हमारे पुराने उत्पाद जो अब बंद हो गए (Our Old Products, Which are Now No More Used) [ Current Affairs - Economics ]

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प्रस्तावना:- दुनिया में वीसीआर बनाने वाली इकलौती जनसमूह ने अब उत्पादन बंद कर दिया है। दूसरे उत्पाद में, देश की बड़ी बिस्किट निर्माता जनसमूह ने लगभग 90 साल पुराने कारखाने बंद कर दीए हैं। लोग यादों के गलियारों में पहुंच गए है। उत्पाद केवल बाजार का अर्थशास्त्र ही नहीं हैं बल्कि इससे लोगों की भावनाएं भी जुड़ी होती हैं। उत्पाद लोगों की जिंदगी में शामिल हो जाते हैं। सोच और जीवनशैली में बदलाव लाते हैं। पीढ़ियां इन्हें इस्तेमाल करती हैं। और इनके साथ जुड़ी यादों को संजो कर रखती हैं। पिछले महीने जुलाई 2016 को ही आर्थिक उदारीकरण के 25 साल पूरे हुए। इस दौरान बाजार से कुछ उत्पाद विदा हुए।

जापान की वीसीआर:-

  • जापानी जनसमूह फूनाई ने गत माह 7 जुलाई 2016 को वीसीआर का उत्पादन बंद कर दिया गया। फूनाई दुनियाभर में वीसीआर बनाने वाली आखिरी जनसमूह था। जबकि पिछले वर्ष फूनाई ने साढ़े 7 लाख वीसीआर बेचे थे।
  • अचानक यादों का समंदर घुमड़ गया। कभी देश के लोगों के लिए दूरदर्शन से आगे की दुनिया की खिड़की हुआ करता था। एशियाड ने टीवी को कई घरों का लाड़ला बना दिया था। वीसीआर ने हॉलीवूड को भी टॉपगन, इविल डैड, हाउस ऑफ द वैक्स, बेवरली हिल्स कॉप, मैकानाज गोल्ड जैसी फिल्मों के दव्ारा घर की चारदिवारी में ला दिया। अमिताभ, आमिर खान, जैसे वीडियों कैसेट के दव्ारा भारतीय परिवारों से घुल-मिल रहे थे। पड़ोसी देश पाकिस्तान का सीरीयल ’बकरा किस्तों पर’ भी हमारे देश में खूब देखा गया। ये वो दौर था जब सिनेमाघर अपनी चमक खो रहे थे। गली-गली वीडियों पार्लर खुलने लगे थे। वैसे 80 के दशक में रंगीन टेलीविजन ही घरों में दुर्लभ हुआ करते थे। वीसीआर तो दूर की बात थी। ऐसे में किराए पर वीसीआर और रंगीन टीवी का कॉम्बोपैक मिला करता था। पूरा मोहल्ला एक ही रात में तीन-तीन फिल्में देख लिया करता था। इसके लिए 10-10 रुपए प्रत्येक घर से एकत्रित होते थे। स्कूटर पर वीसीआर -टीवी का मालिक घर में वीसीआर को पहुंचाता था। संपर्क जोड़ने के साथ ही शुरू हो जाता था घर में सिनेमा। दोस्त, पड़ोसी और रिश्तेदार सभी अपनी-अपनी स्थान पर बैठ जाते थे। ऐसे में कुछ अगर वीसीआर में कुछ खराबी हो जाए तो सबका मन खराब हो जाता था। अधिकतर वीसीआर शनिवार को देखा जाता था ताकि रविवार को सब दिनभर सोते रहे। लेकिन अब हमारे परिवार से वीसीआर बिल्कुल ही अलविदा हो गये है।

सबक:-

  • कोई भी उत्पाद कुछ अहम कारणों के चलते लोगों में अपनी पैठ बनाता है। इनमें शामिल है नवाचार, उपयोगिता और उपभोक्ताओं के प्रति समर्पण। यदि हम वीसीआर की बात करतें हैं तो शुरूआत के समय अपने आप में एक अनुठा प्रोडक्ट (उत्पादन) था ग्रामीण और शहरी भारत में इसका समान रूप से असर दिखाई दिया। मनोरंजन के साधन के रूप में वीसीआर के दव्ारा लोगों को छोटा सिनेमा का आनंद मिला। उस समय वीसीआर के सामने कोई प्रतिदव्ंदी भी नहीं था। वीसीआर की ये मोनोपॉली (वाणिज्य, किसी वस्तु के उत्पादन या वितरण का एकाधिकार) डीवीडी प्लेयर के आने तक कायम रही। लेकिन एक बार बाजार में डीवीडी प्लयेर और पेनड्राइव आई तो इन्होंने वीसीआर को किनारे कर दिया। लेकिन हम आज भी ये कह सकते हैं कि जिस प्रकार से वीसीआर ने हमारी जीवनशैली पर प्रभाव डाला है ठीक उस प्रकार का असर डीवीडी प्लेयर (वाद्ययंत्र का) और पेनड्राइव कतई नहीं डाल पाए। वीसीआर के भारतीय जीवनशैली और लोगों पर प्रभाव को भुलाया नहीं जा सकता हैं। वीसीआर की प्रसिद्धि से हमें कई सबक भी मिलते हैं, कैसे कोई उत्पादन अपने नवाचार से लोगों में जगह बनाता हैं। देखने में आया है कि कोई भी उत्पादन अमरता भी पा लेता है।

पारले-जी बिस्किट:-

  • पिछले दिनों देश की बड़ी बिस्किट जनसमूह पारले -जी ने मुंबई में अपनी लगभग 90 साल पुराना कारखाना को बंद करने का ऐलान किया है। देशभर के समाज संचार दव्ारा में तीखी प्रतिक्रियाएं आने लगी। इससे ये दर्शाता है कि किसी उत्पाद विशेष के साथ लोगों का किस कदर जुड़ाव हो जाता है। लोगों की उत्पाद के साथ यादें जुड़ी होती हैं। बचपन के वो दिन और बिस्किट की बाइट। आज बाजार बिस्किट और टॉफियों से भरा हुआ हैं। इनमें से अधिकांश की पैंकिग खासी लुभावनी होती है लेकिन लोगों का हाथ अब भी पुराने उत्पाद पर ही जाता है।
  • गोली-चूरण से टॉफी-बिस्किट का जो बचपन है वे मोहल्ले के दुकानदार के मर्तबान में सजी रंगबिरंगी गोलियां में होता था कुछ खट्‌टी कुछ मीठी। कुछ मर्तबानों में पैक वाली टॉफी और बिस्कुिट (तब बिस्किट शब्द आम चलन में नहीं था)। बचपन इन्हीं के इर्दगिर्द सिमटा हुआ था। नारंगी की फांक जैसी गोली और कोला स्वाद वाला गोला जो किसी उत्पाद का नहीं होता था, लेकिन इन्हें बड़े चाव से खाया जाता था। दस पैसे में ही ये ढेर से मिल जाया करते थे। बचत के पैसे में ही यदि ग्लूकोज वाले बिस्किट मिल जाए तो बच्चों की मौज हो जाती थी। मेहमान को भी चाय के साथ बिस्किट पेश करना भारतीय मध्यमवर्गीय परिवारों में अघोषित कानून सा था। हमारी संस्कृति के अनुसार चाय के साथ बिस्किट अवश्य दिए जाते हैं। उत्पाद के साथ जुड़ाव का भी अपना अलग ही गणित होता है। जब बात टॉफी-बिस्किट की हो तो लाजमी है कि बचपन से ही ये निरूपति हो जाती हैं। 80 के दशक में देश में चॉकलेट के बाजार का तेजी से प्रसार हुआ था। विदेशी उत्पाद के साथ-साथ देश के उत्पाद भी बाजार में छाए। कुछ उत्पाद तो आज भी लोग बड़ी वफादारी के साथ खरीददते हैं, क्योंकि उन उत्पाद के साथ बचपन भी ’वापसी’ होती है।

जनसमूह के पैसा:-

  • डालडा यूएस एग्री एंड फूड्‌स (खाना) के हाथों में वर्ष 2003 में र 90 करोड़ में ही बिक गई।
  • मोटेतौर पर दुनिया भर की शीर्ष 100 उत्पाद वाली जनसमूह र 66,000 अरब उत्पाद कीमत हैं।
  • किसी जनसमूह के उत्पाद विकास कार्यक्रम में र 3.5 करोड़ तक खर्च हो जाता हैं।

गूगल:-

  • पभोक्ता की जरूरत के लिए खुद को विकसित किया। एक सर्च इंजन ही न रहकर वीडियों-मेज शेयरिंग, विज्ञापन या गूगल अर्थ जैसे स्थान दिए। फेसबुक, आईफोन को उत्पाद बनने में 1 से 3 साल का ही समय लगा।
  • विज्ञापनों का भारतीय सकल घरेलू उत्पाद में वर्ष 2018 तक 0.45 प्रतिशत हिस्सा हो जाएगा।

यह वे छ: उत्पाद है जो आर्थिक उदारीकरण के बाद से बाजार से गायब हो गए।

  • प्रीमियर पद्मनी, लक्जरी का प्रतीक थी ये कार:- 70 और 80 के दशक मेे प्रीमियर पद्मनी कार लक्जरी का प्रतीक थी। इटली की फिएट से कॉलाबोरेशन (सहयोग और गद्दारी) था। एम्बैस्डर कार से विपरीत पद्मनी का डिजाइन काफी सुगठित था। मुंबई में काली-पीली टैक्सियों में पद्मनी का ही राज था। वर्ष 2000 में इसका उत्पादन बंद हो गया।
  • बबल गम व क्रिकेट:- 80 के दशक में बिग फन बबल गम बच्चों-युवाओं में खासी लोकप्रिय थीं। एनपी की च्यूइंग गम भी बाजार में थीं। 1987 के क्रिकेट विश्प कप के दौरान बिगफन ने पैकिंग में क्रिकेट स्टार्स की फोटों शुरू की। कई दोस्तों के पास आज भी ये कलेक्शन (संग्रह किया) है। 90 के दशक में बिगफन का गुब्बारा ’फूट’ गया।
  • एचएमटी:- हिन्दुस्तान मशीन एंड टूल्स यानी एचएमटी की घड़ियां राष्ट्र की समय प्रहरी रही हैं। किसी समय भारतीयों की कलाई पर राज करने वाली इन घड़ियों का वर्ष 2016 में उत्पादन बंद हो गया। सरकार ने सार्वजनिक क्षेत्र के इस उपक्रम को घाटे व बाजार में नई जनसमूह के छाने से बंद कर दिया। बहुत समय चला, अब हो गया पूरा।
  • गोल्डस्पॉट (सोने जैसी प्रतीक) ऑरेंज (नारंगी) जांच वाली कोल्डड्रिंक (ठंडा पेय):- 70 और 80 के दशक में गोल्ड स्पॉट ’जिंग थिंग’ हुआ करती थी। युवाओं खासकर बच्चों में इसका आरेंज फ्लेवर (नारंगी स्वाद) काफी लोकप्रिय था। बाजार में बर्फ के टब में गोल्डस्पॉट बॉटल मिला करती थी। अमरीकी बहुरराष्ट्रीय जनसमूह ने इसका अधिग्रहण कर अपना ओरेंज फ्लेवर कोल्ड ड्रिंक बाजार में उतारा।
  • डायनोरा टीवी, ब्लेक एंड व्हाइट (काला और सफेद) संसार था:- देश में सबसे पहले टीवी उत्पाद में से एक। घर में ब्लेक एंड व्हाइट डायनोरा टीवी होना सामाजिक रुतबे की बात थीं। टीवी स्क्रीन (पर्दे) के दानों और प्लाइवुड (लकड़ी) से बनी शटर (दरवाजा) हुआ करती थी। राजस्थान में गुंजन-हवामहल लोकप्रिय उत्पाद थे। आर्थिक उदारीकरण के बाद अन्य उत्पाद आए तो ये ’स्विच ऑफ’ यानी बंद हो गए।
  • यजदी बाइक, डबल साइलेंसर का बड़ा रुतबा:- समाजवादी युग का प्रतीक रही थी यजदी मोटरबाइक। चेकोस्लवाकिया की जनसमूह और मैसूर की फर्म के कॉलेबरेशन (सहयोग और गद्दारी) से आई जावा की शुरूआत हुई थी। यजदी के लगभग सभी नमूना में डबल (दोहरा) साइलेंसर इसकी पहचान थे। बाद में फ्यूल इकोनॉमी (व्यापार, उद्योग) वाली छोटी बाइक (मोटरसाइकिल) आने से यजदी बंद हो गई।

तीन बातें:-

  • कोई भी उत्पाद हो, उसे समाज के बारे में सोचना होता है। उत्पाद जीवन की तरह है। उत्पाद और ग्राहक में रिश्तेदारी होती हैं, उनका आपस में साथ चलना जरूरी होता है। किसी भी अच्छे उत्पाद की एक आत्मा होती हैं।
  • जब उपभोक्ताओं को अहसास होता हैं कि कोई उत्पाद उसके साथ रहेगा, उसके साथ आगे बढ़ेगा और वह समय के नवाचार करते हुए बदलता रहेगा तो लोग उसे अपने जीवन का हिस्सा बनाने लगते हैं।
  • कोई भी उत्पाद शुरूआत के फौरन बाद उत्पाद नहीं बनता हैं। उत्पाद एक लंबी प्रक्रिया होती हैं। उसके पीछे जनसमूह निवेश करती है, उसे समय की जरूरत के साथ बदलती है। उपभोक्ता की दिलचस्पी को समझने की कोशिश करती है।

योजना और सिद्धांत:-

  • अमरीका के चर्चित उद्यमी केविन प्लैक का कहना है कि ये बात तो स्पष्ट है कि उत्पाद केवल उत्पाद मात्र नहीं होता हैं, ये एक प्रकार का योजना और सिद्धांत होता हैं। उत्पाद अपने आप को किस प्रकार से पेश करते है। उत्पाद में आकांशाएं होती है और ये प्रेरणादायी भी होता है। जनसमूहों अपने उत्पाद को स्थापित करने और इसे बरकरार रखने के लिए करोड़ों-अरबों खर्च करते हैं। आज के दौर में हम अपने आप को कई उत्पादों से घिरा पाते हैं। लेकिन संसार में कुछ भी स्थायी नहीं होता हैं। दुनिया में कई उत्पाद को तकनीक में बदलाव आने के कारण बंद होना पड़ता है।
  • देश की ही बात करें तो हमारे यहां पर 80 और 90 के दशक में यामाहा जनसमूह की आरएक्स 100-आरएक्स 135 बाइक युवाओं में खासी लोकप्रिय थीं। टू-स्ट्रोक (दो घंटी या घड़ी की टनटन की ध्वनि) इंजन वाली इन बाइकों का जबरदस्त पिकअप (बेहतर होना, सुधरना) था। लेकिन प्रदूषण फेलाने वाली इस बाइक का उत्पादन वर्ष 1996 में बंद कर दिया गया। इसका कारण बाजार में सरकारी आदेशों के कारण फोर (चार) स्ट्रोक इंजन वाली बाइक का आना था। मारूति-800 कार भारत के उभरते हुए मिडिल क्लास (सामान्य कक्षा) का पहला चौपहिया वाहन बना। बरसों तक भारतीय सड़कों पर फर्राटा भरने के बाद जनवरी 2014 में मारूति-800 का प्रोडक्शन (उत्पादन प्रक्रिया) बंद हो गया। इसके नए वर्जन अब बाजार में हैं।

उत्पादक व ग्राहक:-

  • किसी उत्पाद का ग्राहक से संवाद का क्या तरीका है, कैसे उसकी पैकेजिंग समय और जरूरत के साथ बदलती रहती है ताकि ग्रहाक उससे जुड़ा रहे। यह एक उत्पाद के लिए महत्वपूर्ण होता हैं। उत्पाद को बॉन्डिंग बनाए रखनी होती है और यह उत्पाद दव्ारा पैदा किए गए भरोसे से होता है।
  • जैसे जिंदगी में बहुत सारे लोग हमें मिलते हैं, फिर बिछड़ते हैं। कुछ लोगों से हम ढंग से मिलते हैं और कुछ के साथ थोड़ा समय बिताकर आगे बढ़ जाते हैं। कुछ ऐसे लोग हमारे दोस्त बन जाते हैं, जिनके साथ हम हमेशा रहते हैं। उत्पाद से भी यही रिश्ता होता है। उत्पाद ग्राहक का एक दोस्त होता है। लेकिन जब उत्पाद उस ग्राहक रूपी दोस्त को भूल जाता है और ग्राहक की जरूरतें भी बदल जाती हैं तब वह उत्पाद खत्म होने लगता हैं। जिंदगी में भी अगर लोग आपसी दोस्ती नहीं निभाते तो वे एक-दूसरे को भूलने लगते हैं, अगर ग्राहक समय के साथ आगे भाग रहा है और उत्पाद पीछे रह जाता है तो फिर उत्पाद पर संकट लाजमी है। उत्पाद और ग्राहक का जीवन साथ-साथ चलना चाहिए।
  • इसांन की जिंदगी हर दिन बदलती है इसलिए उत्पादको को बदलते जीवन से कदमताल करनी होती है। अगर उत्पाद कदम नहीं मिलाएगा तो उसकी प्रासंगिकता खत्म होती चली जाएगी। फिर कोई उत्पाद नए रूप में उसकी जगह ले लेगा।

ग्राहक और उत्पाद के बीच जब रिश्ता बन जाए तब उत्पाद बनता है। ग्राहक उसे नाम से खरीदने लगता है। ग्राहक की उम्मीदें जुड़ जाती हैं।

                                                                                                        पीयूष पांडे, जाने माने विज्ञापन गुरु

लोगों का विश्वास कायम रखने से ही कोई भी उत्पाद बड़ा उत्पाद बनता है और लंबे समय तक बाजार में टिका रह सकता है।

                                                                                                               अवनीश मिश्रा, बाजार विशेषज्ञ

उपसंहार:- किसी भी उत्पाद के लिए एक कहानी की जरूरत होती हैं। हां, अब इस कहानी के घटक बदल गए हैं। लेकिन कहानी की अहमियत कम नहीं होती है। जब तक उत्पाद, बाजार और उपभोगता है, ये कहानी विभिन्न रूपों में हमेशा दोहराई जाती रहेगी। अर्थात नए-नए रूपों उत्पाद आते जाएगें और ग्राहकों से जुड़ते जाएगे। इसके अलावा कुछ उत्पादों की छाप हमेंशा वीसीआर व बिस्किट की तरह ग्राहकों के मन में बस जाएगें।

- Published on: September 7, 2016