जीवन बीमा (Life Insurance - New Changes - Essay in Hindi) [ Current Affairs ]

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प्रस्तावना: -भारतीय बीमा नियामक एवं विकास प्राधिकरण (इरडा) यह प्रावधान करने जा रही है जिसमें मुसीबत के समय जीवन बीमा उपभोक्ता पॉलिसी समाप्त किए बिना 85 फीसदी तक जमा राशि निकाल सकेगा और इसके लिए बीमा कंपनियां कोई कटौती भी नहीं कर पाएंगी। इरडा का यह प्रावधान आम जीवन बीमा उपभोक्ता को राहत दिलाने वाला है। लेकिन, संदेह यह भी है कहीं बीमा कंपनियां उपभोक्ताओं पर राशि कटौती का कोई दूसरा रास्ता नहीं खोज लें? क्या समय पूर्व निकाली गई इस राशि पर आयकर देना होगा? इस नए प्रावधान से किसको फायदा-नुकसान हो सकता है। ऐसा सोचना हमारे लिए बहुत आवश्यक हैं।

फायदा: - इरडा की ओर से घोषित यह योजना एक बार तो बीमा कराने वालों को राहत देती नजर आती है। लेकिन अभी बीमा की पूरी शर्तो का जब तक खुलासा नहीं हो जाए कुछ कहना संभव नहीं होगा। बीमित राशि का 85 फीसदी राशि निकालने की सुविधा देने के बाद सबसे बड़ा सवाल यही खड़ा होता है कि इससे बीमा कंपनियों व उपभोक्ता दोनों को कैसे राहत मिल पाएगी? बीमा कंपनियां अपने बीमा उत्पाद से मिली राशि का विभिन्न तरीकों से बाजार में निवेश करती है। यह शेयर बाजार व सरकारी कोष तक में होता है। इसी निवेश के रिटर्न के आधार पर ही वे बीमित व्यक्ति को पॉलिसी पूरी होने पर राशि का भुगतान करती हैं। इसमें जमा राशि का ब्याज, बोनस व अन्य परिलाभ शामिल होते हैं। इससे तो बीमा कंपनियों का निवेश योजना गड़बड़ा जाएगी और अत: खुद को होने वाले नुकसान की भरपाई वे बीमित व्यक्ति से ही करेगी। हो सकता है कि बीमा कंपनियां इस प्रावधान के लागू होने पर अपने बोनस का टारगेट कम कर दें। इसलिए पहले उस मकसद का सामने आना जरूरी है जिसके लिए यह योजना लागू करना प्रस्तावित की गई है। क्योंकि बड़ा सवाल यह है कि 85 फीसदी राशि वापस लेने पर भी शेष अवधि के लिए भला बीमा कंपनियां शतप्रतिशत जोखिम क्यों कवर करेंगी? ऐसा लगता है कि फायदा देने के चक्कर में कहीं पॉलिसी धारक को ही नुकसान नहीं हो जाए? बीमा कंपनियां अपने यहां निवेश प्र्रबंधक रखती हैं। इन प्रबंधकों की राय पर ही ये कंपकनयां बीमित राशि के रूप में प्राप्त धन को एकमुश्त दूसरी जगह निवेश करती आई हैं। यह राशि किसी एक उपभोक्ता की न होकर करोड़ों में होती है। बीच में ही बीमा राशि निकालने वालो के लिए बीमा कंपनियों के पास पहले से ही सरेंडर योजना है। जिसके तहत वे निश्चित राशि काटकर बीमित व्यक्ति को वापस करती हैं। पूरी राशि तो अभी भी कोई वापस नहीं निकाल पा रहा है एक तरह से बीमा कंपनियों की पहले से चल रही स्कीम को ही पुष्ट करने का काम होगा। इसलिए अच्छा तो यह हो कि बीमा राशि के सौ फीसदी निकालने की उपभोक्ता को छूट हो और इसकी एवज में कोई कटौती नहीं की जाए। ऐसा नहीं हुआ तो जाखिम कवर की बात हवा में होकर रह जाएंगी।

अंकुश: - बीमा कराने वालो को सचमुच राहत तो तब मिल पाएगी जब कंपनियों की मनमानी शर्तो पर अंकुश लगाया जाए। ये शर्ते बारीक अक्षरों में बीस-बीस पेज की होती हैं और पढ़ा-लिखा भी इनको नहीं समझ पाता है इसी का फायदा ये कंपनियां उठाती हैं। इसलिए सिर्फ आठ-दस प्रमुख बातों का ही योजना की शर्तों में उल्लेख होना चाहिए। एक बात और हैं। जागरूकता बढ़ने के साथ ही बीमा से जुड़ी शिकायतें हजारों की संख्या में उपभोक्ता अदालतों में पहुंचती है। लेकिन सालों तक इनका निपटारा हो ही नहीं पाता।

यह सुविधा बाजार पर आधारित योजना में नहीं दी जाएगी। बीमा कंपनियों की ओर से पॉलिसी बेचते समय ही ग्राहक को यह विकल्प दिया जाएगा। यदि वह विकल्प नहीं लेंगे तो अचानक पैसा निकालने पर कंपनियां कटौती के लिए स्वतंत्र होंगी।

राहत: - बीमा धारको ने इरडा से पॉलिसी तोड़े जाने पर जमा राशि में भारी कटौती किए जाने की कंपनियों की कारगुजारी से मुक्ति दिलाने का आग्रह किया था। इसलिए प्राधिकरण इससे जुड़े नियम में बदलाव करने जा रहा है। इससे ग्राहकों को राहत मिलेगी।

मौजूदा समय में आपात स्थिति में बीमित व्यक्ति अपनी पॉलिसी तोड़कर ही बीमा में जमा पैसा निकाल सकता है। बीमा कंपनियां अवधि पूरी होने पर ही बीमा की जमा रकम में अन्य लाभ जोड़कर पूर्ण भूगतान करती है। इससे पहले कोई जमाधन भी निकालना चाहता है तो जुर्माना के रूप में कंपनियां 20 से 35 प्रतिशत तक और कुछ इससे भी ज्यादा कटौती करती हैं।

छूट: - नए नियम के तहत मैच्योरिटी से पहले पैसा निकालने के बाद भी पॉलिसी जारी रहेगी। इरडा, ग्राहकों को दस से पंद्रह प्रतिशत रकम पॉलिसी में छोड़कर शेष पैसा जरूरत पड़ने पर निकालने पर कटौती नहीं किए जाने विकल्प लाएगा। इस तरह से पॉलिसी भी जारी रहेगी और इमरजेंसी के दौरान जमा पैसा निकालने में कटौती भी नहीं होगी।

नियम: - जीवन बीमा के संबंध में नियम यह है कि बीमा कंपनियों से मेच्योरिटी पर मिलने वाली राशि पर आयकर नहीं देना पड़ता है। अधिकतर बीमा कंपनियां इसी जानकारी के आधार पर बीमा पॉलिसियां बेचती हैं। लेकिन, दुर्भाग्य से हकीकत केवल यही नहीं है। नियमानुसार यदि कुल प्रीमियम की किसी वर्ष 10 फीसदी राशि ही जमा कराई गई है और ऐसे में आवश्यकता पड़ने पर धन निकाला जाता है, उस राशि पर आयकर अदा करना पड़ जाता है। चूंकि आमतौर पर बीमा कराने वालों को इस तरह नियम की जानकारी नहीं होती है, इसलिए उसके बीमा कंपनी की ओर से काटी जाने वाली राशि भारी झटका साबित होती है। लेकिन इरडा ने इस मामले में बहुत ही बढ़िया सोच रखी है और इसी अच्छी सोच के कारण ही इस तरह का नियम आ रहा है।

पॉलिसी खरीदने वालों को आमतौर पर यह जानकारी नहीं होती कि यदि उन्होंने प्रीमियम की 10 फीसदी से अधिक राशि जमा करा दी है तो उसे मेच्योरिटी से पूर्व ही पैसा निकालने पर आयकर अदा करना होता है। कई बार व्यक्ति पैसा निकालने के बाद आयकर रिर्टन में बीमा कंपनी से मिला पैसा नहीं दर्शाता है, ऐसे में आयकर विभाग ने बीमा कंपनी पर ही यह जिम्मेदारी डाली है कि वह निर्धारित कर व्यक्ति पैसा देते समय ही काट ले। इस राशि की कटौती के नाम पर बीमा कंपनियों पॉलिसी धारक से पैसा वसुलती रही हैं। इरडा के नए नियम के लागू होने के बाद पॉलिसी धारक करीब 85 फीसदी तक राशि निकालने पर आयकर अदा नहीं करना होगा। यह बात सही है कि इससे बीमा कंपनियों को कुछ नुकसान उठाना पड़े लेकिन इस बात उजला पक्ष यह है कि बहुत से ऐसे लोग अपनी राशि बीच में ही निकालेगे और 20 से 35 फीसदी तक पैनल्टी की राशि का चलन बाजार में ही होना वाला है और अंतत इस राशि का लाभ देश की अर्थव्यवस्था को मिलने वाला है। इरडा के इस कदम का स्वागत किया जाना चाहिए और जल्दी से जल्दी इस नियम को लागू करके आम पॉलिसीधारक को राहत उपलब्ध करानी चाहिए।

समझौता: - वर्तमान में बीमा पॉलिसी के लिए पूरी अवधि के लिए समझौता किया जाता है। इसका अर्थ यह है कि पॉलिसी धारक समझौते के मुताबिक निर्धारित अवधि के दौरान प्रीमियम जमा करता है और इस निश्चित अवधि के दौरान जोखिम के एवज में उसका बीमा किया जाता है। बीमित व्यक्ति को पॉलिसी की अवधि समाप्त होने पर समय-समय पर घोषित बोनस के साथ राशि दी जाती है। इस समझौते के दौरान पॉलिसी धारक प्रीमियम के तौर पर जमा कराया गया धन, वापस नहीं ले सकता। धन वापस लेने की दो ही सूरत होती हैं-

  • एक तो पॉलिसी धारक ऋण ले और तय ब्याज अदा करे। इस दौरान उसके जोखिम का बीमा बना रहता है।
  • दूसरी सूरत में वह पैसा वापस लेता है तो इसके लिए वह समझौते को तोड़ता है।

उद्देश्य: -आवश्यकता पड़ने पर जब बीमित व्यक्ति मेच्योरिटी पूर्व ही पैसा निकालता है तो उसे बीमा कंपनी से किया समझौता तोड़ना पड़ता है। ऐसी परिस्थति में उसे बीमा कंपनी को भारी-भरकम जुर्माना अदा करना पड़ता है। यदि आवश्यकता बीमारी के इलाज के लिए तो ऐसा लगता है कि बीमा का उद्देश्य ही निष्फल हो गया है।

जुर्माना- ऐसे में बीमा कंपनियां पॉलिसीधारक पर समझौता तोड़ने की शर्त के मुताबिक जुर्माना लगाकर, उसे पैसा वापस कर देती हैं। कई बार तो यह पैसा इतना अधिक होता है कि बीमा का उद्देश्य ही निष्फल हो जाता है। बीमा जोखिम की स्थिति के लिए यानी किसी दुर्घटना की स्थिति में बीमित व्यक्ति को तयशुदा आर्थिक नुकसान की भरपाई के लिए होता है। लेकिन, व्यक्ति को जब बीच में ही पैसा निकालना पड़ता है, तो समझौता तोड़ने के साथ ही बीमा ही दुखद स्थिति होती है कि व्यक्ति जीवन बीमा की राशि किसी बीमारी के इलाज के लिए चाहता है और इसके लिए वह बीमा का समझौता बीच में ही तोड़ता है। ऐसे में उसे समझौता तोड़ने पर जरूरत की पूरी राशि नहीं मिल पाती। यदि वह ऋण का विकल्प चुनता है तो उसकी स्थिति ही नहीं होती कि वह ब्याज और निर्धारित प्रीमियम चुका सके। ऐसे में बीमित रहने पर भी व्यक्ति आर्थिक परेशानी में जूझता रहता है। इस सारी परेशानी से बचाव के लिहाज से देखें तो इरडा का मुसीबत के समय करीब 85 फीसदी राशि निकालने के विकल्प का नियम आम पॉलिसी खरीदने वाले के लिए बहुत ही लाभकारी साबित होने वाला हैं। यह प्रावधान लागू होने के बाद बीमा कराने वालों को भारी-भरकम पेनल्टी से निजात के साथ बीमा जारी रखने में मदद मिलेगी।

नुकसान: - इसमें कोई संदेह नहीं है कि नया नियम लागू होता है तो बीमा कंपनियों को काफी नुकसान उठाना पड़ेगा। बीमा के लिए समझौता टूटने पर वे नुकसान की भरपाई के लिए ही जुर्माना वसूलती रही हैं। लेकिन, इरडा को बीमा नियामक संस्था के रूप में नियम बनाने गए नियमों को मानना ही पड़ेगा। यह जरूर हो सकता है कि कुछ बीमा कंपनियां इस नियम को कोर्ट में चुनौती भी दें।

उपसंहार: - भारतीय बीमा नियामक एवं विकास प्राधिकरण (इरडा) ऐसा नियम बनाने जा रहा हैं। जिसमें मुसीबत के दौर में बीमा से जमा रकम निकालने पर बीमा कंपनियां कोई कटौती नहीं कर पाएगी। इससे बीमाधारक को बहुत राहत होगी लेकिन दूसरी ओर बीमाधारक को बीमा ध्यान पूर्वक एवं पूर्ण रूप से उनकी शर्तो को जानकर ही बीमा करवाना चाहिए जिससे आगे बीमाधारक को कोई नुकसान न हो।

- Published on: February 18, 2016