संसद भवन (Need for New Parliament House in India - Essay in Hindi) [ Current Affairs ]

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प्रस्तावना: - लोकसभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन ने भविष्य की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए नये संसद भवन की आवश्यकता जताई है। वजह 2026 में बढ़ने वाली सांसदों की संभावित संख्या है लेकिन यहां बड़ा सवाल यह है कि जब आज संसद में कामकाज पूरी तरह ठप है और संसद आए दिन हंगामे की भेंट चढ़ती रहती है। सांसद में बैठने की बजाय केन्द्रीय हॉल में गप्प ठोकते नजर आते हैं। तब क्यों सांसदों की संख्या बढ़े और क्यों नया भवन बने?

आवश्यकता: - यह बहुत ही अनुपयोगी और भावनाओं का आहत करने वाला सुझाव है। लोकसभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन बहुत लंबे समय से संसद की सम्मानीय सदस्य रही है। वे संसद के इतिहास और उसकी गरिमा से पूरी तरह से वाकिफ भी हैं, इसके बावजूद उनकी ओर से ऐसे सुझाव का आना, मन को चोट पहुंचाने वाला जैसा हैं। उनसे तो ऐसी उम्मीद नहीं की जा सकती है एवं जब वे ही ऐसी बाते करेगी तो दूसरे फिर क्या करेंगे।

खर्च: - कोई यह कहे कि नए संसदीय भवन को नई तकनीक के अनुरूप बनाने में 1000 से 2000 करोड़ रुपए के बीच खर्च तो आएगा ही, ऐसे में इतना बड़ा खर्च करने की आवश्यकता क्या है तो तर्क यही है कि संसदीय कामकाज और इसकी गरिमा को खर्च से तौलना बिल्कुल भी ठीक नहीं लगता। लेकिन मामला केवल खर्च का नहीं बल्कि संसदीय लोकतंत्र से भी जुड़ा हुआ है।

संविधान: - कहा तो यह जा रहा है कि संविधान के अनुच्छेद 81 के मुताबिक 2026 में शायद 2021 की जनगणना के आधार पर सांसदों की संख्या तय होगी। तब नए सांसदों के जुड़ने से, उनके बैठने की जगह ही नहीं होगी क्योंकि वर्तमान में ही क्षमता के मुताबिक सींटे उपलब्ध नहीं हैं। यह बहुत ही अतार्किक बात लगती है और इसलिए यह बहुत ही गलत समय में दिया गया सुझाव भी है। भले ही बैठने की क्षमता के मुकाबले सांसदों की संख्या बहुत अधिक हो लेकिन पिछली संसद और वर्तमान के आंकड़े उठाकर देख लीजिए कि क्या हमारे सांसद, संसद भवन में बैठते भी हैं? पूरे-पूरे सत्र खाली चले जाते हैं, संसद में केवल हंगामें और शोर के अतिरिक्त ओर कुछ नहीं होता है। जब कामकाज ही नहीं करते सांसद, सदन का कोरम पूरा करने के लिए घंटी ही बजती रहती है, बजट सत्र पारित करने के भी लाले पड़ते हों, ऐसे में सीटो की क्षमता 2026 में कम पड़ेगी का तर्क बेमानी है। वर्ष के आंकड़ों को और आगे ले जाकर 2050 भी कर लीजिए, कोई फर्क नहीं पड़ता! ब्रिटेन की संसद को ही लीजिए कई सौ वर्षों से उसी इमारत में संसदीय कामकाज होता है और हॉल खचाखच भरा रहता है। सवाल कामकाज व भवन की ऐतिहासिकता से जुड़ा है। ऐतिहासिक स्थान का कोई विकल्प नहीं होता है। हमारे संसद भवन की ऐतिहासिकता है, उसके साथ भावनाएं जुड़ी हुई हैं। ऐसे में उसे बदलने की बात सोचना भावनाओं से खिलवाड़ करना है इतिहास से छेड़छाड़ करना और संसद की गरिमा को आहत करने जैसा है। यह तो संसदीय प्रक्रिया या संसदीय लोकतंत्र को बदलने जैसी सोच लगती है।

विकल्प: - युवाओं के मन में हो सकता है कि नए संसदीय भवन की सोच आ भी जाए लेकिन पुराने सांसदों से ऐसे तर्कों की उम्मीदें नहीं की जा सकती है। पूर्व में जब महिला आरक्षण विधेयक पर चर्चा हुई तो एक संसदीय क्षेत्र से महिला और पुरुष दो सांसदों को चुनने का सुझाव आया। इस सुझाव पर यही कहकर ऐतराज जताया गया कि इतने सांसदों को बैठाएंगे कहां? तब इस ऐतराज पर तर्क दिया गया था कि केंन्द्रीय भवन को लोकसभा में परिवर्तित किया जा सकता है, उसकी तो बैठने की क्षमता भी अधिक है। ऐसे में यदि अब भी यदि बैठने की क्षमता को लेकर परेशानी है तो फिर से केंद्रीय भवन के बारे में विचार हो सकता है। केन्द्रीय भवन में होने वाले या इसके अलावा अन्य कार्यक्रमों के लिए अन्यत्र भवन बना लिया जाए। इससे बैठने की क्षमता की परेशानी का समाधान हो सकता है लेकिन अब भी कहना है कि जो क्षमता है पहले उसका तो उपयोग करें।

इतिहास: - संसद भवन का शिलायान्स 12 फरवरी 1921 को ड्‌यूक ऑफ कनाट ने किया था। इस महती काम को अंजाम देने में छह साल का लंबा समय लगा। इसका उद्घाटन तत्कालीन वायसराय लॉर्ड इरविन ने 18 जनवरी 1927 को किया था। संसद भवन के निर्माण कार्य में कुल 83 लाख रुपये की लागत आई।

स्थापत्य: प्रसिद्ध वास्तुविद लुटियंस ने भवन का डिजाइन तैयार किया था। खंभों तथा गोलाकार बरामदों से निर्मित यह पुर्तगाली स्थापत्यकला का अद्भुत नमूना है। सर हर्बर्ट बेकर के निरीक्षण में निर्माण कार्य संपन्न हुआ। प्राचीन भारतीय स्मारकों की तरह दीवारों तथा खिड़कियों पर छज्जों का इस्तेमाल किया गया है।

भाग: - संसद भवन के तीन भाग हैं-

  • लोकसभा-लोकसभा कक्ष अर्धवृत्ताकार है और करीब 4800 वर्ग फीट में फैला हुआ है। सर रिचर्ड बेकर ने वास्तुकला का सुन्दर नमूना पेश करते हुए काष्ठ से सदन की दीवारों तथा सीटों का डिजाइन तैयार किया था। इस सदन में 550 सदस्यों के बैठने की व्यवस्था है। स्पीकर की कुर्सी के दाहिनी ओर सत्ता पक्ष के लोग बैठते हैं और बायीं ओर विपक्ष के लोग बैठते हैं।
  • राज्यसभा-राज्यसभा कक्ष में इसको उच्च सदन कहा जाता है। इसमें सदस्यों की संख्या 250 तक है। यह स्थायी सदन है।
  • केंद्रीय भवन- केंद्रीय कक्ष गोलाकार है। इसके गुंबद का व्यास 98 फीट (29.87 मीटर) है। यह विश्व के सबसे महत्वपूर्ण गुंबद में से एक है। 15 अगस्त 1947 को अंग्रेजों से भारतीय हाथों में सत्ता हस्तांतरण इसी कक्ष में हुआ था। भारतीय संविधान का प्रारूप भी इसी भवन में तैयार किया गया था। वर्तमान में केंद्रीय भवन का उपयोग दोनों संदनों की संयुक्त बैठकों के लिए होता है, जिसको राष्ट्रपति संबोधित करते हैं।

उत्पादकता: -पहली तीनों लोकसभा में औसत छह सौ बैठकें हुई थीं और 3700 घंटे काम हुआ करता था। अब इसमें कमी आई हैं।

Year and Capacity - Parliament House

Year and Capacity - Parliament House

वर्ष

बैठकें

1956

151

2009

54

2012

74

2013

63

2014

66

2015

72

  • पहली और दूसरी लोकसभा में बजट पर औसतन 123 घंटे बहस हुई थी। अब यह घटके औसत 39 घंटे रह गई है।
  • हर साल प्रथम लोकसभा में 72 विधेयक औसतन है लेकिन 15वीं लोकसभा में एक साल में 40 विधेयक ही पारित हो पाए।
  • लोकसभा में सदन की कार्यवाही के दौरान 545 सदस्यों में से 30 सांसद ही औसतन उपस्थित रहते हैं।
  • 15वीं लोकसभा में सांसदों की 76 प्रतिशत उपस्थिति रही। 22 सांसद तो ऐसे हैं जो आधी बैठकों में भी शामिल नहीं हुए। शेष 95 सांसद ऐसे रहे जिसकी उपस्थिति 50 - 75 फीसदी के बीच रही।
  • सरकार के शीतकालीन सत्र में राज्यसभा की उत्पादकता 50 प्रतिशत ही रही। राज्यसभा में कुछ दिन पहले समाप्त हुए शीतलकालीन सत्र में 20 बैठकें हुई। इस दौरान 59 घंटो तक सदन चला। पर विपक्ष हंगामे पर उतारु रहा जिसके चलते 47 घंटों का कीमती वक्त जाया हो गया। केवल सात विधेयकों को मंजूरी दी गई। छह पर चर्चा ही नहीं हुई। 25 प्राइवेट सदस्य बिल पेश किए गए पर एक भी पारित नहीं हो सका।

उपयोग: - भविष्य में संसद के दोनों सदनों में सदस्यों की संख्या के हिसाब से करीब सौ साल पुराना यह भवन छोटा पड़ेगा। लोकसभा अध्यक्ष इस बारे में कह रहीं हैं कि मौजूदा भवन की जगह नए की जरूरत है तो जिम्मेदारी से ही कहा होगा। वे संसद के लिए नई नहीं हैं। उन्हें सदन की बैठकों में रहने का लंबा अनुभव है। लेकिन हमें यह भी देखना होगा कि केंद्रीय हॉल के रूप में विशाल भवन सिर्फ गप्प मारने के अलावा कुछ काम नहीं आ रहा।

अंधविश्वास: - नए संसद भवन की जरूरत की चर्चाओं के बीच यह चर्चा भी काफी जोरों पर है कि निर्माण संबंधी कुछ वास्तुदोष के कारण इस इमारत की जगह नई इमारत की जरूरत महसूस की जाने लगी है। भारतीय जनता पार्टी को कुछ ज्योतिष के अनुसार ऐसी राय दे रहें, बताएं। ऐसी ही राय के चलते दिल्ली भाजपा कार्यालय में भी तोड़फोड़ की गई थी। इन चर्चाओं में ज्यादा दम नही दिखता लेकिन यदि ऐसा है तो बदलाव की बात बिल्कुल नहीं होनी चाहिए। वैसे हम लंबे समय से देख रहे हैं कि संसद एनेक्सी भी बनाई गई है। पुस्तकालय व लोकसभा चैनल के कामकाज भी यहीं से हो रहे हैं। साल 2026 में परिसीमन के आधार पर संसदीय क्षेत्र बढ़े भी हैं। ऐसे में दस साल बाद तो जरूरत विस्तारित भवन की होनी ही है। लोकसभा अध्यक्ष की चिंता अपनी जगह वाजिब हो सकती है लेकिन कुछ बिन्दुओं पर गौर करना ही होगा। हमें उन बातों पर ध्यान देना होगा जिनके कारण संसद के दोनों सदनों की प्रासंगिकता कम होती जा रहीं है।

बहस: - संसद में बहस सबसे बड़ा काम होना चाहिए, वह नहीं हो रहा। बिना बहस के कई बिल पास हो गए। किसी बिल को पास करना है यह अंदर बैठे लोग भलीभांति जानते हैं। संसद की विभिन्न समितियां ही सदन में लाए जाने वाले बिल का प्रारूप तय करने में लगीं हैं। एक तरह से संसद के छोटे-छोटे रूप बन गए हैं जहां बहस और चर्चा हो जाती है। चिंता की बात यह भी है कि कारपोरेट्‌स व माफियाओं का हित साधने वाले लोग इन समितियों में शामिल हो गए हैं। हमें पता ही नहीं चलता और बिल बनने की स्टेज पर ही संबंधित लोगों की इसकी जानकारी हो जाती है। संसद पढ़ाई के नाम पर बने एनजीओ तक इस काम में रुचि लेने लगे हैं।

विकेन्द्रीकरण: - नए हाउस की चर्चा होने के साथ ही इस बात पर मंथन होना चाहिए कि निचले स्तर पर सत्ता का विकेन्द्रीकरण कैसे किया जाए। पंचायत राज के माध्यम से जो विकेन्द्रीकरण का प्रयास हुआ वह भी काफी पुराना हो गया। पंचायते खुद अपने ही फेसले नहीं कर पा रही है। नए निर्वाचन क्षेत्र बनें तब भी इस बात का ध्यान रखना होगा कि पिछड़े व उपेक्षित इलाकों को समुचित प्रतिनिधित्व मिल पाए।

पुन: निर्माण: - अक्सर राजनेताओं की विदेश यात्राओं के दौरे विदेश मंत्रालय और गृह मंत्रालयों के विचार विमर्श के बाद तय होते हैं संबंधित देश की सुरक्षा और खुफिया एजेंसियों को विश्वास में लेना अनिवार्य है ताकि कोई विघ्न-बाधा न हो। अंतराष्ट्रीय प्रोटोकॉल का पालन भी करना होता है तथापि दूरदर्शी प्रशासक अपनी महत्वाकांक्षा के अनुरूप इसमें फेरबदल कराने में सफल रहते हैं। उन्हें आज जनता का सानिध्य प्राप्त करने और लीक से हटकर चलने में जो सुखद अनुभूति होती है वह भव्य किंतु रस्मी आयोजन में नहीं। क्रिशमश की अल-सुबह रूस से काबूल पहुंचे भारत के प्रधानमंत्री मोदी ने अफगान सरकार और अवाम के प्रति जो आत्मीयता दिखाई उससे वे अभिभूत हो गए। भारत के सहयोग से नवनिर्मित संसद भवन के उद्घाटन समारोह में मेजबान डॉ. अब्दुल्ला ने मुसीबत की घड़ी में मिली मदद के लिए तहेदिल से भारत का आभार जताया है। आतंकवाद और विद्रोही गतिविधियों से निपटने के अलावा पुन: निर्माण व विकास कार्यों में मिले जन-धन के सहयोग के लिए अफगान जनता कृतज्ञ है। दरअसल भारत में जो भी सरकार रही हो, अफगानिस्तान को गृह युद्ध की बर्बादी से उबारने में उसने कोई कसर नहीं छोड़ी। भले ही वहां कार्यरत इंजीनियरों और कामगारों ने जान हथेली पर लेकर अपना दायित्व निभाया। कई कार्मिक तालिबानी हिंसा के शिकार हुए लेकिन भारत अपने मिशन पर डटा रहा। अफगानिस्तान की तरक्की, राजनीमिक स्थाईत्व, शांति और सदभाव बहाली के लिए मोदी ने पड़ोसी देशों से भी आगे आने की पुरजोर अपील की हैं।

उपंसहार: -इस तरह एक तरफ तो संसद के नया भवन निर्माण की बात सही भी है लेकिन फिर एक तरह से यह बात इतिहास की भावना को ढेंस पहुंचाने वाली है लेकिन फिर भी आगे आने वाले संसादों की सदस्या की संख्या को देखते हुए व संसद में ढंग से काम होने की स्थिति में एक बार संसद के सब सदस्यों को नए संसद भवन के बारे में विचार करना चाहिए।

- Published on: March 16, 2016