एथलेटिक्स खेल में पदक (Olympics Medal - Essay in Hindi) [ Current Affairs ]

()

प्रस्तावना: - ओलंपिक खेलों के इतिहास में अब तक हम सिर्फ 26 मेडल (पदक) जीत पाए हैं जबकि अमरीका ने 2012 के ओलंपिक में ही 46 गोल्ड सहित कुल 104 मेडल जीते थे। वर्ष 1900 से भारतीय टीम ओलंपिक में भाग ले रही है। लेकिन स्प्रिंट (थोड़ी दूर दौड़कर चलना), ट्रैक एंड फील्ड, लॉन्ग जंप (लंबी कूद), हाई जंप (ऊंची कूद), जैसे एथलेटिक्स के अंतर्गत आने वाले खेलों में आज तक एक भी भारतीय पदक नहीं जीत पाया है। आखिर क्यों?

चैंम्पियन: - खेल के मैदान पर हम चुकने के चैंम्पियन बनते जा रहे हैं। इंटरनेशनल एसोसिएशन ऑफ एथलेटिक्स फेडरेशन्स (अंतराष्ट्रीय सभा) हर वर्ष मई के पहले सप्ताहांत पर वर्ल्ड एथलेटिक्स डे मनाता है। उद्देश्य है विद्यालय जाने वाले बच्चों के बीच खेलों को बढ़ावा देने के लिए विभिन्न आयोजन किए जाते हैं। खेलों का महाकुम्भ ओलंपिक भी नजदीक है। पिछले पांच वर्ष में खेलों पर अरबों रुपए खर्च हुए हैं। लेकिन फिर भी ओलंपिक में मेडल लाने के मामले में हम कई छोटे देशों से भी आगे नहीं निकल पा रहे है। बड़े कैनवस पर तुलना करें तो पाएंगे कि अब समय खामियां ढूंढने और आरोप-प्रत्योरोप का नहीं, मिलकर कुछ करने का है। खुद आईना देखकर बच्चों को आगे बढ़ाने का है।

भारत: - भारत ने 2012 लंदन ओलंपिक खेलों की तैयारी में 143 करोड़ रु. से अधिक खर्च किए और मेडल मिले सिर्फ छह। एक पदक 20 करोड़ भारतीयों पर मिलता है जबकि जमैका को 2 लाख लोगों पर मिला एक मेडल।

table of countries won medal based on number of people

table of countries won medal based on number of people

प्रस्तुत देशो को करोड़ों लोगों पर मिलता एक मेडल

चीन

1.5 करोड़

इथियोपिया

1.25 करोड़

रूस

1.8 लाख़

क्यूबा

06 लाख

जनसंखया के आधार पर ओलंपिक खेलों में पदक जीतने में हम काफी पीछे है। केन्या, जमैका और इथियोपिया जैसे छोटे और पिछड़े देश भी हमसे तीन गुना अधिक पदक जीतते हैं।

मेडल: - 3 मेडल हमें 65 लाख करोड़ रु. की जीडीपी पर मिलता जबकि इतनी ही राशि में जमैका को 808.5 मेडल मिलेंगे। चीन को 10.5, रूस को 40.2, इथियोपिया 162.3 एवं क्यूबा को 217.4 मेडल इस राशि में मिलते हैं। भारत की जीडीपी करीब 160 करोड़ रु. है जो क्यूबा के मुकाबले 30 गुना ज्यादा है। लेकिन ओलंपिक खेलों में वे हमसे 8 गुना ज्यादा पदक जीत चुके हैं। जबकि हमारा खेल बजट उनके बराबर ही है।

स्वास्थ्य: - हमारे खिलाड़ियों की लंबाई 170 सेमी है जबकि विदेशी एथलीटों की 176.4 सेमी औसत लंबाई है। हम वजन व स्टैमिना में भी पीछे है। भारतीय एथलीटों का औसत वजन 60.2 किग्रा है, अन्य देश के खिलाड़ियों का औसत वजन 70.8 किग्रा है। स्वास्थ्य के आधार पर हमारे एथलीटों की तुलना विदेशी खिलाड़ियों से की गई तो पाया गया कि लंबाई, वजन, मांसपेशियों की ताकत में हमारे खिलाड़ी पीछे हैं। शरीर में फैट (मौटापे) की प्रतिशत में हम आगे है।

बजट: - बजट में आवंटन3, 730 करोड़ रु. भारत सरकार ने 2011 - 12 से 2015 - 16 तक यानी इन 5 वर्षो में विभिन्न खेलों पर किए हैं। खेल मंत्रालय ने 250 करोड़ रुपए से अधिक इन 5 वर्षों यानी 2011 - 12 से 2015 - 16 के बीच 67 खेलसंघों पर खर्च किए हैं।

ऊपरी सतह या सर्वोच्च पद-पदक दिलाने वाले सर्वोच्च पद 3 राज्य हैं। एशियन गेम्स, कॉमनवेल्थ गेम्स, वर्ल्ड चैंम्पियनशिप आदि अंतरराष्ट्रीय स्पर्द्धाओं में पदक दिलाने में हरियाणा, पंजाब व आंध्रपद्रेश के खिलाड़ी अव्वल हैं। खेल के लिए बेहतर इंफ्रास्ट्रक्चर इसका प्रमुख कारण हैं।

20%

18%

8%

हरियाणा पंजाब आंध्रप्रदेश

सबसे अधिक मेडल शूटिंग, दौड़ कुश्ती, बॉक्सिंग, तीरंदाजी व हॉकी दिलाता हैं।

राष्ट्रमंडल खेल- 64 पदक मिले 2014 में वहीं 101 पदके मिले 2010 में।

एशियन खेल- 57 पदके मिले 2014 में वहीं 65 पदक मिले 2010 में ।

रियो: - रियो ओलंपिक में हम 10 से 12 पदक जीत सकते हैं। बॉक्सिंग में शिवा थापा, मैरीकॉम व सरिता देवी तो कुश्ती में सुशील कुमार पदक जीत सकते हैं। तीरंदाजी में दीपिका कुमार और लक्ष्मी मांझी, शूटिंग में जीतू राय, अभिवन बिंद्रा और गगन नारंग से पदक जीतने की उम्मीद है। बैडमिंटन में सायना नेहवाल, पीवी सिन्धु व हॉकी टीम के साथ टेनिस से भी पदक आने की उम्मी है। अब तक 86 खिलाड़ी ओलंपिक के लिए कर चुके हैं क्वालिफाई। देश का प्रतिनिधित्व 100 से अधिक खिलाड़ी कर सकते हैं।

खिलाड़ी: - जो निम्न हैं-

  • दीपिका कुमारी-बनाया विश्व प्रमाण- विश्व चैम्पियनशिप (स्पर्धा) पदक विजेता और कॉमनवेल्थ में गोल्ड जीत चुकी दीपिका कुकारी ने हाल ही शंघाई में द. कोरियाई तीरंदाज कि बो-बाई के 720 में 686 के स्कोर की बराबरी कर वर्ल्ड रिकॉर्ड बनाया। इनके पिता ऑटोरिक्शा ड्राइवर थे। झारखंड के रातुचेती गांव में जन्मी दीपिका अपनी तैयारी बांस के तीर-धनुष से करती थी।
  • विजय कुमार- शूटिंग में, 60 परिवार का है गांव। 2012 के ओलंपिक खेल में सिल्वर (चांदी का) पदक जीता। भारतीय सेना में सूबेदार मेजर के तौर पर नियुक्त विजय हिमाचल प्रदेश के हमीरपुर जिले में स्थित एक छोटे से गांव हसरोर के रहने वाले हैं। इस गांव में कुल 60 परिवार ही रहते हैं। वे कॉमनवेल्थ गेम्स (खेल) में पांच गोल्ड (सोना) और एक सिल्वर मेडल जीत चुके हैं।
  • मैरी कॉम- बॉक्सिंग

राज्यसभा की सदस्य बनीं, मणिपुर के एक छोटे से गांव कंगाथेई से निकलकर पहचान बनाई। पांच वर्ल्ड चैपियनशिप की विजेता हैं। चार बार एशियन चैम्पियन, एशियन खेल में स्वर्ण पदक जीत चुकी हैं। इनके पिता एक किसान थे। कैसे इन्होंने सभी चुनौतियों को पीछे छोड़ा, इस पर फिल्म भी बन चुकी है।

अश्वेत खिलाड़ी: - अफ्रीकी मूल के खिलाड़ी बेहतर एथलीट होते हैं। ऐसा कई लोगों का मानना है। यहां तक कि अमरीका में पश्चिमी अफ्रीकी मूल के खिलाड़ियों की संख्या काफी अधिक है। एक खोज में विशेषज्ञों का मानना है कि पश्चिमी अफ्रीकी मूल के खिलाड़ियों के शरीर में मौटापा कम होने की वजह से वे स्प्रिंटिंग, फुटबॉल और बास्केटबॉल में बेहतर होते हैं। जबकि पूर्वी अफ्रीकी मूल के खिलाड़ियों में गैस्ट्रोनीमियस (लोअर काफ मसल्स) पूरी तरह विकसित नहीं होता जिससे ये बेहतर धावक होते हैं। 38 स्प्रिंट (थोड़ी दूर दौड़कर चलना) विश्व प्रमाणित में 28 प्रमाण अश्वेत एथलीटों के नाम, उनमें आधे से अधिक केन्याई के है। 86 मेडल केन्या ने ओलंपिक में जीते हैं। इनमें 63 केवल एथलेटिक्स में हैं। 45 पदक इथियोपिया ने ओलंपिक खेलों में जीते हैं, सभी मेडल एथलेटिक्स में मिले हैं। 67 मेडल जमैका ने ओलंपिक में जीते हैं, इनमें 66 एथलेटिक्स में है। 38 मेडल अफ्रीकी मूल के एथलीट्‌स ने अमरीका की तरफ से 2012 के ओलंपिक में जीता है।

सरकार: -बैडमिंटन स्वीमिंग (तैरना), टेबल टेनिस और टेनिस के राज्य लेवल के उच्च 10 जूनियर (छोटे) खिलाड़ियों (लगभग 120) व उनके अभिभावकों पर किए गए एक सर्वे में ये खुलासा हुआ कि खेल में करियर बनाने को उत्सुक बच्चों में से आधे को ये नहीं पता कि सरकार की ओर से उनके लिए कौन-कौन सी योजनाएं चल रही हैं।

  • 54% से ज्यादा एथलीट व परिवार खेल प्रोत्साहन के लिए सरकार द्वारा चलाई जा रही योजनाओं से अनभिज्ञ हैं।
  • 67% खिलाड़ियों ने माना कि वे स्पोट्‌र्स में कॅरियर (खेल में जीवनवृति) बनाना चाहते हैं।
  • 57% खिलाड़ी कोच की सलाह पर, 27% फिजियो की सलाह पर फिटनेस रूटीन फॉलो (उपर्युक्ता या अनुकूलता नित्य कर्म अनुसरण) करते हैं।
  • 23% अभिभावकों ने कहा कि वे कमाई का 40 फीसदी खर्च बच्चों के खेल पर करते हैं।
  • 50% खिलाड़ी डाइट प्लान फॉलो (भोजन संबंध योजना का अनुसरण करना) नहीं करते।
  • 42% कोई पौष्टिक सप्लीमेंट नहीं लेते।
  • 21% ने प्रोफेशनल (व्यावसायिक) न्यूट्रीशियन से डाइट (भोजन) संबंधी सलाह ली है।

गो स्पोट्‌र्स फाउंडेशन, फिक्की, 2014

सर्वे: -भारत में बच्चों की फिटनेस, 27, 918 बच्चों को 2014 में स्पोट्‌र्स प्रोग्राम (खेल कार्यक्रम) के तहत दो वर्ष तक रखा गया। हर सप्ताह उन्हें स्पोट्‌र्स के तीन अतिरिक्त क्लास (कक्षा) दिए गए। इसके बेहतर नतीजे आए। 7 - 17 वर्ष, 287 स्कूल, 85 शहर 23 राज्य 40% बच्चों का बीएमआई बॉडी (शरीर) मास इंडेक्स (सूची) मानक से नीचे है। 40% बच्चों में शहनशक्ति की क्षमता मानक से नीचे है।

table of Increased growth of children

table of Increased growth of children

बढ़ गया बच्चों का स्टैमिना

बीएमआई

1 प्रतिशत बढ़ा

स्प्रिंटिंग एबिलिटी

1 प्रतिशत की बढ़त

फ्लोक्सिबिलिटी

2 प्रतिशत की बढ़त

लेअर बॉडी स्ट्रेंथ

4 प्रतिशत की बढ़त

अपर बॉडी स्ट्रेंथ

5 प्रतिशत की बढ़त

मिल्खा सिंह: - फ्लाइंग सिख का रिकॉर्ड (प्रमाण), 5 गोल्ड मेडल (स्वर्ण पदक) जीता। एशियन गेम्स में 4 और कॉमनवेल्थ में एक। 1 सिल्वर मेडल (चांदी का पदक) मिला। पाकिस्तानी जनरल अयूब खान ने दिया फ्लांइग सिख नाम।

एथलेटिक्स में भारत अब तक ओलंपिक खेलों में एक भी पदक नहीं जीत पाया है। वर्ष 1960 में फ्लाइंग सिख नाम से मशहूर मिल्खा सिंह पदक जीतने से चूक गए थे। वर्ल्ड (विश्व) एथलेटिक्स डे (दिन) के मौके पर देश में एथलेटिक्स के भविष्य व रियो ओलंपिक में भारतीय टीम के पदक जीतने की संभावनाओं पर आकाश कुमार ने की मिल्खा सिंह से खास बातचीत।

1 प्रश्न- क्या कारण है कि ओलंपिक खेलों में हमारे एथलीट्‌स पदक नहीं जीत पाते हैं?

उत्तर- मैं इस बात को नहीं मानता कि देश में टेलेंट (हुनर) की कोई कमी है। कमी हमारी इच्छाशक्ति व परिश्रम में है जिसके कारण हम अब तक ओलंपिक खेलों में पदक से वंचित है। भारत ने पीटी ऊषा, श्रीराम सिंह, अंजू बेबी जॉर्ज जैसे एक से बढ़कर एक एथलीट्‌स दिए हैं, पर दुर्भाग्यवश हम ओलंपिक में एक भी पदक नहीं जीत पाए। पदक न जीत पाने का एक बड़ा कारण यह है कि हम एथलीट बनने की तैयारी बचपन से नहीं करते। विद्यालय व महाविद्यालय स्तर पर खेल को बढ़ावा देने के ठोस प्रयास की कमी रही है। हालांकि स्थितियां अब सुधर रही हैं। पदक न जीत पाने में कुछ खामियां हमारे खिलाड़ियों की रही तो कुछ खेलसंघों की भी। दोनों स्तर पर सुधार की जरूरत है। ओलंपिक खेलों में सफल होने का मंत्र है कड़ी मेहनत और दृढ़ इच्छाशक्ति। इसी से मेडल मिल सकता है।

2 प्रश्न- ऐसे कौन-कौन से उपाय किए जाएं जिनसे हमारे खिलाड़ियों का प्रदर्शन सुधरे। सरकारी स्तर पर क्या किया जाना चाहिए?

उत्तर: - सबसे पहले सरकार को खिलाड़ियों के प्रशिक्षण में काम आने वाले उपकरण और तकनीकी में सुधार लाने का प्रयास करना चाहिए। जो तकनीक दूसरे देशों में पुरानी हो जाती है, हम वो अपने खिलाड़ियों के लिए लेकर आते हैं। सरकार को खिलाड़ियों की प्रशिक्षण और भोजन पर ध्यान देना चाहिए।

3 प्रश्न- क्या हमारे खिलाड़ियों को विदेशी कोच की जरूरत है?

उत्तर: - खिलाड़ियों को उचित प्रशिक्षण मिल सके, इसके लिए हमे अंतरराष्ट्रीय स्तर के कोच की जरूरत है, चाहे वे देसी हो या विदेशी। हकीकत यह है कि देश में अनुभवी व कुशल कोच की कमी है। इसके लिए संस्था को कारगर कदम उठाना चाहिए। खिलाड़ी को तैयार करने में कोच की अहम भूमिका होती है।

4 प्रश्न- अंतरराष्ट्रीय स्तर के एथलीट पैदा नहीं कर पाने के लिए क्या सरकार को जिम्मेदार ठहराया जा सकता है?

उत्तर- नहीं मैं नहीं जानता कि इसके लिए सरकार जिम्मेदार है। हमारे समय में खिलाड़ियों को पूरी सुविधाएं नहीं मिल पाती थीं, लेकिन अब ऐसी स्थिति नहीं है। सरकार खिलाड़ियों पर खर्च कर रही है, प्रशिक्षण दिला रही है। जीतने के लिए मेहनत तो खिलाड़ियों को ही करनी होगी।

5 प्रश्न- ऐसे कौन-कौन से खेल हैं जिनमें पोटेंशियल तो है लेकिन पद नहीं मिल पा रहे हैं?

उत्तर- ओलंपिक में 1980 तक हॉकी का प्रदर्शन अच्छा था। मुझे उम्मीद है कि हॉकी की टीम अच्छा करेगी। शूटिंग, तीरंदाजी, कुश्ती में भारत को अपेक्षित सफलता मिली है, पर इसे संतोषजनक नहीं कहा जा सकता है। उन्हें ओर अधिक मेहनत करनी होगी। हमारे सभी खिलाड़ियों स्तर पर खिताब जीत सकते हैं।

6 प्रश्न- खेलसंघो पर नेताओं का कब्जा है इससे क्या खेल को हानि हुई हैं?

उत्तर- यह खिलाड़ियों के उत्साहवर्द्धन का समय है। मेरी शुभकामनाएं उनके साथ हैं एथलेटिक्स में अगर गोल्ड मेडल जीतते हैं तो मेरा सपना पूरा हो जाएगा।

उपसंहार: - प्रस्तुत सभी बातों से यह पता चला है कि हमारे भारत के खिलाड़ियों में इच्छाशक्ति की थोड़ी बहुत कमी है लेकिन अभी उनके पास समय है क्योंकि आने वाले रियो ओलंपिक में वे अपना बेहतर प्रदर्शन करके भारत के लिए पदक जीत सकते हैं। यह उनके लिए सुनहरा अवसर होगा।

- Published on: June 22, 2016