नये जिद व आविष्कार ( New Stubbornness and Inventions- Essay in- Hindi) [ Current Affairs ]

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प्रस्तावना: - पूर्व में भी हमने कुछ जिद करने वाले लोगों के बारे में आपको बताया जिन्होंने अपनी जिद से कई लोगों की जिदंगी बदल दी। अब भी ऐसे कई लोग है जो जिद करके लोगों की जान बचाते है और उनको नया जीवन प्रदान करते हैं। अभी महाराष्ट्र में बिच्छु की एक प्राणघातक प्रजाति से रोज मौतें हो रही थीं, इलाज नहीं था। लेकिन चिकित्सक की ज़िद ने दिलाई इस अभिशाप से मुक्ति। ज़िद ने ही इंग्लैंड के जेनकिन्स को भारत आकर ग्रीन विद्यालय खोलने की प्रेरणा दी। इसी प्रकार वैसे तो आए दिन नए-नए आविष्कार होते रहते लेकिन अभी हाल 2016 में कुछ नए आविष्कार हुए। नए ड्रोन (हेलिकॉप्टर) का आविष्कार हुआ जिससे कृत्रिम अंगों को ले जाना आसान हो सका है एवं एक स्मार्टफोन की बैटरी जो जीवनभर काम कर सकती हैं। ऐसे ही अलग-अलग वैज्ञानिकों ने अलग-अलग आविष्कार किया हैं। जिन्होंने लोगों की जिदंगी आसान बनने के साथ-साथ उनकी जिदंगी में नया बदलाव लाया हैं।

जिद: -निम्न लोग हैं-

1 महाराष्ट्र- के पश्चिमी तटीय इलाके में लाल बिच्छु (मिजोबुथस टैम्युलस) की तादाद बहुत बढ़ गई थी। मई से नवंबर के माह में रोज बिच्छु से जहर का गंभीर मामला या डेड बॉडी (शव) बिरवाड़ी (रायगढ़ जिला) के स्वास्थ्य केंद्र पर मेंरे पास लाई जाती। इलाके में 23 से 30 फीसदी मौते बिच्छु के काटने से ही होती है। पीड़ित व्यक्ति को बहुत पसीना आता, शरीर ठंडा पड़ने लगता तो वे अंतिम संस्कार की तैयार करने लगते। रोज के इस नज़ारे से मैं बहुत बेचैन हो जाता है। इसका कोई इलाज न तो किताबों में था और न मुझे चिकित्सक की पढ़ाई में बताया गया था।

  • घटना-एक बार एक महिला को बिच्छु ने काटा। घबराकर उसने बिच्छु को फेंका तो वह उसके छह माह के शिशु पर गिरा और उसे भी काट लिया। मां के शरीर में अधिक जहर था। बच्चा दर्द से रोए जा रहा था। उसे भयंकर पल्मोनरी एडेमा (फेफड़ों में पानी भरना) हो गया और उसकी मौत हो गई।
  • ध्यान- इस घटना से मुझे गहरा धक्का लगा और मैंने बिच्छु के जहर का फार्मोकोलॉजिकल एंटीडोट (विष या बीमारी को राकने वाली दवाई) खोजने की कसम खा ली। उसके बाद मैं हर पीड़ित के लक्षणों को विस्तार से लिखकर रखता-पसीना कितना आया, पल्स रेट (नव्स की मात्रा), ब्लड प्रेशर (खून का दबाव), श्वसन दर, छाती में अतिरिक्त ध्वनियां, हार्ट मर्डर (दिल के द्वारा मरना), सायनोसिस आदि। सारे लोग पल्मोनरी एडेमा से ही मारे जाते। मेरे ध्यान में आया कि जिन पीड़ितों को काटने की जगह पर दर्द होता उनमें कार्डियोवैस्कुलर समस्याओं के लक्षण पैदा नहीं होते। जिन्हें दर्द नहीं होता या बहुत मामूली दर्द होता उनकी मौत पल्मोनरी एडेमा से होती। काटने से दर्द और तेज चलने जैसी स्थिति को वॉर्म एक्सट्रिमिटीज और पसीना आने, हाथ-पैर ठंडे पड़ने को कोल्ड एक्सट्रिमिटीज कहते है। मेरी समस्या कोल्ड को वॉर्म एक्सट्रिमिटीज में बदलने की थी। विश्राम के दौरान हार्ट फैल्योर (दिल के फेल) के लक्षण दिखाई दें या ट्रिपल ड्रग थैरपी (तीन बार औषधी वाला उपचार) के बाद भी ऐसा हो तो उसे रिफ्रेक्टरी हार्ट फैल्योर कहते हैं। इस मामले में यह और एडेमा पर मेरी निगाह थी। इस तरह हार्ट फैल्योर में सोडियम नाइट्रोप्रुसाइड रामबाण इलाज माना जाता है। मैंन ऐस हार्ट फैल्योर पर जितनी सामग्री मिल सकती थी, जुटाई और रात-दिन अध्ययन किया। अस्सी के दशक में जब ई-मेल व इंटरनेट नहीं था, तब यह बहुत कठिन बात थी।
  • खोज- 22 अगस्त 1983 को 8 वर्ष का बालक मेरे पास लाया गया। बिच्छु काटने से उसमें कोल्ड एक्सट्रिमिटीज पैदा हो गई थीं। रात भर निगरानी रखने के बाद सुबह उसकी छाती में पानी भर गया। मैंने बालक के पिता से खतरनाक नाइट्रेप्रुसाइड आजमाने की लिखित अनुमति ली। सामान्य सलाइन के साथ मैं और मेरी चिकित्सक पत्नी हर लक्षण पर निगाहे रखे थे। मेरा दिल तेजी से धड़क रहा था और पसीना बह रहा था। ड्रिप (बूंद-बूंद टपकाने) लगाने के बाद ब्लड प्रेशर 100 तक बढ़ा, नब्ज भी नियमित हुई और चार घंटे के बाद छाती से पानी समाप्त हो गया। बच्चा आराम से सो गया। बाद में वॉर्म कंडीशन (हालात) हो गई है। उसे तेज दर्द होने लगा। मेरा तो मन खुश हो गया। यह मेरे लिए यूरेका मोमेंट (पल) था। उसी सुबह मेरे गांव से टेलीग्राम आया कि मेरे पिता गुजर गए। मेरे सामने मेरा मरीज था और दूसरी ओर पिता की अंतिम विदाई। मैंने कर्तव्य को प्राथमिकता दी। फिर हमने यह दवा मुंह से देने का तरीका भी खोज लिया। उसके बाद बिच्छु के दंश से मौत की दर 4 फीसदी से भी कम रह गई।
  • कुछ दिनों बाद छह माह का बालक लाया गया। उसमें कोल्ड एक्सट्रिमिटीज पैदा हो गई थीं। हमारे पास इंजेक्शन (शरीर में दवाई चढ़ाने का यंत्र) से देने लायक दवा नहीं थी। मां ने अपने दूध में पेस्ट बनाई और अपने स्तन पर लगाकर बच्चे को दुग्ध पान कराया। तरकीब काम कर गई और चौथे दिन बच्चे को छुटटी दे दी गई । यह लाइफ टाइम रिसर्च (जिंदगी भर की खोज) बिना किसी ऋण, कार्यस्थान या सरकारी मदद के की गई।

डॉ. हिम्मतराव, बावस्कर

2 इंग्लैंड: - की ससेक्स काउंटी के ब्रायन जेनकिन्स की ससेक्स विश्वविद्यालय में एक बौद्ध भिक्षु का व्याख्यान हुआ। 21 वर्षीय जेनकिन्स यह देखकर चकित रह गए कि बौद्ध भिक्षु एक बार भी अपनी कुर्सी की पीठ से सटकर नहीं बैठे। वे बिना कुर्सी का सहारा लिए सीधे और बिल्कुल आराम से बैठे थे। उनकी मुद्रा में कुछ ऐसी गरिमा थी कि कुछ ऐसा ही बनने का विचार आया। छुट्‌टी ली और बौद्ध मेडिटेशन (गंभीर विचारों की अभिव्यक्ति) सीखने भारत आ गए। यही विचारक जे. कृष्णमूर्ति के विचारों और स्वयं उनसे परिचय हुआ। यह बात 1969 की हैं।

शिक्षा पूरी हुई तो कृष्णमूर्ति फांउडेशन (नींव) संस्था द्वारा ब्रिटेन के ब्रॉकवुड पार्क में पढ़ाने लगे। वहां 14 साल तक पढ़ाया। 1980 में जब वे भारत में थे तो कृष्णमूर्ति विद्यालय में बहुत फेरबदल हो रहा था। उसी साल उनकी दादी का देहांत हुआ।

  • प्रेरणा- किशोर अवस्था में ही उन्हे तीसरी दुनिया के देशों में गरीबी के बारे में बहुत कुछ जानने का मौका मिला। चूंकि कृष्णमूर्ति कहा करते थे कि आप सीखते इसलिए हैं कि वर्तमान में रह सकें। हर स्थिति का सामना कर सके। अपनी प्रतिक्रिया सके। रिस्पॉन्सिबिलिटी (जिम्मेदारी) का यही अर्थ है। लोग इसे कर्तव्य की तरह देखते हैं, लेकिन जिम्मेदारी का कुछ अलग ही अर्थ हैं। इन दोनो बातों ने उन्हें किसी विकासशील देश में जाकर काम करने की प्रेरणा दी और वे भारत आ गए।
  • तलाश-फिर शुरू हुई विद्यालय के लिए जगह की तलाश। उन्होंने श्रीलंका, नेपाल और भारत की सात हजार किलोमीटर की यात्रा की और तमिलनाडु के डाईनाल से 18 किलोमीटर दूर स्थित प्राकृतिक वातावरण वाली जगह पसंद की। जे. कृष्णमूर्ति के विचारों के आधार पर ग्रीन स्कूल (हरा विद्यालय) खोलने का फैसला किया। यानी ऐसा विद्यालय जिसमें सारी बिजली प्राकृतिक ढंग से बिना प्रदूषण के पैदा की जाती हो। भारत का चुनने का एक कारण यह भी था कि यहां रोज छह घंटे से अधिक धूप होती है। यह सोलर एनर्जी के लिए अच्छी जगह थी।
  • दादी ने वसीयत में उनके लिए कुछ पूंजी छोड़ी थी। उसी से काम शुरू किया। पहले अध्यापक वे स्वयं और उनके दो बच्चे पहले छात्र बने। पहले सिर्फ दो झोपड़ियां थीं। फिर स्थानीय पत्थरों व ईंट से शोलाई विद्यालय क्लोएट की इमारत बनी। पूरी जगह को आर्गनिक फार्म (आकृति) का रूप दिया। कॉफी, काली मिर्च, फल, सब्जियां उगाना शुरू किया। विद्यालय के सारे बच्चो को आर्गनिक चीजें ही मिलती हैं। यह आमदनी का भी जरिया है। कॉफी जर्मनी को निर्यात होती है। आर्गनिक फार्मिंग के अलावा भी विद्यालय में कई ग्रीन प्रोजेक्ट (हरी योजना बनाना) चलाए जाता हैं। मशक्कत कर सरकार से सोलर पैल लिए। फिर परिसर में छोटी सी नदी बहती है, इसलिए पनबिजली का प्रयोग किया। अब ऐसा छोटा यानी माइक्रो हाइड्रो प्लांट कैसे बने। सौभाग्य से इंडियन इंस्टीट्‌यूट ऑफ साइंस के एक प्रोफेसर मिल गए। उन्होंने यह समस्या दूर कर दी।
  • पुरस्कार- फिर बायों गैस प्लांट लगाए। खाना बनाने के लिए उनका उपयोग होता है। पत्तियों और जंगल से मिलने वाली लकड़ी से चार बायो गैस प्लांट चलते हैं। इनके अलावा विद्यालय में 70 सोलर पैनल, 9 स्मोकलेस स्टोव और छह सोलर वाटर हीटर हैं। विद्यालय के इन प्रयासों पर केंद्रीय विज्ञान व पर्यावरण मंत्रालय का ’मॉडल ग्रीन स्कूल अवॉर्ड’ भी इसे मिला है। विद्यालय में 3 से 19 वर्ष तक के बच्चे पढ़ते हैं और वहां हर छह विद्यार्थियों पर एक शिक्षक है। सौ एकड़ में फेले इस विद्यालय में नियमित शिक्षा के अलावा आल्टरनेटिव टेक्नोलॉजी (वैकल्पिक तकनीकी) जैसे सोलर (सूर्यग्रहण), माइक्रो हाइड्रो और बायोगैस के अलावा आर्गनिक फार्मिंग की शिक्षा दी जाती हैं।

ब्रायन जेनकिन्स

3 मैसूर: - के व्याख्ता राम राजशेखरन को लंबे समय से देश की समस्याएं सता रही थीं। एक तो मुख्त: शाकाहारी आबादी होने के कारण आहार में प्रोटीन की कमी की समस्या और दूसरा बार-बार आने वाला सूखा। वे चाहते थे कि ऐसी कोई फसल हो जो बहुत ही कम पानी में उग सके और उसमें इतना प्रोटीन हो, जो मांसाहार में मौजूद प्रोटीन के बराबर हो। वे तमिलनाडु की मनमदुराई तहसील के हैं और उनकी परवरिश पुश्तैनी खेत के वातावरण में ही हुई है। इस गांव में पानी का हमेशा संकट बना रहता है लेकिन साथ में जातिगत भेदभाव की भी परेशानी थी। गांव में 50 मीटर की दूरी पर स्थित दो बस्तियों में से एक में खेतों में काम करने वाले मजदूर यानी पल्लर रहते थे तो दूसरी बस्ती में थेवार यानी क्षत्रिय रहते थे। दोनों में तनाव बना रहता था। राजशेखरन के बाल मन पर इन्ही बुरे अनुभवों का गहरा असर हुआ। थोड़े बड़े होने पर उन्हें लगा कि वास्तव में पानी के अभाव से कमजोर हो चुकी इलाके की अर्थव्यवस्था ही सारे झगड़े की झंझट है। उन्हें लगा कि विज्ञान और तकनीकी में ही इसका समाधान है।

  • खोज- इसलिए उन्होंने विज्ञान की पढ़ाई को चुना और वे गांव के पहले ग्रेजुएट अर्थात (बी. ए. ) बने। फिर वे पीएचडी के लिए बेंगलुरू स्थित इंडियन इंस्टीट्‌यूट ऑफ साइंस शोध के लिए गए और लिपिड्‌स यानी वसा पर शोध की ओर ध्यान गया। इसकी भी वजह थी। लिपिड ऐसे वसा होते हैं, जो कोशिका में पानी को रोकने की रचना बनाते हैं। इसके बाद वे उच्च शिक्षा के लिए अमेरिका गए। इलिनॉय विश्वविद्यालय के पद चिकित्सक विद्यार्थी रहे और ड्‌यूपोंट में वैज्ञानिक के रूप में वे लिपिड और मानव आहार में उसकी भूमिका पर ही शोध करते रहे। बाद में न्यू मैक्सिकों जिला विश्वविद्यालय में गए। वहां भी उनकी खोज चलती रही।
  • इथियोपिया में खोज- शोध और अपने काम के सिलसिले में उनका ध्यान इथियोपिया की ओर गया। उनके गांव की तरह यह देश भी बरसों से भीषण सूखे का सामना करता रहा है। वहां भी बारिश बहुत कम होती है। उन्होंने सोचा कि बरसों-बरस सूखे का सामना कर रहे इस देश में जरूर प्रकृति ने ऐसी किस्में पैदा की होंगी, जो इस स्थिति का सामना कर सकें। उन्होंने अपने अध्ययन में पढ़ा था कि जैसी परिस्थिति होती है उसी के अनुसार पेड़-पौधे व प्राणी ढल जाते हैं। उसके मुताबिक खूबियां उनमें विकसित हो जाती है। उन्हें पता चला कि इथियोपिया में टेफ नामक खसखस के दानों जैसा खाद्यान्न का इस्तेमाल किया जाता है। यह फसल बरसों से उस देश का सांस्कृतिक खाद्य माना जाता है। खास बात यह थी कि इसमें प्रोटीन की मात्रा अंडे में मौजूद प्रोटीन के बराबर ही थी। इसके अलावा यह सूखे का सामना अच्छी तरह कर लेती है। इसमें अत्यधिक प्रतिरोधी स्टार्च होता हैं, जिसका मतलब है कि भोजन में यह स्टार्च धीरे-धीरे पैदा होता है। यह डायबिटीज के रोगियों के लिए बहुत अच्छा होता है, क्योंकि इससे ब्लड शुगर एकदम नहीं बढ़ती। भारत जैसे डायबिटीज की राजधानी कहलाने वाले देश में यह वरदान ही है। मैसूर के सेंट्रल फूड टेक्नोलॉजिकल रिसर्च इंस्टीट्‌यूट के निदेशक राजशेखरन ने इंडियन काउंसिल ऑफ एग्रीकल्चरल रिसर्च के मार्फत वहां से टेफ की 18 किस्में मंगवाई। अपनी लैब में उन्होंने इसे उगाया पर सिर्फ दो किस्में ही जीवित रह सकीं। तीन साल के गहन शोध और प्रयोगशाला व मैदानी परीक्षण के बाद अब वे यह ’वंडर ग्रेन’ भारतीय किसानों को दने की तैयारी में है। राजशेखरन को उम्मीद है कि बचपन में उन्होंने पानी और प्रोटीन की समस्या के समाधान का जो सपना देखा था, उसका इस फसल से समाधान होगा।

4 उत्तराखंड: - के शुभेंद्र शर्मा टोयोटा के प्लांट में इंजीनियर थे। एक दिन उनके प्लांट में जापान के पर्यावरणविद अकिरा मियावाकी आए। वे टोयोटा के परिसर में जगल उगाने आए थे। शुभेंद्र को अचरज हुआ कि क्या जंगल भी उगाया जा सकता है, क्योंकि प्राकृतिक रूप से किसी जंगल को साकार होने में कम से कम 100 साल का समय लगता है। 86 साल के मियावकी ने बताया कि कैसे प्रकृति के तौर-तरीकों में दस गुना रफ्तार लाकर 10 साल में जंगल खड़ा हो सकता है। वे दुनियाभर में 4 करोड़ पेड़ लगा चुके थे। बस, शुभेंदु पर भारत में जंगल उगाने की ज़िद सवार हो गई। उन्होंने मियावकी के सहायक के रूप में काम करके उनकी विधि का अध्ययन किया। पहला प्रयोग हुआ उत्तराखंड स्थित घर के पीछे के 93 वर्ग मीटर के बगीचे में। वहां वे एक साल में 42 प्रजातियों के 300 पेड़ लगाने में कामयाब रहे। इसके बाद तो उन पर जंगल उगाने की धुन सवार हो गई, लेकिन इस काम को नौकरी में रहते नहीं किया जा सकता था। अत्यधिक मोटी वेतन वाली नौकरी छोड़ना आसान फैसला नहीं था। घर वाले इसे मूर्खता समझ रहे थे। कि जंगल उगाने के लिए इतनी अच्छी नौकरी व कॅरिअर (जीवनवृति) को छोड़ा जाए।

खोज-हिम्मत करके 2011 में नौकरी छोड़ी और एक साल तक सिर्फ खोज की, क्योंकि भारतीय मिट्‌टी और पर्यावरण अलग होने के कारण मियावकी की विधियों को हुबहु इस्तेमाल करने में खतरा था। काफी योजना और खोज के बाद उनके ध्यान में यह बात आई कि चूंकि इस काम में काफी समय और देखभाल की जरूरत होती है, इसलिए इसे संस्था की तरह नहीं चलाया जा सकता है। कोई ऐसा व्यापार नमूना बनाना होगा, जो बहुत सस्ता हो, लेकिन उससे कंपनी का काम भी चल जाए। फिर जन्म हुआ ’एफारेस्ट’ का। उन्होंने उस समय डेढ़ सौ रुपए प्रति वर्गफूट पर काम करने का सूत्र या नियम तया किया। यह मियावाकी की तुलना में अत्यधिक सस्ता था। वे अब तक 54 हजार पेड़ लगा चुके हैं।

चरण- जंगल उगाने के छह चरण हैं-

  • पहले मिट्‌टी का परीक्षण कर पता लगाते हैं कि उसमें क्या कमी है।
  • फिर जलवायु व मिट्‌टी के मुताबिक पेड़ों की प्रजाति तय की जाती है।
  • फिर स्थानीय तौर पर उपलब्ध मिट्‌टी के लिए पोषण देखा जाता है जैसे पोल्ट्री फॉर्म का अपशिष्ट, चीनी कारखानों से निकला बायप्रोडक्ट (जीव योजना), कुछ भी हो सकता है।
  • एक मीटी तक मिट्‌टर को जरूरी पोषण देने के बाद 80 सेमी ऊंचाई के पौधे लगाते हैं। प्रति वर्गफीट में 3 से 4 पौधे।
  • इसके लिए 100 वर्गफीट का न्यूनतम क्षेत्र होना चाहिए।
  • इससे इतना घना जंगल तैयार हो जाता है। कि 8 माह बाद सूरज की रोशनी ज़मीन तक नहीं पहुंचती। इस स्थिति में आसमान से गिरी बारिश ही हर बूंद अपने आप सहेजी जाती है और पेड़ों से गिरी हर पत्ती खाद का रूप ले लेती है। जितना जंगल को पानी देना पड़ता है और खरपतवार हटानी पड़ती है।

वेबसाइट व सॉफ्टवेयर-शुभेंदु का सपना है कि दूर बैंठकर ही सारी जानकारी शेयर कर सकें। इसके लिए उन्होंने एक वेबसाइट बनाई है। दूर बैठकर मिट्‌टी का परीक्षण करने के लिए जीपीएस आधारित सॉफ्टवेयर की भी योजना है। यह डाटा ’एफारेस्ट’ के पास मौजूद जानकारी से मिलाने के बाद पता चल जाएगा कि मिट्‌टी को क्या चाहिए और इसमें कौन-से पेड़ उगाने चाहिए। सूरज की कितनी रोशनी जमीन पर पहुंच रही है, मिट्‌टी के पोषक तत्वों व नमी में परिवर्तन आदि को जांच कर जंगल की वृद्धि पर निगरानी रखी जा सकती है ताकि उनकी विधि का चरण -दर- चरण पालन करके कोई भी जंगल उगा सके।

5 मद्रास: - भारतीय डायग्नोसिस तकनीकी की कहानी- धनंजय डेंडुकुरी की जिद कुछ अलग प्रकार की थी। वे थे आईआईटी मद्रास में केमिकल इंजीनियरिंग के छात्र, लेकिन हमेशा लगता था कि शरीर में रोग पता करने के ढेर सारे जांच कराने की बजाय कोई ऐसा आसान तरीका हो, जिससे सारी जांच एक साथ हो जाएं, उसमें समय भी ज्यादा न लगे और सबसे बड़ी बात वह बहुत सस्ता हो। ऐसी कोई तकनीकी, जो भारत के संसाधनहीन ग्रामीण इलाकों में भी इस्तेमाल की जा सके। अब यह समस्या बायोलॉजी के क्षेत्र में आती थीं धनंजय को यह विषय बिल्कुल पसंद नहीं था, क्योंकि विद्यालय के दिनों में इस विषय की पढ़ाई की थी तो यही समझा था कि इसमें रीढ़ वाले और बिना रीढ़ वाले जानवरों में फर्क, एक दल वाले बीज व द्धि-दलीय बीज में फर्क जैसी रटनी पड़ती है। किंतु जब अमेरिका के प्रतिष्ठित मैसाच्युसेट्‌स इंस्टीट्रयूट ऑफ तकनीकी (एमआईटी) में पीएचडी करने गए तो वहां हर छात्र को बायोलॉजी की इंट्रोडक्टरी कक्षा अटेंड (जाना) करनी पड़ती है। उस कक्षा में पढ़ाई के दौरान पता लगा कि यह रटने की चीज नहीं है। यह तो जिंदगी की कहानी है। बायोलॉजी में कोई परिकल्पना या विचार लाया जाता है, उसका परीक्षण किया जाता है, विश्लेषण किया जाता है और नई चीज बनाई जाती है।

बायोलॉजी -के बारे में यह अहसास होते ही डायग्लोनोस्टिक जांच विकसित करने का पुराना जुनून जाग गया। खुद को औसत छात्र मानने वाले धनंजय ने देखा कि कई स्मार्ट और अद्भूत छात्र जीवनवृति की तलाश में विज्ञान छोड़कर बैंकिंग और निवेश जैसे क्षेत्रों में चले गए। यदि वे इंजीनियरिंग या विज्ञान के क्षेत्र में ही रहते तो कुछ योगदान दे सकते थे। उन्होंने तय किया कि वे ऐसी गलती कभी नहीं करेंगे। फिर उन्होंने ऐसे बहुत से उदाहरण देखे कि भारतीय छात्र विदेश जाकर और तकनीकी विकास में महान योगदान दे रहे थे। वे चाहते थे कि तकनीकी का विकास भारत में हो। वे दिखाना चाहते थे कि भारत में भी विश्वस्तरीय तकनीकी विकसित की जा सकती है। वे खुद को भारत में बहुत सुविधाजनक स्थिति में पाते थे। यहां रहकर काम करना उन्हें अच्छा लगता था। 2008 में एमआईटी में पीएचडी पूरी हुई तो कुछ समय एक जनसमूह में काम करने के बाद भारत लौटे। दिमाग में एक ही विचार था, ’क्या मैं पूरी पैथालॉजिकल लैब को सिकोड़कर क्रेडिट कार्ड जैसी छोटी-सी चिप पर ला सकता हूं? ’

अचिरा लैब्स- स्वदेश लौटकर उन्होंने बेंगलुरू में अचिरा लैब्स की स्थापना की और अपनी जैसी वाले युवा तकनीक की समूह बनाया और काम में लग गए। अपने काम के तकनीकी लक्ष्य तय किए तो पाया कि सबसे बड़ी चुनौती यह थी कि जो भी उपकरण बने उसकी लागत बहुत कम होनी चाहिए। परिणाम भी तत्काल मिल जाने चाहिए। इसके साथ जांच की प्रक्रिया की लागत भी न्यूनतम हो, तभी यह ग्रामीण इलाकों में कारगर साबित होंगी। उद्देश्य था कि शरीर से निकली खून की एक बूंद से दर्जनभर जांच तो हो ही जाएं। फिर यह सब 15 से 20 मिनट में हो जाना चाहिए। इन सारे ही लक्ष्यों का समाधान उन्हें केमिकल इंजीनियरिंग में नजर आया। उन्होंने पीएचडी में माइक्रो पल्यूडिक्स की पढ़ाई की थी। इसके तहत बहुत ही छोटे सिस्टम, यानी बाल के बराबर की पतली नलियों में द्रव के प्रभाव को नियत्रंण किया जाता हैं। उनका काम आगे बढ़ा और पेटेंट मिलने लगे तो उन्हें एमआईटी तकनीकी रिव्यू ने 35 वर्ष उम्र के नीचे के दुनिया के शीर्ष आविष्कारकों में चुना।

प्रोटोटाइप- धनंजय बताते हैं कि सॉफ्टवेयर में तो आसान से आसान प्रोडक्ट (उपज/फल) में पैसा लगाने वाले आसानी से मिल जाते हैं, लेकिन हार्डवेयर में प्रोडक्ट को बाजार में अपनी खासियत दिखाने की मशक्कत से गुजरना पड़ता है। प्रोडक्ट को अवधारणा के स्तर से उठाकर प्रोटोटाइप में बदलना पड़ता है। प्रोडक्ट के आंत्रप्रेन्योर को उस समस्या की गहराई से सुलझाई जानी है और बाजार में उसका कितना स्कोप है, इसका भी उसे अहसास होना चाहिए। प्रोटोटाइप ट्रम्प कार्ड की तरह होता है। एक वास्तविक, सामने मौजूद, असली चजी। इसका प्रभाव बेजोड़ होता है। ऐसा प्रभाव हजारों प्रेर्जेंटेशन से भी नहीं पैदा किया जा सकता है। प्रोटोटाइप बनाना चुनौती थी।

  • समस्या- ऐसे में पहला ऐसा व्यक्ति खोजना, जिसे आपके प्रोडक्ट में विश्वास हो और आपको प्रयोग की सहूलियत दे, बहुत निर्णायक होता है। सौभाग्य से पीएचडी के बाद वे जिस कॉनेक्शिओस लाइफ साइंसेस में लीड साइंटिस्ट के रूप में काम करते थे, उसने उनकी स्टार्टअप जनसमूह को शुरुआती सहारा दिया ताकि वे कम लागत के डायग्नोस्टिक उपकरण विकसित करने के अपने विचार के साथ प्रयोग कर सकें, उसकी व्यावहारिकता की पड़ताल कर सकें। कई समस्याएं तो व्यावसायिक रूप से बहुत रोमाचंक लगती है, लेकिन हो सकता है कि वह इतनी आकर्षक नजर न आए कि उसके समाधान के उपकरण विकसित करने के लिए पैसा जुटाया जा सके। जाहिर है लैंब में दिमाग लगाने के अलावा ये सारी समस्याओं से भी धनंजय को दो-चार होना पड़ा।
  • खोज- चिप पर लेब लाने की उनकी कल्पना को तब बड़ा प्रोत्साहन मिला जब बायोतकनीकी इंडस्ट्री खोज असिस्टेंस काउंसिल ने इसके लिए पैसा मुहैया कराया। धनंजय के सामने एक ओर समस्या समूह जुटाने की थी। चूकीं भारत में बहुत समय लगता हैं इसके लिए दूरदर्शिता और लोगों को पहचानने जैसी विशेषताएं होनी चाहिए। ऐसे लोगों को खोजना आसान नहीं हैं, जो आपके योजना पर उसी जुनून के साथ काम कर सके। जैसे आप कर रहें हैं। धनंजय विभिन्न महाविद्यालय में उपदेश या व्याख्यान देनें जाते और श्रोताओं में ऐसे लोगों को खोजने का प्रयास करते, जो माइक्रो पल्यूडिक को लेकर उन्ही जैसा जुनून रखते हों। एक बार वे आइआईटी दिल्ली में लैक्चर देने गए। वहां कोई को माइक्रो पल्यूडिक में पीएचडी कर रहा था। वह उनका लैक्चर सुनने आया और लैक्चर खत्म होने के बाद प्रश्न पूछने के लिए वहां रूका रहा। अब वह छात्र उनकी पूरी यात्रा का महत्वपूर्ण सहंयोगी और कोर समूह का सदस्य बन गया है।
  • माइक्रो पल्यूडिक- प्रयोगशाला और मैदानी परीक्षणों में 6 साल के अथक परिश्रम के बाद पिछले हफ्ते धनंजय ने घोषणा की कि ज्यादा से ज्यादा दो माह में यह चिप बाजार में आ जाएगी। इस माइक्रो पल्यूडिक चिप पर बारीक नलियां बनी हैं जिनमें रिएजेंट यानी जांच करने वाले केमिकल हैं। लैब तकनीकी को सिर्फ इतना करना है कि यह नमूना को इन बारीक नलियों से गुजारे। पुराने परीक्षणों में जहां परिणाम आने में काफी समय लगता था, वहीं इसमें मात्र 30 मिनट लगेंगे। प्रोडक्ट का नाम है एसिक्स 100, जिसकी मदद से थायरॉइड की गड़बड़ियों, डायबिटीज, फर्टिलिटी और कई प्रकार के संक्रामक रोगों के लक्षणों का तत्काल पता लगया जा सकता है। लागत भी कम आएगी। प्रयोगशाला में इसने बहुत अच्छा प्रदर्शन किया है। अब अंतिम मैदानी परीक्षण जारी हैं। इसके बाद लागत तय हो जाएगी। धनंजय को भरोसा है कि उनके प्रोडक्ट को 13485 आईएसओ सम्मान मिलेगा। यह मेडिक के क्षेत्र का सर्वश्रेष्ठ मानक है। इसके साथ यह साबित हो जाएगा कि भारत में भी विश्व कक्षा तकनीकी विकसित की जा सकती हैं।

भारत में सॉफ्टवेयर तकनीक तो विकसित होती रही है, लेकिन पहली बार किसी आविष्कारक ने विश्वस्तरीय हार्डवेयर तकनीकी विकसित की है। ऐसी तकनीकी तो रोज की जिंदगी में मददगार हो।

आविष्कार: - निम्न हैं-

1 अमेरिका: - डिलीवरी ड्रोन बनाने वाली चीन की इहांग जनसमूह ने अमेरिका की लंग बायोटेक्नोलॉजी कंपनी (जीवविज्ञान तकनीक जनसमूह) साथ समझौता किया है। इसके तहत इहांग कंपनी ऐसा ड्रोन बनाएगी, जिसमें मानव शरीर के कृत्रिम अंगों को तेजी से निश्चित स्थान पर पहुंचाया जाएगा। ये ड्रोन हेलिकॉप्टर की तहर होंगे, जिसमें कृत्रम अंगों को सुरक्षित रखने की व्यवस्था होगी। लंग बायोटेक्नोलॉजी कंपनी कृत्रिम फेफड़े व अन्य कृत्रिम अंग बनाने की दिशा में अग्रणी समझी जा रही है। इससे गंभीर रोगी की जान बचाने की संभावनाएं बढ़ जाएंगी। इहांग वर्तमान में ऐसा ड्रोन बना चुकी है, जो एक व्यक्ति को 104 किलोमीटर प्रतिघंटे की रफ्तार से 16 किलोमीटर के दायरे में पहुंचा सकता है। इसके लिए ड्रोन को स्मार्टफोन से सपंर्क करना पड़ता है, ताकि उसे जगह खोजने में आसानी हो। चिकित्सालय को भी इसके लिए अपने यहां चार्जिंग पैड तैयार करने होंगे।

वर्तमान में ब्रेन डेड (मरे हुए दिमाग वाले) व्यक्ति के ही अंगो का प्रत्यारोपण किया जाता है। इसके इंतजार में हर साल हजारों लोगों की जान चली जाती है। 4, 700 करोड़ रुपए सालाना बिक्री वाली यह कंपनी बड़ी राशि कृत्रिम अंग बनाने पर खर्च कर रही है।

2 स्मार्टफोन: - स्मार्टफोन, टेबलेट या कैमरे की बैटरी कितनी बार रिचार्ज की जाती है, इसकी गणना कोई नहीं करता है, लेकिन हर बैटरी की एक उम्र होती हे। यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया के वैज्ञानिकों ने रिचार्जबल और उपयोग की हुई बैटरी में गोल्ड नेनोवायर का प्रयोग किया है, जिससे बैटरी की उम्र कई लाख गुना बढ़ाई जा सकती है। यह प्रयोग विश्वविद्यालय में पीएचडी करने वाली मया ली थाई का था। उन्होंने लैब में रोज कई-कई घंटे काम करके बैटरी में गोल्ड नेनेवायर तकनीक का इस्तेमाल किया और वह चीज हासिल कर ली, जो वैज्ञानिक सालों से नहीं कर पा रहे थे। उन्होंने बैटरी में नेनोवाय फिलामंट लगाया, जो मनुष्य के बाल से हजारों गुना पतला होता है। वह विद्युत संचार करने में सक्षम होता है। गोल्ड नेनोवायर को मैंगनीज डायऑक्साइड में लगाकर उसे ’जेल’ इलेक्ट्रोलाइट (विद्युत प्रकाश) जैसे प्लेक्सीग्लास में रखा। इस कॉम्बीनेशन (जांच) के बाद उन्होंने पाया कि बैटरी की क्षमता को बिना नुकसान पहुंचे उसकी उम्र कई गुना बढ़ गई है।

उदाहरण के तौर पर किसी बैटरी की क्षमता 5, 6 या 7 हजार बार रिचार्ज करने की हैं, तो वह 2 लाख बार रिचार्ज करने के काबिल हो गई। इस तरह स्पष्ट हो गया कि इस तकनीक से बनी रिचार्जेबल बैटरी जीवनभर काम कर सकती है।

3 एकॉस्टिक जीपीएस: - वर्तमान में अभी हम जो जीपीएस तकनीक व डिवाइस का उपयोग कर रहे हैं, उससे ज़मीन या उसकी ऊपरी चीजों की जानकारी मिल जाती है। पानी के अंदर की जानकारी लेने के लिए अब तक ऐसा कोई उपकरण नहीं था, जिनसे सैन्य उपकरणों का पता लगाया जा सके। खासतौर पर पनडुब्बियों की स्थिति या पोजीशन पता करने के लिए। अमेरिकी रक्षा विभाग से संबंद्ध अनुसंधान कार्यकर्ता डेरपा ऐसा एकॉस्टिक जीपीएस बना रही है, जो पानी के अंदर भेजी जाने वाली एक-एक चीज की जानकारी दे देगा। इसे पोजिशनिंग सिस्टम या डीप ओशन नेविगेशन भी कह सकते हैं। डेरपा ने इसका शुरुआती संस्करण बनाया था, जिससे प्रभावित होकर रक्षा विभाग ने उसे पूरा कॉन्ट्रैक्ट (अनुबंध/ठेका) दे दिया है। डेरपा का मानना है कि अब तक हमारे पास सैटेलाइट संबंधित जीपीएस डिवाइस ही थे, जो जमीन पर कोई निश्चित जगहों की जानकारी ही दे सकते थे। फोन या कार में मौजूद जीपीएस रिसीवर सिग्नल मिलने के बाद काम करते हैं, उसमें भी कई बार दिक्कत आती है। नया जीपीएस सामान्य तरीके से काम करेगी, लेकिन वह पानी के अंदर की जानकारी देगा। आपात समय में इससे सर्तकता भी मिल जाएगी कि संबंधित उपकरण या पनडुब्बी खतरे की स्थिति में है। इसके एडवांस (प्रगति/उन्नति /विकास) संस्करण की पहली जांच 2018 में हो जाएगी। शुरुआत में यह सेना और सरकार के काम आएगा, उसके बाद के संस्करण आम लोगों तक पहुंच सकेंगे।

4 स्मार्ट लेंटर्न फोन: - अमेरिकी जनसमूह बायोलाइट ने सोलर एनर्जी की दिशा में बड़ी कामयाबी हासिल कर ली है। इस बार उसने ऐसा लेंटर्न तैयार किया है, जिसे स्मार्टफोन से जोड़ा जा सकता है। उसके एप से पता चल जाता है कि वह कितने दिन तक रोशनी दे सकता है। इसमें नॉन डिस्पोजेबल बैटरी लगाई है, जो 7, 800 एमएच की क्षमता वाली है। उससे चार स्मार्टफोन चार्ज किये जा सकते हैं। लेंटर्न की क्षमता बिना केसी वायर के दो दिन तक रोशनी देने की है, उसे जरूरत पड़ने पर सोलर पैनल से या घर में भी चार्ज कर सकते हैं। इसके अंदर की मशीनरी ऐसी है कि वह शुरू होते ही मिनी स्मार्ट ग्रिड बन जाती है, जो लंबे समय तक ऊर्जा देने के लिए महत्वपूर्ण है। रोशनी भी इतनी तेज है कि एक बड़े हॉल या बाहरी जगह पर आसानी से इसका उपयोग किया जा सकता है इसे ब्लूटुथ से भी जोड़ा सकता है यानी एक बाद में 16 स्मार्ट लेंटर्न एक-दूसरे से जोड़े जा सकते हैं। इसका आकार इतना छोटा है कि इसे कहीं भी ले जाया जा सकता है। पारंपरिक लेंटर्न तेज हवा के साथ बुझने या कम रोशनी देने लगते हैं, इसमें ऐसी कोई बात नहीं है। इसके अतिरिक्त इसमें टाइम सेट (समय तय) करने व रोशनी कम ज्यादा करने की भी सुविधा है, ताकि फिजूल रोशनी न खर्च हो।

5 वाहनो की बॉडी: - अमेरिका की खोज जनसमूह हायपरलूप ट्रांसपोर्टेशन तकनीकी ने हाईस्पीड (उच्च दौड़ या गति) वाले वाहनों के लिए ऐसा मटैरियल (माल) तैयार कर लिया है, जो एल्यूमीनियम और स्टील का बेहतर विकल्प साबित होगा। इसे ’वाइब्रेनियम’ कहा जाएगा, जिसका इस्तेमाल अत्यधिक गति वाली परिवहन प्रणाली में किया जा सकेगा। यह एल्युमीनियम से 8 गुना और स्टील से 10 गुना ज्यादा मजबूत है। जनसमूह कुछ दिन पहले नेवादा के डेजर्ट में अत्यधिक तेज गति वाले ’प्रोपल्शन सिस्टम’ के परीक्षण में इसका प्रदर्शन कर चुकी है। इसका प्रदर्शन लंबे पॉड के रूप में किया गया था, जिसमें 50 लोग आसानी से बैठ सकते हैं। स्किन मटैरियल ’बाइब्रेनियम’ तापमान सहने, स्थिरता बनाये रखने और मजबूती प्रदान करने में कारगर हैं।

यह मटैरियल परिवाह प्रणाली में पॉड और लूप के साथ काम करता हैं। अगर पॉड में कोई सुधार कार्य करना हो तो पॉड को लूप से निकालकर किया जा सकता हैं। वाइब्रेनियम का निर्माण कार्बन फाइबर तकनीक से किया गया हैै, जिसमें सेंसर काम करते हैं। हाइपरलूप पॉड हाइस्पीड (उच्च गति) से कम नहीं है, जिसके विंडो (खिड़की) ग्लास में सेंसर होते हैं। वे गंतव्य की दूरी, मौसम की जानकारी व अन्य सूचनाएं मुहैया कराते हैं।

फिलहाल पारंपरिक परिवहन प्रणाली में इसका उपयोग नहीं किया गया, जनसमूह का मानना है कि इस दिशा में अन्य कंपनी को ही पहल करनी होगी। फिलहाल तो नहीं, लेकिन भविष्य के वाहनों में इसी मटैरियल का इस्तेमाल शरीर में किया जाएगा।

6 ग्रेफीन तकनीक: -चीन की ’स्टार्टअप ’मौक्सी’ ने हाईली बेन्डेबल मोबाइल फोन प्रदर्शित किया है, जिसे हाथ घड़ी की तरह कितना भी मोड़ा जा सकता हैं। इसमें फ्लैक्सीबल टच (छुने) स्क्रीन है, जो घड़ी या ब्रेसलैट (हाथ में पहनने का कड़ा) की तरह आसानी से मुड़ जाती हैं। जाहे तो अन्य फोन की तरह फ्लैट करके भी इसका इस्तेमाल कर सकते हैं

बैंन्डेबल स्क्रीन ’ ग्रेफीन’ से बनाई गयी है, जिसे विश्व में सबसे पतले और मजबूत मटैरियल के तौर पर जाना जाता हैं। वह वजन में कम और फ्लैक्सीबल होती हैं । मौक्सी ने अब तक इससे फोन तो तैयार कर ही लिया है और साल के अंत तक उसकी एक लाखों यूनिट (इकाई) बनाने की योजना हैं। यह वीयरेबल डीवाइस, फोल्डेबल या कर्वड फोन से बिल्कुल अलग हैं दावा किया गया है कि इतनी बैन्डेबल स्क्रीन अब तक किसी भी फोन से नहीं लगाई गई हैं। इसलिए इनोवेशन के तौर पर यह शानदार उपलब्धि हैं। विश्व की बड़ी जनसमूह अभी इस पर काम ही कर रही हैं।

चौंगकिंग शहर स्थित जनसमूह के अनुसार फिलहाल इस स्क्रीन वाला फोन ब्लेक एंड व्हाइट (काला और सफेद) डिसप्ले (प्रदर्शन) में ही उपलब्ध होगा। फुल कलर (पूरा रंगीन) वर्शन और तकनीकी बदलाव के लिए वर्ष 2018 तक का इंतजार करना होगा। यह जनसमूह ग्रेफीन का इसतेमाल करने में माहीर हैं। पिछले साल वह इस मटैरियल से बने कुछ स्मार्ट फोन शुरू कर चुकी हैं, लेकिन वे बैन्डेबल नहीं थे।

7 कैंसर: -कैंसर का परीक्षण अब पहले से कई गुना आसान हो जाएगा। ऑस्ट्रलिया में एडिलेट के शोधकर्ताओं ने लंबे परीक्षणों के बाद ऐसी डिवाइस तैयार कर ली है, जो किसी भी व्यक्ति की सांस से ही उसमें कैंसर का पता लगा लेती है। ये शोधकर्ता फ्लिंडर्स विश्वविद्यालय के हैं, उनका मानना था कि किसी भी व्यक्ति को इस परीक्षण के लिए लंबी प्रक्रियाओं से गुजरना पड़ता है। कई जांच ऐसी होती हैं, जिनमें ज्यादा राशि भी खर्च होती है। उन्होंने उम्मीद जताई है कि इस डिवाइस के चलन में आने से कैंसर परीक्षण के परंपरागत व महंगे तरीके नहीं अपनाए जाएंगे।

विश्वविद्यालय के मुख्य शोधकर्ता डॉ. रोजर यज्. बेक ने यह प्रोजेक्ट लीड (योजना उत्साहित) किया है। वे कहते हैं कि हमारी सांस के परीक्षण मात्र से कैंसर के अलावा भी कई बीमारियों का पता लगाया जा सकता है। हमारी मात्र एक सांस के साथ तकरीबन दो हजार अलग-अलग प्रकार की गैंसे निकलती हैं। हम उनकी जांच से पता लगा सकते हैं कि शरीर के किस हिस्से में क्या चल रहा है। हम यहां ऐसे समूह के साथ भी काम कर रहे हैं, जो अन्य बीमारियों के परीक्षण के लिए डिवाइस बना सकें।

डॉ. रोजर यज्. बेक कहते हैं, हमारा फोकस गेस्ट्रोइन्टेस्टिनल हालात से निपटने पर है, जिसका संबंध भोजन नली और पेट के बीच कैंसर से हैं। ऑस्ट्रेलिया में हर साल करीब 1300 से 2000 ऐसे केस आते हैं।

उपसंहार: - इस तरह हमने देखा कि कुछ लोगों की अच्छी जिद व कुछ के आविष्कार करने के कारण मनुष्य की जिदंगी काफी आसान हो गई यहां तक की किसी को जीवनदान भी दे देते है जिनसे उनकी जिदंगी बच जाती है। इसी तरह आगे ओर भी ऐसे ही जिद व आविष्कार हमारे विश्व में होत रहे तो जिदंगी बहुत ही खुशनुमा हो जाएगी।

- Published on: June 29, 2016