भारत-अमरीका समझौता (Indo-American Treaty - April 2016 - in Hindi) [ Current Affairs ]

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प्रस्तावना: -भारत रिश्ते सुधारने की दिशा में कदम बढ़ाते हुए अमरीका के साथ लॉजिस्टिक्स एक्सचेंज मेमोरेंडम ऑफ एग्रीमेंट नामक समझौता करने पर सहमत हो गया है। रक्षा क्षेत्र में किए जाने वाले इस समझौते के तहत भारत और अमरीका एक दूसरे के सैन्य हवाई अड्‌डे और बंदरगाह इस्तेमाल कर सकेंगे। सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि इस समझौते से भारत को क्या हासिल होगा? अमरीका अपने कौनसे हित इस समझौते के माध्यम से साधना चाहता? अमरीका की मौका परस्ती फितरत को देखते हुए क्या भारत को उस पर भरोसा करना ठीक हैं? भारत के दोस्त रहे रूस और पड़ोसी देश चीन की प्रतिक्रिया इस समझौते को लेकर क्या होगी?

समझौता: - भारत और अमरीका के बीच लॉजिस्टिक्स एक्सचेंज मेमोरेंडम ऑफ एग्रीमेंट (लीमा) यानी रक्षा के क्षेत्र में जो समझौता होने के आसार हैं, उसे बहुत ही बढ़ा-चढ़ा कर पेश किया जा रहा है। हकीकत में एकाएक परिस्थितियों को बदल देने वाला नहीं कहा जा सकता है। अलबत्ता, इसे दोनों देशों के संबंधों की प्रगाढ़ता की दिशा में महत्वपूर्ण कदम जरूर कहा जा सकता हैं। दरअसल अमरीका अपने मित्र और सहयोगी देशों के साथ कुछ आधारभूत समझौते करता है। इसे अमरीका की ओर से लॉजिस्टिक्स सपोर्ट एग्रीमेंट कहा जाता है। भारत इस पर आनाकानी करता रहा है। दिसंबर 2015 में भारत के वर्तमान रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर जब अमरीका गए तो उनसे भी इस समझौते को आगें बढ़ाने की बात कही गई। इस मामले में नए प्रस्ताव अमरीका की ओर से आए तो भारत ने इसे एकतरफा समझौता करने की बजाय दो तरफा समझौता करना स्वीकार किया। इसलिए समझौते का नाम भी बदल दिया है। इसके साथ ही अमरीका भारत के साथ दो और समझौते भी करना चाहता है। अमरीका का कहना है कि इन तीनों समझौते के बाद वह बिना किसी रोकटोक के तकनीकी सहायता उपलब्ध करा सकेगा। एलएसए से लेमोआ तक- लॉजिस्टिक सपोर्ट एग्रीमेंट (एलएसए) को सुधारकर इसे लॉजिस्टिक्स एक्सचेंज मेमोरेंडम ऑफ एग्रीमेंट (लेमोआ) कहा गया है। इसके तहत अमरीका और साझेदार देशों की सेना को लॉजिस्टिक सपोर्ट आपूर्ति व सेवाएं मुहैया कराई जाएंगी। अमरीकी एयरक्राफ्ट और युद्धपोत भारतीय सैन्य केंद्रों पर ईधन आपूर्ति, मरम्मत और अन्य लॉजिस्टिक सहायता के लिए उतर सकेंगे। इसी तहर भारतीय विमान को भी अमरीकी सैन्य केंद्रो पर यह सहायता मिलेगी।

4 साल से अमरीका भारत को हथियार देने वाला सबसे बड़ा देश हैं। भारत-अमरीका हर साल संयुक्त रूप से सैन्याभ्यास करते हैं। भारत ने अमरीका के साथ पिछले 9 साल में 14 अरब डॉलर के हथियार समझौते किए हैं। अब भी कई समझौतों पर बातचीत जारी हैं।

मायने: - लीमा के बाद भारत और अमरीका की सेनाएं संयुक्त रूप से सैन्य अभियान सरलता से संचालित कर सकेंगी। भारत की सेना अमरीका में और अमरीका की सेना भारत में उसके सैन्य हवाई अड्‌डे, बंदरगाह का इस्तेमाल कर सकेंगे। भारत में अपने हवाई अड्‌डों और बदंरगाहों पर अमरीकी सेना को जरूरत पड़ने पर ईंधन, उपकरणों को सुधारने के लिए उपकरण, तकनीकी सहायता और भोजन-पानी की व्यवस्था उपलब्ध कराएगा। हालांकि इस समझौते में अमरीकी सेना के भारत मे ठहरने की कोई बात नहीं हैं। लेकिन, भविष्य में ऐसा नहीं किया जाएगा, ऐसी बात भी नहीं है।

एशिया: -हकीकत यह है कि अब यूरोप के मुकाबले एशिया आर्थिक, तकनीकी और सैन्य दुष्टि से तेजी के साथ उभर रहा है। अमरीका के लिए यूरोप में सबसे बड़ी चुनौती रूस रहा था तो उसने नेटों के जरिए काम चलाया लेकिन एशिया में उसके लिए सबसे बड़ी चुनौती चीन है। उसके लिए वह भारत के साथ दोस्ती बढ़ा रहा है। इसके अलावा एशिया में दूसरा बड़ा खतरा आतंकवाद का भी है। जिससे खुद अमरीका जूझ रहा है। अमरीका का मानना है भारत केवल दक्षिण एशिया में ही नहीं बल्कि समूचे एशिया में इस चुनौती का सामना करने में अग्रणी भूमिका निभा सकता है।

लाभ: - भारत मेक इन इंडिया अभियान की इस दिशा में आगे बढ़ रहा है। रक्षा समझौते के साथ यूपीए सरकार ने अमरीका के साथ भविष्य की रक्षा रणनीति के संदर्भ में चार क्षेत्रों में अनुसंधान व विकास की परियोजना पर संयुक्त रूप से आगे काम करने की बात की थी। अब इस मामले में दो क्षेत्र ओर जुड़ रहे हैं। यानी भारत अमरीका के साथ मिलकर रक्षा उपकरणों की दिशा में अनुसंधान के साथ उन्हें तैयार भी करेगा। यह सामरिक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण काम कहे जा सकते हैं। अब यह नजरियें का सवाल है अगले कुछ वर्षों में क्या अनुसंधान होता है और उसे कैसे विकसित किया जाता है। इस पर निर्भर करेगा कि भारत-अमरीका के बीच रक्षा समझौता कितना फायदेमंद है।

रूस व चीन: -भारत के इस कदम से केवल चीन ही नहीं रूस भी चौकन्ना हो गया है। चूंकि भारत पहले से ही अमरीका के साथ रिश्ते सुधारने की जुगत में था, इसलिए उसने पाकिस्तान से संबंध बढ़ाने शुरू कर दिए। दूसरी ओर अमरीका ने भी पाकिस्तान से दोस्ती बनाए रखी है और उसे हाल ही में एफ-16 विमान देने की बात कही। और, साथ में हमेशा की तरह भारत से यह भी कहा कि पाकिस्तान इनका इस्तेमाल आतंक को रोकने के लिए करेगा। यहीं पर अमरीका पर संदेह होता है क्योंकि वह पाकिस्तान को दिए गए उसके हर उपकरण का इस्तेमाल भारत के विरूद्ध करता है। जहां तक चीन का सवाल है तो भारत के रक्षामंत्री और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार जल्द ही चीन जाने वाले हैं। दोनों देशों के बीच बातचीत का एजेंडा (बैठक में/कार्य विवरण/विचारणी य विषयों की सूची) सीमा पर सहयोग बढ़ाने को लेकर था। लेकिन अब भारत पाकिस्तान में रह रहे आतंकी मसूद अजहर पर चीन की राय और चीन भारत-अमरीका के बीच बढ़ते सैन्य रिश्तों को लेकर जरूर बात करेगा।

चीन: - इस समझौते को चीन के खिलाफ सामरिक गठबंधन मानने से भारतीय अधिकारियों ने इनकार किया है। इस समझौते के माध्यम से भारत-अमरीकी सैन्य संबंधों को मजबूत करना है। भारत अमरीकी हथियारों का बड़ा आयातक है।

यह भी देखना चाहिए कि यह एक पारदर्शी प्रावधानों वाली सहमति है जिसमें दोनों देशों के हित शामिल है। कहीं भी किसी का हित प्रभावित होता दिखे तो वह नोटिस (लिखित सूचना) देकर इस सहमति को समाप्त भी कर सकता है। ऐसे में जब दक्षिणी चीन सागर व एशिया प्रशांत क्षेत्र में चीन की गतिविधियां भारत को नुकसान पहुंचाने वाली दिख रही है। भारत और अमरीका के बीच संबंध मजबूत होते हैं तो एक तरह से चीन की गतिविधियों पर अंकुश लगाने का काम ही होगा। अभी मेक (निर्माण करना, बनाना, अस्तित्व में लाना या उत्पन्न करना) इन इंडिया (भारत), स्मार्ट (साफ-सुथरा) शहर जैसे कार्यक्रमों के लिए भारत पर अमरीका की वित्तीय सहायता की जरूरत होगी।

विरोध: - हालांकि यूपीए सरकार में ऐसे ही समझौते का विरोध हुआ। था। तब रक्षा मंत्रालय ने यह कहकर इनकार किया था कि इससे भारत की सामरिक स्वायत्तता का उल्लंघन होगा। अमरीकी सेना को भारत में ’बुनियादी अधिकार’ मिल जाएंगे।

विश्वास: - रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर और अमरीकी समकक्ष एश्टन कार्टर ने जोर दिया कि नए समझौते का मतलब भारतीय जमीन पर अमरीकी सेना को सैन्य ठिकाना मुहैया करना नहीं है। जब चाहे अमरीका को भारत रोक भी सकता है।

रक्षा: -हम याद करें कि जब चनद्रशेखर देश के प्रधानमंत्री थे तब खाड़ी युद्ध के दौरान भी भारत ने अमरीकी युद्धक विमानों को मुम्बई एयरपोर्ट पर ईंधन भरने की अनुमति दी थी। अमरीका के पास एडवांस (विकास) एयरक्राफ्ट (हवा दस्तकारी/चालाकी करना) हैं।

इससे आगे भारत-अमरीका समुद्री रक्षा सहयोग को मजबूत करेंगे। हिंद महासागर में साथ काम करेगें। भारतीय सेना अपने तटों से दूर कभी-कभार ही संचालन करती है। पर अमरीकी सैन्य अड्‌डों जैसे जिबूती और डिएगो गर्सिया तक भारत की पहुंच लाभदायक हो सकेगी।

परिणाम: - भारत और अमरीका के संबंधों की बात करें तो हम देखेंगे कि पिछले 15 से 20 साल से इनमें बदलाव ही आया है। अटलबिहारी वाजपेयी और इसके बाद डॉ. मनमोहन सिंह और अब नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री कार्यकाल में दोनों देशों के सैन्य अड्डों के इस्तेमाल को लेकर बनी सहमति को हमें दीर्घकालीन परिणामों के संबंध में देखना चाहिए जो काफी सार्थक साबित होने वालें हैं। आलोचनात्मक नजरिए से देखें तो हर देश अपने हित में काम करता है। यही कारण है कि अमरीका भी किसी मामले में चीन, किसी में पाक और किसी में भारत का साथ देता नजर आता है।

एफ-14: - अब एफ-14 युद्धक विमानों का उत्पादन जब हम भारत में ही करने की बात कर रहे हैं तो अमरीकी तकनीक की मदद भी हमें आसानी से मिल पाएगी। इससे दोनों देशों के आर्थिक हित भी जुड़े हुए हैं। सैन्य संसाधनों के इस्तेमाल को लेकर की गई यह सहमति विदेश और रक्षा नीति दोनों ही क्षेत्रों में काफी अहम है।

उपसंहार: - प्रस्तुत समझौता दोनों देश के लिए बहुत ही सराहनीय कदम है पर इस समझौते में एक दूसरे के ऊपर विश्वास भी होना बहुत जरूरी हैं। तभी यह समझौत अच्छा साबित होगा। आगे इस समझौते से क्या परिणाम सामने आते हैं यह सब तो आगे आने वाले समय में ही पता चलेगा।

- Published on: May 13, 2016