नयी खोज व नये आविष्कार भाग -3 ( New Discovery and New Inventions Part - 3 ) [ Current Affairs - Science & Technology ]

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प्रस्तावना:-पूर्व की भांति हम इस बार आपके लिए कुछ लोगों की जिद के कारण नयी खोज व नये आविष्कार लायें जो देश की प्रगति के लिए बहुत आवश्यक हैं। इस प्रकार हम देखते हैं कि हमारे विश्व के वैज्ञानिक केवल धरती पर ही खोज या आविष्कार नहीं करते बल्कि अंतरिक्ष में नई-नई खोज करते रहते हैं।

सिक्किम:-

  • के मुख्यमंत्री पवन चामलिंग ने जब 2003 में विधानसभा में राज्य को पूरी तरह ऑर्गेनिक (जैविक) बनाने की घोषणा की थीं, तो लोगों ने उनके इस काल्पनिक विचार को नामुमकिन बताया था। हालांकि, उन्हें कृषि सचिव खोलों भूटिया जैसे ऐसे उत्साही सहयोगी मिले जिससे कि राज्य की 75,000 हेक्टेयर कृषि भूमि के ऑर्गेनिक होने के साथ लक्ष्य हासिल कर लिया गया है। भूटिया कहते हैं यह अहिंसा खेती है। जब आप ऑर्गेनिक खेती करते हैं तो आप मदर (माता) अर्थ को मारते नहीं। सिक्किम बायोडायवर्सिटी (जीव विश्वविद्यालय) हॉटस्पॉट है। वे बताते हैं कि इस जैवविविधता का कायम रहना हमारे पर्यटन के लिए अच्छा है और पर्यटन हमारे लिए सबकुछ हैं।
  • सिक्किम को ऑर्गेनिक बनाने के लिए 12 साल की कड़ी तपस्या करनी पड़ी। भूटिया और एग्जिक्यूटिव (प्रबंधक) डायरेक्टर (निर्देशक) डॉ. अनबालागन के नेतृत्व में ऑर्गेनिक मिशन ने सात साल के पहले चरण में राज्य भर में जागरूकता अभियान चलाया। अपने मैदानी अधिकारियों को ऑर्गेनिक खेती के तौर-तरीकों में पारंगत किया है। बायो फर्टिलाइजर और बायो (जैविक, उर्वक और खाद जीव) कीटनाशक बनाने की स्वदेशी तकनीक विकसित की है। मौजूदा तकनीक का डाक्यूमेंटेशन (अभिलेखों का प्रस्तुतिकरण) किया हैं। इसके बाद आजीविका विद्यालय खोले गए, जहां 835 शिक्षित बेराजगारों को ऑर्गेनिक खेती सिखाई गई। फिर मिट्‌टी के परीक्षण की प्रयोगशालाएं स्थापित की गई। इसके अलावा कीट नियंत्रण के लिए एकीकृत मोबाइल वाहन तैयार किए गए और बीजों के लिए प्रोसेसिंग (प्रकिया/विधि) इकाइयां स्थापित की गई। समय के साथ राज्य सरकार ने रासायनिक उर्वरकों पर दी जा रही सब्सिडी (रिहायत) भी खत्म कर दी।
  • भूटिया बताते हैं कि आज सिक्कम अपने जरूरत के 80 फीसदी बीज खुद ही तैयार करता है और उसने 35 प्रकार की फसलों के लिए ऑर्गेनिक खेती के तौर-तरीके विकसित किए हें। राज्य ने 2010 में राष्ट्रीय ऑर्गेनिक उत्पादन कार्यक्रम के दिशा-निदेर्शो पर चलते हुए ऑर्गेनिक बनने की ओर कदम बढ़ाए। भूटिया का लक्ष्य है कि राज्य की खेती की क्षमता का अधिकतम संभव उपयोग किया जाए। वे पंजाब का उदाहरण देते हुए कहते हैं कि हरित क्रांति के लालच में वहां खेती बर्बाद हो गई हैं। सिक्किम गोवा के बाद 7,06 वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल के साथ देश का सबसे छोटा राज्य है। इसका 10 फीसदी क्षेत्र खेती के लायक हैं। सरकार ने 75,000 हेक्टेयर भूमि को ऑर्गेनिक में बदलने का लक्ष्य रखा था। छह लाख से कुछ अधिक आबादी के साथ सिक्किम सबसे कम आबादी वाला राज्य है। वैसे भी राज्य सरकार के अनुसार वहां के किसान अन्य राज्यों के मुकाबले रसायनों का उपयोग कम ही करते थे। वहां उर्वरकों का इस्तेमाल 10 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर प्रति वर्ष रहा है, जबकि राष्ट्रीय औसत इससे कहीं ज्यादा 70 किलोग्राम का है। इतने काम के बाद राज्य सरकार ने 2014 में सिक्किम एग्रीकल्चर, (कृषि संबंधी) हार्टीकल्चर इनपुटस एंड लाइवस्टॉक फीड रेग्यूलेशन एक्ट बनाया। इसके तहत रासायनिक कीटनाशकों व उर्वरकों की बिक्री, निर्यात या उपयोग को अपराध घोषित कर दिया गया। इसके तहत तीन माह की कैद हो सकती है या 25 हजार से एक लाख रुपए तक का जुर्माना देना पड़ सकता है।

चार फसलें-

ऑर्गेनिक खेती के जरिये पर्यटन बढ़ाने के अलावा राज्य सरकार का लक्ष्य चार प्रमुख फसलों के ऑर्गेनिक निर्यात पर भी ध्यान केंद्रित कर रही है। ये चार फसलें हें अदरक, हल्दी, बकव्हिट(कुट्‌टु) और इसकी प्रसिद्ध बड़ी इलायची। देश में यह बड़ी इलायची और सिंबिडियम आर्किड का सबसे बड़ा उत्पादक है। इनके लिए राज्य में कलस्टर बनाए गए हैं, जहां ये पांच फसलें उगाई जा रही हैं। इसके लिए अब तक 187 किसान समूह ऑर्गेनिक घोषिक किए गए हैं।

बेंगलुरू:-

से करीब 100 किलोमीटर दूर स्थित मंड्‌या कस्बे में जुलाई 2015 में गन्ना उगाने वाले 20 किसानों ने आत्महतया कर ली। मंड्‌या कोई सूखे से प्रभावित कस्बा नहीं है। वहां पूरे साल भरपूर पानी रहा हैं, लेकिन किसान पर हमेशा कर्ज का बोझ रहता था। पिछले साल वहां के किसानों पर बैंकों का 1200 करोड़ रुपए का कर्ज था। कैलिफोर्निया में आईटी पेशेवर के रूप में सपनों की जिंदगी जी रहे मधुचंद्रन, मंड्‌या की खबरे सुनकर बैचेन हो जाते है। मधुचंद्रन मंडया के थे, उनके परिवार की जड़े खेती में थी और बेंगलुरू कृषि विश्वविद्यालय के विशाल परिसर में पले बढ़े थे, जहां उनके पिता कुलपति के पद से सेवानिवृत हुए थे। मधुचंद्रन सॉफ्टवेयर इंजीनियर बनकर विदेश चले गए थे और वेरीफाया कॉर्पोरेशन जनसमूह स्थापित की, जो जनसमूहों को सॉफ्टवेयर जांच के स्वाचालित हल देती थी।

ऑर्गेनिक (जैविक)-

आखिरकार अगस्त 2014 में सबकुछ छोड़कर मधुचंद्रन मंडया लौट आए। उन्होंने अपने जैसे विचारों वाले मित्रों से 1 करोड़ रुपए की राशि जुटाकर मंडया ऑर्गेनिक फार्म्स कोओॅपेटिव सोसायटी बनाई और ऑर्गेनिक खेती करने वाले 240 किसानों को इकट्‌ठा किया। एक तरफ तो ऊंची कीमत के कारण ग्राहक ऑर्गेनिक उत्पादों को खरीदने में झिझक रहे थे और दूसरी तरफ सिर्फ 24 साल की उम्र के किसान को रसायनों के ज्यादा संपर्क में आने से कैंसर हो गया और उसकी मौत हो गई। साफ था कि ऑर्गेनिक उत्पादों के फायदों से लोगों को परिचित कराने की जरूरत थी और उसके लिए कोई साझा मंच चाहिए था। उन्हाेेंने मंड्‌या से गुजरने वाले मुख्यमार्ग का लाभ उठाने की सोची, जो बेंगलुरू और मैसूर को जोड़ता था। उन्हें यकीन था कि वहां से गुजरने वाले लोग ऑर्गेनिक चीजें खरीदने के लिए वहां रुकेंगे। लोगों को और प्रोत्साहित करने के लिए उन्होंने पास में ही ऑर्गेनिक रेस्तरां खोल लिया। इस तरह जनसमूह का ’ ऑर्गेनिक टूरिज्म’ पहल ने जन्म लिया, जिसमें प्रस्तुत योजनाएं शामिल थी।

  • पसीना दान अभियान- किसान की 20 फीसदी से ज्यादा उपज सही समय पर मजदूर न मिलने से नष्ट हो जाती है। जिन्हे खेती में काम करना अच्छा लगता है, वे वहां सप्ताह में आकर इसका मजा उठाएं। 60 साल के एक किसान को पूरे खेत की जुताई करनी थी, लेकिन दिनभर के काम के लिए 3000 रुपए मजदूरी उसके पास नहीं थी। मधुचंद्रन ने फेसबुक पर प्रार्थना की और 24 कार्यकर्ताओं ने आकर आधे दिन में काम खत्म कर दिया। पिछले कुछ माह में महाविद्यालय के विद्यार्थियों से लेकर आईटी पेशेवरों तक 1000 लोगों को इस अभियान ने आकर्षित किया है।
  • किराये पर खेत- यह एक और अनोखी पहल है। इसमें लोगों को 35 हजार रुपए लेकर आधे से दो एकड़ खेत तीन माह के लिए अपनी उपज उगाने के लिए किराये पर दिये जाते है। पैकेज में परिवारों को खेत पर आठ से नौ रातों तक रुकने की सुविधा रहती है। उनकी गैर-मौजूदगी में किसान फसल की देखभाल करता हैं। उपज आने पर वे इसे या तो ऑर्गेनिक मंड्‌या को बेच सकते हैं या अपने उपयोग के लिए रख सकते हें। इससे किसान को लगातार आया होती है।
  • टीम फॉर्म (दल का आकार)- इसमें 1,300 रुपए प्रतिदिन पर जनसमूहों अपने कर्मचारियों को एक दिन की खेती की गतिविधियों, ग्रामीण खेलों में भाग लेने और जैगरी प्लांट (पौधा) जैसे जगहों के यात्रा कराने के लिए ला सकती हैंं। ऑर्गेनिक मंड्‌या को पूरी तरह काम शुरू करके सिर्फ छह माह हुए हैंं और इसमें 500 किसान पंजीकृत है, जिनके पास कुल 200 एकड़ जमीन है और वे 70 प्रकार की चीजों का उत्पादन कर रहे हैं। चार माह में ही जनसमूह की आमदनी एक करोड़ रुपए तक पहुंच गई है।

चीन:-

चीन ने एलियन को खोजने के लिए दुनिया की सबसे बड़ी रेडियो दूरबीन बनाई है। अब इसकी जांच भी शुरू हो गई है। इस दूरबीन के रिपलेक्टर का व्यास 500 मीटर है। यह इतना बड़ा है कि इसमें फुटबॉल के 500 मैदान समा जाएंगे। एलियन खोजने का यह दुनिया का अब तक सबसे बड़ा प्रोजेक्ट (योजना) है। इसे ’फास्ट’ (तेज) नाम दिया गया है।

  • स्थान- इसे शहरी आबादी से दूर दक्षिण-पश्चिमी प्रांत गोइझोऊ की पहाड़ियों नामक स्थान में लगवाया गया है। मैग्नेटिक सिग्नल से व्यवधान को रोकने के लिए 5 किमी परिधि का क्षेत्र खाली करवाया था। 10 हजार लोगों को पांच किमी की परिधि से हटाया गया हैं। हर व्यक्ति को 12-12 हजार यूआन का मुआवजा दिया गया है।
  • काम-यह दूरबीन इलेक्ट्रोमेग्नेटिक (विद्युत चुम्बक) स्पेक्ट्रम की अलग-अलग फ्रिक्वेंसी पर काम करेगी। इससे खगोल पिंडो से निकलने वाले रेडिएशन (तंरगो) का भी पता लगाने में मदद मिलेगी। इस टेलीस्कोप की उच्च क्षमता की मदद से गैलक्सी के बाहर जीवन की संभावनाओं की तलाश में मदद मिलेगी। यह अंतरिक्ष में होने वाली उथल-पुथल का गहराई से अध्ययन करेगा। अंतरिक्ष से मिलने वाले संकेतो पर निगरानी रखेगी।
  • 2011 में शुरू हुई इस परियोजना में 1200 करोड़ रुपए का खर्च आया है।
  • पर्टो रिको का रिकॉर्ड (प्रमाण) टूटा- एरेसिबो इससे पहले दुनिया के सबसे बड़ा टेलीस्कोप पर्टो रिको के पास था। इस टेलीस्कोप का व्यास 300 मीटर था। यह 1963 में बनी थी। 73 हजार वर्ग मीटर सिग्नल (संकेत) पकड़ने की क्षमता है।
  • चीन का यह टेलीस्कोप (दूरबीन) एरेसिबो से 10 गुना तेज है। अंतरिक्ष के कमजोर सिग्नल को भी पकड़ सकेगा। 40 डिग्री (मात्रा) तापमान में भी काम करेगा। इस पैनल को सिग्नल की तरफ घुमाने के लिए रोबोट तैनात किए गए हैं।
  • वजन- इसमें 6 एंटीने भी हैं। पूरे मैकेनिज्म (यंत्र) का वजन 30,000 किग्रा है। इस छतरी का एक चक्कर लगाने में 45 मिनिट लगते हैं।
  • पैनल- 4,450 त्रिभुजाकर पैनल लगाए गए हैं। एक पैनल की लंबाई 11 मीटर है।
  • समय- इस ब्रह्यांड में 7,000 पुच्छल तारे हैं यह टेलीस्कोप 1 साल से कम समय में ढूंढ लेगी।
  • गति- इसकी गति 1,000 प्रकाश वर्ष रहेगी। इससे सिग्नल पकड़ने में आसानी होगी।

क्षुद्रग्रह-

अंतरराष्ट्रीय खगोलशासित्रयों ने हमारे सौरमंडल में एक नए क्षुद्र ग्रह की खोज की हैं। इसका नाम 2015-आरआर 245 रखा गया हैं। इस क्षुद्र ग्रह की परिधि 700 किलोममीटर है। खगोल शास्त्री व्यूपर बैल्ट में इस तरह के और छोटे ग्रह तलाश रहे हैं। खोजकर्ताओं का कहना हैं कि यह अभी तक की सबसे बड़ी आउटर सोलर सिस्टम ओरिजन सर्वे (ओएसएसओएस) खोज हैं। इस क्षुद्र ग्रह को सूर्य का चक्कर लगाने में 700 साल लगते हैं। वैज्ञानिकों का मानना है कि हमारे सौरमंडल में ऐसे बहुत सारे ग्रह है लेकिन वे बड़े ग्रहों की भ्रमणशीलता से नष्ट हो जाते हैं।

ग्रहो की स्थिति-

सितारों और ग्रहों की स्थित जानने के लिए अब आपको आसमान की ओर टकटकी लगाने की जरूरत नहीं हैं। जल्द एक ऐसा एप आने वाला है। जिसका नाम हैं ’कॉस्मिक वॉच’ (ब्रह्यांडीय घड़ी)। इस एप को डवलप (विकास) करने वाले मार्कोस हम्बल बताते हैं कि ये एप अच्छा है। ये सौर मंडल में ग्रह और सितारों की स्थिति को रियल टाइम (वास्तविक समय) में डिस्पले (प्रदर्शित) करता है। नासा के डेटा को एप में लोड किया गया है। डिजिटल युग की पहली एस्ट्रोनॉमिकल (खगोलीय) वॉच (घड़ी) में तीन मोड होंगे। वर्ल्ड क्लॉक (विश्व घड़ी), एस्ट्रोनामी (खगोल विद्या) व एस्ट्रोलॉजी (ज्योतिष) मोड़। अब आप इस एप को अपने स्मार्टफोन में डाउनलोड कर सितारों की सैर कर सकते हैं।

वाशिंगटन:-

नासा ने मंगल ग्रह के गेल क्रेटर की एक चट्‌टान से ट्राइडीमाइट नामक खनिज मिलने की पुष्टि की है मंगल पर खोजे गए इस नए मिनरल से इस ग्रह की उत्पत्ति के संबंध में कुछ नए खुलासे होने की उम्मीद है। नासा का दावा है कि मंगल पर भेजे रोवर ने जिस ट्राइडीमाइट खनिज की खोज की है उसके मंगल पर पाए जाने की उम्मीद नहीं की जाती। यह खनिज सिलिका और ज्वालामुखी में निकले लावा और गैस जैसे तत्वों से मिलकर बना है। यह खोज वैज्ञानिकों को मंगल के ज्वालामुखी इतिहास पर फिर से सोचने को मजबूर कर सकती हैं। मंगल पर इस तत्व के मिलने पर अब वैज्ञानिको को इसे बनने की प्रक्रिया का फिर से परिक्षण करना होगा। क्योंकि वैज्ञानिकों के पास इस खनिज के कम तापमान और बगैर ज्वालामुखी घटना के बनने के कोई सबूत नहीं हैं।

इरोवर ने जुलाई 2015 में बकसिकन नाम के स्थान से एक चट्‌टान में छेद करके कुछ पॉउडर एकत्र किया था। इसी खनिज को वैज्ञानिको ने ट्राइडीमाइट कहा है।

लंदन:-

सौर विस्फोटो के कारण से अंतरिक्ष में भेजे गए सैटेलाइटो (उपग्रहों) पर हमेशा खतरा मंडराता रहता हैं। लेकिन विशेषज्ञों ने इस डर से निपटने के लिए एक कारगर हथियार खोज लिया हैं। जिस हथियार का नाम है 3डी केमरा, इससे कोरोनल मॉस इंजेक्संस को ट्रैक किया जा सकेगा। वैज्ञानिकों ने एक ऑटोमेटिक (स्वचालित) सिस्टम (तंत्र) बनाया है जो अंतरिक्ष के खतरनाक मौसम का 3डी कैमरे में प्रदर्शित करेगा। इससे पहले से अधिक सटीक भविष्यवाणियां की जा सकेगी। यह स्वचालित सीएमई त्रिकोण प्रणाली स्पेस (अंतरिक्ष) आधारित तीन वेधाशालाओं से डेटा लेती है। इससे वैज्ञानिको दव्ारा सूर्य और कोरोनल मॉस इंजेक्शंस को भिन्न-भिन्न कोणों से देख पाने में आसानी होगी।

अभी तक का सीएमई ट्रैकिग सिस्टम दव्विमीय यानी 2डी था जिससे आकार, गति और उसमें आने वाले अंतर का ही अनुमान लगाया जा सकता था। एसीटी की इस तकनीक से सीएमई के धरती की तरफ बढ़ने की पल-पल की खबर रखी जा सकेगी। इसके साथ के गर्म तत्वों का प्लाज्मा कहा जाता है। इसे सूर्य से धरती तक पहुंचने में तीन दिन का समय लगता है।

  • सीएमई- सूर्य में मुख्यत: दो प्रकार का विस्फोट होता है। पहला सौर लपटों के रूप में और दूसरा कोरानल मॉस इंजेक्शंस या सीएमई के रूप में। सौर लपटो से ऊर्जा और एक्सरे किरणें निकलती हैं जो 8 मिनिट के कोरानल मॉस इंजेक्शंस के बाद प्रकाश की गति से धरती पर पहुंच सकती हैं। अभी तक सीएमई सिस्टम से 2डी तस्वीरें ही आती थी। सीएमई लाखों मील प्रति घंटे की गति से सफर करता है।
  • सीएमई के दौरान 2500 किमी प्रति सैकेंड की गति से करोड़ो टन सौर सामग्री अंतरग्रहीय अंतरिक्ष में घूमती है। यदि यह धरती की तरफ मुड़ जाए तो हाहाकार मच कसता है। इससे बड़े पैमाने पर पॉवर सप्लाई (ताकत पहुंचाना) और सैटेलाइट आधारित संचार सेवाएं ठप हो सकती है। सौर तत्वों से बने बादलों को पहुंचने में तीन दिन का समय लगता है। इनके धरती पर पहुंचेन से रेडियो और सैटेलाइट (उपग्रह) आधारित संचार व्यवस्था प्रभावित हो सकती हैं।

आविष्कार:-निम्न हैं-

अंतरिक्ष:- अंतरिक्ष यानों के अभियान को सफल व सुरक्षित बनाने के लिए नासा ने अब तक का सबसे नया प्रयोग किया है। नासा ने अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन (आईएसएस) से कुछ दूर सिग्नस (संकेत) यान छोड़ा है। उस यान को भेजने के साथ अंतरिक्ष में ही 16×37 इंच का कॉटन फाइबर ग्लास मटैरियल (सूती रेसे काँच वाला सामान) जलाया गया है। इसके बाद यान पुन: अपनी जगह पर स्थापित हो गया। इसके पहले कभी भी इतने आकार वाली कोई सामग्री अंतरिक्ष में नहीं जलाई गई थी। पृथ्वी से दूर यह प्रयोग मुख्य रूप से अंतरिक्ष में आग जलाने का परीक्षण करने के लिए किया गया था।

सफायर-

अंतरिक्ष यान के इस अग्नि परीक्षण को सफायर-1 नाम दिया गया है। नासा के ग्लेन रिसर्च सेंटर (खोज केंद्र) ने परीक्षण के लिए विशेष नमूना तैयार किया था, ताकि आग फेले नहीं। आईएस से सिग्नस (संकेत) के दूर होते ही रिसर्च सेंटर ने उस मटैरियल (सामान) तक अग्नि पहुंचाई। ऐसे दो और प्रयोग होंगे, जिनके नाम सफायर-11 व सफायर-111 होंगे। दूसरे प्रयोग में जलाई जाने वाली सामग्री का आकर 2×12 इंच होगा। यह प्रयोग ज्वलनशीलता तय करने के लिए होगा, उसी के आधार पर तीसरे परीक्षण में और बड़ी सामग्री जलाई जाएगी।

कुकिंग गैस:-

इजराइली जनसमूह ’होम बायोगैस’ (घर की जैविक गैस) ने ऐसी मशीन बना ली है, जिसे घर में ही किसी खुली जगह पर स्थापित किया जा सकता है। उसमें अनुपयोगी खाद्य सामग्री और ऑर्गेनिक वेस्ट (जैविक कचरा) डालना होता है। उनसे मशीन में प्रक्रिया होती है और कुकिंग गैस तैयार हो जाती है। मशीन में ही पाइपलाइन का सिस्टम (व्यवस्था) है, जिसे घर या मल्टी स्टारी (एक से अधिक) इमारत में चाहे जितने रसोई से जोड़ा जा सकता है। होम बायोगैस का कहना है कि यह उन जगहों के लिए बहुत ज्यादा उपयोगी है, जहां एलपीजी की उपलब्धता आसान नहीं है। खासतौर पर विकासशील एवं निम्न आय वालो देशों में यह ज्यादा काम की है। आज भी छोटे कस्बों एवं गांवों में ईंधन के लिए लकड़ी या कोयले का उपयोग होता है। उनका धुआं स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होता है।

मशीन-

70 हजार रुपए लागत वाली यह मशीन कहीं भी एसेग्बल (एकत्र) की जा सकती हैं। इसमें विद्युत की आवश्यकता नहीं पड़ती है। यह एक दिन में 6 किलोवॉट-ऑवर्स विद्युत के बराबर गैस तैयार करती हैं। यह मशीन केवल रसोई में ही नहीं बल्कि इस मशीन का उपयोग रोशनी और पानी गरम करने के लिए भी किया जा सकता है, लेकिन इसके लिए जरूरी उपकरण होने चाहिए।

उपसंहार:- इस प्रकार हम देखते हैं कि हमारे विश्व के वैज्ञानिक केवल धरती पर ही खोज या आविष्कार नहीं करते बल्कि अंतरिक्ष में नई-नई खोज करते रहते हैं। ताकि देशवासियों को अंतरिक्ष के बारे में नई-नई जानकारी मिल सकें।

- Published on: August 17, 2016