जानलेवा सेल्फी (स्वयं दव्ारा खींचा गया चित्र) (Murderous Selfie -Essay in Hindi ) [ Current Affairs ]

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प्रस्तावना: - सेल्फी समाज का बदलता व्याकरण है। काफी कुछ मानवीय अस्तित्व का घोष है। स्मार्ट कैमरा (तीक्ष्णबुद्धि से फोंटो खीचना) फोन आपसे खुद को परिभाषित करने को उकसाता है। सोशल (सामाजिक) मीडिया सेल्फी को अपलोड करने का माध्यम है। युवाओं ने सबसे पहले स्वीकारा। अब सभी इसमें शामिल हैं। सेल्फी खुद को प्रचारित करने की ’सोशल मार्केटिंग’ (सामाजिक बाजार) है, लेकिन सावधान इसमें खतरे भी हैं। विश्व में पिछले 3 साल में सेल्फी लेते समय 49 लोगों की मौत हुई। अतिउत्त्साह और सर्तकता नहीं बरतने सबसे अधिक 19 लोग हमारे देश में मारे गए। क्योंकि आप हैं तो सेल्फी है।

शुरूआत: - पिछले दशक के दौरान स्मार्ट फोन्स (तीक्ष्णबुद्धि वाले दूरभाष यंत्र) में कई तकनीकी बदलाव आए। शुरुआत में स्मार्ट फोन में बैक कैमरे लगे। इससे ही लोगों में सेल्फी (स्वयं चित्र खिंचने) का क्रेज बढ़ा। जनसमूहों ने इसे अवसर के रूप में लिया फोन (दूरभाष यंत्र) फ्रंट (पहला) कैमरे के साथ बाजार में आने लगे।

  • शुरूआत जापान से- स्मार्टफोन में बैक कैमरे की शुरूआत जापान में वर्ष 2000 में जे-फोन नमूना से हुई। कुछ का मानना है कि दक्षिण कोरियाई जनसमूह ने फोन में बैक (पीछे) कैमरे की शुरूआत की। प्रारंभिक दौर के कैमरों की पिक्चर क्वालिटी (चलचित्र की मजबूती) अच्छी नहीं थी।
  • फ्रंट कैमरा (पहला चित्र खींचना वाला यंत्र) - वर्ष 2003 में एक जापानी जनसमूह ने पहले कैमरे वाला नमूना जेड 1010 बाजार में उतारा। इसका मूल्य 130 अमरीकी डॉलर था। इस फोन में वीडियों कॉल के लिए 0.3 मेगापिक्सल का सेंसर भी था। तब सेल्फी शब्द चलन में नहीं आया था।
  • सिलसिला- इसके बाद तो फ्रंट कैमरा फोन का सिलसिला ही चल पड़ा। एक के बाद एक कई जनसमहों ने फ्रंट कैमरा फोन बाजार में उतारे। इन्हीं ने सेल्फी संस्कृति पनपी। आज 13 मेगापिक्सेल तक के फ्रंट कैमरा एलईडी फ्लैश के साथ उपलब्ध हैं।

सेल्फी प्रेम: - भारत एक ऐसी सूची मे पहले स्थान पर हैं जहां उसे नहीं होना चाहिए। देश में सबसे अधिक मौते हुई हैं। शुरू में हम सोचते थे कि सेल्फी लेना पश्चिम का शगल है। केवल गोरी चमड़ी के लोगों को सेल्फी का खुमार है। सेल्फी का चस्का भारत में एक सामाजिक बीमारी का रूप धर चुका है। ये शारीरिक और मानसिक दोनों रूप से घातक हो सकता है। एक विवरण में खुलासा हुआ है कि दुनिया भर में सेल्फी के कारण जान गंवाने वाले लोगों में से आधे भारतीय थे। इन सभी की सेल्फी का स्थान जानलेवा था। किसी ने तेजी से आती ट्रेन के सामने तो किसी ने खतरनाक घाटियों में सेल्फी खिंचवाई। और तो और ताजमहल में एक जापानी पर्यटक सीढ़ियों पर सेल्फी खींचते समय गिरकर मर गया।

दीवानगी: - सेल्फी की दीवानगी युवाओं के ऐसे सिर चढ़कर बोलती है कि वे खतरनाक जगहों पर जाकर फोटो क्लिक (चटखनी/खटक) करते हैं। फिर चाहे वो न्यूयॉर्क की गगनचुंबी इमारतें हो या फिर ऊंचे पहाड़। तपते रेगिस्तान या फिर बर्फीले वीराने। सेल्फी का जानलेवा चस्का कई बार बेमौत कारण बन जाता है। भारत में भी पिछले कुछ वर्षों के दौरान सोशल साइट्‌स (सामाजिक स्थान) में ज्यादा से ज्यादा पसंद आने की होड़ मेें युवाओं में खतरनाक सेल्फी की प्रवृति सामने आई है। ये जानलेवा साबित हो रही है।

खतरनाक: -सेल्फी हमारे समाज में इस खतरनाक अंदाज में घर कर गई है कि मुबंई पुलिस को हाल में शहर के लगभग दर्जन भर से अधिक स्थानों को ’नो सेल्फी जोन’ घोषित करना पड़ा है। बांद्रा इलाके में अरब सागर के तट पर सेल्फी लेते समय तीन युवतियों की डूबने से मौत हो गई। कुछ अन्य स्थानों जैसे मरीन ड्राइव और गिरगांव चौपाटी को भी ’नो सेल्फी जोन’ घोषित किया गया है। दरअसल, कुंभ मेले में भी सेल्फी लेने पर रोक लगाई गई थी। इसका कारण मौके पर भगदड़ की आशंका पैदा नहीं करना था। सेल्फी कभी जानलेवा भी साबित हो सकती हैं तो कभी ये आपसी संबंधों पर भी असर डाल सकती है। यह तथ्य कई तरह के शोध में भी सामने आ चुके हैं।

देखने में आया है कि दोस्तों के संग सेल्फी लेते समय अवसर समूह मानसिकता हावी हो जाती है। युवा वर्ग सतर्कता बरतने में ढिलाई करता है। ऐसे में हादसे भी हो जाते हैं। देश में कई ऐसे मामले सामने आए हैं जबकि युवा खतरनाक स्थानों पर हद से आगे जाकर सेल्फी लेकर जान खतरे में डालते हैं।

शोध: -फ्लोरिडा विश्वविद्यालय की जेसिका रिजवे और रसेल क्लेटन ने इंस्टाग्राम पर सेल्फी पोस्ट करने के पीछे के मनोविज्ञान पर शोध किया। इसके अनुसार जो लोग अपने शरीर और सुंदरता के प्रति सकारात्मक नजरिया रखते हैं वो लोग ज्यादा सेल्फी में स्थान पाते है। लेकिन ऐसे लोग अपने निजी जीवन में तनाव भी झेल रहे होते हैं। इसी प्रकार बर्मिघम बी- विद्यालय में भी हुए एक शोध में पाया गया कि सेल्फी एडिक्ट (आसक्त) को भावनात्मक रूप से परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है। इसी प्रकार के एक अन्य शोध में ये सामने आया कि ज्यादा सेल्फी भेजने या स्थान पाने वाले लोग आत्ममुग्धता के शिकार होते हैं और ऐसे लोगों में कभी कभार असामाजिक प्रवृतियां भी सामने आती हैं।

आकंड़े: - निम्न हैं-

  • भारत में काउंटर पाइंट डेटा रिसर्च (लेन-देन की टेबल बिंदु के आकड़ों की खोज) के मुताबिक 22 करोड़ स्मार्ट फोन यूजर्स (उपयोगकर्ता) हैं।
  • मोबाइल एसोसिएशन के अनुसार अगले वर्ष 30 करोड़ मोबाइल फोन इंटरनेट यूजर्स हो जाएंगे।
  • इंटरनेशनल बिजनेस टाइम्स (अंतराराष्ट्रीय व्यापार समय) के अनुसार दूसरा नंबर व्हाट्‌स अप डीपी का 48 प्रतिशत सेल्फी फेसबुक पर पोस्ट (पद/स्थान) होती है।
  • ईग्लैंड में पीउ खोज के एक शोध में ये खुलासा हुआ कि एक औसत युवा 18 से 34 वर्ष की उम्र के दौरान
  • 25, 000 सेल्फी खींचता है।
  • हॉलीवुड के चर्चित अभिनेता इवेन जॉनसन के नाम 105 सेल्फी मात्र तीन मिनट में खींचने का (विश्व प्रमाण) है।
  • कनाडा के विन ग्राड के नाम 37 फीट और 8 इंच लंबी सेल्फी स्टिक से फोटों खींचने का विश्व प्रमाण है।
  • गूगल इंडिया (भारत) के अनुसार औसत युवा 21 बार सोशल मीडिया को भी चैक करता है एवं 14 सेल्फी खींचता है एक औसत युवा प्रतिदिन।
  • नेटवर्क: दुनिया में हर चीज को अच्छे और खराब पहलू से परिभाषित किए जाने की प्रवृति है। अब ’अच्छी स्वमंत्रमुग्धता’ और ’खराब स्वमंत्रमुग्धता’ की अवधारणा सामने आ रही है। जिसे हम सेल्फी के रूप में समझ सकते हैं। अमरीका की स्टैनफोर्ड विश्वविद्यालय के पीएचडी के छात्र एंड्रेज कारपेथी ने एक अनुठा अनुसंधान तैयार किया है। एंड्रेज ने आर्टिफिशल इंटेलीजेंस (एआई अथवा कृत्रिम बुद्धिमता) नेटवर्क तैयार किया है। हस नेटवर्क के माध्यम से लाखों सेल्फी में से खराब और बेहतरीन सेल्फी को चुना जा सकता है। इस नेटवर्क (संपर्क) की कार्यक्रम ही ऐसी की गई है। इस एआई को जटिल मानसिक नेटवर्क (संपर्क) अथवा कॉन्वनेट्‌स (सुविधाजनक) भी कहा जा सकता है। कारपेथी के अनुसार यदि आप कंप्यूटर पर किसी भी चित्र अथवा वीडियों को देख रहे हैं तो ये निश्चिय ही महिला मठ/ नन लोगों के समाज के जरिये आया होगा इस समूचे नवाचार के पीछे सबसे बड़ी समस्या हैं कि इसकी खोज के पीछे के सिद्धांत और उपादेयता को समझना काफी कठिन है।

एंड्रेज का फार्मूला (सूत्र) - लगभग 50 लाख इंटरनेट इमेज (प्रतिबिम्ब) को एंड्रेज ने एक कंप्यूटर स्क्रिप्ट (लिखा हुआ) के जरिये पूरी तरह से खंगाला। इन सभी फोटोज को सेल्फी के नाम से टैग किया गया था। इसमें भी केवल उन्हीं फोटो को चुनाव किया जिसमें केवल चेहरा ही दिखाया गया था।

सेल्फी को बिगाड़ने वाले चेहरे: - अंग्रेजी में कहावत है, ’फर्स्ट इम्प्रेशन इज द बेस्ट इम्प्रेशन’ (पहला असर और अंतिम असर) । और आज जहां दुनिया सोशल साइट्‌स (सामाजिक स्थान) पर सिमटी है, वहीं दूसरी ओर सेल्फी लोगों के लिए अपने ’फर्स्ट इम्प्रेशन’ को बेस्ट इम्प्रेशन बनाने का जरिया बन गई है। व्हाट्‌सएप, फेसबुक, इंस्टग्राम जैसे जगहों पर हर कोई भी जतन कर एक अदद सेल्फी की तलाश में है। चाहे सही मौका हो या न हो, सही जगह हो या न हो, खुश हों या न हों। सामाजिक स्थान पर खुद की मौजूदगी दिखाने और जताने को लोग इतने बेताब हैं कि सेल्फी खींचना जरूरी-सा हो गया है। बिहेव्यरल इंवेस्टिगेटर वेनेसा वैन एडवड्‌र्स बताती हैं कि अधिकांश लोग अच्छी सेल्फी के लिए बुनियादी बातों को भुला देते हें। उनका मानना है कि एक अच्छी सेल्फी के लिए शरीर की भाषा, कैमरा एंगल (तरह), सूक्ष्मदर्शी भाव सटीक होने जरूरी होते हैं। वास्तविक हंसी और सकारात्मक रुख के बिना अच्छी सेल्फी की उम्मीद ही नहीं कर सकते’। पर लोग सेल्फी दौड़ में ऐसे मशगुल हैं कि नकली हंसी, बनावटी चेहरा हावी हो गया है। लोगाेें के वास्तविक भाव गायब हो गए हैं। सेल्फी के लिए लगता है कि हंसना जरूरी है बस इसलिए सभी सेल्फी के समय हंस रहे होते हैं। सेल्फीज को देखकर आसानी से बातया जा सकता है कि लोग खुश नहीं वे खुशी का ढोंग कर रहे हैं।

भाव: - चहेरे की स्वाभाविक प्रतिक्रिया न होने पर सेल्फी के लिए जबरन प्रतिक्रिया दी जा रही है। जो हमें अवास्तविक भावों की दुनिया में ले जा रही है। सेल्फी के जरिए वास्तविक अहसास गायब होने लगा है। हम नकली भावों से खुद को दुनिया से अवगत कराते है। वैसे तो हम सबमें कैमरा फीसर यानी कैमरे के सामने आते ही असहज होने की स्थिति रहती है। लेकिन अगर हम इस पर काबू नहीं पाते हैं तो बनावटीवपन में चले जाते है। कहा जाता है कि हंसी दबाए नहीं दबती और आंसू छुपाए नहीं छुपते है। अध्ययन बताते हें कि जब हम जबरन हंसते है तो भावों को समझने वाला मस्तिष्क का हिस्सा नकली हंसी की व्याख्या कर लेता है। और जब हम वास्तविक हंसी हर रहे हाते हैं तो उसे भी हमारा मस्तिष्क पहचान लेता है। इसलिए सेल्फी में चेहर के बनावटी भाव स्पष्ट दिख जाते हैं। वास्तविक हंसी से हमारे चेहरे पर सकारात्मक भाव स्वयं नजर आते हैं। वहीं कुछ अध्ययन बताते है कि लगातार सेल्फी लेने की आदत आत्मगुग्धता और मानसिक विकार की ओर ले जाती है।

गुड-बैड (अच्छा-बुरा): - 50 लाख में से 20 लाख ऐसी फोटो का चयन किया गया। इसके बाद इन चयनित फोटोज को मिलने वाले पसंद के आधार पर सभी डेटा को कॉन्वनेट (आकंड़ो को समाज/महिला मठ) में फीड किया गया। इसके बाद 50 हजार ऐसी नई सेल्फी सामने आई जिन्हें शुरुआती दौर में चयनित ही नहीं किया गया था। आखिरकार ये सूची कवायद भी बढ़िया सेल्फी के बारे में कुछ स्पष्ट नहीं कर पाई।

मास्टर स्ट्रोक (अध्यापक थपथपना) : - महिलाओं की सेल्फी सबसे ज्यादा लोकप्रिय हैं। इसमें भी सेल्फी जिनमें महिला का चेहरा फ्रेम के मध्य से थोड़ा एक ओर झुका हुआ हो। पुरूषों की बेहतर सेल्फी के बारे में एंड्रेज का कहना कि माथा और दोनों कंधे साफ दिखने चाहिए।

आजमाएं- आप भी अभी बढ़िया सेल्फी चुनने के लिए कॉन्वनेट ट्‌िवटर हैंडल (समाज सरक्षंक प्रबंध) पर पद पा सकते हैं। ये आपको झटपट बता देगा कि सेल्फी का स्कोर क्या है। यानी बढ़िया है या. . नहीं। ये आपकी सेल्फी को बेहतर ढंग से क्रॉप (छोटा) भी कर सकता है। लेकिन इसकी क्रापिंग (छोटे करने) पर इतना भरोसा न करें आखिर ये आर्टिफिशल (बनावटी) इंटेलीजेंस (बुद्धि) हैं…. ।

सेल्फी ड्रोन: - 360 डिग्री के पैनोरामा व्यू से सेल्फी ली जा सकती है। साथ ही 20 मिनट का वीडियों भी प्रमाण होगा। अब सेल्फी स्टिक भी गुजरे जमाने की बात हो जाएगी। ऑस्ट्रेलिया की एक जनसमूह ने बाजार में सेल्फी ड्रोन उतारा है इसके माध्यम से अब बेहतर सेल्फी ली जा सकेगी। स्टिक से केवल एक निश्चित दूरी तक ही सेल्फी क्लिक की जा सकती है। वहीं इस नए ड्रोन से सेल्फी को एक नया लुक दिया जा सकेगा। सेल्फी ड्रोन की मोबाइल फोन से टीथरिंग (की जाएगी। सेल्फी ड्रोन में फेशियल रिकगनिशन टैक्नोलॉजी (मसाज पहचानने की प्रक्रिया तकनीकी) के जरिये उपयोगकर्ता इसे 25 मीटर की दूरी से भी कंट्रोल (नियंत्रण) कर सकेगा।

नो सेल्फी जोन: - निम्न हैं-

  • मुबंई- नो सेल्फी जोन

सेल्फी लेते समय हादसों के खतरे को टालने के लिए मुबंई में स्थानीय प्रशासन ने 16 नो सेल्फी जोन बनाए हैं। शहर के अहम पर्यटक स्थल इसमें शामिल हैं। उल्लेखनीय है कि हाल में मुबंई में सेल्फी लेते समय दो किशोरों की डूबकर मौत हो गई थी।

  • इंग्लैंड- कई देशों में सेल्फी स्टिक पर बैन लगाया गया है। इंग्लैंड ने विंबल्डन और कुछ प्रीमियर फुटबॉल मैचों के दौरान सेल्फी स्टिक पर बैन लगाया है। मशहूर पर्यटक स्थल डिज्नी थीम (विषय) पार्क में भी सेल्फी स्टिक पर रोक है।
  • मार्स से सेल्फी- मार्स यानी मंगल ग्रह पर जीवन की संभावनाओं को तलाशने गए नासा के रोवर क्यूरियोसिटी पर भी सेल्फी का खुमार चढ़ा। हैंड लैंस इमेजर कैमरे से पिछले वर्ष सेल्फी धरती पर भेजीं।
  • यूपी- ट्रेन ट्रेक (पटरी) पर रोक-

उत्तरप्रदेश में ट्रेन ट्रेक (रेल की पटरी) के पास सेल्फी लेने पर सरकार ने रोक लगा दी है। उल्लंघन करते पाए जाने पर जेल अथवा जुर्माने का प्रावधान किया गया है। उत्तरप्रदेश में हाल ही में ट्रेन टेक के पास सेल्फी लेते चार लोगों की मौत हो गई थी।

  • रूस- गाइडलाइंस (मागदर्शक रेखाएं) जारी

रूस में खतरनाक सेल्फी लेने के दौरान मौतों की बढ़ती संख्या के चलते सरकार ने गाइडलाइंस जारी की है। जागृति फेलाने के उद्देश्य से गाइडलाइंस को सोशल मीडिया (सामाजिक मीडिया) व अन्य माध्यमों से प्रचारित किया गया है।

सेल्फी कॉन्ट्रोवर्सि (वाद-विवाद) : - सियासत भी गरमायी-

  • चुनावी समर की सेल्फी दुनियर भर में छाई- वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव के दौरान तत्कालीन पीएम पद के दावेदार नरेंद्र मोदी ने मत डालने के बाद भाजपा के चुनाव चिन्ह के साथ सेल्फी सेशन किया। विपक्ष ने इसे आचार संहिता का उल्लंघन बता शिकायत भी की। पीएम बनने के बाद मोदी की विदेश यात्राओं के दौरान विभिन्न नेताओं के साथ सेल्फी में चर्चित रहते है।
  • बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओं पर हल्ला- हरियाणा से शुरू हुआ वर्ष 2015 का सेल्फी विद् डॉटर (सेल्फी के साथ बेटी) काफी विवादों में रहा है। बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओं अभियान में अपनी बेटी के साथ सेल्फी अपलोड करनी थी। अभिनेत्री श्रुति सेठ ने इसे महज प्रचार बताया तो सामाजिक मीडिया पर उनकी जमकर खिंचाई हुई।

गाय के सेल्फी से मची हायतौबा-

कोलकाता में एक संगठन की ओर से गायों की रक्षा के लिए सेल्फी के दौरान देश में गौमांस पर खासा विवाद चल रहा था। एक-दूसरें पर ध्रुवीकरण के आरोप में पक्ष-विपक्ष के नेता आमने-सामने हुए। काफी समय तक सियासी भूचाल रहा।

जनता सूखे त्रस्त, मंत्री सेल्फी में व्यस्त-

महाराष्ट्र सरकार की मंत्री पंकजा मुंडे ने हाल में सूखाग्रस्त लातूर में सेल्फी खींच कर सोशल मीडिया पर अपलोड की। इसमें पंकजा मुस्करा रही थी। जबकि बैकग्राउंड (चित्र में पीछे का दृश्य) में सूखे के कारण सिमटी हुई जलधारा नजर आ रही थी। पकंजा पर किसानों और जनसंवेदनाओं के साथ खिलवाड़ का आरोप लगा।

रिपोर्ट- मणिमंजरी सेनगुप्ता

उपसंहार: - सभी प्रकार के शोध इस नतीजे पर पहुंचते हैं कि सेल्फी एक प्रकार का स्व प्रकटीकरण है। इसके द्वारा व्यक्तिवाद हावी होता है। ये अन्य की उपस्थिति को नकारने का लक्षण है। खुद को शारीरिक रूप से जांचते रहना एक प्रक्रिया है लेकिन सेल्फी के कारण ये अवसर चिंता और अवसाद तक ले जा सकती है। जहां तक भारत की बात है हमें ऐसे कोई शोध करने की कोई खास जरूरत नहीं है। हम इस समस्या को अच्छी तरह से समझ सकते हैं। रूस का उदाहरण हमारे सामने हैं, जहां पुलिस ने नो सेल्फी जोन बनाए हुए हैं। जिससे कि लोगों को सेल्फी के कारण खतरनाक हालात का सामना नहीं करना पड़े।

- Published on: June 29, 2016