कि नासा जैसे संस्थान वाला देश अमेरिका भी हम पर भरोसा कर रहा है और हमारे साथ कार्य कर रहा है। दुनिया में जमने वाली इस धाक के साथ भारतीय वैज्ञानिक संस्थानों की दक्षता और उनकी व्यावसायिक उपयोगिता बढ़ी है।

दक्षिण एशिया:-

हम दक्षिण ऐशिया में ऐसे केंद्र बन गए हैं, जिसे दक्षिण ऐशिया ही नहीं पश्चिम के भी कई देश अपने वैज्ञानिक शोध और तरक्की के लिए उपयोग करना चाहते हैं। अमेरिका के लैब डोव उपग्रह तमाम प्रकार की तस्वीरें लेने वाले हैं, जिनसे शहर, गांव, तटवर्ती इलाकों और जल की उपलब्धता की तस्वीरें खींची जा सकेंगी और विभिन्न कार्यक्रमों का निर्माण हो सकेगा। इनका उपयोग जीपीएस प्रणाली में भी हो सकेगा।

इसरो के विषय में विचार निम्नलिखित हैं-

हम एक राष्ट्र के तौर पर अलग-अलग उपलब्धियां हासिल कर रहे हैं। इसरों ने एक बार फिर हमें गौरवान्वित किया है। एक बार में 20 सैटेलाइट लॉन्च करके इसरो ने हमें और आगे बढ़ाया है।

                                                                                                                                     रणदीप हुड्डा, अभिनेता

इस उपलब्धि के साथ ही भारत तीसरा ऐसा देश बन गया हैं, जिसने 20 या इससे अधिक सैटेलाइट एक बार में लॉन्च किए हैं।

                                                                                                                                  कलराज मिश्र, केंद्रीय मंत्री

इसरो आप अद्भुत हो। इसने बार-बार सिद्ध किया है कि यदि उन्हें करने दिया जाए, तो सरकारी संस्थानों में बैठे लोग भी श्रेष्ठ प्रदर्शन कर सकते हैं।

                                                                                                                        राजीव चंद्रशेखर, राज्यसभा सांसद

क्या कभी यह सोचा गया है कि इसरो के लगभग सभी वैज्ञानिक दक्षिण से ही क्यों हैं? वे क्यों बुद्धिमत्ता में हम उत्तर भारतीयों से तेज हैं?

                                                                                                          डॉ. एसवाई कुरैषी, पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त

सैटेलाइट (उपग्रह):-

भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) ने एक साथ 20 उपग्रहों को अंतरिक्ष में भेजकर दुनिया को चौंका दिया हैं। एक साथ इतने विदेशी उपग्रह भेजने का यह प्रमाण है। यह वही इसरों है, जिसके पास तीन दशक पहले तक उपग्रह और रॉकेट लाने-ले जाने के लिए वाहन तक नहीं थे। बैलगाड़ी और साइकिल से उपग्रह -रॉकेट लांचिग पैड तक ले जाए जाते थे। लेकिन उसने 35 साल में आकाश में ऐसी छलांग लगाई कि आज भारत को दुनिया का तीसरा ऐसा देश बना दिया, जिसने एक साथ 20 या इससे ज्यादा उपग्रह भेजने की उपलब्धि हासिल की है।

इतना ही नहीं, आज हर देश इसरों से सैटेलाइट भिजवाना चाहता है। क्योंकि अमेरिकी कार्यकर्ता नासा से हमारी लागत 10 गुना तक कम है। हम सबसे सस्ती लांचिंग में निजी जनसमूहों स्पेस एक्स और अमेजन को भी टक्कर दे रहे हैं। 1981 में भारत में जब अंतरिक्ष कार्यक्रम की शुरुआत हुई थी, तब रॉकेट साइकिल पर और उपग्रह बैलगाड़ी पर रखकर एक जगह से दूसरी जगह पहुंचाए जाते थे। 2016 में सिंगल मिशन में अब हम रूस से 33 उपग्रह और अमेरिका से 29 उपग्रह से ही पीछे है। भारत के 3 उपग्रह भेजे गए। इनमें दो उपग्रह सैटेलाइट छात्रों के दव्ारा बनाए गए हैं। सत्यभामा चेन्नई के छात्रों और स्वयं सैटेलाइट पुणे के छात्रों ने बनाए हैं।

मुख्य उपग्रह:-

हमारा मुख्य उपग्रह कार्टोसेट-2 हैं। इसमें सेना के भी दो उपकरण लगे हैं जो प्राकृतिक आपदा से निपटने में सेना की मदद करेगा। वहीं स्मार्ट सिटी के लिए नक्शा बनाने के काम आएगा।

परिणाम:-

एक समय था जब किसी सामान्य लांचिग तक के समय हमारे पूरे दल की सांसे रुक जाती थी। इस वर्ष 28 अप्रेल को एक विशेष लांचिंग के समय श्रीहरिकोटा में आमंत्रित किया गया है। इस लांचिंग में वैज्ञानिको का आत्मविश्वास देखा उसमें इसरों दल की सालों की तपस्या का मीठा फल नजर आ रहा था। लांचिंग से पहले दशकों पूर्व के तनाव भरे माहौल की बजाय हमने वहां आपस में मजाक करते हुए वैज्ञानिक देखे। यह आत्मविश्वास रातोंरात नहीं आया है। एक पूरी पीढ़ी के सतत प्रयास का नतीजा है।

                                                                            डॉ. एस. एल, पूर्व निदेशक, इसरों सेटेलाइट, नेविगेशन कार्यक्रम

अगला मिशन:-

इसरों का अगला मिशन स्कैनसेट-1 होगा। हमारा यह उपग्रह महासागर में होने वाली उथल-पुथल पर पैनी नजर रखेगा। उसके बाद उपग्रह इनसेट-3डी-आर भी इसी साल लांच (शुरू) करेंगे। इसका प्रक्षेपण जीएसलवी से होगा। यह भी मौसम पूर्वानुमान से संबंधित है। इसके अलावा जीसेट-18 का प्रक्षेपण फ्रेंच गुयाना के कौरू प्रक्षेपण स्थल से सितंबर में होने की उम्मीद है। हमारा उपग्रह प्रक्षेपण स्थल पर पहुंच चुका है। यह अब तक का सबसे वजनी उपग्रह होगा।

                                                                                                             एम. अन्नादुरै, निदेशक, इसरो उपग्रह केंद्र

उपसंहार:-जीपीएस प्रणाली से चीन जैसे पड़ोसियों को भी यह संदेश जाएगा कि भारत अपनी बुद्धि और कौशल के लिहाज से दुनिया का एक ऐसा उदीयमान देश है, जिससे दुनिया मिलकर चलना चाहती है, इसलिए इसकी उपेक्षा उचित नहीं है। इस उपलब्धि का राष्ट्रीय स्तर पर यही संदेश है कि हम धर्म और जाति के आधार पर बने आपसी मतभेद भुलाकर इसरों की तरह वैज्ञानिक दृष्टिकोण से काम करेंगे तो हमारी समृद्धि और सफलता कोई रोक नहीं सकता है और इसी तरह भारत विकास की ओर बढ़ता जाएगा।

- Published on: August 17, 2016