ज्वैलरी कारोबार (Jewellery Business - Essay in Hindi) [ Current Affairs ]

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प्रस्तावना: - देश का ज्वैलरी उद्योग उत्पाद शुल्क की मार झेल रहा है। इसकी वापसी को लेकर ज्वैलरी व्यवसाइयों ने करीब डेढ़ महीने की हड़ताल की लेकिन सरकार टस से मस नहीं हुई। फिलहाल मामले पर समिति बना दी गई है। और अब इसकी विवरण का इंतजार है। इस बीच पहली जून से स्त्रोत पर ही कर संग्रहण की व्यवस्था लागू की जा रही है। इससे उद्योग के और मंदा होने की आशंका व्यक्त है। आखिरटीसीएस (उद्योग उत्पाद शुल्क) लागू करने के पीछे सरकार की मंशा क्या हैं? क्या करोबारी इस अंकुश को सहन कर पाने की स्थिति में हैं?

सरकार: - के ज्वैलरी उद्योग पर स्त्रोत पर कर संग्रहण की अनिवार्यता लागू होने से इस उद्योग को कई पेचीदगियों का सामना करना पड़ेगा। सरकार का मन्तव्य तो नकद लेन-देन कम से कम करने का है लेकिन ज्वैलरी जैसे कारोबार में दो लाख रुपए से ज्यादा के नकद भुगतान पर यह अनिवार्यता अव्यावहारिक प्रतीत होती है। काले धन पर अंकुश लगाने के लिए सरकार रीयल स्टेट (स्वतंत्र राज्य) के साथ ज्वैलरी उद्योग पर भी यह प्राधान लागू कर रही हैं। देखा जाए तो रीयल स्टेट के व्यवहार व ज्वैलरी कारोबार के व्यवहार में अंतर है। संपत्ति के सौंदों में एग्रीमेंट (समझौता), रजिस्ट्र आदि का पुख्ता प्रबंध होता है और ऐसे सौदों में किसी के ठगे जाने की आशंका कम रहती है। लेकिन, ज्वैलरी में कारोबारी को चेक प्राप्त करने के साथ ही क्रेता को आभूषणों की डिलीवरी देनी होगी। यह बात सही है कि इसमें पेन कार्ड की अनिवार्यता रखी गई है पर आभूषण विक्रता चेक से भुगतान लेने के बाद भी उसके साफ होने तक फंसा ही रहेगा। कहीं उसका चेक बाउंस हो गया तो? ऐसे में यदि खरीददार अनजान है तो वह ठगी का शिकर भी हो सकता है, इसमें संदेह नहीं। आभूषणों पर उत्पाद शुल्क पहले ही लागू हो गया है। अब नकद व्यवहार कर रहे हैं तो भी कर देना होगा। सरकार का मन्तव्य भले ही इसके पीछे अच्छा रहा हो लेकिन हमारा मानना है कि इससे ग्राहकी भी कमजोर होगी। हम कैसे उम्मीद कर सकते हैं कि अपने खेत-खनिहार से निकला अनाज बेच कर आभूषण खरीदने आया काश्तकार चेक बुक साथ ही लाएगा? यह व्यवस्था आम कारोबारी और ग्राहको दोनों को ही उलझाने वाली होगी और कागजी खानापूर्ति बढ़ने से इंस्पेक्टर राज का खतरा भी हो जाएगा। छोटे कारोबारी पहले सही धंधे में मंदी के शिकार हैं। ऐसे प्रावधानों से उसे कई झंझटों का सामना करना पड़ सकता है। हालांकि सरकार ने आश्वस्त किया कि इस व्यवस्था से इंस्पेक्टर राज का खतरा नहीं होने वाला है। आभूषण तैयार होने के साथ ही उस पर उत्पाद शुल्क पहले ही लग रहा है। व्यापारी बिना वैट के अपना माल बेच नहीं सकता। वह नकद भुगतान लेकर भी उसे बैंक में जमा करा रहा है। और, सबसे बड़ी समस्या यह है कि ग्राहक यदि चेक से भुगतान नहीं करना चाहता तो व्यापारी उसको बाध्य भी नहीं कर सकता है। आभूषण कारोबारियों के सामने दूसरी बड़ी समस्या हॉल मार्किंग (गहनो को प्रमाणित करने का चिन्ह की रोशनी) अनिवार्यता को लेकर आने वाली है। बड़ा सवाल यह है कि जिसके पास बिना हॉल मार्किंग वाला माल पड़ा है, उसका क्या होगा? दूसरी बात यह भी है कि हमारे यहां हॉल मार्किंग सेंटर (स्थान) भी अभी इतने नहीं हैं कि सब आभूषण निर्माता आसानी से जांच करा सकें।

संकट: - गांव व छोटे शहरों में आभूषण विक्रेताओं की तो इससे समस्या और बढ़ने वाली है। इससे उनके कारोबार पर संकट आ जाएगा। हां, बड़े आभूषण कारोबारी इससे बाजार पर हावी जरूर हो जाएगें। आभूषणों के मामले में टीसीएस में 2 लाख रुपए की सीमा तो यूं ही हो जाती है। 2 लाख रुपए में तो 70 ग्राम सोना आता है। इस पर लेबर भी लगेगा। एक नगीना या हीरा भी लग गया तो कीमत वैसे ही बढ़ जाएगी। यह अकेला उद्योग है जिसमें उत्पाद का मूल्यवर्धन यानी वेल्यू एडिशन कम और कच्चा माल महंगा होता है। सवाल तीन तरह से लगाए गए करों का भी है। एक फीसदी वेट, एक फीसदी उत्पाद शुल्क और 1 प्रतिशत टीसीएस के बारे में आम उपभोक्ता को समझना काफी मुश्किल है। आभूषण विक्रेता पहले ही इन सबको शामिल करते हुए आभूषणों का भाव बताने को मजबूर होंगे। अंतत: पूरा भार उपभोक्ताओं पर ही पड़ने वाला है। इस प्रावधान से सोने की तस्करी बढ़ने की आशंका रहेगी। आभूषणों का 70 फीसदी कारोबार ग्रामीण क्षेत्र में होता हैं जहां आभूषणों की बिक्री प्रभावित होगी। कारोबारियों कोई फार्म भरने होंगे। इससे इंस्पेक्ट राज का खतरा बढ़ जाएगा।

समस्या: - ज्वैलरी कारोबार को लेकर शंका की दृष्टि से देखना ठीक नहीं है। सरकार ने हॉल मार्क की अनिवार्यता तो लागू करने की बात कही है लेकिन यह स्पष्ट नहीं किया कि जो निर्धारित कैरेट इस अनिवार्यता में शामिल नहीं है वह माल यदि तैयार पड़ा है तो उसका क्या होगा? क्या ऐसे आभूषणों को गलाकर फिर तैयार करना होगा। जो प्रावधान टीसीएस में किए गए हैं उसमें एक भारी विसंगति यह है कि आभूषण खरीददार यदि एक हिस्सा नकद और शेष चेक से भुगतान करता है तो टीसीएस की परिधि में पूरे भुगतान को ही नकद भुगतान माना जाएगा। यह प्रावधान काफी उलझाने वाला है। यह मानना चाहिए कि यदि एक सामान्य आभूषण कारोबारी इस प्रावधान से अनजान है तो इसे अनावश्यक रूप से सम्पूर्ण राशि पर टीसीएस देना पड़ेगा। आभूषण कारोबारियों को इन मसलों को लेकर विश्वास में लेना चाहिए। आभूषण कारोबार में नकद व्यवहार की सीमा को दो लाख रुपए करना काफी कम है। सरकार को यदि इसे लागू करना ही था तो पहले कम से कम 10 लाख रुपए की सीमा तय की जा सकती थी। बाद में इसे धीरे-धीरे 5 लाख करते हुए दो लाख रुपए तक लाया जा सकता था।

शुल्क व आयात: - उत्पाद शुल्क के विरोध में ज्वैलर्स 1 मार्च से 13 अप्रेल 16 तक हड़ताल पर रहे। इस दौरान मांग घटने से आयात 67.33 प्रतिशत घटा। प्रतिवर्ष भारत में 800 - 900 टन सोना आयात होता है यह आयात केवल घरेलू उपयोग के लिए होता हैं। वर्ष 2014 - 15 971 टन सोना आयात हुआ। वर्ष 2014 - 15 750 टन सोना आयात हुआ। देश में 60 लाख करोड़ रुपए का सोना है। देश के घरों में 17 हजार टन सोना हैं। देश के मंदिरों में 03 हजार टन सोना हैं। सोने का अप्रेल 2015 में 60 टन आयात हुआ था। सोने का आयात अप्रेल में 19.6 टन ही हुआ। विश्व में सोने की कुल खपत का बीस फीसदी भारत में हैं।

अनिवर्याता: - सरकार ने यह कदम नकद लेन-देन को हतोत्साहित करने के लिए उठाया है। देश में काले धन पर लगाम लगाने के लिए सरकार ने दो लाख रुपये से ज्यादा के नकद लेन-देन पर परमानेंट अकांउट नंबर (पैन) कार्ड अनिवार्य कर दिया है। इसके साथ ही नए नियमों के मुताबिक एक बार में दो लाख रुपए या इससे अधिक के आभूषण और सोना, चांदी खरीदने पर भी पैन का उल्लेख करना होगा सोना, चांदी और जेवरात खरीद को भी कालेधन का प्रमुख स्त्रोत माना जाता है। अब तक 5 लाख और इससे अधिक की खरीद पर पैन नंबर की आवश्यकता थी।

विवरण: - यूपीए सरकार के समय रिपोर्ट आई थी कि भारत में हर साल 2 लाख करोड़ रुपए का सोना खरीदा जाता है। लेकिन सरकार को मात्र 20 फीसदी सोने की खपत का ही लेखा-जोखा मिलता है। अर्थात देश में जितना सोना आयात होता है उससे बहुत कम आभूषणों के बिल बनते हैं। काले धन पर पिछले साल आई एक विवरण में अनुमान लगया गया कि देश में 70 से 80 फीसदी गहनों की बिक्री नकद में होती है। अंदेशा है कि इसमें ज्यादातर काला धन होता है। देश में कालेधन पर लगााम लगाने की दिशा में इसे अहम कदम माना जा रहा हैं।

रियायत और दिक्कत: - ज्वैलरी उद्योग को रियायत देने के साथ ही स्पष्ट रूप से कहा गया है कि भले ही 5 लाख रुपए से ज्यादा की खरीद-फरोख्त पर टीसीएस लागू होगा लेकिन उन्हें रिपोर्टिंग फॉर्म 61 ए दो लाख रुपए से अधिक की खरीद-फरोख्त पर भरना जरूरी होगा। इसका अर्थ यह है कि ऐसे ज्वैलरी कारोबारी जिनका टर्नओवर एक करोड़ रुपए से अधिक है, उन्हें 2 लाख रुपए से अधिक के लेन-दने पर ही ग्राहक का नाम, पता, पैन कार्ड विवरण को आवश्यक रूप से देना ही होगा। इन परिस्थितियों में उद्योग में 70 ग्राम से अधिक की ज्वैलरी बिकने में काफी दिक्कत होगी क्योंकि वर्तमान में सोने की 70 ग्राम की ज्वैलरी की कीमत करीब 2 लाख रूपए होगी। 2 लाख रुपए से अधिक के नकद लेन-दने पर टीसीएस के लिए फॉर्म 61 ए भरना आवश्यक है। इन हालात में ग्राहक भारी-भरकम ज्वैलरी की बजाय हल्की ज्वैलरी ही खरीदेगा। इससे कारोबार की गति में धीमापन आ सकता है। सरकार ने एक फीसदी उत्पाद शुल्क तो पहले से ही लगा रखा है और कारोबार से संबंधित एसोसिएशनों ने हड़ताल भी की। लेकिन, उत्पाद शुल्क का प्रावधान लागू तो ही चुका है। अब तो ज्वैलरी कारोबार से जुड़े लोगों को डॉ. अशोक लहरी की रिपार्ट का इंतजार हैं जो मामले की पूरी समीक्षा करके अपनी राय देगी।

उद्देश्य: - उम्मीद है कि जून के तीसरे सप्ताह में लहरी क विवरण आ जाएगा। तब तक तो कारोबार की स्थिति यथावत ही रहेगी। उत्पाद शुल्क के बाद धीमा हुआ कारोबार और धीमा ही होगा। सरकार वास्तव में सोने का आयात कम करना चाहती है। सरकार का इरादा है कि 20 से 25 फीसदी तक देश में सोने का आयात कम हो। यह सब दीर्घकालीन योजना के तहत किया जा रहा है ताकि आयात में और इजाफा न होने पाए। सरकार को पता है कि भारतीयों का रुझान सोने के प्रति काफी अधिक है और वे इसे बेहतर विनेश साधन मानते हैं। यही कारण है कि सरकार इसके आयात को बंद भी नहीं कर सकती लेकिन इसे कम करने के प्रयास ही करती है। ऐसा इसलिए क्योंकि इससे अर्थव्यवस्था को विशेषलाभ नहीं होता बल्कि सोने के आयात की कीमत अदा करने के लिए डॉलर की मांग काफी अधिक होती है और इससे रुपए के सापेक्ष उसकी कीमत में बढ़ोतरी हो जाती है। सरकार चाहती है कि डॉलर की कीमत नियंत्रित रहे। कम से कम सोना आयात हो, लोगों के घर में रखा हुआ सोना बाजार में आए। और इसलिए वह गोल्ड मोनेटाइजेशन योजना भी लेकर आई है। सोने के बदले लोग बांड खरीदे, इसके जिएसॉवरेन गोल्ड बांड लांच किए गए। इसी तरह सरकार ने इस पर नकद खरीद की सीमा लगाई। सरकार का दृष्टिकोण है कि यदि सोना खरीदना ही है तो एक नंबर के पैसे से ही खरीदा जाना चाहिए। सरकार चाहती है कि इस उद्योग से कालेधन का प्रवाह कम होता जाए। कभी मनी लांड्रिग का मामला सामने आता है तो कभी कुछ। ऐसे में ज्वैलरी व्यवसाय साफ-सुथरा हो, इसलिए सरकार प्रयासरत है और इस मामले में किसी को कोई शिकायत भी नहीं होनी चाहिए।

जेटली: - वित्त मंत्री अरुण जेटली ने साफ कर दिया कि सोने व हीरे के गहनों पर लगाई गई एक फीसदी एक्साइज ड्‌यूटी (कर्तव्य) वापस नहीं लीया जाएगी। लोकसभा में वित्त विधेयक-2016 पर चर्चा के दौरान उन्होंने यह बात कही। सरकार ने आम बजट में सोने के गहनों पर एक फीसदी एक्साइज ड्‌यूटी लगाई थी। ज्वैलरी का आकलन 1987 की कीमत पर करना था, यह गलत था।

उपसंहार: - वर्तमान में सोने पर आयात शुल्क 10 फीसदी है और उत्पाद शुल्क एक फीसदी लागू हो चुका है। इस पर टीसीएस की बंदिशें भी हैं। ऐसे में सोने की तस्करी की आशंका काफी बढ़ जाती है। इन परिस्थितियों के बावजूद भी सरकार अपने चालू खते के घाटे में किसी भी किस्म का दबाव नहीं लाना चाहती। जहां तस्करी को रोकने का सवाल है तो यह गृह मंत्रालय का विषय है और चालू खाता घाटा नियंत्रित करना वित्त मंत्रालय का विषय है हकीकत बात यह है कि सरकार काले धन की स्वघोषित योजना जून में लाने वाली है। यदि सरकार कारोबार को नियंत्रित करने के मामले में इतनी सख्ती नहीं करेगी तो फेल हो जाएगा। इसकी सफलता के लिए ये सारे कदम उठाने ही होंगे।

- Published on: June 10, 2016