उत्तराखंड में लोकतंत्र (No More President’S Rule in Uttarakhand - Essay in Hindi) [ Current Affairs ]

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प्रस्तावना: - उत्तराखंड में राष्ट्रपति शासन हटने से कांग्रेसी मुख्यमंत्री हरीश रावत ने राहत की सांस ली है। करीब डेढ़ माह से चली राजनीतिक उठापटक ने उत्तराखंड में राजनीतिक दलों और नेताओं की अवसरवादिता की पोल खोली ही, साथ ही सत्ता की खातिर खरीद-फरोख्त का खेल भी सामने आया है। संविधान के अनुच्छेद 356 का राजनीतिक हितों के लिए इस्तेमाल, कोई पहली बार नहीं हुआ है पर यह पहली बार हुआ है कि सुप्रीम न्यायालय ने राष्ट्रपति शासन हटाने का फैसला सुनाया। किसी मुख्यमंत्री को शक्ति परीक्षण का मौका दिया। क्यों संविधान से मिले अधिकारों को होने लगा है बेजा इस्तेमाल? अदालतों को ऐसे मामलों में दखल क्यों देना पड़ रहा हैं? और, क्यों केन्द्र और राज्यों के बीच टकराव बढ़ने लगा हैं? क्या सत्ता के लिए प्रदेश के विकास के मुद्दे ताक पर रख देना कहां तक जायज हैं?

कांग्रेस व भाजपा: - उत्तराखंड जैसे छोटे राज्य में कुर्सी की छीनाझपटी का खेल सचमुच चिंताजनक है। जनता ने जिन उम्मीदों के साथ इस नए प्रदेश का स्वागत किया था, वे पूरी नहीं हो पाई। संविधान के अनुच्छेद 356 के इस्तेमाल को लेकर जो हुआ उसने राजनीतिक चरित्र की भयावहता को ही उजागर किया है। वहां भयावह तरीके से जंगल जल गए लेकिन राजनेताओं को कुर्सी का खेल खेलने में ही मंगल नजर आता रहा। यहां जो कुछ हुआ वह कांग्रेस व भाजपा दोनों के लिए ही सबक सिखाने वाला हैं।

उत्तराखंड के राजनीतिक उतार-चढ़ाव के बाद दोनों ही मुख्य दलों पर जनमानस में शक पैदा हुआ है और अन्य दल के लिए भी वहां राह बनी हैं। इस घटनाक्रम में बड़ा संदेश यह गया है कि भाजपा सरकार ने कांग्रेस से राजनीतिक बदला लेने के लिए राष्ट्रपति शासन लगाया। पहले, अरुणाचल प्रदेश फिर उत्तराखंड में उथल-पूथल हुई। अब हिमाचल, मणिपुर में ऐसी कोशिशों की खबरें हैं। इसलिए मोदी सरकार को समझना चाहिए कि वे ऐसे हथकंडे से कांग्रेस मुक्त भारत नहीं कर सकते हैं। उत्तराखंड में जनता दोनों मुख्य दलों के निहित स्वार्थ, खरीद-फरोख्त से वाकिफ हो गई और वहां आगामी चुनावों में आम आदमी जैसी तीसरी दल के लिए जगह बनी है। जैसा अभी पंजाब में दिख रहा हैं।

जांच का विषय: - अब भले ही कांग्रेस के हरीश रावत ने शक्ति परीक्षण में अपना बहुमत साबित कर दिया है। लेकिन, इस घटनाक्रम ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं। मौजूदा विधान सभा का कार्यकाल जल्दी ही पूरा होने को है। वहां कांग्रेस विधायकों ने भी बागावत का झंडा राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं को पूरा करने के लिए उठाया था। बागावत अवसरवादिता का ही नाम है। भाजपा भले ही इसे कांग्रेस का अंदरूनी मामला बताती रही, पर बागी विधायकों को हवा कौन दे रहा है, यह साफ दिख रहा था। असंतुष्टों को हरीश रावत को हटाना था तो कांग्रेस पार्टी में दबाव बनान चाहिए। इस दौरान स्टिंग आंपरेशनों (डंक क्रिया दव्ारा व्यापारिक या औद्योगिक कार्रवाई) में विधायकों की खरीद-फरोख्त की बातें भी सामने आई। इसके लिए कौन दोषी है और कौन नहीं यह जांच का विषय जरूर होना चाहिए।

सबक: - अपनी सरकार पर आए संकट का मुकाबला अकेले हरीश रावत ने ही किया। पार्टी के बड़े नेता बयानबाजी करते रहे। भाजपा ने इस घरेलू झगड़े का लाभ उठाने का प्रयास किया। चाहे उत्तराखंड हों या फिर अरूणाचल प्रदेश या फिर दिल्ली। लोकतंत्र में जनता पर ही यह फैसला छोड़ देना चाहिए कि कौन सत्ता में रहे और कौन नहीं? भाजपा का अतिउत्साह उसके लिए सबक है। पीएम नरेन्द्र मोदी ने लोकसभा चुनावों में उत्तराखंड में परचम फहराया था। जल्दबाजी के बजाए वह जनादेश की प्रतीक्षा करते तो अच्छा रहता। मोदी ’मेंक इन इंडिया’ और स्किल इंडिया (निपूर्ण भारत) जैसे नारे देकर देश को नई दिशा में ले जाने की पहल कर रहे हैं लेकिन, सरकारों को येन-केन प्रकारेण अपभद्र करने के ऐसे तरीके तो केन्द्र की छवि धमिल करते दिख रहे हैं।

जल्दबाजी: - जब राज्यपाल ने शक्ति परीक्षण के लिए कह दिया तो बिना किसी ठोस आधार के केन्द्र को राष्ट्रपति शासन की सिफारिश में जल्दबाजी नहीं दिखानी चाहिए। धरातल जांच में बहुमत साबित नहीं होने पर केन्द्र अनुच्छेद-356 का इस्तेमाल करने के लिए स्वतंत्र था। उत्तराखंड के विकास को लेकर मुख्यमंत्रियों में नारायण दत्त तिवारी के बाद हरीश रावत ने भी बेहतर काम किया है। इससे इनकार नहीं किया जा सकता है। रहा सवाल उन पर लगेे भ्रष्टाचार के आरोपों का तो दूसरे प्रदेशों में भी मुख्यमंत्रियों के खिलाफ जांच हुई तो दोषी तक पाए गए हैं। प्रदेश के राज्यपाल चाहे तो जांच के आदेश दे सकते हैं। आरोप-प्रत्यारोपों के आधार पर किसी की छवि बनाने व बिगाड़ने का प्रयास नहीं होना चाहिए।

विकास: - उत्तराखंड में कई ज्वलंत मुद्दे हैं। जैसे बड़ी संख्या में प्रतिभाओं का पलायन हो रहा है। यहां की वादियां हर किसी को आकर्षित करने को काफी हैं लेकिन, ये सब घरों के बैठक के कमरे की शोभा बढ़ाने वाले ही ज्यादा हैं। पर्यटन की यहां अपार संभावनाएं हैं। यहां का विकास का नमूना दूसरों से भिन्न होना चाहिए। क्योंकि यहां की भौगौलिक परिस्थितियां दूसरों से अलग हैं। अंग्रेजों ने यहां चीड़ के पेड़ लगा दिए जो किसी काम के नहीं हैं। दरअसल यहां ईकोफ्रेंडली (प्रतिध्वनि, गूंज दोस्ती) विकास की दरकार है। हम हिमाचल प्रदेश को देख सकते हैं जहां पहाड़ी इलाका होने के बावजूद गांव-गांव सड़कों से जुड़े हैं। उत्तराखंड में गांवों में सड़कें या तो मिलेगी ही नहीं और मिल भी जाएं तो उनकी गुणवत्ता नहीं है। जरूरत इस बात की है कि उत्तराखंड को राजनीतिक स्थिरता देने के साथ ही वहां विकास को लेकर जनता की उम्मीदों पर काम हो। बड़ी जिम्मेदारी राजनीतिक दलों की ही है। जनता तो समय पड़ने पर फैसला देगी ही।

राष्ट्रपति शासन: - निम्न देशों में लगे थें या नहीं लगे थें-

  • राष्ट्रपति शासन मणिपुर में सर्वाधिक 10 बार लगा हैं।
  • राष्ट्रपति शासन के दौर से उत्तर प्रदेश को अब तक नौ बार गुजरना पड़ा हैं।
  • बिहार ने भी 8 बार राष्ट्रपति शासन का दौर देखा हैं।
  • राष्ट्रपति शासन 2001 से अस्तित्व में आए छत्तीसगढ़ में अब तक एक बार भी नहीं लगा।
  • राष्ट्रपति शासन राजस्थान में 1967, 1977, 1980 और 1992 में चार बार लगा।
  • राष्ट्रपति शासन मध्यप्रदेश में 1967, 1980 और 1992 में लगा।

प्रावधान: - संविधान के अनुच्छेद-356 के मुताबिक अगर राष्ट्रपति को संबंधित राज्य के राज्यपाल से या अन्य माध्यम से विवरण मिले कि राज्य में ऐसी स्थिति आ खड़ी हुई है, जिसमें राज्य सरकार संवैधानिक प्रावधानों के अनुरूप शासन नहीं कर सकती है। तब राष्ट्रपति उस राज्य में राष्ट्रपति शासन की घोषणा कर सकते हैं। लेकिन आम तौर पर इस प्रावधान का राजनीतिक हितों के लिए इस्तेमाल हाेेने लगा है। सिफारिश संविधा के अनुच्छेद-356 में मिले अधिकार से होती हैं।

भूमिका: - राष्ट्रपति केंद्रीय मंत्रिमंडल/मंत्रिपरिषद की अनुशंसा के आधार पर ही किसी प्रदेश में राष्ट्रपति शासन लगाने का फैसला लेते हैं। यह जरूरी नहीं है राष्ट्रपति केंद्रीय मंत्रिमंडल/मंत्रिपरिषद की अनुशंसा स्वीकार ही करें। यह प्रावधान है कि राष्ट्रपति पूर्ण आश्वस्त हों कि राज्य में सरकार संवैधानिक प्रावधानों के अनुरूप नहीं चल रही है तब केंद्रीय केबिनेट की अनुशंसा स्वीकारते हैं और राष्ट्रपति शासन की घोषणा करतें हैं।

अदालत: - इसमें कोई शक नहीं है। कि भाजपा देश के सामने कठघरे में खड़ी हुई है और हरीश रावत को थोड़ी सहानुभूति मिली है। शुरुआत में कांग्रेस ने उत्तराखंड की उठापठक में ढिलाई बरती पर फिर उसने स्थिति संभाली। आनन-फानन में राष्ट्रपति शासन लगाने और सदन में बहुमत साबित न करने देने के कदम से केंन्द्र सरकार के खिलाफ ’लोकतंत्र की हत्या’ करने का माहौल बना है। जब एस. आर. बोम्मई मामले में स्पष्ट सिद्धांत स्थापित हो गया था कि बहुमत साबित करने के लिए सदन का पटल ही केवल एक मुफीद जगह है। जब बहुमत परीक्षण होना था तो सरकार ने एक दिन पहले राष्ट्रपति शासन लगा दिया गया था जो किसी भी दृष्टि से न्यायोचित नहीं था। उत्तराखंड के राज्यपाल बहुमत परीक्षण के पक्ष में थे पर उन्हें दरकिनार कर राष्ट्रपति शासन लगा दिया गया। अदालतों ने सरकार के खिलाफ सख्त रुख दिखाया और एक निर्वाचित सरकार बच गई। आखिर में नतीजा ’फ्लोर टेस्ट’ (धरातल जांच) पर ही निकला। सरकार के निर्णय हमेशा सही नहीं होते हैं। इसलिए लोकतंत्र में विपक्ष है, सत्ता का बंटवारा है, न्यायपालिका है। उत्तराखंड का राजनीतिक घटनाक्रम हमारे लोकतंत्र में ’चैक एंड बैलेंस’ (जांच और संतुलन) का एक सुनहरा उदाहरण बनकर सामने आया है।

दरअसल मोदी का नारा था ’कांग्रेस मुक्त भारत’ इस ओर उनकी सरकार का यह कदम था जिसे न्यायपालिका ने रोका। वे राजनीतिक लड़ाई लड़े पर कानूनों का दिमाग इस्तेमाल कर राजनीतिक लाभ उठाने की कोशिश करेंगे तो जनता के सामने छवि खराब ही होगी। जैसे एक दौर में कांग्रेस की हुई थी। पर अब राजनीतिक हालात बदल गए हैं। एक पार्टी राज वाला दौर नहीं रहा। इसलिए केंद्र सरकार अनुच्छेद 356 जैसे मसलों पर बहुत ही संभलकर कदम उठाना चाहिए। यह सिर्फ इसलिए जायज नहीं ठहराना चाहिए कि कांग्रेस सरकारों ने भी किया था।

केंद्र: - में मोदी के नेतृव्य में सरकार बनने के बाद भारतीय जनता पार्टी दो बार राष्ट्रपति शासन लगाने के मामले में मुंह की खानी पड़ी। और, अब उत्तराखंड में भी उसे बड़ा झटका लगा है। उत्तराखंड में चुनी हुई सरकार को हटाने का प्रयास किया गया लेकिन न्यायालय के हस्तक्षेप के बाद बच गई। राज्यपाल तो संविधान के अनुसार चल ही रहे थे। भाजपा को तब ओर शर्मिंदगी उठानी पड़ी जब न्यायालय ने राज्यपाल के विवरण और राष्ट्रपति शासन के कारणों के संदर्भ में सवाल किया। ऐसे में केंद्र के पास कोई ठोस जवाल नहीं था। दरअसल पूरे मामले में भाजपा को बहुत शर्मदिंगी उठानी पड़ी उसने न तो वैधानिकता के लिहाज से जांच-परख की और न ही राज्य की स्थिति का ही ठीक से आकलन किया। यह भी नहीं सोचा कि यदि राष्ट्रपति शासन के प्रस्ताव को किसी तरह से लागू करवा भी लिया तो क्या वह राज्यसभा में पास करा पाने में सक्षम है? यदि नहीं तो इस तरह का कदम उठाने की आवश्यकता ही क्या है। जहां तक राज्यपाल की स्थिति की बात है तो घटनाक्रम के शुरुआती दौर के बाद वे कहीं से भी निष्पक्ष नजर नहीं आए। इससे न केवल पद बल्कि संवैधानिक पदों की गरिमा को आघात लगता है। संवैधानिक पदों की उपयोगिता पर सवाल खड़े होने लगते हैं।

नैतिकता: - उधर कांग्रेस में जो कुछ भी हुआ, वह ठीक नहीं था। स्टिंग ऑपरेशन (डंक क्रिया दव्ारा व्यापारिक एवं औद्योगिक क्षेत्र में कार्यवाई) हुए हैं, उससे साफ लगता है कि पूरे मामले में नैतिकता को ताक पर रख दिया गया है। खरीद-फरोख्त की बातें जिस तहर से आई उससे लगा कि राजनीति केवल पैसों का खेल बन कर रह गई है। राज्य में यदि उसकी सरकार है तो भी अन्य दलों के सहारे पर टिकी है। राज्य की जनता खुद को ठगा सा महसूस करती है। उत्तरप्रदेश से अलग करके उत्तराखंड जब राज्य बना तो सोचा गया था कि इस क्षेत्र के प्रतिनिधि विकास पर ध्यान दे पाएंगे। लेकिन आज तक न तो सड़क और न ही रेलवे का फास्ट ट्रेक (शीघ्र पटरी) विकसित हुआ है। स्थिति और आर्थिक हालात बद से बतर अर्थात खराब होते जा रहे हैं। करीब 14 साल पहले नारायण दत्त तिवारी राज्य के मुख्यमंत्री थे तब एक सर्वे विवरण में देश के सभी राज्यों में उत्तराखंड को आधारभूत सुविधाओं और विकास कार्यो के लिहाज से चौथा स्थान प्राप्त था और यह 21वें स्थान पर आ गया है। राज्य से भाजपा के 5 लोकसभा सांसद हैं लेकिन केंद्र सरकार में कोई प्रतिनिधित्व ही नहीं है। यदि हालात ऐसे ही रहे तो राज्य आगे बढ़ने की बजाय और पिछड़ता ही जाएगा।

न्यायपालिका: - उत्तराखंड में अंतत: फैसल हो गया। किंतु यह प्रकरण कई महत्वपूर्ण प्रश्न पीछे छोड़ गया है, जिसमें सबसे महतवपूर्ण प्रश्न हैं- विधायिका और न्यायपालिका के संबंधो का। हमारे संविधान की मौलिक व्यवस्था में शासन के तीनें अंगो यानी विधायिका, न्यायपालिका और कार्यपालिका के कार्य क्षेंत्रों क स्पष्ट बंटवारा है। तीनों में संतुलन बनाने का प्रयास किया गया है। धीरे-धीरे कार्यपालिका की अकर्मण्यता और भूल की वजह से उसका दायरा छोटा होता चला गया और न्यायपालिका का दायरा बढ़ता गया।

प्रक्रिया: - निम्न हैं-

  • सर्वप्रथम उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश, न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए मुख्यमंत्री को ही अपनी सिफारिश भेजते थे।
  • फिर मुख्यमंत्री विचार करने के बाद सिफारिश राज्यपाल को भेजते थे।
  • फिर राज्यपाल यह सिफारिश भारत सरकार के विधि मंत्रालय को भेजते थे।
  • उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश विचार-विमर्श कर राष्ट्रपति की स्वीकृति के बाद नए न्यायाधीशों की नियुक्ति होती थी।
  • फिर एक दिन जिस संविधान के अंतर्गत ऊपर अंकित प्रक्रिया का पालन होता था, उस संविधान में बिना कोई संशोधन किए अपने एक आदेश से उच्चतम न्यायालय ने इस सारी प्रक्रिया को बदल डाला और न्यायधीशों की नियुक्ति में अब कार्यपालिका का अधिकार समाप्त हो गया। वहीं दूसरी ओर लोकहित के नाम पर न्यायपालिका ने अपना दायरा बढ़ाने का काम किया। हर मामले में न्यायपालिका का कार्यपालिका के क्षेत्र में हस्तक्षेप बढ़ता गया। कार्यपालिका में आत्म-विश्वास की कमी इसका मुख्य कारण था।

धीरे-धीरे न्यायपालिका का यह अतिक्रमण अब विधायिका पर भी साफ दिखने लगा। लेकिन चाहे विधानसभा हो या संसद, अध्यक्ष का फैसला अंतिम फैसला माना जाता था। सदन की भीतर कार्यवाही पर न्यायपालिका का कोई हस्तक्षेप नहीं हो सकता है, लेकिन दल-बदल का कानून होने के बाद अध्यक्ष के आदेश को न्यायपालिका में चुनौती देना आम बात हो गई है। सदस्यों की सदस्यता बरकरार रहेगी या जाएगी इस पर अध्यक्ष के फेसले को खुले तौर पर न्यायपालिका में चुनौती दी जा रही है और न्यायपालिका दव्ारा इसमें हस्तक्षेप किया जा रहा है। किंतु अभी उत्तराखंड में जो हुआ उसमें न्यायापालिका का सीधे हस्तेक्षेप सदन के भीतर जो कार्यवाही होनी थी उसमें हुआ। मार्च 2005 में इसी प्रकार की घटना हुई। उत्तराखंड मामले में भी उच्चतम न्यायालय का आदेश अत्यंत विस्तृत है तथा विधानसभा की कार्यवाही के हर पहलू पर हैं।

दिन: - वो दिन हवा हुए जब भारत में मतदान केन्द्र या तो खाली नजर आते थे या फिर बाहुबलियों के कब्जे में होते थे। अब तो मतदातआओं की लंबी-लंबी लाइनें नजर आती है, जो यह साबित करने लिए पर्याप्त हैं कि 64 साल का चुनावी लोकतंत्र भारतीय मतदाताओ के दिल-दिमाग ही नहीं उनके खून तक में दौड़ने लगा है। और यह भी इस लोकतंत्र की ही खूबसूरती है। लोकतंत्र की मजबूती की यात्रा कहां से चली, कहां तक पहुंची और कैसे?

मतदाता: - 20वीं सदी के 6वें दशक में हमारे देश का लोकतंत्र परीक्षा के दौर में गुजर रहा था। उस दौर में पश्चिम के राजनीति विज्ञान के विश्लेषकों ने शास्त्रीय आधार पर भविष्यवाणी की थी कि भारत में लोकतंत्र विफल हो जाएगा। उनकी भविष्यवाणी का आधार था कि संसदीय लोकतंत्र की सफलता के लिए दलीय व्यवस्था का विकसित होना और मतदाताओं का साक्षर व शिक्षित होना बेहद जरूरी है। भारत में न तो दलीय व्यवस्था बहुत विकसित रही और न ही बहुत बड़ी संख्या में लोग साक्षर थे। पश्चिमी देशों के मुकाबले शिक्षित होने की बात तो बहुत दूर थी। लेकिन, हमारे देश में जिस तरह से मतदान प्रतिशत में तेजी से सुधार हुआ है, उसने पश्चिमी देशों के शास्त्रीय आधार को झुठला दिया है।

यदि हम विकसित पश्चिमी देशों को देखें तो वहां शिक्षित और मध्यम वर्ग समुदाय की आमतौर पर लोकतंत्र में गहरी रुचि रही है। इसके विपरीत हमारे देश में शिक्षित वर्ग तो मतदान केन्द्र तक मुश्किल से ही पहुंचता है। पंजाब में आतंकवाद के दौर में लोकतंत्र की बहाली के लिए चुनाव का फैसला लिया गया था। आतंकियो नें तो चुनाव का बहिष्कार किया ही था, अकाली दल ने भी चुनाव नहीं लड़ा था। बसपा का बहुत बड़ा बैंक दलित समूदाय है। ऐसा वर्ग जो आमतौर पर अपेक्षाकृत अशिक्षित, अधिकारों से वंचित है। जिसे अपने लिए सम्मान और अधिकार चाहिए, वह लोकतंत्र को अपने लिए अवसर के रूप में देखता है। उन्हें लगता है कि वे मतदान के जरिए अपना अधिकार हासिल कर सकते हैं।

हमारा देश अन्य देशों की तरह नहीं है। यहां पर बड़ा और अमीर वर्ग तो मत डाले या न डाले को लेकर असमंजस में ही रहा है। हमारे यहा विकास का अर्थ पश्चिमी देशों की तरह नहीं है।

स्थिति: - आंदोलन की स्थिति 1977 के दौर में भी देखने को मिली थी, तब आपाताकाल के बाद चुनाव हुआ था और उसे लोकतंत्र की वापसी का दौर कहा गया था। तब भी मध्यम वर्ग ने इस बात को समझा था कि परिवर्तन मतपेटी से ही हो सकता है। इस बार आंदालेन के साथ देश का युवा वर्ग भी जुड़ गया है। देश में 60 फीसदी से कुछ अधिक युवा वर्ग से ही है। हमारा भारतीय समाज भी स्वाभाव से लोकतांत्रिक है और अहिंसक प्रक्रिया से परिवर्तन का पक्षधर है। हमारे देश में जितनी बड़ी समस्याएं हैं, वैसी बड़ी समस्याएं यदि अन्य लोकतांत्रिक देश में होती तो क्रांतियां हो जाती।

किसी भी लोकतंत्र में चुनाव प्रक्रिया शासन का महत्वपूर्ण आधार है। यह संतोष का विषय है। कि हमारे देश में जहां भौगोलिक और सांस्कृतिक विविधताएं हैं और मतदाताओं में लोकतंत्र के प्रति आस्था लगातार बढ़ती जा रही है। पिछले सालों में मतदान प्रतिशत में हो रही बढ़ोतरी इस बात का प्रतीक है कि मतदाता भी अपने अधिकारों को लेकर जागरूक हुए हैं। यह बड़ी बात है कि तमाम विपरीत परिस्थितियों में भी हमारे देश में लोकतंत्र को कभी आंच नहीं आई। कभी यह सवाल नहीं उठा कि हमारा लोकतंत्र दूसरे देशों के मुकाबले कहीं पीछे है। यही कारण है कि दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में जब भी चुनाव होते है दुनियाभर की नजरे टिकी होती है। हमने यह भी देखा है कि पिछले 50 सालों में दुनिया के कई देशों में लोकतांत्रिक व्यवस्था की उम्मीदें तो जगीं लेकिन समय के साथ वे तानाशाही और सैन्य विद्रोहों के शिकार हो गए। हमारे पड़ोसी देश इसका उदाहरण हैं। लेकिन, यह भारत के लोकतंत्र की खासियत रही कि आपाताकाल के कटु अनभुवों को छोड़कर हम लोकतांत्रिक मान्यताओं को बनाए रखने में कामयाब हुए। आपाताकाल को दूसरे नजरिए से देखें तो यह बात भी सामने आती है कि इस देश में निरकुंश शासन को कभी जनता ने स्वीकार नहीं किया।

अंकुश: - हमारे लोकतंत्र में और मजबूती लाने के लिए यह जरूरी है कि चुनाव जीतने का भ्रष्ट तरीकों पर कठोरता से अंकुश लगाया जाए। हमारे लोकंतत्र में बड़ी खामी यह है कि चुनाव जीतने के बाद अनुचित तरीके से धन कमाने वाले जनप्रतिनिध को वापस बुलाने को मतदाताओं को अधिकार नहीं है। ऐसे में मत डालने के बाद 5 साल तक मतदाता खुद को ठगा महसूस करते हैं। राजनेताओ और माफिया की सांठगांठ रोकने को कोई प्रयास नहीं करता। केवत मतदान प्रतिशत बढ़ने से खुश होना ठीक नहीं। चुनाव सुधारों को लेकर सत्ता में बैठे लोगों को सक्रियता से प्रयास करना ही होगा।

उपसंहार: - इन सब के पीछे जो मूल कारण है वह है विधायकों, सरकारों और सदन के अध्यक्षों दव्ारा निष्पक्ष कार्रवाई नहीं करना। सदन के अध्यक्ष पद पर बैठकी यदि कोई व्यक्ति दलगत राजनीति से प्रेरित होकर बहस करता है, नियम कानून और संविधान की धज्जियां उड़ाता है तो फिर न्यायपालिका का हस्तक्षेप होगा ही। प्रश्न यह कि आने वाले दिनों में विधायिका अपने आचरण मेें सुधार लाती है या कार्यपालिका की तरह वह भी न्यायापालिका के सामने नतमस्तक हो जाती है? न्यायपालिका यदि संविधान में स्थापित संतुलन के साथ इसी प्रकार खिलवाड़ करती रही तथा विधायिका और कार्यपालिका उसके सामने झुकते रहे तो संसदीय लोकतंत्र के लिए बड़ा खतरा पैदा होगा। चुने हुए जनप्रतिनिधियों और सरकारों के बदले देश में शासन की बागडोर बिना चुने हुए न्यायधीशों के हाथ में चली जाएगी तथा नए प्रकार नियमों का आविर्भाव होगा। लोकतंत्र के इन मंदिरों का असली सम्मान तब ही होगा जब हम वाकई वहां पर जनता की बात करेंगे।

- Published on: June 13, 2016