Major April 2016 News in Hindi - टॉप सिक्स न्यूज सॉर्ट में (उच्च 6 प्रकार के समाचार संक्षेप में) [ Current Affairs ]

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प्रस्तावना: - यहां प्रस्तुत हैं विदेश नीति से लेकर राजनीति, सामाजिक बदलाव और जनसरोकार से जुड़ी छह बड़ी ताजा खबरों पर जाने-माने विशेषज्ञों के नजरिये से खबरो के विश्लेषण का। 1 भारत-पाक वार्ता: - विवक टेक- 15 दिसंबर 2015 को विदेश मंत्रियों ने सीबीडी की घोषणा की। 15 जनवरी 2016 को विदेश सचिव मिलने वाले थे। पठानकोट हमला हुआ और वार्ता रूकी। दिसंबर की घोषणा के बाद पहली बार 26 अप्रेल को विदेश सचिव मिले।

दोनों मुल्कों के विदेश सचिवों के स्तर की मुलाकात हुई पर यह ’हार्ट ऑफ एशिया’ सम्मेलन के उपलक्ष्य में हुई है। इसलिए यह कोई खास मुलाकात नहीं थी। कि जिससे ठोस परिणाम की उम्मीद की जाती। जिस ’कॉम्प्रिहेंसिव बाइलैटरल डायलॉग’ (सीबीडी) की घोषणा हुई थी वैसा कुछ इस मुलाकात से हासिल नहीं हुआ। अभी कूटनीति हलकों में यह बात रही है कि भारत की ओर से बड़े स्तर की वार्ता तभी होगी जब पाकिस्तान आतंकवाद पर कोई ठोस तरक्की करके दिखाए। हमारे विदेश मंत्रालय की प्रेस विज्ञप्ति में दो शब्दों का इस्तेमाल किया गया है। ’फ्रेंक और कंस्ट्रक्टिव’ लेकिन जब भी भारत-पाक की मुलाकात में इन दो शब्दों का इस्तेमाल होता है तो उसमें अनुभव यही रहा कि ’फ्रेंक’ ही ज्यादा दिखता है कुछ कंस्ट्रक्टिव नजर नहीं आता है।

अब पाक की गंभीरता देखिए, उन्होंने तो सचिवों की मुलाकात खत्म होने से पहले ही अपनी प्रेस विज्ञप्ति भी जारी कर दी। यानी वे पहले ही सोच-समझकर आए थे कि केवल कश्मीर और बलूचिस्तान का राग अलापना है। जिसे भारत में अधिक महत्व नहीं दीया जाता हैं। पर वे ऐसा बोलकर अपने घर में राजनीतिक लाभ उठा लेते हैं। उधर, हमने पठानकोट पर फोकस रखा। जाहिर है आतंकवाद हमारा तात्कालिक मुद्दा है और वे इसे कश्मीर के बहाने मोड़ देते हैं। उनका यह रुख बरसों से चला आ रहा है और चलता रहेगा इसलिए जब तक हालात नहीं बदलते ऐसी मुलाकात बेमानी हैं।

वे हमारी तात्कालिक चिंताओं पर बात करना ही नहीं चाहते है। हम अगर बात करते भी रहें और कोई हमला हो जाए तो इन विदेश सचिवों और विदेश मंत्रियों के मिलने का कोई मतलब रह नहीं जाता है। भारत आतंकवाद पर कोई ठोस कार्रवाई की उम्मीद करता है पर वहां ज्यों ही सरकार कुछ करने की नीयत दिखाती है तो उसे सेना और आतंकी कोई कार्रवाई नहीं करने देती है। पाकिस्तान में भी अब बुद्धिजीवी लोग और मीडिया में यह बात उठाई जाने लगी है।

2 दिल्ली म्यूजियम में आग: - नष्ट हुए ऐतिहासिक दस्तावेज और मॉडलों (नमूनों) के मूल्य का अनुमान लगाना कठिन है। सबसे बड़ा नुकसान हैं, उस उद्देश्य का, जिसके लिए यह संग्रहालय बना था।

प्राकृतिक इतिहास बताने वाला राष्ट्रीय संग्रहालय पूरे ब्रह्यांड की जानकारियां उपलब्ध करता रहा है। यहां बेहद अहम दस्तावेज और अमूल्य मानव रम से तैयार मॉडल (नमूने) के जरिए पृथ्वी, आकाश, जल, वायु के बारे में यहां बहुत ही सरल और मनोरंजन तरीके से सहज जिज्ञासाओं का समाधान किया जाता था। यहां जीव-जंतुओं, मानव जीवन, पेड़-पौधों की उत्पत्ति उनके विकास के जानकारी के साथ उनकी खाद्य श्रृंखला के बारें में विस्तार से दी जाने वाली जानकारियां व्यक्ति को सीधे पर्यावरण से जोड़ती रही है। आमतौर पर अन्य संग्रहालयों में फोटों खींचने की अनुमति नहीं होती लेकिन यहां रखी गई सामग्री के साथ लोग फोटो खींच सकते थे। भले ही बहुत सी सामग्री कृत्रिम रूप से तैयार की गई हों लेकिन वह सामग्री बहुत ही महत्वपूर्ण है। व्यक्ति यहां रखी सामग्री से सीधा जुड़ता था। यही कारण था कि इस संग्रहालय से लोग सीख कर जाते थे। इस संग्रहालय का यही उद्देश्य भी था और इसलिए यहां हर रोज बड़ी संख्या में बच्चे आते थे। जानकारी के अनुसार अब यह बेशकीमती धरोहर नहीं है, उसे फिर से हासिल कर पाना बेहद कठिन होगा।

“ऐतिहासिक दस्तावेजों और नमूनों के नष्ट हो जाने से उनके मूल्य का अनुमान लगाना बेहद कठिन है। लेकिन, सबसे बड़़ा नुकसान है, उस उद्देश्य का, जिसके लिए यह तैयार किया गया था। आमजन को पर्यावरण के साथ जोड़ने के लिए ऐसा संग्रहालय तैयार करना इतना आसान नहीं है। वर्षों के शोध पर आधारित मॉडल (नमूने) नष्ट हुए हैं और उन्हें फिर से तैयार कर भी लिया जाए लेकिन, वैसे नमूने और उतनी ही दक्षता के साथ तैयार करना बड़ी चुनौती हैं।” बी. पी. साहू, इतिहास विभाग, दिल्ली विश्वविद्यालय

3 भविष्य निधि ब्याज: - कर्मचारियों के भविष्य निधि खाते के तौर पर 30 हजार करोड़ रुपए की राशि जमा है। इसके बावजूद ब्याज दर घटाना तो समझ से परे है। समझ में नही आता की सरकार कर्मचारियों को लेकर सोच क्या रही है।? ऐसा लगता है कि उसकी निगाह गरीब और मध्यम आय वर्ग की बचत पर ही लगी हुई है। पहले वित्त मंत्री अरुण जेटली ने भविष्य निधि की राशि निकालने पर कर लगाने का प्रस्ताव किया। लेकिन, इसका जमककर विरोध हुआ तो उन्होंने बजट में लाए गए इस प्रस्ताव को वापस लिया। इससे कुछ पहले ही यानी फरवरी में ही भविष्य निधि की पूरी राशि निकालने पर रोक लगाने की अधिसूचना जारी की गई। विरोध के कारण ही सरकार इस अधिसूचना को लागू को लेकर डर रही थी। लेकिन, जब कर्मचारियों की ओर से इसका भारी विरोध हुआ तो अधिसूचना को वापस ले लिया गया।

कर्मचारी पिछले कुछ वर्षों से भविष्य निधि जमा पर ब्याज बढ़ाने की मांग करते रहे हैं। इस बार भविष्य निधि के केंद्रीय न्यासर बोर्ड की ओर से 8.80 फीसदी की दर से ब्याज देने को प्रस्ताव किया गया था। लेकिन, केंद्रीय वित्त मंत्रालय ने तो इसे बढ़ाने की बजाय घटा और दिया। अब भविष्य निधि पर कर्मचारियों को 8.70 फीसदी ब्याज मिलेगा। उल्लेखनीय है कि भविष्य निधि के तौर पर केंद्र सरकार के पास 30 हजार करोड़ रुपए जमा हैं। इतनी बड़ी राशि के मद्देनजर सरकार का ब्याज दर घटाने का फैसला तो समझ से परे है। कर्मचारियों के लिए यह बेहद अपमानजनक बात है। उसे सहन नहीं किया जाएगा। इतनी बड़ी राशि पर मामूली ब्याज की बढ़ोतरी से सरकार को विशेष फर्क नहीं पड़ने वाला है। लेकिन, ऐसा लगता है कि सरकार कर्मचारियों से दुश्मनी निकाल रही है। इस मामले को जोर-शोर से संसद में उठाया जाएगा। कर्मचारी एकजूट हो रहे हैं। यदि सरकार नहीं मानी तो हड़ताल को लेकर भी विचार किया जा रहा हे। कर्मचारियों के भविष्य निधि खाते में जमा पर ब्याज में कमी बर्दाश्त नहीं होगी।

4 शराबबंदी: - काम शराबंदी के ऐलान से ही नहीं चलने वाला। लोगों को इसके खतरे से आगाह किये बिना ऐसे फैसले असरदार हो पाएंगे। इसमें संशय हैं। युवा शक्ति को भी जोड़ना होगा।

शराब ने सबको ही बर्बाद किया है। शराब से हजारों-लाखों परिवार उजड़े हैं। मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने मध्यप्रदेश को धीरे-धीरे शराब मुक्त प्रदेश बनाने की पहल की है। जब बिहार में सरकार शराब बंदी की ओर कदम बढ़ा सकती है तो फिर मध्यप्रदेश और दूसरे प्रदेश क्यों नहीं। हम देख रहे हैं कि शराब को बढ़ावा देने वाले प्रदेशों ने इसे आमदनी का जरिया मान रखा है। लोगों की सेहत से हो रहे खिलावाड़ की किसी को चिंता नहीं हे। शराब के अभिशाप से मुक्त पाना तभी संभव हो पाएगा जब सरकारें शराब को कमाई का जरिया बनाने का काम छोड़ दें। यदि यह अनुमान लगाया जाए कि शराब की वजह से चौपट हो रहे घरबार कितने हैं और इससे कितने लोग असमय मौत के शिकार बन रहे हैं तो शराब सेवन के नतीजों का भयावहता का स्वत: ही अंदाजा हो जाएगा। शराब के कारण होने वाली बीमारियां के कारण सरकारों को स्वास्थ्य के मद में बजट भी बढ़ रहा है। फिर भी सरकारें क्यों कमाई की चिंता करने में लगी रहती हैं?

“शराबबंदी को चरणबद्ध रूप से खत्म करने से काम नहीं चलने वाला है। इसके लिए सरकारों को कोई ठोस नीति बनानी होगी। ऐसा नही होना चाहिए कि वाहवाही लूटने के लिए शराबंदी का ऐलान कर दिया जाए और शराब की ब्रिकी चोरी-छिपे होती रहे। केरल, हरियाणा व गुजरात सरीखे प्रदेश इसका उदाहरण है जहां पूर्ण शराबंदी के बावजूद शराब की उपलब्धता आसानी से हो जाती है। ऐसे में नाम की शराबंदी से काम नहीं चलने वाला।” एस. एन. सुब्बाराव, गांधीवादी चिंतक

5 राज्यसभा मनोनयन: -किसी पार्टी से जुड़े व्यक्ति को राज्यसभा में इस रास्ते से लाना उचित नहीं है। पारदर्शितापूर्व चयन से ही सही लोगों के अनुभवों का फायदा सदन और देश को मिल सकेगा।

संविधान में इसकी व्यवस्था की गई थी कि कला, संस्कृति, साहित्य समाजसेवा आदि क्षेत्रों में कार्यरत ऐसी हस्तियों को राज्यसभा में मनोनीति किया जाएगा जो चुनावी प्रक्रिया के जरिए सदन तक नहीं पहुंच पाते। मकसद साफ था कि ऐसी प्रतिभाओं के विचारों से सदन लाभांवित हो तथा उनके अनुभवों का देश हित में इस्तेमाल किया जा सके। शुरू के सालों में यह मनोनयन राष्ट्रपति ही करते थे लेकिन इंदिरा गांधी के प्रधानमंत्रीत्व काल में यह व्यवस्था शुरू कर दी गई कि राज्यसभा के लिए मनोनयन के दौरन इसको भी ध्यान में रखा जाना था कि देश के सभी हिस्सों से सभी वर्गों का प्रतिनिधत्व हो। यह एक अच्छी परिपाटी थी लेकिन पिछले सालों में ये मनोनयन राजनीतिक आधार पर या चेहरे देखकर किए जाने लग है। हमने यह भी देखा है कि खेल व सिने जगत की हस्तियों के नाम पर पिछले सालों में कुछ मनोनयन ऐसे भी हुए जिन्होंने सदन में रुचि ही नहीं ली।

“कुछ तो महज फोंटो खिंचवाने के लिए ही सदन में आए थे। भला ऐसे मनोनयन से देश को क्या फायदा होने वाला है? यह बात भी सच है कि इस सदन में श्याम बेनेगल, लता मंगेशकर, स्वामीनाथन व जावेद अख्तर सरीखी हस्तियों की वजह से सदन को गौरव ही बढ़ा है। एक तरह से इन प्रतिभाओं को देश ने सम्मनित ही किया है। लेकिन राजनीतिक संतुलन बनाने के इरादे से होते जा रहे मनोनयन से मूल भावना खत्म होने लगी है। ऐसा इंदिरा गांधी नरिसम्हाराव और दूसरे अन्य प्रधानमंत्री के कार्य काल में भी हुआ है।” एच. के. दुआ, वरिष्ठ पत्रकार एवं पूर्व राज्यसभा सदस्य

6 मस्जिद में महिलाएं: -सुहारा ने वर्ष 1990 में अपने उपन्यास ’किनावू’ के लिए प्रतिष्ठितललिताम्बिका अंथरजन्म पुरस्कार प्राप्त किया। वे मस्जिद में प्रवेश की पहल को मुस्लिम महिलाओं को और अधिक स्वतंत्रता की दिशा में अहम कदम मानती है।

केरल के कोट्‌टायम जिले मेेें स्थित ताडातंगाडी जामा मस्जिद में महिलाओं के प्रवेश की मंजूरी ताजा हवा के झोंके के समान है। देश में पूजा स्थलों और इबादतखानों में प्रवेश के अधिकार को लेकर महिलाओं के स्वर बुलंद हो रहे है। ताडातंगाडी जामा मस्जिद में मुस्लिम महिलाओं का प्रवेश इसलिए भी अहम हो जाता है क्योंकि अल्पसंख्यक वर्ग की महिलाओं में अब घर की चारदीवारी के साथा-साथ सार्वजनिक जीवन और इबादतखानों में भी उपस्थिति दर्ज कराने के विचार मजबूती पा रहे हैं। फिलहाल महिलाओं को प्रवेश की मंजूरी बतौर पर्यटक ही दी गई है, लेकिन मीनाचिल नदी के किनारे एक बड़े बदलाव की शुरुआत हुई है। मस्जिद में बतौर पर्यटक पहुंची महिलाएं सेल्फी लेती नजर आई। एक हजार साल में पहली बार महिलाओं को ताडातंगाडी जामा मस्जिद में प्रवेश मिला है। आधी आबादी को इबादत स्थल में प्रवेश की पैरोपकार होने के नाते सुहारा को इस कदम से खुशी मिली है। बचपन से ही सुहारा मस्जिद में जाकर दुआ करने की तमन्ना रखती थी। सुहारा हमेशा मस्जिद जाने की ख्याब देखा करती थीं। वैसे कूछ मुस्लिम संगठन महिलाओं को मस्जिद परिसर के एक निश्चित दायरे में जाने की इजाजम देते हैं। सुहारा नहीं मानती कि महिलाओं के प्रवेश से इन स्थानों की पवित्रता पर कोई आंच आएगी। पवित्र कुरआन में इस संबंध में महिला-पूरुष में कोई भेद नहीं है। सुहारा ने बचपन में रूढ़ियों को करीबी से देखा है। इस नई पहल का सुहारा स्वागत करती हैं। - बी. एम. सुहारा, विख्यात मलयाली लेखिका

- Published on: May 16, 2016