आतंकी इशरतजहां मामला (May 2016 - About Terrorist Izahratjahan in Hindi) [ Current Affairs ]

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प्रस्तावना: - आतंकी इशरतजहां और उसके चार साथियों को 5 जून 2004 को अहमदाबाद में पुलिस मुठभेड़ में मार गिराया था। इसके बाद मुठभेड़ को फर्जी बताते हुए मुठभेड़ में मारे गए लोगों के समर्थन में जमकर राजनीति शुरू हो गई। अब गृह विभाग के तत्कालीन अधिकारियों ने खुलासे करने शुरू किए हैं कि उन पर दबाव डालकर हलफनामा बदलवाया गया और इशरत को निर्दोष साबित करने की कोशिश की गई। यद्यपि तत्कालीन गृहमंत्री पी. चिदंबरम ने माना है कि उन्होंने हलफनामा बदलवाया लेकिन किसी को बचाने के लिए नहीं। बहरहाल, इस मुठभेड़ और उसके बाद हुई जांच में तथ्यों को छिपाने का मसला गरमा गया है। यह मामला अब सियासी हो चला हैं।

मामला: - संसद पर हुए हमले में आतंकियो से लड़कर जान गंवाने वाले शहीदों की लाशों पर खड़े होकर जो लोग हमलावर आतंकियों की जय-जयकार के नारे लगाते हों उन्हें देशभक्त कहना चाहिए या देशद्रोही? आतंकियो को निर्दोष विद्यार्थी बताकर उनके समर्थन में खड़े होने वालों को क्या कहना चाहिए? क्या यह देश के साथ गद्दारी नहीं कही जाएगी? इशरतजहां मामले में आतंकी सरगना डेविड कोलमैन हेडली खुद कह रहा है कि इशरतजहां पाकिस्तान से संबद्ध आतंकी संगठन तश्कर ए तैयबा से जुड़ी हुई थी, उसकी बात पर उन्हें यकीन नहीं होता। इसके विपरीत मामले में हलाफनामा ही बदल दिया गया और आतंकियो से लड़ने वाले पुलिस वालों को फर्जी मुठभेड़ का दोषी ठहराकर जेल में सड़ने के लिए मजबूर कर दिया गया। यह तो देश की जनता को तय करना ही पड़ेगा कि क्या ऐसे लोगों को देश का नागरिक कहा जाना चाहिए?

धोखेबाजी: - इसी मामले में हमने सर्वोच्च न्यायालय में जनहित याचिका दायर की है। हलफनाम बदलने का मतलब केवल गुमराह करना भर नहीं है बल्कि यह देश के साथ षडयंत्रपूर्वक धोखेबाजी करना है। हालांकि हमने अपनी जनहित याचिका में किसी व्यक्ति विशेष का नाम नहीं लिया है लेकिन इशरतजहां के मामले में सभी को जानकारी है कि उसने क्या किया है? तत्कालीन गृहमंत्री पी. चिदंबरम ने माना कि उन्होंने हलफनामा बदला था। उन्होंने यह भी कहा था कि पूर्व गृह सचि जी. के. पिल्लई अपनी भूमिका से बच नहीं सकते। लेकिन अब ये सारी बातें कह देने से भर से काम नहीं चल सकता है कि उन्होंने अपनी स्थिति स्पष्ट कर दी है। देश की जनता को यह तो जवाब देना पड़ेगा कि उन्होंने ऐसा क्यों किया? जहां तक अदालत में हलफनामा बदलवाने की बात है ऐसा किया जाना सरकार का नीतिगत फैसला था। इस मामले में पूरी केबिनेट (मंत्री-परिषद) की जिम्मेदारी बनती है। यह किसी व्यक्ति विशेष का फैसला नहीं था इसलिए हमने तत्कालीन केंद्र सरकार और गृह विभाग के विरुद्ध याचिका दायर की है।

एम. एल. शर्मा, एडवोकेट, सुप्रीम न्यायालय

अपराध: - हमारा स्पष्ट मानना है कि इशरतजहां आतंकी संगठन से ताल्लुक रखती थी। उसे और उसके साथियों ने जिन पुलिस वालों ने मारा, वे निर्दोष थे। दुनिया में कहीं पर भी देश के दुश्मनों को मारना या आतंकियों को मारना कोई अपराध नहीं होता। वास्तव में अपराध तो आतंकियों के साथ खड़े होना होता है। उनके समर्थन में आकर, झूठा हलफनामा दायर करना होता है। आतंकियों से मुकाबला करने वालों को बेइज्जत करना होता है आतंकियों से लड़ने वाले पुलिस वालों को इनाम देने की बजाय उन्हें जेल में सड़ने के लिए मजबूर करना अपराध कहा जाएगा। जिन पुलिस वालों को जेल हुई, क्या उनकी पुरानी जिंदगी वापस लौटाई जा सकती है? यह तो सोचना ही पड़ेगा कि देश में आतंकियों से लड़ने वालों को अपराधी बना देने वालों को क्या वही सजा नहीं मिलनी चाहिए? देश की जनता को अब जवाब चाहिए।

लेखक इशरतजहां प्रकरण में गृह विभाग के हलफनामा बदलवाने पर सुप्रीम न्यायालय में पीएलआई दाखिल करने वाले वकील हैं।

महत्वपूर्ण तथ्य: - इशतरजहां से जुड़े महत्वपूर्ण तथ्य निम्नलिखित हैं-

  • 5 जुन 2004 को अहमदाबाद में हुए मुठभेड़ में चार जने मारे गए थे जिनके नाम इशरतजहां, जावेद उर्फ प्राणेश पिल्लई, अमजद अली राणा और जीशान जौहर थें।
  • यह मुठभेड़ डीआईजी डीजी वंजारा की दल दव्ारा किया गया, जिन्हें बाद में सोहराबुद्दीन शेख के फर्जी मुठभेड़ के आरोप में जेल भेज दिया गया।
  • इशरतजहां मुंबई की रहने वाली 19 वर्षीय युवती थी जो गुरु नानक खालसा महाविद्यालय में बी. एससी की छात्रा थीं।
  • पुलिस ने दावा किया था कि ये चारों गुजरात के तत्कालीन प्रधानमंत्री मोदी की हत्या करने आए थे। खुफिया कार्य स्थान के अंदर की जांच के आधार पर मुठभेड़ किया गया था।
  • बाद में इशरतजहां के मुठभेड़ को फर्जी बताया गया और इसे लेकर राजनीति शुरू हो गई।

एम. एल. शर्मा, एडवोकेट, सुप्रीम न्यायालय

आरोप: - यूपीए सरकार में गृह सचिव रहे जी. के. पिल्लई ने कहा है कि चिंदंबरम ने उन्हें दरकिनार कर इस मामले का हलफनामा बदलवा लिया था। चिदंबरम खुद बोल कर नया हलफनामा लिखवा रहे थे इसलिए किसी ने विरोध नहीं किया। उन्हें इस मामले में हलफनामा देने के लिए आईबी और गृह सचिव को जिम्मेदार नहीं ठहराना चाहिए।

पूर्व गृह सचिव जी. के. पिल्लई पर पलटवार करते हुए कांग्रेस प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला ने पिल्लई की नीयत पर संदेह जाहिर किया है। कहा कि पिल्लई से यह जरूर पूछा जाना चाहिए कि उन्होंने अडाणी की जनसमूह में काम करना के करीब साढ़े 6 साल बाद ये बात कैसे कहीं कि चिदंबरम ने इशरतजहां को आतंकी न बताने का दबाव डाला था।

दबाव: - अब गृह विभाग के पूर्व अफसर आर. वी. एस. मणि ने आरोप लगाया है कि संप्रग सरकार के समय उन पर इशरतजहां को आतंकी नहीं बताने को लेकर दबाव था। कहा कि उनसे सुप्रीम न्यायालय में दाखिल हलफनामा बदलने के लिए कहा गया था। इसके लिए मुख्य एसआईटी ने उन्हें सिगरेट से भी दागा था। यही नहीं, सीबीआई उनका पीछा भी करती थी।

सफाई: - तत्कालीन केंद्रीय गृह मंत्री पी. चिदंबरम ने कहा है कि उन्होंने किसी को बचाने के लिए हलफनामा नहीं बदला था। उन्होंने इस मामले में पिल्लई की नीयत पर भी सवाल उठाए हैं। हालांकि उन्होंने यह माना कि हलफनामा बदला गया था लेकिन ऐसा इसलिए किया गया क्योंकि पहला हलफलनामा भ्रम फेलाने वाला था।

कांग्रेस: -ने इस प्रकरण में पल्ला झाड़ने की कोशिश की हैं। कांग्रेस की ओर से कहा गया कि अहमदाबाद के जिला जज ने इशरतजहां मुठभेड़ मामले की जांच की थी। तब वर्तमान प्रधानमंत्री मोदी जी गुजरात के मुख्यमंत्री थ। दो जजों ने अपनी जांच में स्पष्ट किया था कि इशरतजहां मुठभेड़ फर्जी था। इसके बाद कोई बात सामने नहीं आई।

राजनीतिक: - वैसे तो गृह मंत्रालय में मंत्री की राय आखिरी होती है और मामला जब इशरत जहां मुठभेड़ जैसा हो तो उसमें पेचीदगियां भी होती हें। तत्कालीन गृहमंत्री पी. चिदंबरम खुद एक अच्छे वकील व राजनेता हैं। इशरतजहां मामले में विवाद यह है कि पहले जो हलफनामा बनाया हुआ था, बाद में उसमें बदलाव किया गया। अब चिदंबरम कह रहे हैं कि उन्होंने हलफनामें में बदलाव इसलिए किए क्योंकि पहले पर्याप्त सबूत नहीं थे। अब किसी भी कानून के तहत वे गुनहगार तो नहीं हैं क्योंकि वे बतौर मंत्री अपने सचिवों से अलग दूसरी राय रख सकते हैं। किसी भी मंत्रालय से जुड़े मामलों में मंत्री ही आखिरी आदेश का अधिकार होता है। पर अब सवाल यह है कि जो जांच गृह मंत्रालय ने न्यायालय में पेश किए पहले हलफनामें में लिया था, उसे दोबारा कैसे बदल दिया? और किस आधार पर?

अरुण भगत, पूर्व आईबी मुखिया

आईबी व सीबीआई की जांच: - पी. चिदंबरम ने उन पर लग रहे आरोपों का स्पष्टीकरण दिया है कि आईबी की विवरण सौ फीसदी पुख्ता नहीं होती हैं, उनमें अनुमान ही लगाया जाता है। इसलिए जो जांच कराई जाती है, उसे ही आखिरी सबूत माना जाता है। अब सीबीआई ने अपनी जांच में इशरत जहां समेत उसके अन्य साथियों को आतंकी नहीं माना है। चिदंबरम उस समय गृह मंत्री थे। गृहमंत्रालय दव्ारा अदालत में पेश किए गए पहले हलफनामें के बारे में चिदंबरम का कहना है मुझसे सलाह नहीं ली गई थी। जब उन्होंने हलफनामे को देखा तो पहले हलफनामें के हिसाब से इशरत जहां को आतंकी ठहराया था। फिर सीबीआई ने जांच कर बताया कि इशरत जहां आतंकी नहीं थी। वह एक फर्जी मुठभेड़ में मारी गई थी।

बयान: - गुजरात पुलिस के एक वरिष्ठ अधिकारी ने धारा 164 के तहत बयान दर्ज कराते हुए पुष्टि की थी कि यह फर्जी मुठभेड़ थी। किंतु पिछले कुछ महीनों से सेवानिवृत नौकरशाह और पुलिस अधिकारी ने विपरीत बयान दिये हैं। क्या तब सीबीआई की जांच गुजरात सरकार को घेरने के उद्देश्य से थी या अब मामले में खास जानकारी सिर्फ इसलिए खोली जा रही है कि मामला निर्णायक दौर में है और केंद्र में सत्ता का समीकरण बदल गया है।

हलफनामा: - अब सीबीआई ने जो कहा उस आधार पर गुजरात पुलिस के अधिकारियों की गिरफ्तारी भी हुई। पर अब यह नहीं कहा जा सकता है कि कौनसा हलफनामा पूरी तरह सही है और कौनसा गलत। इसलिए मेरे ख्याल में तो यह मामला दोबारा खुलना चाहिए। पूरी जांच फिर होनी चाहिए। चूंकि सीबीआई जांच के आधार पर नया हलफनामा गृह मंत्रालय ने पेश किया था। अब इसमें कोई राजनीतिक दखलंदाजी थी या नहीं, इस बारे में जांच से ही मालूम लग पाएगा कि पहला हलफनामा सही था या नये हलफनामें में सही जानकारी थी।

अथॉरिटी (आदेश देने का अधिकार): - इस तरह की जांच में सीबीआई जो जांच करती है, वह सीधे गृह मंत्रालय के तहत काम कर रही होती है। भ्रष्टाचार के मामलों में वह कार्मिक विभाग के तहत काम करती हैं। इसलिए यहां सीबीआई जांच और अंदर के मामले में आखिरी आदेश का अधिकार गृह मंत्री का ही था। अब तत्कालीन गृह मंत्री चिदंबरम कह रहे हैं कि पहले हलफनामें में मुझसे पूछा ही नहीं गया। सचिव स्तर पर ही हलफनामा पेश कर दिया गया। जब चिदंबरम से जवाब मांगा गया कि गृह सचिव भी तो आपके नीचे ही काम कर रहे थे तो उन्होंने कहा कि यह छूट नौकरशाहों को ही है, राजनेताओं को नहीं। चिदंबरम के इस जवाब से बिना उनकी इजाजत के सचिव अपने स्तर पर ऐसा हलफनामा दायर कर सकते थे। इसलिए इस विवादास्पद मामले की फिर से जांच होना जरूरी है। यह कोई पहला मामला नहीं हैं। मंत्री नौकरशाहों और यहां तक की न्यायालय से भी गलतियां होती हैं। इस मसले में दूसरे हलफनामा पेश करने के बारे में अभी तक तस्वीर साफ नहीं हो पाई है। आईबी और सीबीआई, दोनों बड़ी समूहों के अलग-अलग मत थे।

राजेन्द्र शेखर, सीबीआई के पूर्व निदेशक

हैडली: - ने लश्कर के किसी ऐसे आतंकी ’मॉडयूल’ नाम के बारे में सुना था जिसमें इशरत नाम की महिला थी। किंतु क्या सुनी हुई बात मजबूत मामला तैयार करने के के लिए पर्याप्त हैं?

उपसंहार: - वैसे तो आतंकी सरगना डेविड कोलमैन हेडली ने भी इशरतजहां को आत्मघाती हमलावर बताया था। पर उस भी कितना भरोसा किया जा सकता है, वह खुद दो तरफा कार्यकर्ता था। वह पाकिस्तान और यूएस दोनों के लिए काम कर रहा था। हेडली की गवाही पर पूरा भरोसा नहीं किया जा सकता है। हालांकि उसके दव्ारा मिली जानकारी को भी जांच में ही स्पष्ट किया जा सकता है। इशरतजहां पर सीबीआई की जांच सही थी, पर यह सिर्फ दोबारा गहन जांच के जरिए ही सामने आ सकता है।

- Published on: May 12, 2016