राष्ट्रपति शासन (President’S Rule in Uttarakhand - Essay in Hindi) [ Current Affairs ]

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प्रस्तावना: - उत्तराखंड का राजनीतिक नाटक थमने का नाम ही ले रहा है। विधानसभा में विनियोग विधेयक पर मतदान की मांग को लेकर शुरू हुआ ये नाटक राजभवन, राष्ट्रपति भवन, और उच्च न्यायालय तक पहुंच चुका हैं। उत्तराखंड विधानसभा में विनियोग विधेयक पेश करने के साथ कांग्रेस से बगावत कर नौ विधायक, राज्य में प्रमुख विपक्षी दल भाजपा की शरण में चले गए। मान-मनोबल के दौर चले लेकिन सब बेकार हो गया। विधानसभा स्पीकर ने हालांकि इन विधायकों को विधानसभा की सदस्यता से तो अयोग्य करार देकर कांग्रेस को सदन में बहुमत दिलाने का इंतजाम तो कर लिया लेकिन राष्ट्रपति शासन लागू होने से सारे किए कराये पर पानी फेर दिया गया अर्थात सब बेकार हो गया। सवाल यह है कि इस सारे घटनाक्रम में संवैधानिक तौर पर क्या सही रहा और गलत? नैतिकता ताक पर रखकर राजनीतिक लाभ के लिए फेसले का खामियाजा राज्य क्यों उंठाए? राजनीतिक अस्तित्व की इस लड़ाई में आखिर हारी तो जनता और लोकतंत्र ही है

राज्य: -बड़े राज्यों को विभाजित कर जब छोटे राज्य बनाये जाते है तो समझा जाता है कि ऐसा, विकास के अधूरे छूट जाने वालो कार्यों को पूरा करने के लिए किया गया है। उत्तराखंड, झारखंड और छत्तीसगढ़ ऐसी विकास की अपेक्षाओं के साथ बने थे लेकिन यह बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण लगता है कि वहां विकास की बजाय राजनीति को प्रमुख बताया जाता हैं। जहां तक उत्तराखंड की बात है तो वहां हालांकि शुरुआती दौर में कुछ स्थिरता रही लेकिन बी. सी. खंडूरी और डॉ. रमेश पोखरियाल निशंक जैसे नताओं को हटना पड़ा। भारतीय जनता पार्टी भी वहां स्थिर शासन नहीं दे सकी। ऐसे में उम्मीद थी कि कांग्रेस के शासन में आने पर कुछ स्थिरता देखने को मिलेगी पर ऐसा नहीं हुआ।

उत्तराखंड: - उत्तराखंड की राजनैतिक अस्थिरता वैसी ही है जैसी कि आमतौर पर पूर्वोत्तर राज्यों में देखने को मिलती है। उत्तराखंड ऐसा प्रदेश है जहां गरीबी और असमानता का संकट रहा है पर वहां विकास की अपार संभावनाएं रही है। अब वहां दुर्भाग्य से भ्रष्टाचार और दल-बदल के हालात का घृणित चित्र देखने को मिला है। उत्तराखंड सरकार के हालात देखने से लगता है कि यदि कांग्रेस ने वहां विजय बहुगुणा की बजाय शुरुआत में ही हरीश रावत को मुख्यमंत्री बना दिया होता तो आज जैसी दुर्भाग्यपूर्ण परिस्थितियां तो बिल्कुल ही नहीं होती। सरकार में मंत्री ही विधेयक पर मत विभाजन की मांग करने लगे और वही दल-बदल कर जाएं, इससे अधिक दुर्भाग्यपूर्ण परिस्थतियां क्या होगी? हालांकि एक बार जॉर्ज फर्नांडीज ने जनता पार्टी की सरकार में रहते हुए सरकार का जोरशोर से समर्थन किया और उसकी बड़ी अच्छी तरह से सदन में पैरवी की लेकिन दूसरे ही दिन वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के मुद्दे पर जनता पार्टी से अलग भी हो गए। लेकिन वह वैचारिक मुद्दे पर अलग होना था। उत्तराखंड में ऐसी कोई बात देखने को नहीं मिलती। वहां कोई वैचारिक मतभेद के कारण या विकास के मुद्दे पर अलग होने की बात नहीं की गई। जो लोग कांग्रेस के विरूद्ध गए उन्होंने ऐसा कुछ भी नहीं किया बल्कि वे तो व्यक्तिपरक विरोध रखते हैं। बागी नेताओं में वे हरक सिंह भी शामिल हैं, जो भाजपा में थे जो भाजपा के नेता ही उन पर गंभीर आरोप लगाते थे और ऐसे ही आरोपों के बाद वे पार्टी से निकाल दिए गए। कांग्रेस ने ऐसे गलत लोगों को लिया। लोकतंत्र में यदि कोई जनता के विकास के मुद्दे पर रातों-रात सरकार बदलने को तैयार होता हो उसे ठीक भी कहा जाए लेकिन वहां जो भी कुछ हुआ है, वह अनैतिक तो कहा ही जाएगा। भले ही इन सारी परिस्थितियों के लिए हरीश रावत या राहुल गांधी की अदूरदर्शिता को जिम्मेदार ठहरा दें लेकिन उत्तराखंड के लिए तो यह अच्छा नहीं कहा जा सकता।

अनैतिक: -जरा ये भी सोचिए ऐसे नेता जो कांग्रेस से पाला बदलते हैं, भले ही उन पर भ्रष्टाचार के आरोप ही क्यों न हों वे पता नहीं कैसे भारतीय जनता पार्टी के लिए अनुकूल हो जाते हें। अभी नहीं पता कि उत्तराखंड में कांग्रेस के नौ बागी विधायकों के साथ क्या परिस्थिति बनेगी लेकिन इतना तो कहा ही जा सकता है कि उन्हें भाजपा की ओर से प्रोत्साहित तो किया ही गया। भाजपा ने उसे कांग्रेस का अंदरूनी मामला जऱूर कहा लेकिन यह कभी नहीं कहा कि ऐसे भ्रष्ट लोगों के खिलाफ जांच होनी चाहिए। जरा सोचिए, केदारनाथ विभीषिका से निपटने में सरकार के विफल रहने के बाद ही विजय बहुगुणा को हटाया गया था और भाजपा ने ही उन पर गंभीर आरोप लगाए थे। विजय बहुगुणा और हरक सिंह रावत जैसे नेताओं को भाजपा भले ही समर्थन दे रही हो लेकिन उसकी स्थापना आरएसएस के जिन आदर्शों के आधार पर हुई, उसका ध्यान तो कतई नहीं रखा जा रहा है। हो सकता है राजनैतिक लिहाज से भाजपा के लिए ऐसा करना उसके अपने हित में हो लेकिन नैतिक आधार पर इसे कभी भी शौभाजनक नहीं कहा जा सकता। यद्यपि यह कहना कठिन है कि राष्ट्रपति शासन लागू होने के बाद स्थितियां किस तरह से परिवर्तित होंगी। सच तो यह है कि कुछ आठ-दस महीनों के बाद उत्तराखंड में चुनाव होने ही हैं, ऐसे में समय से पहले चुनाव कराना ठीक तो नहीं कहा जा सकता है।

भाजपा: -इसी तरह एक महत्वपूर्ण सवाल यह भी है कि कांग्रेस के असंतुष्ट बागी नेताओं के सहयोग से भारतीय जनता पार्टी की उत्तराखंड में सरकार बन भी गई तो यह कितनी टिकाऊ होगी? इसके अलावा भाजपा राज्य की जनता को इस बात का क्या जवाब देगी कि जिन्हें कुछ समय पहले तक उसके नेता ही भ्रष्टाचार में डुबा हुआ बता रहे थे वे अचानक देवता पुरुष कैसे बन गए? क्या संवैधानिक गड़बडियां हुई, इसकी समीशा संविधान विशेषज्ञ करते रहेंगे लेकिन इतना जरूर है कि दोनों ही दलों की ओर से अपने राजनैतिक अस्तित्व को बढ़ाने और बचाने को लेकर जिस तरह के प्रयास किए गए, वे विकास और लोकतंत्र के दृष्टि से ठीक नहीं हें। उत्तराखंड की जनता तो विकास चाहती है, गरीबी से मुक्ति चाहती है लेकिन इस मामले में वही पिछड़ती लग रही हैं।

संविधान: - के अनुच्छेद-356 के मुताबिक अगर राष्ट्रपति को संबंधित राज्य के राज्यपाल से या अन्य माध्यम से रिपोर्ट मिले कि राज्य में ऐसी स्थिति आ खड़ी हुई है, जिसमें राज्य सरकार संवैधानिक प्रावधानों के अनुरूप शासन नहीं कर सकती है। तब राष्ट्रपति उस राज्य में राष्ट्रपति शासन की घोषणा कर सकते हैं। यहां लगे कई बार राष्ट्रपति शासन जो निम्न हैं-

Details of President’s Rule

Details of President’s Rule

राष्ट्रपति शासन

राज्य

अवधि

समय

राजस्थान

1967, 1977, 1980 और 1992

चार साल

मध्यप्रदेश

1977, 1980, 1992

तीन साल

मणिपुर

-

10 बार

उत्तरप्रदेश

-

9 बार

बिहार

-

8 बार

राष्ट्रपति शासन का सबसे लम्बा दौर

जम्मु-कश्मीर

19 जनवरी 1990 से 9 अक्टूबर 1996

6 साल

264 दिन

पंजाब

11 जून 1987 से 25 फरवरी 1992

4 साल

259 दिन

अरुणाचल प्रदेश

25 जनवरी 2016 से 14 फरवरी 2016 तक

18 दिन

उत्तरांखड

27 मार्च 2016

अनिश्चतकाल के लिए

जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री मुफ्ती मोहम्मद सईद के निधन के कारण राज्य में सरकार नहीं बन पाई। लिहाजा 8 जनवरी 2016 को राज्य में राष्ट्रपति शासन लगा जो अब तक लागू है।

हमारे देश के संविधान में स्पष्ट प्रावधान है कि राष्ट्रपति को संविधान के अनुच्छेद 356 के अंतर्गत किसी राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू करने का अधिकार है। ऐसा करने के लिए राष्ट्रपति के पास राज्यपाल की सिफारिश भेजी जाती है और राष्ट्रपति इस बात से यदि संतुष्ट हो जाते हैं कि राज्य में संविधान के अनुसार शासन नहीं चल रहा है तो वे राज्य में राष्ट्रपति शासल लागू करने का आदेश दे सकते हैं। आमतौर पर इस मामले में केंद्रीय मंत्रिपरिषद की राय पर फैसला लिया जाता है। उत्तराखंड के मामले में भी ऐसा ही हुआ है।

फैसला: - इस मामले में कोई दो मत हो नहीं सकते कि किसी भी राज्य में राष्ट्रपति शासन अंतिम विकल्प ही होना चाहिए। चूंकि इस मामले में राज्यपाल के सिफारिश के साथ केंद्रीय मंत्रिपरिषद की राय मायने रखती है तो ऐसे में कहा जा सकता है कि राष्ट्रपति बहुत ही सोच-विचार कर ऐसा फैसला करते हैं। उत्तराखंड के मामले में भी इसी तरह की परंपरा का निर्वहन हुआ है, तो ऐसे में कहा जा सकता है कि राष्ट्रपति का यह फैसला भी सोच-समझकर लिया गया फैसला ही है। यह बात अलग है कि कोई राष्ट्रपति की राय से सहमत हो या नहो। वैचारिक भिन्नता रखने की आजादी भी हमारे देश में है।

किसी भी परिणाम पर पहुंचने से पहले हमें साधारण सी यह बात सभी को समझनी चाहिए कि क्या उत्तराखंड विधानसभा में सरकार बहुमत खो चुकी थी? ऐसी स्थिति थी तो मुख्यमंत्री को आगे बढ़कर खुद ही त्यागपत्र दे देना चाहिए था। दूसरी बहुत ही महत्वपूर्ण बात यह है कि उत्तराखंड विधानसभा में विनियोग विधेयक को पारित करवाने से पूर्व यदि एक भी सदस्य यह कह दे कि मत विभाजन किया जाना चाहिए, ऐसे में स्पीकर इस बात के लिए बाध्य है कि मत विभाजन करवाया जाए। मत विभाजन की ऐसी मांग हर स्थिति में स्वीकार करनी चाहिए। उत्तराखंड विधानसभा स्पीकर ने ऐसा नहीं किया तो यह भी एक बड़ी गलती ही कहलाएगी। अब जो दावे किये जा रहे हैं। कि कितने विधायक किसके साथ हैं या कहें कि सरकार को विश्वास मत हासिल है, यह साबित करने का उसे मौका मिलना ही चाहिए, तो इस बात का अब कोई महत्व नहीं रह गया है। ऐसा इसलिए क्योंकि विनियोग विधेयक को पारित करते समय मत विभाजन के साथ ही इस बारे में स्पष्ट हो जाता कि सरकार को विश्वास मत हासिल है भी कि नहीं लेकिन दुर्भाग्यपूर्ण बात यह रही कि इस मामले ऐसा नहीं हुआ।

न्यायालय: - उच्च न्यायालय के फेसले के खिलाफ केंद्र सुप्रीम न्यायालय में जाने की बात कर रहा है। केंद्र का मानना है कि कोई भी अदालत राष्ट्रपति के फेसले पर रोक नहीं लगा सकती। तो क्या उच्च न्यायालय के न्यायाधीश को ये पता नहीं कि उन्हें राष्ट्रपति के फेसले पर रोकने का अधिकार नहीं?

विधानसभा: -उत्तराखंड में यदि कांग्रेस के नौ विधायकों को सरकार बचाने के लिहाज से आनन-फानन में विधानसभा में अयोग्य घोषित करने का फैसला किया जाता है तो कानून के मुताबिक उसे वैध नहीं कहा जा सकता क्योंकि इस फेसले के पीछे सरकार और स्पीकर की गलत नीयत उजागर होती है। बेहतर होता कि इन विधायकों को पूरी वैधानिक प्रक्रिया अपनाते हुए अयोग्य ठहराया जाता लेकिन ऐसे नहीं किया गया। दूसरी बात यह कि कांग्रेस के बागी हुए विधायकों ने उच्च न्यायालय का दरवाजा तो खटखटाया लेकिन विधानसभा में अयोग्य घोषित किए जाने से पहले ही उन्होंने ऐसा कदम उठा लिया। यदि वे स्पीकर के फेसले के बाद ऐसा कदम उठाते तो उनका कदम सही कहा जा सकता हैं। इस मामले में उच्च न्यायालय ने बिल्कुल सही फैसला दिया हैं।

किरदार: - राष्ट्रपति शासन के तीन किरदार निम्न हैं-

राज्यपाल- राज्य में संवैधानिक प्राधानों की अनेदखी होने पर राज्यपाल कानूनी सलाहकारों से विचार-विमर्श के बाद गृह मंत्रालय को अपनी रिपोर्ट भेजते हैं। ऐसी रिपोर्ट राज्यपाल स्वयं भी भेज सकते हैं और केंद्रीय गृह मंत्रालय उनसे मांग भी सकता हैं।

केंद्रीय केबिनेट- यह राज्यपाल और राष्ट्रपति के बीच मध्यस्थ की भूमिका निभाती है। राज्यपाल की रिपोर्ट का अध्यन करने के बाद केंद्रीय केबिनेट राष्ट्रपति से अनुच्छेद-356 का उपयोग करते हुए राष्ट्रपति शासन लगाने की अनुशंसा करती है।

राष्ट्रपति- राष्ट्रपति केंद्रीय केबिनेट की अनुशंसा के आधार पर फैसला लेते हें। यह जरूरी नहीं है कि राष्ट्रपति केंद्रीय केबिनेट की अनुशंसा स्वीकारें ही। राष्ट्रपति पूर्ण आश्वस्त हों कि राज्य में सरकार संवैधानिक प्रावधानों के अनुरूप नहीं चल रही है तब केंद्रीय केबिनेट की अनुशंसा स्वीकारते हैं और राष्ट्रपति शासन की घोषणा करते हैं। मतदान: - उत्तराखंड में राजनीतिक भूचाल के बीच नैनीताल उच्च न्यायालय ने ऐतिहासिक फैसला लिया है। राष्ट्रपति शासन को चुनौती देने वाली याचिका पर न्यायाधीश यूसी ध्यानी ने कांग्रेस को 31 मार्च को बहुतम साबित करने का आदेश दिया है। वहीं बागी विधायकों की बर्खास्तगी की याचिका पर कहा कि ये 9 बागी भी बहुमत के लिए होने वाले मतदान में हिस्सा लेगे। हालांकि उनके मत तब तक अलग रखे जायेंगे जब तक राष्ट्रपति शासन के खिलाफ दायर याचिका पर फैसला नहीं आ जाता। कानून के अनुसार इतिहास में पहली बार ऐसा होगा जब किसी राज्य में राष्ट्रपति शासन लगा हो और बहुमत साबित करने के लिए मतदान भी हो रहे हों।

समाधान: -राजनीतिक रस्साकशी के इस दौर में ऐसा रास्ता निकालने की जरूरत है जिससे उत्तराखंड के राजनीतिक हालात सामान्य हो सकें। नहीं तो पहले ही केदारनाथ की त्रासदी की पीड़ा से उत्तराखंड अब तक उभर नहीं सका है और अब यह उत्तराखंड की राजनीतिक। इसलिए इस बात का ध्यान रखना होगा कि आगे किसी भी राज्य में ऐसी स्थिति न आये जहां पर राष्ट्रपति शासन लगाना पड़े।

भाजपा को केंद्र में शासन करने का अवसर मतदाताओं ने अच्छे दिन लाने के लिए दिया था। भाजपा को इस राजनीतिक खेल में उलझने के बजाय अपने वादों में अमल की दिशा में आगे बढ़ने पर ध्यान देना चाहिए। इसके अलावा कांग्रेस को उत्तराखंड को एक सबक के रूप में लेना चाहिए। अपनी सरकारों और संगठन को मिल-बैठकर सुलझाने की आदत भी डालनी चाहिए।

उपसंहार: -अब तक हम देख चुके की किसी भी राज्य में अगर कोई पार्टी स्थिर नहीं हो पाती है तो वहां जनता के विकास के लिए राष्ट्रपति शासन लगाना अनिवार्य हो जाता है ताकि उस राज्य का काम अगली नई व मजबूत पार्टी आने तक रूके नहीं। अब आगे उत्तराखंड में कौनसी पार्टी आती है और स्थिर रहती है यह तो आने वाला समय ही बताएगा।

- Published on: April 19, 2016